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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 276 में से

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पृष्ठ 88

७४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

योरभाव एव स्यात् । तत्सिद्धयर्थं | ईश्वरके न रहनेपर तो संसार और
प्रपञ्चाद्यवस्थानं दर्शयति— | मोक्षका अभाव ही हो जाना चाहिये
"एकं पादं नोत्क्षिपति | था । अतः उसको सिद्धिके लिये
सलिलाद्धंस उच्चरन् । | सनत्सुजातजी भी "एकं पादं
स चेदविन्ददानन्दं | नोत्क्षिपति" इत्यादि वाक्यसे यह
न सत्यं नानृतं भवेत् " | बतलाते हुए कि "हंस (परमात्मा)
इति सनत्सुजातोऽप्येकं पादं | जल ( संसार ) से ऊपर रहते हुए
नोत्क्षिपतीत्यादि । तथा च | भी अपना एक पाद नहीं निकालता ।
श्रुतिः—"पादोऽस्य विश्वा भू- | यदि वह [ स्वरूपभूत ] आनन्दका
तानि त्रिपादस्यामृतं दिवि" (छा० | अनुभव करने लगे तो न सत्य
उ० ३।१२।६) इति । तत्र प्रथमेन | ( मोक्ष ) ही रहे और न मिथ्या
मन्त्रेण सर्वात्मानं ब्रह्म चक्रं | ( संसार ) ही" ईश्वरकी सिद्धिके
दर्शयति द्वितीयेन नदीरूपेण— | लिये प्रपञ्चादिकी स्थिति दिखलाते
| हैं। ऐसा ही "सम्पूर्ण भूत परमात्मा-
| के एक पाद हैं और उसके अमृत-
| मय तीन पाद द्युलोकमें हैं"
| यह श्रुति भी बतलाती है । यहाँ
| श्रुति पहले मन्त्रसे सर्वात्मा ब्रह्मको
| चक्ररूपसे और दूसरे मन्त्रसे नदी-
| रूपसे प्रदर्शित करती है—

कारण-ब्रह्मका चक्ररूपसे वर्णन

तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं
शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं
त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥