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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 276 में से

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पृष्ठ 104

९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
"तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदि- | भी परे है", "तू उसीको ब्रह्म जान,
दमुपासते” (के० उ० १।४)। | जिसकी लोक इदंभावसे उपासना
"अस्थूलम्” (बृ० उ० ३ । | करता है वह ब्रह्म नहीं है", "वह
८।८) अशब्दमस्पर्श" (क० | स्थूल नहीं है", "शब्दरहित है
उ० १ । ३ । १५) । "स एष | और स्पर्शरहित है", "वह ब्रह्म यह
नेति नेतीति ।” “ततो यदुत्तर- | (कारण) नहीं है, यह (कार्य)
तरम्" (श्वेता० उ० ३ । १०)। | नहीं है", "जो उससे भी आगे
"अन्यत्र धर्मात्” (क० उ० १।२। | है", "वह धर्मसे परे है" "न
१४)। “न सन्न चासच्छिव एव | सत् है न असत्, वह शुद्ध-
केवलः” (श्वेता० उ० ४ । १८)। | स्वभाव एवं अविद्याजनित विकल्पसे
"तमसः परः ।” “यतो वाचो | शून्य है", "वह अज्ञानसे परे है",
निवर्तन्ते ।” (तै० उ० २।४।१) | "जहाँसे वाणी लौट आती है",
"यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति | “जहाँ न अन्य कुछ देखता है, न
नान्यद्विजानाति स भूमा” (छा० | अन्य कुछ जानता है वह भूमा है",
उ० ७। २४। १)। "योऽश- | "जो भूख-प्यास तथा शोक, मोह,
नायापिपासे शोकं मोहं भयं जरा- | भय और वृद्धावस्थासे परे है", "जो
मत्येति” (बृ० उ० ३।५। | प्राण और मनसे रहित, शुद्धस्वरूप
१)। "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो | और पर अव्याकृतसे भी परे है",
ह्यक्षरात्परतः परः” (मु० उ० २। | “ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है",
१।२)। "एकमेवाद्वितीयम् ।” | "विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला
(छा० उ० ६ । २ । १) “वाचा- | नाममात्र है", "यहाँ नाना कुछ
रम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० | नहीं है" तथा "उसे एकरूप ही
उ० ६।१।४)। “नेह नानास्ति | देखना चाहिये" इत्यादि मन्त्रोंमें
किञ्चन" (बृ० उ० ४।४।१९)। | ब्रह्म प्रपञ्चसे असङ्ग ही जाना
"एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० | जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ।
४।४।२०)। इत्येवमादिषु प्रपञ्चा-
स्पृष्टमेव ब्रह्मावगम्यत इत्यर्थः ।
यत एवं प्रपञ्चधर्मरहितं | क्योंकि इस प्रकार ब्रह्म प्रपञ्चके
ब्रह्मात एव परंमं तु ब्रह्म । | धर्मोंसे रहित है, इसलिये वह