श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
नित्य इति । नित्यो नित्या- | 'नित्यः' इत्यादि । नित्य जीवोंके
नां जीवानां मध्ये तन्नि- | मध्यमें जो नित्य है, अभिप्राय यह
त्यत्वेन तेषामपि नित्यत्वमित्य- | कि उसके नित्यत्वसे ही उनका भी
भिप्रायः । अथवा पृथिव्यादीनां | नित्यत्व है, अथवा पृथिवी आदि
मध्ये । तथा चेतनश्चेतनानां | नित्योंमें जो नित्य है, तथा चेतन
प्रमातॄणां मध्ये । एको बहूनां | प्रमाताओंमें जो चेतन है; जो
जीवानां यो विदधाति प्रयच्छति | अकेला ही बहुत-से जीवोंके काम—
कामान्कामनिमित्तान्भोगान् । | कामनिमित्तक भोगोंका विधान यानी
सर्वस्य सांख्ययोगाधिगम्यं | दान करता है और सबके लिये
ज्ञात्वा देवं ज्योतिर्मयं मुच्यते | सांख्ययोगद्वारा ज्ञातव्य है, उस देव-
सर्वपाशैर्विद्यादिभिः ॥१३॥ | प्रकाशस्वरूपको जानकर [ पुरुष ]
| समस्त पाशोंसे अर्थात् अविद्यादिसे
| मुक्त हो जाता है ॥१३॥
ब्रह्मके प्रकाशसे ही सबको प्रकाशकी प्राप्ति
कथं चेतनश्चेतनानाम् ? । | वह चेतनोंमें चेतन किस प्रकार
इत्युच्यते— | है ? सो बतलाया जाता है—
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१४॥
वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता, न चन्द्र और तारे प्रकाशित होते
हैं और न ये बिजलियाँ ही चमकती हैं, फिर यह अग्नि तो कहाँ प्रकाशित
हो सकता है ? ये सब उसके प्रकाशित होनेसे ही प्रकाशित होते हैं,
उसीके प्रकाशसे ये सब प्रकाशित हैं ॥१४॥