श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१
प्रार्थनारूपं शृण्वन्तु विश्वेऽमृतस्य | [विद्वान्की कीर्तिकी भाँत मेरा श्लोक
ब्रह्मणः पुत्राः सूत्रात्मनो हिरण्य- | विस्तारको प्राप्त हो—] इस प्रार्थनारूप
गर्भस्य । के ते ? ये धामानि | वाक्यको अमृत—ब्रह्म यानी
दिव्यानि दिवि भवान्यातस्थु- | हिरण्यगर्भके सूर्यरूप समस्त पुत्र
रधितिष्ठन्ति ॥ ५ ॥ | सुनें । वे कौन हैं ?—जिन्होंने
| सम्पूर्ण दिव्य—द्युलोकान्तर्गत धामों-
| पर अधिकार कर रखा है ॥ ५ ॥
सविताकी अनुज्ञाके बिना हानि
युञ्जानः प्रथमं मन इत्यादिना | ‘युञ्जानः प्रथमं मनः’ इत्यादि
सवित्रादिप्रार्थना प्रतिपादिता । | मन्त्रसे सविता आदिकी प्रार्थना कही
यस्तु पुनः प्रार्थनामक़त्वा तैर- | गयी । किन्तु जो पुरुष उनकी
ननुज्ञातः सन्योगे प्रवर्तते स | प्रार्थना न करके उनकी अनुज्ञाके
भोगहेतौ कर्मण्येव प्रवर्तत | बिना ही योगमें प्रवृत्त होता है
इत्याह— | उसकी भोगके हेतुभूत कर्मोंमें ही
| प्रवृत्ति हो जाती है—यह बात अब
| श्रुति बतलाती है—
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते ।
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥
जहाँ ( अग्न्याधानादि कर्ममें ) अग्निका मन्थन किया जाता है,
जहाँ वायुका अधिरोध होता है और जहाँ सोमरसकी अधिकता होती है
उन कर्मोंमें ही [ उसके ] मनकी प्रवृत्ति होती है ॥ ६ ॥
अग्निर्यत्रेति । अग्निर्यत्राभिम- | ‘अग्निर्यत्र’ इत्यादि । जहाँ अग्न्या-
| धानादिमें अग्निका मन्थन किया जाता
थ्यत आधानादौ । वायुर्यत्राधि- | है, जहाँ प्रवग्र्यादि ( वायुकी स्तुति