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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

१४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

१४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

पृथिव्या गन्धवत्या गन्धो योगिनो | है ? [ सो बतलाते हैं—] गन्धवती
भवति । तथाद्भ्यो रसः । एव- | पृथिवीका गुण गन्ध उस योगीको
मन्यत्र । उक्तं च— | अनुभव होता है तथा जलसे रस-
“ज्योतिष्मती स्पर्शवती | की प्रवृत्ति होती है । इसी प्रकार
तथा रसवती परा । | अन्य भूतोंके विषयमें समझना
गन्धवत्यपरा प्रोक्ता | चाहिये । कहा भी है— “ज्योति-
चतस्रस्तु प्रवृत्तयः॥ | ष्मती, स्पर्शवती और रसवती
आसां योगप्रवृत्तीनां | तथा इनसे भिन्न एक गन्धवती—ये
यद्येकापि प्रवर्तते । | योगीकी चार प्रवृत्तियाँ कही गयी हैं।
प्रवृत्तयोगं तं प्राहु- | इन योगप्रवृत्तियोंमेंसे यदि एककी
र्योगिनो योगचिन्तकाः ॥” | भी प्रवृत्ति हो जाय तो योगिजन उस
| साधकको योगमें प्रवृत्त हुआ
| बतलाते हैं ।”
न तस्य योगिनो रोगो न | उस योगीको न रोग होता है,
| न वृद्धावस्था होती है और न मृत्यु-
जरा न मृत्युर्वा प्रभवति । कस्य ? | का ही उसपर प्रभाव होता है ।
| किसे ? जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त
प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् । | हो गया है अर्थात् जिसे ऐसा शरीर
| प्राप्त हो गया है कि जिसके दोषसमूह
योगाग्निसंप्लुष्टदोषकलापं शरीरं | योगाग्निसे भस्म हो गये हैं । शेष
| ( तेरहवें मन्त्रका ) अर्थ स्पष्ट
प्राप्तस्य । स्पष्टमन्यत् ॥१२-१३॥ | है ॥१२-१३॥

योगसिद्धि या तत्त्वज्ञानका प्रभाव
किञ्च— | तथा—
यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं
तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् ।