श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय शाङ्करभाष्यार्थ १६९
अध्याय शाङ्करभाष्यार्थ १६९
सर्वस्य जगतः प्रभुमीशानम् । | वह समस्त जगत्का प्रभु और
सर्वस्य शरणं परायणं बृहत्कारणं | शासक है तथा सबका शरण—
च ॥१७॥ | आश्रय और बृहत्—कारण है ॥१७॥
किञ्च— | तथा—
नवद्वारे पुरे देही हँसो लेलायते बहिः ।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥१८॥
सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्का स्वामी यह हंस ( परमात्मा ) देहा-
भिमानी होकर नव द्वारवाले [ देहरूप ] पुरमें बाह्य विषयोंको ग्रहण
करनेके लिये चेष्टा किया करता है ॥ १८ ॥
नवद्वार इति । नवद्वारे शिरसि | 'नवद्वारे' इत्यादि । [ दो
| आँख, दो नाक, दो कान और
सप्तद्वाराणि द्वे अवाची पुरे देही | एक मुख—इन ] सात शिरके और
| [ गुदा एवं लिङ्ग ] दो निम्न-
विज्ञानात्मा भूत्वा कार्यकारणो- | भागके इस प्रकार नौ द्वारोंवाले
| शरीरमें देही—विज्ञानात्मा यानी भूत
पाधिः सन्हंसः परमात्मा हन्त्य- | और इन्द्रियरूप उपाधिवाला होकर
| यह हंस—परमात्मा बाह्य विषयोंको
विद्यात्मकं कार्यमिति, लेलायते | ग्रहण करनेके लिये चेष्टा करता—
| चलता है। यह अविद्याजनित कार्यका
चलति बहिर्विषयग्रहणाय । वशी | हनन करता है इसलिये हंस है। तथा
| यह स्थावर-जंगम समस्त लोकका
सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य | वशी ( स्वामी ) है ॥ १८ ॥
च ॥१८॥ |