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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३

| चशब्दोऽवधारणे, अविनाश्येव | यहाँ 'च' शब्द निश्चयार्थक है अर्थात् |
| ब्रह्म, मायात्मकत्वाद्विकारस्य । | ब्रह्म अविनाशी ही है, क्योंकि विकार |
| विकाराश्रयत्वेऽप्यविनाश्येव कूट- | मायिक है। अभिप्राय यह है कि |
| स्थं ब्रह्मावतिष्ठत इत्यभिप्रायः । | विकारका आश्रय होनेपर भी कूटस्थ |
| मायात्मकत्वं च प्रपञ्चस्य पूर्वमेव | ब्रह्म अविनाशी ही रहता है । |
| प्रपञ्चितम् । तस्मात्सर्वात्मक- | प्रपञ्चका मायामय होना तो पहले |
| त्वेऽपि ब्रह्मणः प्रपञ्चस्य मिथ्या- | ही विस्तारसे बतला दिया गया है । |
| त्मकत्वेन ब्रह्मणः प्रपञ्चासंसर्गा- | अतः तात्पर्य यह है कि ब्रह्म यद्यपि |
| त्पूर्णानन्दब्रह्मात्मानं पश्यतो | सर्वरूप है तथापि प्रपञ्च मिथ्या |
| मोक्षाख्यः परमपुरुषार्थो भवती- | होनेसे ब्रह्मसे प्रपञ्चका कोई सम्बन्ध |
| त्यर्थः । | नहीं है । अतः पूर्णानन्दस्वरूप |
| | ब्रह्मात्मभावका दर्शन करनेवाले |
| | पुरुषको मोक्षरूप परम पुरुषार्थकी |
| | प्राप्ति होती है । |
| कथं तस्यात्मानं पश्यतो | अब श्रुति यह बतलाती है कि |
| (पूर्णानन्द-ब्रह्मात्मानं पश्यतो मोक्षसिद्धिप्रकारः) मोक्षसिद्धिरित्यत | उस आत्मदर्शीको किस प्रकार मोक्ष- |
| आह—अत्रास्मिन्न- | की प्राप्ति होती है ? यहाँ—अन्नमय |
| न्नमयाद्यानन्दमया- | कोशसे लेकर आनन्दमय कोशपर्यन्त |
| न्ते देहे विराडाद्यव्याकृतान्ते वा | इस देहमें अथवा विराट्से लेकर |
| प्रपञ्चे पूर्वपूर्वोपाधिप्रविलयेनोत्त- | अव्याकृतपर्यन्त प्रपञ्चमें पूर्व-पूर्व |
| रोत्तरमप्यशनायाद्यसंसृष्टं वाचा- | उपाधिका लय करते हुए उत्तरोत्तर |
| मगोचरं ब्रह्मविदो विदित्वा | क्षुधादिके संसर्गसे शून्य वाणी- |
| लीना ब्रह्मणि विश्वाद्युप- | के अविषयभूत ब्रह्मको जानकर |
| संहारमुखेन लयं गता अहं | ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममें लीन हो— |
| ब्रह्मास्मीति ब्रह्मरूपेणैव स्थिता | विश्वादिका उपसंहार करते हुए ब्रह्ममें |
| | ही लयको प्राप्त हो 'मैं ब्रह्म हूँ' |
| | इस प्रकार ब्रह्मरूपसे ही स्थित हो |