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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय ६ ]

अध्याय ६ ]
शाङ्करभाष्यार्थ
२४५


[वाम स्तम्भ / Left Column]

तपःप्रभावादिति । तपसः
कृच्छ्रचान्द्रायणादिलक्षणस्य, तत्र
तपःशब्दस्य रूढत्वात् । नित्या-
दीनां विधिवदनुष्ठितानां कर्मणा-
मुपलक्षणमिदम् । “मनसश्चे-
न्द्रियाणां च ह्येकाग्र्यं परमं
तपः” इति स्मरणात् । तस्य
च सर्वस्य तपसस्तस्मिञ्श्वेता-
श्वतरे नियमेन सत्त्वात्तत्प्रभावा-
त्तत्सामर्थ्याद्देवप्रसादाच्च कैवल्य-
मुद्दिश्य तदधिकारसिद्धये बहु-
जन्मसु सम्यगाराधितपरमेश्वरस्य
प्रसादाच्च ब्रह्मापरिच्छिन्नमह-
त्त्वम् । ह इति प्रसिद्धद्योतनार्थः ।
श्वेताश्वतरो नाम ऋषिर्विद्वान्य-
थोक्तं ब्रह्म परम्पराप्राप्तं गुरु-
मुखाच्छ्रुत्वा मनननिदिध्यास-
नादरनैरन्तर्यसत्कारादिभिर्ब्रह्माह-
मस्मीत्यपरोक्षीकृताखण्डसाक्षा-
त्कारवान् ।


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

‘तपःप्रभावात्’ इत्यादि । ‘तपसः’
अर्थात् कृच्छ्रचान्द्रायणादिरूप तपके
[ प्रभावसे ], क्योंकि उसीमें ‘तप’
शब्द रूढ है । यह विधिवत् अनुष्ठान
किये हुए नित्यादि कर्मोंका उपलक्षण
है, क्योंकि “मन और इन्द्रियोंकी
एकाग्रता ही परम तप है” ऐसा
स्मृतिवाक्य है । वह सम्पूर्ण तप
श्वेताश्वतर ऋषिमें नियमसे होनेके
कारण उसके प्रभाव यानी सामर्थ्यसे
तथा भगवान्‌की कृपासे—कैवल्य-
पदके उद्देश्यसे उसका अधिकार
प्राप्त करनेके लिये अनेकों जन्म-
पर्यन्त सम्यक् प्रकारसे आराधना
किये हुए परमेश्वरकी प्रसन्नता-
से जिसकी महिमाकी कोई सीमा
नहीं है, उस ब्रह्मको—यहाँ ‘ह’
शब्द प्रसिद्धिका द्योतक है--श्वेता-
श्वतरनामक ऋषिने जाना अर्थात्
यथावत्रूपसे वर्णन किये हुए
परम्परागत ब्रह्मतत्त्वको गुरुदेवके
मुखसे श्रवण कर मनन, निदिध्यासन,
आदर ( श्रद्धा ), निरन्तर अभ्यास
एवं सत्कारादिके द्वारा ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस
प्रकार अपरोक्ष किया अर्थात् अखण्ड-
वृत्तिसे उसका साक्षात्कार किया ।