श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
[वाम भाग / संस्कृत मूल]
ब्रह्मादिरूपेण कार्यादिरूपेण
वैश्वानरादिरूपेण च मोक्षापे-
क्षितशुद्ध्यर्थम् "स यदि पितृ-
लोककामः" (छा० उ० ८।
२। १) इति विश्वैश्वर्यार्थाम् "मां
वा नित्यं शङ्करं वा प्रयाति"
इत्यादिदेवतासायुज्यप्राप्त्यर्थां
वैश्वानरादिप्राप्त्यर्थां चोपासना-
मशेषलौकिकवैदिककर्मप्रसिद्धिं
च दर्शयति । यदि कार्यकारण-
रूपेण स्वरूपेण चित्सदानन्दा-
द्वितीयब्रह्मात्मना च व्यवस्थितं
न स्यात्तदा भोग्यभोक्तृनियन्त्र-
भावे संसारमोक्षयोरभाव एव
स्यात् । अधिकारिणोऽभावेन
साधनभूतस्य प्रपञ्चस्याभावात् ।
तत्फलदातुश्चेश्वरस्याभावात् ।
तथा संसारादिहेतुभूतमीश्वरं
दर्शयति-"संसारमोक्षस्थितिबन्ध-
हेतुः" इति । तथा च संसारमोक्ष-
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]
देवभावसे, [ आकाशादिरूप ] कार्य-
भावसे और वैश्वानरादिरूपसे
मोक्षापेक्षित चित्तशुद्धि तथा
"यदि वह पितृलोककी कामनावाला
होता है" इत्यादि श्रुतिके अनुसार
सम्पूर्ण ऐश्वर्यप्राप्ति, "वह सर्वदा
मुझे या शंकरको प्राप्त होता है"
इत्यादि प्रमाणके अनुसार इष्टदेवसे
सायुज्यप्राप्ति एवं वैश्वानरादि भावोंकी
प्राप्तिके लिये उपासना है उसको
तथा सम्पूर्ण लौकिक-वैदिक कर्म-
परम्पराको प्रदर्शित करती है। यदि
परमात्मा कार्य-कारणरूपसे और
स्वरूपतः सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूप-
से स्थित न होता तो भोक्ता, भोग्य और
नियन्ताका अभाव हो जानेसे संसार
और मोक्षका भी अभाव हो जाता;
क्योंकि अधिकारीके न रहनेसे न तो
उसका साधनभूत प्रपञ्च रहता है और
न उसे साधनका फल देनेवाला ईश्वर
ही। तथा "[ ईश्वर ही ] संसार,
मोक्ष, स्थिति और बन्धनका हेतु है"
यह शास्त्रवाक्य संसारादिके हेतुभूत
ईश्वरको सिद्ध करता है । और
७४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
७४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
योरभाव एव स्यात् । तत्सिद्धयर्थं | ईश्वरके न रहनेपर तो संसार और
प्रपञ्चाद्यवस्थानं दर्शयति— | मोक्षका अभाव ही हो जाना चाहिये
"एकं पादं नोत्क्षिपति | था । अतः उसको सिद्धिके लिये
सलिलाद्धंस उच्चरन् । | सनत्सुजातजी भी "एकं पादं
स चेदविन्ददानन्दं | नोत्क्षिपति" इत्यादि वाक्यसे यह
न सत्यं नानृतं भवेत् " | बतलाते हुए कि "हंस (परमात्मा)
इति सनत्सुजातोऽप्येकं पादं | जल ( संसार ) से ऊपर रहते हुए
नोत्क्षिपतीत्यादि । तथा च | भी अपना एक पाद नहीं निकालता ।
श्रुतिः—"पादोऽस्य विश्वा भू- | यदि वह [ स्वरूपभूत ] आनन्दका
तानि त्रिपादस्यामृतं दिवि" (छा० | अनुभव करने लगे तो न सत्य
उ० ३।१२।६) इति । तत्र प्रथमेन | ( मोक्ष ) ही रहे और न मिथ्या
मन्त्रेण सर्वात्मानं ब्रह्म चक्रं | ( संसार ) ही" ईश्वरकी सिद्धिके
दर्शयति द्वितीयेन नदीरूपेण— | लिये प्रपञ्चादिकी स्थिति दिखलाते
| हैं। ऐसा ही "सम्पूर्ण भूत परमात्मा-
| के एक पाद हैं और उसके अमृत-
| मय तीन पाद द्युलोकमें हैं"
| यह श्रुति भी बतलाती है । यहाँ
| श्रुति पहले मन्त्रसे सर्वात्मा ब्रह्मको
| चक्ररूपसे और दूसरे मन्त्रसे नदी-
| रूपसे प्रदर्शित करती है—
कारण-ब्रह्मका चक्ररूपसे वर्णन
तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं
शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं
त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
उस एक नेमि, तीन वृत, सोलह अन्त, पचास अरों, बीस प्रत्यरों,
छः अष्टकों, विश्वरूप एकपाश, तीन मार्गों, तथा [ पाप-पुण्य ] दोनोंके
निमित्तभूत एक मोहवाले कारणको [ उन्होंने देखा* ] ॥ ४ ॥
तमेकेति । य एकः कारणानि | ‘तमेकनेमिम्····’ इत्यादि । जो
निखिलान्यधितिष्ठति तमेकनेमिं | अकेला ही समस्त कारणोंमें अधिष्ठित
| है, उस एक नेमिवालेको [ उन्होंने
योनिः कारणमव्याकृतमाकाशं | देखा । ] जो योनि, कारण, अव्याकृत,
परमव्योम माया प्रकृतिः शक्ति- | आकाश, परव्योम, माया, प्रकृति,
| शक्ति, तम, अविद्या, छाया, अज्ञान,
स्तमोऽविद्या छायाज्ञानमनृतम- | अनृत और अव्यक्त इत्यादि शब्दोंसे
व्यक्तमित्येवमादिशब्दैरभिलप्य- | कही जाती है वह एक कारणावस्था
| ही जिस अधिष्ठाता अद्वितीय पर-
मानैका कारणावस्था नेमिरिव | मात्माकी नेमिके समान नेमि अर्थात्
नेमिः सर्वाधारो यस्याधिष्ठातुरद्वि- | सम्पूर्ण कार्यवर्गका आधार है
तीयस्य परमात्मनस्तमेकनेमिम् । | ऐसे उस एक नेमिवाले और
| ‘त्रिवृतम्’—सत्त्व, रज, तमरूप
त्रिवृतं त्रिभिः सत्त्वरजस्तमोभिः | प्रकृतिके तीन गुणोंसे वृत (घिरे
प्रकृतिगुणैर्वृतम् । | हुए ) परमात्माको [ कारणरूपसे
| देखा ] ।
षोडशको विकारः पञ्च भूता- | तथा सोलह विकार अर्थात् पाँच
न्येकादशेन्द्रियाण्यन्तोऽवसानं | भूत और ग्यारह इन्द्रियाँ—ये जिस
| आत्माके अन्त–अवसान यानी
विस्तारसमाप्तिर्यस्यात्मनस्तं षोड- | विस्तारकी समाप्ति हैं उस सोलह
- अथवा अगले मन्त्रके क्रियापद ‘अधीमः’ का अध्याहार करके ‘हम जानते
हैं’ ऐसा अर्थ करना चाहिये ।
७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
शान्तम् । अथवा प्रश्नोपनिषदि | अन्तोंवाले; अथवा प्रश्नोपनिषद्में
"यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभव- | “यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्ति” यहाँसे लेकर “स प्राणमसृजत्
न्ति” (६।२) इत्यारभ्य | प्राणाच्छ्रद्धाम्” इत्यादि मन्त्रसे कही
"स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम्” | हुई जो [ प्राणसे लेकर ] नामपर्यन्त सोलह कलाएँ हैं वे ही जिसका
(६।४) इत्यादिना प्रोक्ता | अवसान हैं, [ उस आत्माको कारण-
नामान्ताः षोडशकला अवसानं | रूपसे देखा ]। अथवा 'एकनेमिम्' इस
यस्येति । अथवैकनेमिमिति का- | पदसे कारणभूता अव्याकृतावस्थाका वर्णन किया गया है, उसके समष्टि-
रणभूताव्याकृतावस्थाभिहिता । | कार्यभूत विराट् और सूत्रात्मा ये दो
तत्कार्यसमष्टिभूतविराट्सूत्रद्वयं | और व्यष्टिकार्यभूत भूः आदि
तद्व्यष्टिभूतभूरादिचतुर्दश भुव- | चौदह भुवन ये सोलह जिस प्रपञ्च- रूपसे स्थित परमात्माके अन्त हैं
नान्यन्तोऽवसानं यस्य प्रपञ्चात्म- | उस षोडशान्तको [ कारणरूपसे
नावस्थितस्य तं षोडशान्तम् । | देखा ] ।
शतार्धारम् । पञ्चाशत्प्रत्यय- | पचास अरोंवाले—विपर्यय,
भेदा विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्या- | अशक्ति, तुष्टि और सिद्धि नामक
ख्या अरा इव यस्य तं शता- | पचास प्रत्ययभेद जिसके अरोंके समान हैं उस पचास अरोंवालेको
र्धारम् । पञ्च विपर्ययभेदाः- | [ देखा ] । तम, मोह, महामोह,
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो | तामिस्र और अन्धतामिस्र ये पाँच
ह्यन्धतामिस्र इति । अशक्तिरष्टा- | विपर्ययके भेद हैं । अशक्ति अट्ठाईस
१. प्रश्नोपनिषद्के षष्ठ प्रश्नमें निम्नलिखित सोलह कलाएँ बतलायी हैं—
प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप,
मन्त्र, कर्म, लोक और नाम। यहाँ 'कला' शब्दका अर्थ इस प्रकार है—कं ब्रह्म
लीयते आच्छाद्यते यया, सा कला। अर्थात् जिसके द्वारा क (ब्रह्म) लीन
(ढका हुआ) है उसे कला कहते हैं। इन्होंने ब्रह्मके पारमार्थिक स्वरूपको ढक
रखा है, इसलिये ये कलाएँ हैं।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
विंशतिधा । तुष्टिर्नवधा । अष्टधा | प्रकारकी है, तुष्टि नौ प्रकारकी
सिद्धिः । एते पञ्चाशत्प्रत्यय | और सिद्धि आठ प्रकारकी । ये ही
भेदाः । तत्र तमसो भेदोऽष्ट- | पचास प्रत्ययभेद हैं । इनमें तमके
विधः । अष्टसु प्रकृतिष्वनात्म- | आठ भेद हैं—अनात्मभूत आठ
स्वात्मप्रतिपत्तिविषयभेदेनाष्टविध- | प्रकृतियोंमें आत्मभाव होना यही
त्वप्रतिपत्तेः । मोहस्य चाष्ट- | भावोंके विषयभेदके अनुसार आठ
विधो भेदः । अणिमादिशक्ति- | प्रकारका तम है । मोहका आठ
र्मोहः । दशविधो महामोहः । | प्रकारका भेद है, अणिमादि आठ
दृष्टानुश्रविकशब्दादिविषयेषु प- | शक्तियाँ ही मोह हैं । महामोह दश
ञ्चसु पञ्चस्वभिनिवेशो महामोहः। | प्रकारका है; दृष्ट ( लौकिक ) और
दृष्टानुश्रविकभेदेन तेषां दशवि- | श्रुत ( पारलौकिक ) शब्दादि पाँच-
धत्वम् । तामिस्रोऽष्टादशविधः । | पाँच विषयोंमें जो सत्यत्वबुद्धि है
दृष्टानुश्रविकेषु दशसु विषयेष्वष्ट- | वही महामोह है, दृष्ट और आनु-
विधैरैश्वर्यैः प्रयतमानस्य तदसिद्धौ | श्रविक भेदसे वे दश प्रकारके हैं ।
यः क्रोधः स तामिस्रोऽभिधीयते । | तामिस्र अठारह प्रकारका है । आठ
अन्धतामिस्रोऽप्यष्टादशविधः । | प्रकारके ऐश्वर्योंद्वारा दश प्रकारके
अष्टविधैश्वर्ये दशसु विषयेषु | दृष्ट और आनुश्रविक विषयोंके लिये
भोग्यत्वेनोपस्थितेष्वर्धभुक्तेषु मृ- | प्रयत्न करते हुए उनकी प्राप्ति न
त्युना हियमाणस्य यः शोको | होनेपर जो क्रोध होता है वह तामिस्र
| कहलाता है । अन्धतामिस्र भी
| अठारह प्रकारका है । आठ प्रकारके
| ऐश्वर्य और दशों प्रकारके विषय
| भोग्यरूपसे उपस्थित रहनेपर उन्हें
| आधे भोगनेपर ही मृत्युके द्वारा
| उनसे छुड़ा दिये जानेपर जो ऐसा
१. सांख्यशास्त्रानुसार प्रधान, महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा—ये आठ
प्रकृतियाँ हैं—इनमें भी प्रधान केवल प्रकृति है और महदादि सात प्रकृति-विकृति
हैं । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामें पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और
अहंकारको भगवान्की अष्टधा प्रकृति कहा है । किन्तु आगे ये प्रकृतियाँ प्रकृत्यष्टकमें
ली हैं, इसलिये यहाँ पूर्वोक्त सांख्यसम्मत प्रकृतियाँ ही समझनी चाहिये ।
७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
जायते महता क्लेशेनैते प्राप्ता न चैते | शोक होता है कि मैंने इन्हें बड़े कष्टसे
मयोपभुक्ताः प्रत्यासन्नश्चायं मरण- | प्राप्त किया था, मैं इन्हें भोग भी नहीं
| पाया कि यह मरणकाल उपस्थित हो
काल इति सोऽन्धतामिस्र इत्युच्यते। | गया—इसे अन्धतामिस्र कहते हैं ।
विपर्ययभेदा व्याख्याताः। | इस प्रकार विपर्ययके भेदोंकी तो
अशक्तिरष्टाविंशतिधोच्यते—एका- | व्याख्या हो गयी। अशक्ति अठ्ठाईस
दशेन्द्रियाणामशक्तयो मूक- | प्रकारकी कही जाती है। मूकत्व,
| बधिरत्व, अन्धत्वादि ग्यारह बाह्य
त्वबधिरत्वान्धत्वप्रभृतयो बाह्याः। | अशक्तियाँ तो इन्द्रियोंकी हैं, पुरुषार्थ-
अन्तःकरणस्य पुरुषार्थयोग्यता- | की योग्यतास्वरूप तुष्टियोंसे विपरीत नौ
तुष्टीनां विपर्ययेण नवधाशक्तिः। | अशक्तियाँ अन्तःकरणकी हैं, और
सिद्धीनां विपर्ययेणाष्टधाशक्तिः। | आठ अशक्तियाँ सिद्धियोंसे विपरीत हैं।
तुष्टिर्नवधा—प्रकृत्युपादान- | तुष्टि नौ प्रकारकी है—चार
कालभाग्याख्याश्चतस्रः । विष- | तो प्रकृति, उपादान, काल और
| भाग्य नामवाली तथा पाँच विषयोंसे
योपरमात्पञ्च । कश्चि- | उपरति हो जानेसे होती हैं। (१)
त्प्रकृतिपरिज्ञानात्कृतार्थोऽस्मीति | कोई पुरुष प्रकृतिका ज्ञान होनेपर
मन्यते । अन्यः पुनः पारि- | ही यह मान लेता है कि मैं कृतार्थ हो
व्राज्यलिङ्गं गृहीत्वा कृता- | गया। (२) कोई संन्यासके चिह्न
| धारण करनेसे ही 'मैं कृतार्थ हो गया'
र्थोऽस्मीति मन्यते । अपरः पुनः | ऐसा अपनेको मानने लगता है।
प्रकृतिपरिज्ञानेन किमाश्रमाद्युपा- | (३) कोई प्रकृतिका ज्ञान होनेपर
| ऐसा मानकर सन्तुष्ट हो जाता है कि
दानेन वा किं बहुना कालेन | अब संन्यासाश्रमादि ग्रहण करने-
अवश्यं मुक्तिर्भविष्यतीति मत्वा परि- | की क्या आवश्यकता है, बहुत काल
| बीतनेपर अब तो अवश्य मुक्ति हो
तुष्यति । कश्चित्पुनर्मन्यते विना | ही जायगी। (४) कोई ऐसा मानने
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
भाग्येन न किञ्चिदपि प्राप्यते । | लगता है कि बिना भाग्यके कुछ
यदि मम भाग्यमस्ति ततो भवत्ये- | भी नहीं मिलता, यदि मेरा भाग्य होगा
वात्रैव मोक्ष इति परितुष्यति । | तो मुझे अवश्य यहीं मोक्ष प्राप्त हो
विषयाणामार्जनमशक्यमित्युपरम्य | जायगा—ऐसा समझकर वह सन्तुष्ट
तुष्यति । शक्यते द्रष्टुमार्जितु- | हो जाता है । ( ५ ) कोई यह मान-
मार्जितस्य रक्षणमशक्यमित्युपरम्य | कर कि विषयोंका उपार्जन करना
| असम्भव है, उपरत होकर सन्तुष्ट
परितुष्यति । सातिशयत्वादिदोष- | हो जाता है । ( ६ ) कोई यह
| सोचकर कि विषयोंका दर्शन और
दर्शनेनोपरम्य परस्तुष्यति । वि- | उपार्जन तो सम्भव है, परन्तु उपार्जित
| विषयोंकी रक्षा करना सम्भव नहीं है,
षयाः सुतरामेवाभिलापं जनयन्ति | उनसे उपरत होकर सन्तोष कर
न च तद्भोगाभ्यासे तृप्तिरुप- | लेता है । ( ७ ) कोई विषयोंमें
जायते । | न्यूनाधिकतादि दोष देखनेसे उनसे
| उपरत होकर सन्तुष्ट हो जाता है ।
“न जातु कामः कामाना- | ( ८ ) विषय तो तत्सम्बन्धी
मुपभोगेन शाम्यति । | अभिलाषाको ही उत्पन्न करते हैं,
हविषा कृष्णवर्त्मेव | उनके पुनः-पुनः भोगसे कभी तृप्ति
| नहीं होती, “विषयोंकी इच्छा उनके
भूय एवाभिवर्धते ॥” | भोगसे कभी शान्त नहीं होती, अपितु
(श्रीमद्भा० ९ । १९ । १४) | घृतसे अग्निके समान वह और भी बढ़
| जाती है ।” अतः पुनः-पुनः
इति । तस्मादलमेनैन पुनः पुनः | असन्तोषके हेतुभूत इन विषयोंके भोग-
| को छोड़ो—इस प्रकार विषयासक्तिमें दोष
रसन्तोषकारणेनोपभोगेनेत्येवं सङ्ग- | देखकर कोई उनसे उपरत होकर
दोषदर्शनादुपरम्य कश्चित्तुष्यति । | सन्तोष कर लेता है । ( ९ ) जीवों-
नानुपहृत्य भूतान्युपभोगः संभ- | की हिंसा किये बिना भोग मिलना
८० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
वति। भूतोपघातभोगाच्चाधर्मः। | सम्भव नहीं है और जीवहिंसापूर्वक
अधर्मान्नरकादिप्राप्तिरिति हिंसा- | भोग भोगनेसे अधर्म होगा तथा
| अधर्मसे नरकादिकी प्राप्ति होगी।
दोषदर्शनात्कश्चिदुपरम्य तुष्यति। | इस प्रकार हिंसारूप दोष देखकर
| कोई उनसे उपरत होकर सन्तोष
प्रकृत्युपादानकालभाग्याश्चतस्रः। | कर लेता है। इस प्रकार प्रकृति,
| उपादान, काल और भाग्यनामक
विषयाणामार्जनरक्षणविषयदोष- | चार एवं विषयोंके उपार्जन, रक्षण,
| विषयतारतम्यरूप दोष, संग और
सङ्गहिंसादोषात्पञ्च तुष्टय इति | हिंसा इन दोषोंके कारण होनेवाली
| पाँच—ऐसी इन नौ तुष्टियोंकी
नव तुष्टयो व्याख्याताः। | व्याख्या कर दी गयी।
सिद्धयोऽभिधीयन्ते—ऊहः श- | अब सिद्धियाँ बतलायी जाती
ब्दोऽध्ययनमिति तिस्रः सिद्धयः। | हैं—तीन सिद्धियाँ तो ऊह,
| शब्द और अध्ययन नामकी हैं,
दुःखविघातास्तिस्रः। सुहृत्प्राप्ति- | तीन दुःखविघात नामवाली हैं
र्दानमिति सिद्धिद्वयम्। ऊहस्त- | और दो सुहृत्प्राप्ति एवं दान हैं।
त्त्वं जिज्ञासमानस्योपदेशमन्तरेण | ऊह—तत्त्वजिज्ञासुको उपदेशके
जन्मान्तरसंस्कारवशात्प्रकृत्यादि- | बिना ही जन्मान्तरके संस्कारसे जो
विषयं ज्ञानमुत्पद्यते सेयमूहो | प्रकृति आदिके विषयमें ज्ञान उत्पन्न
| हो जाता है वह ऊह नामकी पहली
नाम प्रथमा सिद्धिः। शब्दो नामा- | सिद्धि है। बिना अभ्यासके केवल
भ्यासमन्तरेण श्रवणमात्राद्यज्ज्ञा- | श्रवणमात्रसे ही जो ज्ञान उत्पन्न हो
नमुत्पद्यते सा द्वितीया सिद्धिः। | जाता है वह शब्द नामकी दूसरी
| सिद्धि है। शास्त्रके अभ्याससे जो ज्ञान
अध्ययनं नाम शास्त्राभ्यासाद्य- | उत्पन्न हो जाता है उसे अध्ययन
ज्ज्ञानमुत्पद्यते सा तृतीया सिद्धिः। | कहते हैं, यह तीसरी सिद्धि है।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
आध्यात्मिकस्याधिभौतिकस्याधि- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और
दैविकस्य त्रिविधदुःखस्य व्युदा- आधिदैविक इन त्रिविध दुःखोंकी
साच्छीतोष्णादिजन्यदुःखसहिष्णोः उपेक्षा करनेसे शीतोष्णादिजनित
तितिक्षोर्यज्ज्ञानमुत्पद्यते तस्य दुःख सहन करनेवाले तितिक्षु पुरुष-
आध्यात्मिकादिभेदात्सिद्धेस्त्रैवि- को जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह
ध्यम् । सुहृदं प्राप्य या सिद्धि- दुःखविघात नामकी सिद्धि है;
र्ज्ञानस्य सा सुहृत्प्राप्तिर्नाम आध्यात्मिकादि भेदके कारण इस
सिद्धिः। आचार्यहितवस्तुप्रदानेन सिद्धिके भी तीन प्रकार हैं । किसी
या सिद्धिर्विद्यायाः सा दानं नाम सुहृद्के प्राप्त होनेपर जो ज्ञानकी
सिद्धिः। एवमष्टविधा सिद्धिर्व्या- सिद्धि होती है वह सुहृत्प्राप्ति नामकी
ख्याता । सिद्धि है । आचार्यको उनकी प्रिय
वस्तु दान करनेसे जो ज्ञानकी प्राप्ति
होती है वह दान नामकी सिद्धि है।
इस प्रकार आठ प्रकारकी सिद्धियों-
की भी व्याख्या की गयी ।
एवं विपर्ययाशक्तितुष्टि- इस तरह यह विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि
सिद्धाख्याः पञ्चाशत्प्रत्यय- और सिद्धि नामक पचास प्रत्ययभेदोंकी
भेदा व्याख्याताः । एवं ब्राह्म- व्याख्या हुई । ब्राह्मपुराणमें कल्पो-
पुराणे कल्पोपनिषद् व्याख्यान- पनिषद्की व्याख्याके प्रसङ्गमें साठवें
प्रदेशे षष्टितमाध्याये पञ्चाशत् अध्यायमें पचास प्रत्ययभेदोंकी इसी
प्रत्ययभेदाः प्रतिपादिताः । अथवा प्रकार व्याख्या की गयी है । अथवा
“पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः”इति परस्य “पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः” इस पुराण-
याः शक्तयः पुराणे स्वरूपत्वेना- वाक्यमें परमात्माकी जिन शक्तियोंका
भिमताः पञ्चाशच्छक्तय अरा इव उनके स्वरूपरूपसे वर्णन किया है
यस्य तं शतारारम् । वे ही जिसके अरोंके समान हैं उस
शतारार ( पचास अरोंवाले ) को
[ कारणरूपसे देखा ] ।
८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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विंशतिप्रत्यराभिः । विंशति- | बीस प्रत्यरोंसे युक्त । दश इन्द्रियाँ
प्रत्यरा दशेन्द्रियाणि तेषां च | और उनके विषय शब्द, स्पर्श,
विषयाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध- | रूप, रस, गन्ध, वचन, आदान
वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाः । | (ग्रहण ), गति, त्याग और आनन्द
पूर्वोक्तानामराणां प्रत्यरा ये प्रति- | —ये बीस प्रत्यर हैं । जो पूर्वोक्त
विधीयन्ते कीलका अराणां दा- | अरोंके प्रति अरे—अरोंकी दृढ़ताके
र्ढ्याय ते प्रत्यरा इत्युच्यन्ते । | लिये जो शलाकाएँ लगायी जाती हैं
तैः प्रत्यरैर्युक्तम् । अष्टकैः षड्भि- | वे प्रत्यर कहलाते हैं । उन प्रत्यरोंसे
र्युक्तमिति योजनीयम् । | युक्त, तथा छः अष्टकोंसे युक्तको
"भूमिरापोऽनलो वायुः | [ कारणरूपसे देखा ]—ऐसी योजना
खं मनो बुद्धिरेव च । | करनी चाहिये । "पृथिवी, जल,
अहंकार इतीयं मे | अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि
भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥" | और अहंकार—यह मेरी आठ भेदों-
(गीता ७ । ४ ) | वाली प्रकृति है" यह गीतोक्त
इति प्रकृत्यष्टकम् । त्वक्चर्म- | प्रकृत्यष्टक है; त्वचा, चर्म, मांस,
मांसरुधिरमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि | रुधिर, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र
धात्वष्टकम् । अणिमाद्यैश्वर्या- | यह धात्वष्टक है; अणिमादि ऐश्वर्याष्टक
ष्टकम् । धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्याधर्मा- | है; धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म,
ज्ञानावैराग्यानैश्वर्याख्यभावाष्ट- | अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य—यह
कम् । ब्रह्मप्रजापतिदेवगन्धर्वयक्ष- | भावाष्टक है; ब्रह्मा, प्रजापति, देव,
राक्षसपितृपिशाचा देवाष्टकम् । | गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और
अष्टावात्मगुणा ज्ञेयाः, दया | पिशाच—यह देवाष्टक है; और आठ
सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौच- | जिन्हें आत्माके गुण समझना चाहिये,
| वे समस्त प्राणियोंके प्रति दया,
| क्षमा, अनसूया (निन्दा न करना ),
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१. अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और
वशित्व—ये आठ ऐश्वर्य हैं ।
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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
मनायासो मङ्गलमकार्पण्यमस्पृहेति | शौच, अनायास, मङ्गल, अकृपणता
गुणाष्टकं षष्ठम् । एतैः षड्भि- | और अस्पृहा ये छठा गुणाष्टक हैं;
र्युक्तम् । | इन छः अष्टकोंसे युक्तको [ कारण-
| रूपसे देखा ] ।
विश्वरूपैकपाशं स्वर्गपुत्रान्नाद्या- | विश्वरूप एक पाशवालेको—
दिविषयभेदाद्विश्वरूपं विश्वरूपो | स्वर्ग,पुत्र एवं अन्नाद्य आदि विषयभेदसे
नानारूप एकः कामाख्यः पाशो- | कामनामक एक ही विश्वरूप—अनेक
ऽस्येति विश्वरूपैकपाशम् । धर्मा- | प्रकारका पाश है जिसका उस
धर्मज्ञानमार्गभेदा अस्येति त्रि- | विश्वरूप एक पाशवालेको; धर्म,
मार्गभेदम् । द्वयोः पुण्यपापयो- | अधर्म और ज्ञानरूप जिसके मार्गभेद
र्निमित्तैकमोहो देहेन्द्रियमनोबुद्धि- | हैं उस तीन मार्गभेदोंवालेको; तथा
जात्यादिष्वनात्मस्वात्माभिमानो- | पाप-पुण्य इन दोनोंका एक ही
ऽस्येति द्विनिमित्तैकमोहम् । अप- | निमित्त मोह यानी देह, इन्द्रिय, मन,
श्यन्निति क्रियापदमनुवर्तते । | बुद्धि एवं जाति आदि अनात्माओंमें
अधीम इत्युत्तरमन्त्रसिद्धं वा | जिसका आत्माभिमान है ऐसे उस
क्रियापदम् ॥ ४ ॥ | दोके [ मोहरूप ] एक ही निमित्त-
| वालेको [ उन्होंने कारणरूपसे देखा ]
| इस प्रकार यहाँ पूर्वमन्त्रकी
| क्रिया 'अपश्यन्' की अनुवृत्ति होती
| है, अथवा अगले मन्त्रके क्रियापद
| 'अधीमः' ( जानते हैं ) का
| अध्याहार करना चाहिये ॥४॥
कार्यब्रह्मका नदीरूपसे वर्णन
पूर्वं चक्ररूपेण दर्शितमिदानीं | पहले जिसे चक्ररूपसे प्रदर्शित
| किया है उसीको अब श्रुति नदी-
नदीरूपेण दर्शयति— | रूपसे दिखलाती है—
८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां
पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् ।
पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां
पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥
पाँच स्रोत जिसमें जलकी धाराएँ हैं, पाँच उद्गमस्थानोंके कारण जो
बड़ी उग्र और वक्र (टेढ़ी) है, जिसमें पञ्चप्राणरूप तरंगें हैं, पाँच
प्रकारके ज्ञानोंका मूल जिसका कारण है, जिसमें पाँच आवर्त (भँवर)
हैं, जो पाँच प्रकारके दुःखरूप ओघवेगवाली है और जो पाँच पर्वोंवाली
है उस पचास भेदोंवाली [नदी] को हम जानते हैं ॥ ५ ॥
पञ्चस्रोतोऽम्बुमिति । पञ्च | 'पञ्चस्रोतोऽम्बुम्' इत्यादि । पाँच
स्रोतांसि चक्षुरादीनि ज्ञानेन्द्रि- | स्रोतरूप चक्षु आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
याण्यम्बुस्थानानि यस्यास्तां नदीं | ही जिसके जलस्थान हैं उस पाँच
पञ्चस्रोतोऽम्बुम् । अधीम इति | स्रोतरूप जलवाली नदीको [हम जानते
सर्वत्र संबध्यते । पञ्चयोनिभिः | हैं] । यहाँ 'अधीमः' (जानते हैं)
कारणभूतैः पञ्चभूतैरुग्रां वक्रां | क्रियापदका सबके साथ सम्बन्ध है ।
च पञ्चयोन्युग्रवक्राम् । पञ्च | पाँच योनियों अर्थात् कारणभूत पाँच
प्राणाः कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाण्या- | भूतोंसे जो उग्र और वक्र है उस
दयो वोर्मयो यस्यास्तां पञ्चप्राणो- | पञ्चयोन्युग्रवक्राको, पाँच प्राण अथवा
र्मिम् । पञ्चबुद्धीनां चक्षुरादि- | वाक्, पाणि, पादादि पाँच कर्मेन्द्रियाँ
जन्यानां ज्ञानानामादिः कारणं | जिसकी तरंगें हैं उस पञ्चप्राणोर्मि-
मनः । मनोवृत्तिरूपत्वात्सर्व- | को, पाँच बुद्धियों अर्थात् चक्षु आदिसे
ज्ञानानां मनो मूलं कारणं यस्याः | होनेवाले पाँच ज्ञानोंका आदि यानी
संसारसरितस्ताम् । तथा च | कारण मन है, क्योंकि समस्त ज्ञान
मनोवृत्तिरूप हैं; वह मन जिस
संसाररूप नदीका मूल—कारण है
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
मनसः सर्वहेतुत्वं दर्शयति— | उसको। तथा मन ही सबका हेतु है—
“मनोविजृम्भितं सर्वं | यह इस वाक्यसे दिखाते हैं—
यत्किंचित्सचराचरम् । | जितना कुछ स्थावर-जंगम है वह
मनसो ह्यमनीभावे | सब मनका ही विलास है। मनके
द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥” | मननशून्य होनेपर द्वैतकी उपलब्धि
इति । पञ्च शब्दादयो विषया | ही नहीं होती ।” शब्दादि पाँच
आवर्तस्थानीयास्तेषु विषयेषु प्रा- | विषय आवर्तरूप हैं, उन विषयोंमें
णिनो निमज्जन्तीति यस्यास्तां | प्राणी डूब जाते हैं, इसलिये वे
पञ्चावर्ताम् । पञ्च गर्भदुःखजन्म- | जिसके आवर्त हैं उस पाँच आवर्त-
दुःखजरादुःखव्याधिदुःखमरण- | वालीको, गर्भदुःख, जन्मदुःख, जरा-
दुःखान्येवौघवेगो यस्यास्तां पञ्च- | दुःख व्याधिदुःख और मरणदुःख ये
दुःखौघवेगाम् । अविद्यास्मिता- | पाँच जिसके ओघवेग ( जलराशिके
रागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेश- | प्रवाह ) हैं उस पाँच दुःखरूप
भेदाः पञ्च पर्वाण्यस्यास्तां पञ्च- | ओघवेगवालीको; तथा अविद्या,
पर्वामिति ॥ ५ ॥ | अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश
| ये पाँच क्लेश ही जिसके पाँच पर्व हैं
| उस पाँच पर्वोंवाली संसारनदीको
| [ हम जानते हैं ] ॥ ५ ॥
जीवके संसार-बन्धन और मोक्षके कारणका निर्देश
एवं तावन्नदीरूपेण ब्रह्म- | इस प्रकार यहाँतक तो नदी-
चक्ररूपेण च कार्यकारणात्मकं | रूपसे और ब्रह्मचक्ररूपसे प्रपञ्च-
ब्रह्म सप्रपञ्चमिहाभिहितम् । | सहित कार्य-कारणरूप ब्रह्मका वर्णन
इदानीमस्मिन्कार्यकारणात्मक- | किया गया । अब, इस कार्य-
ब्रह्मचक्रे केन वा संसरति केन | कारणात्मक ब्रह्मचक्रमें किस हेतुसे
| जीवको संसारकी प्राप्ति होती है और
श्वेता० ४—
८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
वा मुच्यत इति संसारमोक्ष- | किस साधनसे वह मुक्त होता है इस
| प्रकार संसार और मोक्षका हेतु
हेतुप्रदर्शनायाह— | दिखलानेके लिये श्रुति कहती है—
सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते
अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे ।
पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा
जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६ ॥
जीव अपनेको और सर्वनियन्ता परमात्माको अलग-अलग मानकर
इस समस्त भूतोंके जीवननिर्वाहक ( भोगभूमि ) और सबके आश्रयभूत
( प्रलयस्थान ) महान् ब्रह्मचक्रमें भ्रमता रहता है; और जब उससे
अभिन्नरूपसे सेवित होता है तब अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
सर्वाजीव इति । सर्वेषामाजी- | 'सर्वाजीवे' इत्यादि । जिसमें समस्त
वनमस्मिन्निति सर्वाजीवे । सर्वेषां | भूतोंका जीवन है उस सर्वाजीव
| तथा जिसमें सबकी संस्था—समाप्ति
संस्था समाप्तिः प्रलयो यस्मि- | यानी प्रलय होती है उस सर्वसंस्थ
न्निति सर्वसंस्थे । बृहन्तेऽस्मि- | बृहन्त ( महान् ) ब्रह्मचक्रमें हंस-
| जीव, संसारमार्गमें हनन—गमन
न्हंसो जीवः । हन्ति गच्छत्यध्वा- | करता है इसलिये जीव हंस कहा
नमिति हंसः । भ्राम्यतेऽनात्म- | जाता है, भ्रमता रहता है, अर्थात्
| अनात्मभूत देहादिको आत्मा मानता
भूतदेहादिमात्मानं मन्यमानः | हुआ देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादि
सुरनरतिर्यगादिभेदभिन्नानायो- | भेदोंवाली अनेकों योनियोंमें भ्रमण
| करता है । इसी प्रकार भ्रमण करता
निषु । एवं भ्राम्यमाणः परिवर्तत | हुआ सब ओर भटकता रहता है—
इत्यर्थः । | ऐसा इसका तात्पर्य है ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत - शाङ्करभाष्य):
केन हेतुना नानायोनिषु
परिवर्तते ? इति तत्राह—पृथगा-
त्मानं प्रेरितारं च मत्वेति । आ-
त्मानं जीवात्मानं प्रेरितारं चेश्वरं
पृथग्भेदेन मत्वा ज्ञात्वा'अन्योऽसा-
वन्योऽहमस्मि' इति जीवेश्वरभेद-
दर्शनेन संसारे परिवर्तत इत्यर्थः ।
केन मुच्यते ? इत्याह—जुष्टः
सेवितस्तेनेश्वरेण चित्सदानन्दा-
द्वितीयब्रह्मात्मनाहं ब्रह्मास्मीति
समाधानं कृत्वेत्यर्थः । तेनेश्वर-
सेवनादमृतत्वमेति । यस्तु पूर्णा-
नन्दब्रह्मरूपेणात्मानमवगच्छति स
मुच्यते । यस्तु परमात्मनोऽन्य-
मात्मानं जानाति स बध्यत इति ।
तथा च बृहदारण्यके भेददर्श-
नस्य संसारहेतुत्वं प्रदर्शितम्—
“य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स
इदं सर्वं भवतीति तस्य ह न
देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा
दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद/भाष्यार्थ):
किस कारणसे अनेकों योनियोंमें
घूमता है ? इसके उत्तरमें कहते हैं—
'पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा' इति ।
आत्मा अर्थात् जीवात्मा और प्रेरक—
ईश्वरको पृथक्—विभिन्नरूपसे मान-
कर; तात्पर्य यह है कि 'यह अन्य
है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार जीव
और ईश्वरका भेद देखनेसे वह
संसारमें घूमता है ।
किस उपायसे वह मुक्त होता है,
सो बतलाते हैं—उस ईश्वरसे जुष्ट—
सेवित होनेपर अर्थात् सच्चिदानन्द-
मय ब्रह्मसे अभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे 'मैं
ब्रह्म ही हूँ'—ऐसा समाधान (समाधि)
करनेपर । इस समाधिद्वारा ईश्वरका
सेवन करनेसे वह मुक्त हो जाता
है। जो कोई भी अपनेको पूर्णानन्द
ब्रह्मस्वरूपसे अनुभव करता है वही
मुक्त होता है और जो अपनेको
परमात्मासे भिन्न जानता है वह
बँधता है । इसी प्रकार बृहदारण्यक-
में भी भेददृष्टिको संसारका हेतु
दिखलाया है—"जो ऐसा जानता
है कि मैं ब्रह्म हूँ वह सर्वरूप हो
जाता है; देवगण भी उसके सर्वात्मक
ब्रह्मभावकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेको
समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका
८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
ह्येषां स भवत्यथ योऽन्यां | आत्मा ही हो जाता है । किन्तु जो
देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहम- | किसी अन्य देवताकी 'यह अन्य है
स्मीति न स वेद यथा पशुरेवं | और मैं अन्य हूँ' ऐसे भावसे
उपासना करता है वह नहीं जानता
स देवानाम्” (बृह० उ० १। | [ अर्थात् वह अज्ञानी है ] वह पशु-
४। १०) इति । | ओंके समान देवताओंका पशु है ।”
तथा च श्रीविष्णुधर्मे— | ऐसा ही विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें
“पश्यत्यात्मानमन्यं तु | भी कहा है— “जीव जबतक अपने-
यावद्वै परमात्मनः । | को परमात्मासे भिन्न देखता है
तावत्संभ्राम्यते जन्तु- | तबतक वह अपने कर्मोंद्वारा मोहित
र्मोहितो निजकर्मणा ॥ | करके भटकाया जाता है । किन्तु
संक्षीणाशेषकर्मा तु | जब उसके समस्त कर्म क्षीण हो
जाते हैं तो उसे शुद्ध परब्रह्मका
परं ब्रह्म प्रपश्यति । | अपनेसे अभेदरूपसे साक्षात्कार
अभेदेनात्मनः शुद्धं | होता है, और शुद्धस्वरूप हो जानेके
शुद्धत्वादक्षयो भवेत्”॥६॥ | कारण वह अमर हो जाता है”॥६॥
परब्रह्मकी प्राप्तिसे मुक्तिका वर्णन
ननु तमेकनेमिमित्यादिना | ‘तमेकनेमिम्’ इत्यादि वाक्यसे
सप्रपञ्चं ब्रह्म प्रतिपादितम् । तथा | प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मका प्रतिपादन किया
गया है; ऐसी स्थितिमें ‘मैं ब्रह्म हूँ’
च सत्यहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्म- | इस प्रकार ब्रह्मात्मभावकी प्राप्ति
प्रतिपत्तावपि सप्रपञ्चस्यैव ब्रह्मण | होनेपर भी प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मको ही
आत्मस्वरूपसे जाना जायगा;
आत्मत्वेनावगमात् “तं यथा | इससे “उसकी जो जिस प्रकार
यथोपासते तदेव भवति” इति | उपासना करता है वैसा ही हो जाता
है” इस सिद्धान्तके अनुसार सप्रपञ्च
सप्रपञ्चब्रह्मप्राप्तिरेव स्यात् । ततश्च | ब्रह्मकी ही प्राप्ति होगी । और तब
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
प्रपञ्चस्यापरित्यागान्न मोक्षसिद्धिः। प्रपञ्चका त्याग न होनेसे मोक्षकी भी
प्राप्ति नहीं होगी । इसलिये 'उससे
ततश्च जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेती- अभिन्नरूपसे सेवित होनेपर अमरत्व
प्राप्त करता है' इस प्रकार जो
तिमोक्षोपदेशोऽनुपपन्न एवेत्या- मोक्षका उपदेश किया है वह
अनुपयुक्त ही है—ऐसी आशङ्का
शङ्कयाह— करके श्रुति कहती है—
उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म
तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च ।
अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा
लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः ॥ ७ ॥
प्रपञ्चसे पृथक्रूपसे वर्णन किया गया यह ब्रह्म सर्वोत्कृष्ट ही है।
उसमें [ भोक्ता, भोग्य और नियन्ता—ये ] तीनों स्थित हैं। वह इनकी
सुप्रतिष्ठा और अविनाशी है। इसमें प्रवेशद्वार पाकर ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममें
लीन हो समाधिनिष्ठामें स्थित हुए जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥
उद्गीतमिति । सप्रपञ्चं ब्रह्म 'उद्गीतम्' इत्यादि । यदि ब्रह्म
यदि स्यात्ततो भवत्येव मोक्षा- प्रपञ्चयुक्त होता तब तो [ उसकी
प्राप्तिमें ] मोक्षका अभाव हो सकता
भावः । न त्वेतदस्ति । कस्मात् ? था । किन्तु ऐसी बात है नहीं ।
यत उद्गीतमुद्धृत्य गीतमुपदिष्टं कैसे नहीं है ? क्योंकि वेदान्तोंने
कार्यकारणलक्षणात्प्रपञ्चाद्वेदान्तैः। इसका कार्य-कारणरूप प्रपञ्चसे
अलग करके गान यानी उपदेश
"अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- किया है । तात्पर्य यह है कि "वह
दितादधि" (के० उ० १। ३)। विदितसे भिन्न है और अविदितसे
९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
"तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदि- | भी परे है", "तू उसीको ब्रह्म जान,
दमुपासते” (के० उ० १।४)। | जिसकी लोक इदंभावसे उपासना
"अस्थूलम्” (बृ० उ० ३ । | करता है वह ब्रह्म नहीं है", "वह
८।८) अशब्दमस्पर्श" (क० | स्थूल नहीं है", "शब्दरहित है
उ० १ । ३ । १५) । "स एष | और स्पर्शरहित है", "वह ब्रह्म यह
नेति नेतीति ।” “ततो यदुत्तर- | (कारण) नहीं है, यह (कार्य)
तरम्" (श्वेता० उ० ३ । १०)। | नहीं है", "जो उससे भी आगे
"अन्यत्र धर्मात्” (क० उ० १।२। | है", "वह धर्मसे परे है" "न
१४)। “न सन्न चासच्छिव एव | सत् है न असत्, वह शुद्ध-
केवलः” (श्वेता० उ० ४ । १८)। | स्वभाव एवं अविद्याजनित विकल्पसे
"तमसः परः ।” “यतो वाचो | शून्य है", "वह अज्ञानसे परे है",
निवर्तन्ते ।” (तै० उ० २।४।१) | "जहाँसे वाणी लौट आती है",
"यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति | “जहाँ न अन्य कुछ देखता है, न
नान्यद्विजानाति स भूमा” (छा० | अन्य कुछ जानता है वह भूमा है",
उ० ७। २४। १)। "योऽश- | "जो भूख-प्यास तथा शोक, मोह,
नायापिपासे शोकं मोहं भयं जरा- | भय और वृद्धावस्थासे परे है", "जो
मत्येति” (बृ० उ० ३।५। | प्राण और मनसे रहित, शुद्धस्वरूप
१)। "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो | और पर अव्याकृतसे भी परे है",
ह्यक्षरात्परतः परः” (मु० उ० २। | “ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है",
१।२)। "एकमेवाद्वितीयम् ।” | "विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला
(छा० उ० ६ । २ । १) “वाचा- | नाममात्र है", "यहाँ नाना कुछ
रम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० | नहीं है" तथा "उसे एकरूप ही
उ० ६।१।४)। “नेह नानास्ति | देखना चाहिये" इत्यादि मन्त्रोंमें
किञ्चन" (बृ० उ० ४।४।१९)। | ब्रह्म प्रपञ्चसे असङ्ग ही जाना
"एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० | जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ।
४।४।२०)। इत्येवमादिषु प्रपञ्चा-
स्पृष्टमेव ब्रह्मावगम्यत इत्यर्थः ।
यत एवं प्रपञ्चधर्मरहितं | क्योंकि इस प्रकार ब्रह्म प्रपञ्चके
ब्रह्मात एव परंमं तु ब्रह्म । | धर्मोंसे रहित है, इसलिये वह
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
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| [Sanskrit Text] | [Hindi Translation] |
|---|---|
| तुशब्दोऽवधारणे । परममेवोत्कृ- | सर्वोत्कृष्ट ही है । मूलमें ‘तु’ शब्द |
| ष्टमेव । संसारधर्मानास्कन्दित- | निश्चयार्थक है । परमेव अर्थात् |
| त्वात् । उद्गीतत्वेन ब्रह्मण | सर्वोत्कृष्ट ही है, क्योंकि वह समस्त सांसारिक धर्मोंसे अनाक्रान्त है । |
| उत्कृष्टत्वात् । “तं यथा यथो- | उद्गीतरूप होनेसे ब्रह्म उत्कृष्ट है । |
| पासते” इति न्यायेनोत्कृष्टब्रह्मो- | “उसे जो जिस प्रकार उपासना करता है” इस न्यायसे उत्कृष्ट ब्रह्मकी |
| पासनादुत्कृष्टमेव फलं मोक्षाख्यं | उपासना करनेसे मोक्षरूप उत्कृष्ट |
| भवत्येवेत्यभिप्रायः । | फल ही होता है ऐसा अभिप्राय है । |
| नन्वेवं तर्हि ब्रह्मणः प्रपञ्चा- | ऐसा होनेपर तो यदि ब्रह्म |
| (हाशिया: प्रपञ्चस्य स्वातन्त्र्यम् आशङ्क्य तन्निरसनम्*)* संस्पृष्टत्वे प्रपञ्च- | प्रपञ्चसे असङ्ग है और ब्रह्मका भी |
| स्यापि ब्रह्मासंसर्गा- | प्रपञ्चसे कोई संसर्ग नहीं है तो |
| त्सांख्यवाद इव | सांख्यवादके समान प्रपञ्च भी पृथक् सिद्ध होनेके कारण स्वतन्त्र होनेसे |
| प्रपञ्चस्यापि पृथक्सिद्धत्वेन स्व- | “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला |
| तन्त्रत्वाद् “वाचारम्भणं विकारो | नाममात्र है” इस वाक्यके अनुसार |
| नामधेयम्” (छा०उ०६।१।४) इति | प्रपञ्चकी परतन्त्रता स्वीकार कर |
| पारतन्त्र्याभ्युपगमेन मिथ्यात्वोप- | उसका मिथ्यात्व बतलाते हुए |
| देशपूर्वकमद्वितीयब्रह्मात्मत्वेनोप- | अद्वितीय ब्रह्मरूपसे उपदेश करना |
| देशोऽनुपपन्नश्चेत्याशङ्क्याह- | अनुचित ही होगा—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— |
| तस्मिंस्त्रयमिति । यद्यपि ब्रह्म | ‘तस्मिंस्त्रयम्’ इत्यादि । यद्यपि ब्रह्म- |
| प्रपञ्चासंस्पृष्टं स्वतन्त्रं च तथापि | का प्रपञ्चसे संसर्ग नहीं है और वह |
| प्रपञ्चो न स्वतन्त्रः । अपि तु | स्वतन्त्र है तथापि प्रपञ्च स्वतन्त्र नहीं |
| तस्मिन्नेव ब्रह्मणि त्रयं प्रतिष्ठितं | है; अपि तु भोक्ता, भोग्य और प्रेरिता— |
| भोक्ता भोग्यं प्रेरितारमिति | ऐसा कहकर जिनका आगे वर्णन |
९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[बायाँ स्तम्भ]
वक्ष्यमाणं भोग्यभोक्तृनियन्तृ-
लक्षणम् । “अजा ह्येका भोक्तृ-
भोग्यार्थयुक्ता” इति वक्ष्यमाणं भोक्तृ-
भोग्यार्थरूपं चान्यद्वेदं श्रुतिसिद्धं
विराट् सूत्राभ्यां कृतं नामरूपकर्म-
विश्वतैजसप्राज्ञजाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति-
रूपस्वरूपं प्रतिष्ठितं रज्ज्वामिव
सर्पः । यत एतस्मिन्सर्वं भो-
क्त्रादिलक्षणं प्रपञ्चरूपं प्रति-
ष्ठितम् , अत एवास्य भोक्त्रादि-
त्रयात्मकस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्म सुप्र-
तिष्ठा शोभनप्रतिष्ठा । ब्रह्मणो-
ऽन्यस्य चलनात्मकत्वाच्चलप्रति-
ष्ठान्यत्र । ब्रह्मणोऽचलत्वादत्रा-
चलप्रतिष्ठा ।
नन्वेवं तर्हि विकारभूत-
[पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मणः प्रपञ्चाश्रयत्वेऽपि नित्यत्वसमर्थनम्] प्रपञ्चाश्रयत्वेन परि-
णामित्वादद्ध्यादिव-
दनित्यं स्यादि-
त्याशङ्कयाह—अक्षरं चेति ।
यद्यपि विकारः प्रपञ्चाश्रय-
स्तथाप्यक्षरं न क्षरतीत्यक्षरम् ।
[दायाँ स्तम्भ]
किया है वे भोक्ता, भोग्य और नियन्ता
तीनों उस ब्रह्ममें ही स्थित हैं।
अथवा “अजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थ-
युक्ता” इस वाक्यसे कहे जानेवाले
भोक्ता, भोग्य और भोग, किंवा
श्रुति-प्रतिपादित विराट् और हिरण्य-
गर्भद्वारा रचे हुए नाम, रूप और
कर्म अथवा विश्व, तैजस, प्राज्ञ या
जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति ये तीनों
उसमें रज्जुमें सर्पके समान प्रतिष्ठित
हैं । क्योंकि इसमें भोक्तादिरूप
सारा प्रपञ्च प्रतिष्ठित है,
इसीसे ब्रह्म इस भोक्तादि त्रयरूप
प्रपञ्चकी सुप्रतिष्ठा अर्थात् उत्तम
आश्रयस्थान है । ब्रह्मसे भिन्न और
सब चलायमान (अस्थायी) हैं,
इसलिये अन्य सब चलप्रतिष्ठा हैं;
ब्रह्म अचल है, इसलिये इसमें उनकी
अचल प्रतिष्ठा है।
यदि ऐसा है तब तो विकारभूत
प्रपञ्चका आश्रय होनेसे परिणामी
होनेके कारण दधि आदिके समान
ब्रह्म भी अनित्य सिद्ध होगा—ऐसी
आशङ्का करके श्रुति कहती है—
‘अक्षरं च ।’ यद्यपि प्रपञ्चका
आश्रय होना विकार है तथापि वह
अक्षर है। जो स्वरूपसे च्युत नहीं
होता उसे अक्षर कहते हैं।