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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ]        शाङ्करभाष्यार्थ        ८७

शीर्षक (Header):
अध्याय १ ]        शाङ्करभाष्यार्थ        ८७


वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत - शाङ्करभाष्य):

केन हेतुना नानायोनिषु
परिवर्तते ? इति तत्राह—पृथगा-
त्मानं प्रेरितारं च मत्वेति । आ-
त्मानं जीवात्मानं प्रेरितारं चेश्वरं
पृथग्भेदेन मत्वा ज्ञात्वा'अन्योऽसा-
वन्योऽहमस्मि' इति जीवेश्वरभेद-
दर्शनेन संसारे परिवर्तत इत्यर्थः ।
केन मुच्यते ? इत्याह—जुष्टः
सेवितस्तेनेश्वरेण चित्सदानन्दा-
द्वितीयब्रह्मात्मनाहं ब्रह्मास्मीति
समाधानं कृत्वेत्यर्थः । तेनेश्वर-
सेवनादमृतत्वमेति । यस्तु पूर्णा-
नन्दब्रह्मरूपेणात्मानमवगच्छति स
मुच्यते । यस्तु परमात्मनोऽन्य-
मात्मानं जानाति स बध्यत इति ।
तथा च बृहदारण्यके भेददर्श-
नस्य संसारहेतुत्वं प्रदर्शितम्—
“य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स
इदं सर्वं भवतीति तस्य ह न
देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा


दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद/भाष्यार्थ):

किस कारणसे अनेकों योनियोंमें
घूमता है ? इसके उत्तरमें कहते हैं—
'पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा' इति ।
आत्मा अर्थात् जीवात्मा और प्रेरक—
ईश्वरको पृथक्—विभिन्नरूपसे मान-
कर; तात्पर्य यह है कि 'यह अन्य
है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार जीव
और ईश्वरका भेद देखनेसे वह
संसारमें घूमता है ।
किस उपायसे वह मुक्त होता है,
सो बतलाते हैं—उस ईश्वरसे जुष्ट—
सेवित होनेपर अर्थात् सच्चिदानन्द-
मय ब्रह्मसे अभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे 'मैं
ब्रह्म ही हूँ'—ऐसा समाधान (समाधि)
करनेपर । इस समाधिद्वारा ईश्वरका
सेवन करनेसे वह मुक्त हो जाता
है। जो कोई भी अपनेको पूर्णानन्द
ब्रह्मस्वरूपसे अनुभव करता है वही
मुक्त होता है और जो अपनेको
परमात्मासे भिन्न जानता है वह
बँधता है । इसी प्रकार बृहदारण्यक-
में भी भेददृष्टिको संसारका हेतु
दिखलाया है—"जो ऐसा जानता
है कि मैं ब्रह्म हूँ वह सर्वरूप हो
जाता है; देवगण भी उसके सर्वात्मक
ब्रह्मभावकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेको
समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका

८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
ह्येषां स भवत्यथ योऽन्यां | आत्मा ही हो जाता है । किन्तु जो
देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहम- | किसी अन्य देवताकी 'यह अन्य है
स्मीति न स वेद यथा पशुरेवं | और मैं अन्य हूँ' ऐसे भावसे
उपासना करता है वह नहीं जानता
स देवानाम्” (बृह० उ० १। | [ अर्थात् वह अज्ञानी है ] वह पशु-
४। १०) इति । | ओंके समान देवताओंका पशु है ।”
तथा च श्रीविष्णुधर्मे— | ऐसा ही विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें
“पश्यत्यात्मानमन्यं तु | भी कहा है— “जीव जबतक अपने-
यावद्वै परमात्मनः । | को परमात्मासे भिन्न देखता है
तावत्संभ्राम्यते जन्तु- | तबतक वह अपने कर्मोंद्वारा मोहित
र्मोहितो निजकर्मणा ॥ | करके भटकाया जाता है । किन्तु
संक्षीणाशेषकर्मा तु | जब उसके समस्त कर्म क्षीण हो
जाते हैं तो उसे शुद्ध परब्रह्मका
परं ब्रह्म प्रपश्यति । | अपनेसे अभेदरूपसे साक्षात्कार
अभेदेनात्मनः शुद्धं | होता है, और शुद्धस्वरूप हो जानेके
शुद्धत्वादक्षयो भवेत्”॥६॥ | कारण वह अमर हो जाता है”॥६॥
परब्रह्मकी प्राप्तिसे मुक्तिका वर्णन
ननु तमेकनेमिमित्यादिना | ‘तमेकनेमिम्’ इत्यादि वाक्यसे
सप्रपञ्चं ब्रह्म प्रतिपादितम् । तथा | प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मका प्रतिपादन किया
गया है; ऐसी स्थितिमें ‘मैं ब्रह्म हूँ’
च सत्यहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्म- | इस प्रकार ब्रह्मात्मभावकी प्राप्ति
प्रतिपत्तावपि सप्रपञ्चस्यैव ब्रह्मण | होनेपर भी प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मको ही
आत्मस्वरूपसे जाना जायगा;
आत्मत्वेनावगमात् “तं यथा | इससे “उसकी जो जिस प्रकार
यथोपासते तदेव भवति” इति | उपासना करता है वैसा ही हो जाता
है” इस सिद्धान्तके अनुसार सप्रपञ्च
सप्रपञ्चब्रह्मप्राप्तिरेव स्यात् । ततश्च | ब्रह्मकी ही प्राप्ति होगी । और तब

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
प्रपञ्चस्यापरित्यागान्न मोक्षसिद्धिः। प्रपञ्चका त्याग न होनेसे मोक्षकी भी
प्राप्ति नहीं होगी । इसलिये 'उससे
ततश्च जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेती- अभिन्नरूपसे सेवित होनेपर अमरत्व
प्राप्त करता है' इस प्रकार जो
तिमोक्षोपदेशोऽनुपपन्न एवेत्या- मोक्षका उपदेश किया है वह
अनुपयुक्त ही है—ऐसी आशङ्का
शङ्कयाह— करके श्रुति कहती है—
उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म
तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च ।
अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा
लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः ॥ ७ ॥
प्रपञ्चसे पृथक्रूपसे वर्णन किया गया यह ब्रह्म सर्वोत्कृष्ट ही है।
उसमें [ भोक्ता, भोग्य और नियन्ता—ये ] तीनों स्थित हैं। वह इनकी
सुप्रतिष्ठा और अविनाशी है। इसमें प्रवेशद्वार पाकर ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममें
लीन हो समाधिनिष्ठामें स्थित हुए जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥
उद्गीतमिति । सप्रपञ्चं ब्रह्म 'उद्गीतम्' इत्यादि । यदि ब्रह्म
यदि स्यात्ततो भवत्येव मोक्षा- प्रपञ्चयुक्त होता तब तो [ उसकी
प्राप्तिमें ] मोक्षका अभाव हो सकता
भावः । न त्वेतदस्ति । कस्मात् ? था । किन्तु ऐसी बात है नहीं ।
यत उद्गीतमुद्धृत्य गीतमुपदिष्टं कैसे नहीं है ? क्योंकि वेदान्तोंने
कार्यकारणलक्षणात्प्रपञ्चाद्वेदान्तैः। इसका कार्य-कारणरूप प्रपञ्चसे
अलग करके गान यानी उपदेश
"अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- किया है । तात्पर्य यह है कि "वह
दितादधि" (के० उ० १। ३)। विदितसे भिन्न है और अविदितसे

९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
"तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदि- | भी परे है", "तू उसीको ब्रह्म जान,
दमुपासते” (के० उ० १।४)। | जिसकी लोक इदंभावसे उपासना
"अस्थूलम्” (बृ० उ० ३ । | करता है वह ब्रह्म नहीं है", "वह
८।८) अशब्दमस्पर्श" (क० | स्थूल नहीं है", "शब्दरहित है
उ० १ । ३ । १५) । "स एष | और स्पर्शरहित है", "वह ब्रह्म यह
नेति नेतीति ।” “ततो यदुत्तर- | (कारण) नहीं है, यह (कार्य)
तरम्" (श्वेता० उ० ३ । १०)। | नहीं है", "जो उससे भी आगे
"अन्यत्र धर्मात्” (क० उ० १।२। | है", "वह धर्मसे परे है" "न
१४)। “न सन्न चासच्छिव एव | सत् है न असत्, वह शुद्ध-
केवलः” (श्वेता० उ० ४ । १८)। | स्वभाव एवं अविद्याजनित विकल्पसे
"तमसः परः ।” “यतो वाचो | शून्य है", "वह अज्ञानसे परे है",
निवर्तन्ते ।” (तै० उ० २।४।१) | "जहाँसे वाणी लौट आती है",
"यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति | “जहाँ न अन्य कुछ देखता है, न
नान्यद्विजानाति स भूमा” (छा० | अन्य कुछ जानता है वह भूमा है",
उ० ७। २४। १)। "योऽश- | "जो भूख-प्यास तथा शोक, मोह,
नायापिपासे शोकं मोहं भयं जरा- | भय और वृद्धावस्थासे परे है", "जो
मत्येति” (बृ० उ० ३।५। | प्राण और मनसे रहित, शुद्धस्वरूप
१)। "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो | और पर अव्याकृतसे भी परे है",
ह्यक्षरात्परतः परः” (मु० उ० २। | “ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है",
१।२)। "एकमेवाद्वितीयम् ।” | "विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला
(छा० उ० ६ । २ । १) “वाचा- | नाममात्र है", "यहाँ नाना कुछ
रम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० | नहीं है" तथा "उसे एकरूप ही
उ० ६।१।४)। “नेह नानास्ति | देखना चाहिये" इत्यादि मन्त्रोंमें
किञ्चन" (बृ० उ० ४।४।१९)। | ब्रह्म प्रपञ्चसे असङ्ग ही जाना
"एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० | जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ।
४।४।२०)। इत्येवमादिषु प्रपञ्चा-
स्पृष्टमेव ब्रह्मावगम्यत इत्यर्थः ।
यत एवं प्रपञ्चधर्मरहितं | क्योंकि इस प्रकार ब्रह्म प्रपञ्चके
ब्रह्मात एव परंमं तु ब्रह्म । | धर्मोंसे रहित है, इसलिये वह

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
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[Sanskrit Text][Hindi Translation]
तुशब्दोऽवधारणे । परममेवोत्कृ-सर्वोत्कृष्ट ही है । मूलमें ‘तु’ शब्द
ष्टमेव । संसारधर्मानास्कन्दित-निश्चयार्थक है । परमेव अर्थात्
त्वात् । उद्गीतत्वेन ब्रह्मणसर्वोत्कृष्ट ही है, क्योंकि वह समस्त सांसारिक धर्मोंसे अनाक्रान्त है ।
उत्कृष्टत्वात् । “तं यथा यथो-उद्गीतरूप होनेसे ब्रह्म उत्कृष्ट है ।
पासते” इति न्यायेनोत्कृष्टब्रह्मो-“उसे जो जिस प्रकार उपासना करता है” इस न्यायसे उत्कृष्ट ब्रह्मकी
पासनादुत्कृष्टमेव फलं मोक्षाख्यंउपासना करनेसे मोक्षरूप उत्कृष्ट
भवत्येवेत्यभिप्रायः ।फल ही होता है ऐसा अभिप्राय है ।
नन्वेवं तर्हि ब्रह्मणः प्रपञ्चा-ऐसा होनेपर तो यदि ब्रह्म
(हाशिया: प्रपञ्चस्य स्वातन्त्र्यम् आशङ्क्य तन्निरसनम्*)* संस्पृष्टत्वे प्रपञ्च-प्रपञ्चसे असङ्ग है और ब्रह्मका भी
स्यापि ब्रह्मासंसर्गा-प्रपञ्चसे कोई संसर्ग नहीं है तो
त्सांख्यवाद इवसांख्यवादके समान प्रपञ्च भी पृथक् सिद्ध होनेके कारण स्वतन्त्र होनेसे
प्रपञ्चस्यापि पृथक्सिद्धत्वेन स्व-“विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला
तन्त्रत्वाद् “वाचारम्भणं विकारोनाममात्र है” इस वाक्यके अनुसार
नामधेयम्” (छा०उ०६।१।४) इतिप्रपञ्चकी परतन्त्रता स्वीकार कर
पारतन्त्र्याभ्युपगमेन मिथ्यात्वोप-उसका मिथ्यात्व बतलाते हुए
देशपूर्वकमद्वितीयब्रह्मात्मत्वेनोप-अद्वितीय ब्रह्मरूपसे उपदेश करना
देशोऽनुपपन्नश्चेत्याशङ्क्याह-अनुचित ही होगा—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—
तस्मिंस्त्रयमिति । यद्यपि ब्रह्म‘तस्मिंस्त्रयम्’ इत्यादि । यद्यपि ब्रह्म-
प्रपञ्चासंस्पृष्टं स्वतन्त्रं च तथापिका प्रपञ्चसे संसर्ग नहीं है और वह
प्रपञ्चो न स्वतन्त्रः । अपि तुस्वतन्त्र है तथापि प्रपञ्च स्वतन्त्र नहीं
तस्मिन्नेव ब्रह्मणि त्रयं प्रतिष्ठितंहै; अपि तु भोक्ता, भोग्य और प्रेरिता—
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारमितिऐसा कहकर जिनका आगे वर्णन

९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १


[बायाँ स्तम्भ]

वक्ष्यमाणं भोग्यभोक्तृनियन्तृ-
लक्षणम् । “अजा ह्येका भोक्तृ-
भोग्यार्थयुक्ता” इति वक्ष्यमाणं भोक्तृ-
भोग्यार्थरूपं चान्यद्वेदं श्रुतिसिद्धं
विराट् सूत्राभ्यां कृतं नामरूपकर्म-
विश्वतैजसप्राज्ञजाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति-
रूपस्वरूपं प्रतिष्ठितं रज्ज्वामिव
सर्पः । यत एतस्मिन्सर्वं भो-
क्त्रादिलक्षणं प्रपञ्चरूपं प्रति-
ष्ठितम् , अत एवास्य भोक्त्रादि-
त्रयात्मकस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्म सुप्र-
तिष्ठा शोभनप्रतिष्ठा । ब्रह्मणो-
ऽन्यस्य चलनात्मकत्वाच्चलप्रति-
ष्ठान्यत्र । ब्रह्मणोऽचलत्वादत्रा-
चलप्रतिष्ठा ।
नन्वेवं तर्हि विकारभूत-
[पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मणः प्रपञ्चाश्रयत्वेऽपि नित्यत्वसमर्थनम्] प्रपञ्चाश्रयत्वेन परि-
णामित्वादद्ध्यादिव-
दनित्यं स्यादि-
त्याशङ्कयाह—अक्षरं चेति ।
यद्यपि विकारः प्रपञ्चाश्रय-
स्तथाप्यक्षरं न क्षरतीत्यक्षरम् ।


[दायाँ स्तम्भ]

किया है वे भोक्ता, भोग्य और नियन्ता
तीनों उस ब्रह्ममें ही स्थित हैं।
अथवा “अजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थ-
युक्ता” इस वाक्यसे कहे जानेवाले
भोक्ता, भोग्य और भोग, किंवा
श्रुति-प्रतिपादित विराट् और हिरण्य-
गर्भद्वारा रचे हुए नाम, रूप और
कर्म अथवा विश्व, तैजस, प्राज्ञ या
जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति ये तीनों
उसमें रज्जुमें सर्पके समान प्रतिष्ठित
हैं । क्योंकि इसमें भोक्तादिरूप
सारा प्रपञ्च प्रतिष्ठित है,
इसीसे ब्रह्म इस भोक्तादि त्रयरूप
प्रपञ्चकी सुप्रतिष्ठा अर्थात् उत्तम
आश्रयस्थान है । ब्रह्मसे भिन्न और
सब चलायमान (अस्थायी) हैं,
इसलिये अन्य सब चलप्रतिष्ठा हैं;
ब्रह्म अचल है, इसलिये इसमें उनकी
अचल प्रतिष्ठा है।
यदि ऐसा है तब तो विकारभूत
प्रपञ्चका आश्रय होनेसे परिणामी
होनेके कारण दधि आदिके समान
ब्रह्म भी अनित्य सिद्ध होगा—ऐसी
आशङ्का करके श्रुति कहती है—
‘अक्षरं च ।’ यद्यपि प्रपञ्चका
आश्रय होना विकार है तथापि वह
अक्षर है। जो स्वरूपसे च्युत नहीं
होता उसे अक्षर कहते हैं।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३

| चशब्दोऽवधारणे, अविनाश्येव | यहाँ 'च' शब्द निश्चयार्थक है अर्थात् |
| ब्रह्म, मायात्मकत्वाद्विकारस्य । | ब्रह्म अविनाशी ही है, क्योंकि विकार |
| विकाराश्रयत्वेऽप्यविनाश्येव कूट- | मायिक है। अभिप्राय यह है कि |
| स्थं ब्रह्मावतिष्ठत इत्यभिप्रायः । | विकारका आश्रय होनेपर भी कूटस्थ |
| मायात्मकत्वं च प्रपञ्चस्य पूर्वमेव | ब्रह्म अविनाशी ही रहता है । |
| प्रपञ्चितम् । तस्मात्सर्वात्मक- | प्रपञ्चका मायामय होना तो पहले |
| त्वेऽपि ब्रह्मणः प्रपञ्चस्य मिथ्या- | ही विस्तारसे बतला दिया गया है । |
| त्मकत्वेन ब्रह्मणः प्रपञ्चासंसर्गा- | अतः तात्पर्य यह है कि ब्रह्म यद्यपि |
| त्पूर्णानन्दब्रह्मात्मानं पश्यतो | सर्वरूप है तथापि प्रपञ्च मिथ्या |
| मोक्षाख्यः परमपुरुषार्थो भवती- | होनेसे ब्रह्मसे प्रपञ्चका कोई सम्बन्ध |
| त्यर्थः । | नहीं है । अतः पूर्णानन्दस्वरूप |
| | ब्रह्मात्मभावका दर्शन करनेवाले |
| | पुरुषको मोक्षरूप परम पुरुषार्थकी |
| | प्राप्ति होती है । |
| कथं तस्यात्मानं पश्यतो | अब श्रुति यह बतलाती है कि |
| (पूर्णानन्द-ब्रह्मात्मानं पश्यतो मोक्षसिद्धिप्रकारः) मोक्षसिद्धिरित्यत | उस आत्मदर्शीको किस प्रकार मोक्ष- |
| आह—अत्रास्मिन्न- | की प्राप्ति होती है ? यहाँ—अन्नमय |
| न्नमयाद्यानन्दमया- | कोशसे लेकर आनन्दमय कोशपर्यन्त |
| न्ते देहे विराडाद्यव्याकृतान्ते वा | इस देहमें अथवा विराट्से लेकर |
| प्रपञ्चे पूर्वपूर्वोपाधिप्रविलयेनोत्त- | अव्याकृतपर्यन्त प्रपञ्चमें पूर्व-पूर्व |
| रोत्तरमप्यशनायाद्यसंसृष्टं वाचा- | उपाधिका लय करते हुए उत्तरोत्तर |
| मगोचरं ब्रह्मविदो विदित्वा | क्षुधादिके संसर्गसे शून्य वाणी- |
| लीना ब्रह्मणि विश्वाद्युप- | के अविषयभूत ब्रह्मको जानकर |
| संहारमुखेन लयं गता अहं | ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममें लीन हो— |
| ब्रह्मास्मीति ब्रह्मरूपेणैव स्थिता | विश्वादिका उपसंहार करते हुए ब्रह्ममें |
| | ही लयको प्राप्त हो 'मैं ब्रह्म हूँ' |
| | इस प्रकार ब्रह्मरूपसे ही स्थित हो |

९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

इत्यर्थः । तत्पराः समाधिपराः किं | जाते हैं । और तत्पर अर्थात्
कुर्वन्ति योनिमुक्ता भवन्ति गर्भ- | समाधिपरायण होकर क्या करते
जन्मजरामरणसंसारभयान्मुक्ता | हैं?—योनिमुक्त हो जाते हैं; अर्थात्
भवन्तीत्यर्थः । | गर्भवास, जन्म, जरा और मरणरूप
| संसारके भयसे मुक्त हो जाते हैं ।
तथा च योगियाज्ञवल्क्यो | इसी प्रकार योगियाज्ञवल्क्य भी
उक्तार्थे स्मृति- ब्रह्मात्मनैवावस्थितं | ब्रह्मात्मभावसे स्थित होनेको ही
प्रमाणदर्शनम् समाधिं दर्शयति— | समाधिरूपसे प्रदर्शित करते हैं—
“यदर्थमिदमद्वैतं | “यह जो सबका कारणरूप अद्वैत-
भारूपं सर्वकारणम् । | तत्त्व है प्रकाशस्वरूप, आनन्दमय,
आनन्दममृतं नित्यं | अमृत, नित्य और समस्त भूतोंमें
सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ | ओतप्रोत है। अनन्यचित्त पुरुष उस
तदेवानन्यधीः प्राप्य | परमात्माको ही आत्मस्वरूपसे प्राप्त-
परमात्मानमात्मना । | कर उसीमें लीन हो जाता है। वही
तस्मिन्प्रलीयते त्वात्मा | समाधि कहलाती है। इन्द्रियोंको
समाधिः स उदाहृतः॥ | अपने वशमें कर यमादि गुणोंसे
इन्द्रियाणि वशीकृत्य | सम्पन्न हो मनको आत्मामें लगावे
यमादिगुणसंयुतः । | और आत्माको परमात्मामें । फिर
आत्ममध्ये मनः कुर्या- | स्वयं परमात्मभावसे स्थित हो कुछ
दात्मानं परमात्मनि ॥ | भी चिन्तन न करे। तब यह चित्त
परमात्मा स्वयं भूत्वा | अखण्ड प्रत्यगात्मामें लीन हो जाता
न किञ्चिच्चिन्तयेत्ततः । | है। वही प्रत्यगात्मा है—ऐसा
तदा तु लीयते त्वात्मा | ब्रह्मवादियोंने कहा है” ॥ ७ ॥
प्रत्यगात्मन्यखण्डिते॥ |
प्रत्यगात्मा स एव स्या- |
दित्युक्तं ब्रह्मवादिभिः॥” |
इति ॥७॥ |

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
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व्यावहारिक भेद और ज्ञानद्वारा मोक्षका प्रदर्शन

नन्वद्वितीये परमात्मन्यभ्यु- | किन्तु परमात्माको अद्वितीय
पगम्पमाने जीवेश्वरयोरपि | माननेपर तो जीव और ईश्वरका भी
विभागाभावाल्लीना ब्रह्मणीति | विभाग न रहनेसे 'लीना ब्रह्मणि
जीवानां ब्रह्मैकत्वपरा लयश्रुति- | तत्परा योनिमुक्ताः' यह जीवोंका ब्रह्ममें
रनुपपन्नैवेत्याशङ्क्य व्यवहारा- | लय बतलानेवाली श्रुति असंगत ही
वस्थायां जीवेश्वरयोरुपाधितो | होगी—ऐसी आशंका करके व्यव-
विभागं दर्शयित्वा तद्विज्ञानाद- | हारावस्थामें उपाधिवश जीव और
मृतत्वं दर्शयति— | ईश्वरका विभाग दिखलाकर श्रुति
परमात्माके विज्ञानसे अमृतत्वकी
प्राप्ति प्रदर्शित करती है—

संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च
व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः ।
अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावा-
ज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ८ ॥

परस्पर मिले हुए इस क्षर-अक्षर अथवा व्यक्ताव्यक्तरूप विश्वका
परमात्मा पोषण करता है । मायाधीन जीव भोक्तृभावके कारण उसमें बँधता
है और परमात्माका ज्ञान होनेपर समस्त पाशोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

संयुक्तमेतदिति । व्यक्तं वि- | 'संयुक्तमेतत्' इत्यादि । व्यक्त-
कारजातमव्यक्तं कारणं तदुभयं | विकारसमूह और अव्यक्त कारण
क्षरमक्षरं च व्यक्तं क्षरं विनाश्य- | ये ही दोनों क्षर और अक्षर हैं ।
व्यक्त्तमक्षरमविनाशि तदुभयं | व्यक्त-क्षर यानी विनाशी है और
परस्परसंयुक्तं कार्यकारणात्मकं | अव्यक्त-अक्षर यानी अविनाशी
विश्वं भरते बिभर्तीश ईश्वरः । | है । परस्पर मिले हुए कार्य-
कारणात्मक विश्वरूप इन दोनोंका
परमात्मा पोषण करता है

९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
तथा चाह भगवान्— ऐसा ही . भगवान्‌ने भी कहा
“क्षरः सर्वाणि भूतानि है—“सम्पूर्ण भूत (प्राकृत विकार)
कूटस्थोऽक्षर उच्यते । क्षर हैं और कूटस्थ प्रकृति
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः (भगवान्‌की मायाशक्ति) अक्षर
परमात्मेत्युदाहृतः ॥ कही जाती है । इन दोनोंसे अत्यन्त
यो लोकत्रयमाविश्य उत्कृष्ट पुरुष [ अर्थात् पुरुषोत्तम ]
बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।” तो अन्य ही है, जो परमात्मा कहा गया
(गीता १५। १६, १७) है; तथा जो अविनाशी ईश्वर तीन
इति । लोकोंमें व्याप्त होकर उनको धारण
करता है ।” इत्यादि ।
न केवलमीश्वरो व्यक्ताव्यक्तं परमात्मा केवल व्यक्ताव्यक्तरूप
भरतेऽनीशश्चानीश्वरश्च स आत्मा- विश्वका भरण ही नहीं करता, अपितु
विद्यातत्कार्यभूतदेहेन्द्रियादिभि- जीव अनीश—अस्वतन्त्र भी है और
र्बध्यते भोक्तृभावात् । एतदुक्तं वह भोक्तृत्वके कारण अविद्या और
भवति—परस्परसंयुक्त व्यष्टि- उसके कार्यभूत देह एवं इन्द्रियादिसे
समष्टिरूप ईश्वरः । तद्व्यष्टिभूत- बँध जाता है । यहाँ कहना यह है
देहेन्द्रियात्मकोऽनीशो जीवः । एवं कि ईश्वर परस्पर मिले हुए समष्टि-
समष्टिव्यष्ट्यात्मकत्वेन जीव- व्यष्टिरूप है । उनमें व्यष्टि देह एवं
परयोरौपाधिकस्य भेदस्य विद्य- इन्द्रियोंवाला मायाधीन जीव है । इस
मानत्वात्तदुपाध्युपासनद्वारेण नि- प्रकार समष्टि-व्यष्टिरूपसे जीव और
रुपाधिकमीश्वरं ज्ञात्वा मुच्यत परमात्माका औपाधिक भेद विद्यमान
इति भोक्त्रात्मैक्यवादे नानुषपन्नं रहनेसे उस उपाधिजनित उपासनाके
किञ्चिद्विद्यत इति । द्वारा निरुपाधिक ईश्वरका ज्ञान होने-
पर जीव मुक्त हो जाता है । अतः
भोक्ता जीव और परमात्माका एकत्व
माननेवाले सिद्धान्तमें असंगत कुछ
भी नहीं है ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
तथा चौपाधिकमेव भेदं | इसी प्रकार भगवान् याज्ञवल्क्य
भेदस्यौ- दर्शयति भगवान् | भी इनका औपाधिक भेद ही
पाधिकत्वम् याज्ञवल्क्यः— | दिखलाते हैं—“जिस प्रकार घटादि-
“आकाशमेकं हि यथा | में एक ही आकाश भिन्न-भिन्न हो
घटादिषु पृथग्भवेत् । | जाता है उसी प्रकार एक ही आत्मा
तथात्मैको ह्यनेकश्च | जलाशयोंमें सूर्यके समान भिन्न-भिन्न
जलाधारेष्विवांशुमान् ॥” | प्रतीत हो रहा है ।”
( याज्ञ० ३ । १४४) |
तथा च श्रीविष्णुधर्मे— | श्रीविष्णुधर्मोत्तरेमें भी ऐसा ही
“परात्मनोर्मनुष्येन्द्र | कहा है—“राजन् ! परमात्मा और
विभागोऽज्ञानकल्पितः । | जीवात्माका भेद अज्ञानकल्पित है;
क्षये तस्यात्मपरयो- | अज्ञानका नाश हो जानेपर आत्मा
र्विभागाभाव एव हि ॥ | और परमात्माके भेदका अभाव ही
आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञोऽयं | सिद्ध होता है । यह क्षेत्रज्ञसंज्ञक
संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । | जीवात्मा प्रकृतिके गुणोंसे युक्त है
तैरेव विगतः शुद्धः | और उन्हींसे रहित होनेपर यह शुद्ध-
परमात्मा निगद्यते ॥ | स्वरूप परमात्मा कहा जाता है ।
अनादिसंबन्धवत्या | यह क्षेत्रज्ञ अपनेसे अनादिकालसे
क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । | सम्बन्ध रखनेवाली अविद्यासे युक्त
युक्तः पश्यति भेदेन | होनेसे ही अपनेमें स्थित ब्रह्मको
ब्रह्म त्वात्मनि संस्थितम्॥” | भेदभावसे देखता है ।”
तथा च श्रीविष्णुपुराणे— | तथा श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा
“विभेदजनकेऽज्ञाने | है—“जीव और ब्रह्मका भेद उत्पन्न
नाशमात्यन्तिकं गते । | करनेवाले अज्ञानका आत्यन्तिक नाश
आत्मनो ब्रह्मणो भेद- | हो जानेपर आत्मा और ब्रह्मका
मसन्तं कः करिष्यति ॥” | मिथ्या भेद कौन करेगा ?”
( ६ । ७ । ९६) |

९८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

९८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

तथा च वासिष्ठे योगशास्त्रे | वासिष्ठ योगशास्त्रमें भी [ राम-
प्रश्नपूर्वकं दर्शितम्— | चन्द्रजीके ] प्रश्नपूर्वक यही बात
“यद्यात्मा निर्गुणः शुद्धः | दिखायी है। [राम—] “यदि आत्मा
सदानन्दोऽजरोऽमरः । | निर्गुण, शुद्ध, नित्यानन्दस्वरूप,
संसृतिः कस्य तात स्या- | जराशून्य और अमर है तो हे विभो !
न्मोक्षो वा विद्यया विभो ॥ | यह संसार किसे प्राप्त होता है ?
क्षेत्रनाशः कथं तस्य | अथवा ज्ञानसे किसका मोक्ष होगा ?
ज्ञायते भगवन्द्यतः । | और हे भगवन् ! [ ज्ञानीके महा-
यथावत्सर्वमेतन्मे | प्रयाणके समय ] उसका लिङ्गभङ्ग
वक्तुमर्हसि साम्प्रतम् ॥” | होता कैसे जाना जाता है ? इस
| समय ये सब बातें आप मुझे यथार्थ
वसिष्ठः— | रीतिसे बतला दीजिये ।”
“तस्यैव नित्यशुद्धस्य | वसिष्ठ— “मनीषिगण उस नित्य-
सदानन्दमयात्मनः । | शुद्ध, नित्यानन्दमय आत्माको ही
अवच्छिन्नस्य जीवस्य | देहावच्छिन्न जीवभावकी प्राप्ति होनेपर
संसृतिः कीर्त्यते बुधैः ॥ | संसारकी प्राप्ति बतलाते हैं । प्रत्येक
एक एव हि भूतात्मा | जीवमें एक ही भूतात्मा ( सत्य
भूते भूते व्यवस्थितः । | आत्मा—परब्रह्म ) स्थित है । वही
एकधा बहुधा चैव | जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाके समान
दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ | एक और अनेक रूपसे देखा जाता
भ्रान्त्यारूढः स एवात्मा | है । अविद्याधीन होनेपर वही
जीवसंज्ञः सदा भवेत् ॥” | परमात्मा सर्वदा जीवसंज्ञावाला हो
| जाता है ।”
तथा च ब्राह्मे पुराणे परस्यै- | इसी प्रकार ब्रह्मपुराणमें भी
[हाशिया: परस्यैवोपाधिक-] वोपाधिकं जीवादि- | परमात्माके ही औपाधिक जीवादि
[हाशिया: जीवादिभेदो] भेदं दर्शयति— | भेद दिखलाते हैं । वहाँ यह
[हाशिया: बन्धमुक्तादि-] | शंका करके कि ऐसी अवस्थामें
[हाशिया: व्यवस्था च] कथं तर्ह्यौपाधिक- | औपाधिक भेदसे ही बन्ध-मोक्षादिकी
भेदेन बन्धमुक्त्यादिव्यवस्था ? | व्यवस्था कैसे हो सकती है ? उनकी

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९

इत्याशङ्क्य दृष्टान्तपूर्वकं व्यवस्थां | दृष्टान्तपूर्वक व्यवस्था दिखलाते हैं—
दर्शयति— | “जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन्न
“एकस्तु सूर्यो बहुधा | जलाधारोंमें अनेकरूप दिखायी देता
जलाधारेषु दृश्यते । | है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमें
आभाति परमात्मा च | स्थित परमात्मा भी अनेकवत् भासता
सर्वोपाधिषु संस्थितः ॥ | है । वह परब्रह्म समस्त शरीरोंके
ब्रह्म सर्वशरीरेषु | बाहर और भीतर भी स्थित है ।
बाह्ये चाभ्यन्तरे स्थितम् । | जिस प्रकार आकाश पञ्चभूतोंमें
आकाशमिव भूतेषु | ओतप्रोत है उसी प्रकार समस्त
बुद्धावात्मान चान्यथा॥ | बुद्धियोंमें एक ही आत्मा अनुस्यूत
एवं सति यथा बुद्ध्या | है, और किसी प्रकार नहीं । ऐसी
देहोऽहमिति मन्यते । | स्थितिमें अनात्मामें आत्मत्वकी भ्रान्ति
अनात्मन्यात्मताभ्रान्त्या | हो जानेसे वैसी बुद्धिके द्वारा वह जीव
सा स्यात्संसारबन्धिनी ॥ | जो ऐसा मानने लगता है कि 'मैं देह
सर्वैर्विकल्पैर्हीनस्तु | हूँ' यह मति ही उसे संसारमें बाँधने-
शुद्धो बुद्धोऽजरोऽमरः । | वाली है । किन्तु इन समस्त
प्रशान्तो व्योमवद्व्यापी | विकल्पोंसे रहित वह शुद्ध, बुद्ध,
चैतन्यात्मासकृत्प्रभः ॥ | अजर, अमर, अत्यन्त शान्त,
धूमाभ्रधूलिभिर्व्योम | आकाशके समान व्यापक, चैतन्य-
यथा न मलिनायते । | स्वरूप और नित्यज्योतिःस्वरूप है ।
प्राकृतैरपरामृष्टो | जिस प्रकार धूम, मेघ और धूलि
विकारैः पुरुषस्तथा ॥ | आदिसे आकाश मलिन नहीं होता
यथैकस्मिन्घटाकाशे | उसी प्रकार पुरुष प्रकृतिके विकारोंसे
जलैर्धूमादिभिर्युते । | असंग है । जिस प्रकार एक घटा-
नान्ये मलिनतां यान्ति | काशके जल या धूमादिसे युक्त
दूरस्थाः कुत्रचित्क्वचित् ॥ | होनेपर उससे दूर रहनेवाले अन्य
| सब घटाकाश कभी किसी भी

१०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
तथा द्वन्द्वैरनेकैस्तु | स्थानमें मलिन नहीं होते उसी प्रकार
जीवे च मलिनीकृते । | एक जीवके अनेकों द्वन्द्वोंसे अभिभूत
एकस्मिन्नापरे जीवा | होनेपर भी अन्य जीव कहीं भी
मलिनाः सन्ति कुत्रचित् ॥” | मलिन नहीं हो सकते।”
तथा च शुकशिष्यो गौड- | इसी तरह शुकदेवजीके शिष्य
पादाचार्यः— | श्रीगौडपादाचार्य कहते हैं—“जिस
“यथैकस्मिन्घटाकाशे | प्रकार एक घटाकाशके धूलि और
रजोधूमादिभिर्युते । | धूमादिसे युक्त होनेपर अन्य सब
न सर्वे संप्रयुज्यन्ते | घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते, उसी
तद्वज्जीवाः सुखादिभिः॥” | तरह [ एक जीवके ] सुखादिसे सब
(माण्डू० का० ३। ५) इति। | जीव भी युक्त नहीं होते।”
तस्मादद्वितीये परमात्मन्यु- | अतः अद्वितीय परमात्मामें उपाधि-
[जीवगतदुःख-] पाधितो जीवेश्वर- | से ही जीव, ईश्वर और जीवोंके
[सुखादेरीश्वरे-] योर्जीवानां च भेद- | पारस्परिक भेदकी व्यवस्था सिद्ध
[ऽप्राप्तिः] व्यवस्थायाः सिद्ध- | होनेसे विशुद्ध सत्त्वमयी उपाधिवाले
त्वान्न विशुद्धसत्त्वोपाधेरीश्वरस्या- | ईश्वरको अशुद्ध उपाधिवाले जीवके
विशुद्धोपाधिजीवगताः सुख- | सुख, दुःख, मोह एवं ज्ञानादि प्राप्त
दुःखमोहाज्ञानादयः । तथा च | नहीं हो सकते । ऐसा ही भगवान्
भगवान्पराशरः— | पराशरजी कहते हैं—“समस्त
“ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशे- | जीवोंके अन्तःकरणोंमें स्थित ज्ञान-
रपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य । | स्वरूप, विशुद्ध सत्त्वराशि, सर्वदोष-
किं वा जगत्यस्ति समस्तपुंसा- | निर्मुक्त और नित्य प्रकाशस्वरूप
मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य ॥” | परमात्माको संसारमें कौन वस्तु
(विष्णुपु० ५। १७।३२) इति। | अज्ञात है ?”
नापि जीवान्तरगतसुखदुःख- | इसके सिवा किसी बद्ध या मुक्त
| जीवान्तरका किसी अन्य जीवके

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१

जीवस्य जीवान्तर- मोहादिना जीवान्तरस्य बद्धस्य मुक्तस्य वा संबन्धः, उपाधितो व्यवस्थायाः संभवात् । अत एकमुक्तौ सर्वमुक्तिरिति भवदुक्तस्य चोद्यस्यानवकाशः ॥ ८ ॥
सुखदुःखादिना सम्पर्कभावः | सुख, दुःख या मोहादिसे भी कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि उपाधिके कारण ऐसी व्यवस्था होनी सम्भव है । अतः आपकी इस शंकाके लिये कि 'एककी मुक्ति होनेपर सभी जीवोंकी मुक्ति हो जानी चाहिये' कोई अवकाश नहीं है ॥ ८ ॥
ईश्वर, जीव और प्रकृतिकी विलक्षणता तथा उनके तत्त्व-ज्ञानसे मोक्षका कथन
किञ्चेदमपरं वैलक्षण्यमित्याह— | इसके सिवा एक दूसरी विलक्षणता यह भी है--
ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशा-
वजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता ।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता
त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥ ६ ॥
ये [ ईश्वर और जीव क्रमशः ] सर्वज्ञ और अज्ञ तथा सर्वसमर्थ और असमर्थ हैं, ये दोनों ही अजन्मा हैं । एकमात्र अजा प्रकृति ही भोक्ता ( जीव ) के लिये भोग्यसम्पादनमें नियुक्त है । विश्वरूप आत्मा तो अनन्त और अकर्ता ही है । जिस समय इन [ ईश्वर, जीव और प्रकृति ] तीनोंको ब्रह्मरूप अनुभव करता है [ उस समय जीव कृतकृत्य हो जाता है ] ॥ ९ ॥
ज्ञाज्ञौ द्वाविति । न केवलं व्यक्ताव्यक्तं भरत ईशो नाप्य- | 'ज्ञाज्ञौ द्वौ' इत्यादि । ईश्वर व्यक्त और अव्यक्तरूप जगत्का पोषण

१०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

१०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

नीशः संबध्यते जीवः; अपि तु | करता है तथा मायाधीन जीव उसमें
ज्ञाज्ञौ द्वौ ज्ञ ईश्वरोऽज्ञो जीवस्ता- | बँध जाता है—केवल इतना ही नहीं,
वजाै जन्मादिरहितौ । ब्रह्मण | अपि तु वे दोनों क्रमशः ज्ञ और अज्ञ
एवाविकृतस्य जीवेश्वरात्मना- | हैं—ईश्वर ज्ञ (सर्वज्ञ) है और जीव
वस्थानात् । तथा च श्रुतिः— | अज्ञ है। तथा वे दोनों ही अज—
“पुरश्चक्रे द्विपदः | जन्मादिरहित हैं; क्योंकि एकमात्र
पुरश्चक्रे चतुष्पदः । | अविकारी ब्रह्म ही जीव और ईश्वर-
पुरः स पक्षी भूत्वा | भावसे स्थित है। ऐसा ही श्रुति भी
पुरः पुरुष आविशत्॥” | कहती है—“पुरुषने दो पैरोंवाला
(बृ० उ० २।५।१८) | शरीर बनाया और चार पैरोंवाला
इति । | शरीर बनाया और वह पक्षी होकर
“एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं | उन पुरोंमें प्रवेश कर गया,” “इसी
रूपं प्रतिरूपो बहिश्च” (कठ० उ० | प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका वह एक ही
२।२।९) इति च । ईश- | अन्तरात्मा प्रत्येक रूपमें उसके अनु-
नीशौ, छान्दसं ह्रस्वत्वम् । | रूप हो रहा है तथा उनके बाहर भी
नन्वद्वैतवादिनो यदि भोक्तृ- | है।” ‘ईशनीशौ’ इस समस्त पदमें
[जीवेश्वरयो-बैलक्षण्यभाव-शङ्कनम्] भोग्यलक्षणप्रपञ्च- | शकारकी ह्रस्वता वैदिक है।
सिद्धिः स्यात्तदा सर्वेशः परमेश्वरः, | किन्तु अद्वैतवादीके सिद्धान्तमें
अनीशो जीवः, सर्वज्ञः परमे- | यदि प्रपञ्चकी सिद्धि हो सकती हो
श्वरः, असर्वज्ञो जीवः, सर्व- | तभी परमेश्वर सर्वेश्वर है, जीव
कृत्परमेश्वरः, असर्वकृज्जीवः, | अनीश्वर है, परमेश्वर सर्वज्ञ है, जीव
सर्वभृत्परमेश्वरः, देहादिभृ- | असर्वज्ञ है, परमेश्वर सब कुछ करने-
ज्जीवः, सर्वात्मा परमेश्वरः, | वाला है, जीव कुछ भी नहीं कर
| सकता, परमेश्वर सबका पोषण
| करनेवाला है, जीव देहादिका ही
| पोषक है, परमेश्वर सबका आत्मा है,

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३


[वाम भाग / संस्कृत]

असर्वात्मा जीवः, विश्वैश्वर्य
आप्तकामः परमेश्वरः, अल्पै-
श्वर्योऽनाप्तकामो जीवः, “सर्वतः-
पाणि०” (श्वेता० उ० ३।१६)
“सहस्रशीर्षा” (श्वेता० उ० ३।
१४) । “नित्यो नित्यानाम्”
(श्वेता० उ० ६।१३) इत्या-
दिना जीवेश्वरयोर्विलक्षणव्यव-
हारसिद्धिः स्यात् । न तु भोक्त्रा-
दिप्रपञ्चसिद्धिरस्ति स्वतः कूटस्था-
परिणाम्यद्वितीयस्य वस्तुनोऽभो-
क्त्रादिरूपत्वात् । नापि परतो
ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य भोक्त्रादि-
प्रपञ्चहेतुभूतस्य वस्त्वन्तरस्याभा-
वात् । वस्त्वन्तरसद्भावेऽद्वैत-
हानिरित्याशङ्क्याह—अजा ह्येका
भोक्तृभोग्यार्थयुक्तेति ।

भवेदयमीश्वराद्यविभागः यदि
(पार्श्व-टिप्पणी: मायया वैलक्षण्य-साधनम्) प्रपञ्चासिद्धिरेव स्यात् ।
सिध्यत्येव प्रपञ्चः ।
हि यस्मदर्थे। यस्मदजा प्रकृतिर्न
जायत इत्यजा सिद्धा प्रसव-


[दक्षिण भाग / हिन्दी भाष्यार्थ]

जीव सबका आत्मा नहीं है,
परमेश्वर सर्वैश्वर्यसम्पन्न और पूर्ण-
काम है, जीव अल्पैश्वर्यवान् है और
वह पूर्णकाम नहीं है, तथा “उसके सब
ओर हाथ हैं” “वह सहस्र मस्तकों-
वाला है” “वह नित्योंका नित्य है”
इत्यादि वाक्योंसे जीव और ईश्वरके
भेदव्यवहारकी सिद्धि हो सकती है।
किन्तु भोक्तादि प्रपञ्चकी सिद्धि स्वतः
तो हो नहीं सकती, क्योंकि कूटस्थ,
अपरिणामी, अद्वितीय वस्तु
अभोक्तादिरूप है तथा परतः (किसी
अन्यसे) भी उसकी सिद्धि नहीं
हो सकती है, क्योंकि ब्रह्मसे
अतिरिक्त भोक्तादि प्रपञ्चकी हेतुभूत
किसी अन्य वस्तुकी सत्ता ही नहीं
है। कारण, किसी अन्य वस्तुकी सत्ता
स्वीकार करनेपर तो अद्वैत ही सिद्ध
नहीं हो सकता। ऐसी शंका होनेपर
श्रुति कहती है—‘भोक्ताके भोग्य-
सम्पादनमें एकमात्र अजा (प्रकृति)
ही नियुक्त है।’

यदि प्रपञ्च सिद्ध न होता तो
यह ईश्वरादिका विभाग न होना
सम्भव था, किन्तु प्रपञ्च तो सिद्ध
होता है। मूलमें 'हि' शब्द
'क्योंकि' के अर्थमें है। क्योंकि
अजा-प्रकृति, जो उत्पन्न होनेके
कारण अजा है, प्रसवधर्मिणी सिद्ध है।

१०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

धर्मिणी। “अजामेकाम्” (श्वेता० | अर्थात् “एक अजाको”, “मायाको
उ० ४। ५)। “मायां तु | तो प्रकृति जानो”, “इन्द्र मायासे
प्रकृतिं विद्यात्” (श्वेता० उ० | अनेकरूप होकर चेष्टा कर रहा
४। १०)। “इन्द्रो मायाभिः | है”, “माया परा प्रकृति है”,
पुरुरूप ईयते” (वृ० उ० २। | “मैं अपनी मायासे जन्म लेता
५। १९)। “माया परा | हूँ” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध
प्रकृतिः” “संभवाम्यात्ममायया” | होनेवाली भगवान्‌की आत्मशक्तिरूपा
(गीता ४। ६)। इत्यादि- | जगज्जननी एक माया अपने विकार-
श्रुतिस्मृतिसिद्धा विश्वजननी | भूत भोक्ता, भोग और भोग्यके
देवात्मशक्तिरूपैका स्वविकार- | सम्पादनमें नियुक्त होकर ईश्वरकी
भूतभोक्तृभोगभोग्यार्थप्रयुक्तेश्वर- | निकटवर्तिनी किंकरीरूपसे विद्यमान
निकटवर्तिनी किंकुर्वाणावतिष्ठते । | है। अतः वह मायी परमेश्वर भी
तस्मात्सोऽपि मायी परमेश्वरो | मायारूप उपाधिकी सन्निधिसे माया-
मायोपाधिसंनिधेस्तद्वानिव कार्य- | युक्त-सा हो अपने कार्यभूत देहादि
भूतैर्देहादिभिस्तद्वदेव विभक्तैर्वा | विभक्त पदार्थोंके कारण उन्हींके
विभक्त ईश्वरादिरूपेणावतिष्ठते । | समान ईश्वरादिरूपसे विभक्त हुआ-
तस्मादेकस्मिन्नेकरसे परमात्मन्य- | सा स्थित है । अतः परमात्माको
भ्युपगम्यमानेऽपि जीवेश्वरादि- | एक और एकरस स्वीकार करनेपर
सर्वलौकिकवैदिकसर्वभेदव्यवहार- | भी जीवेश्वरादि भेदरूप समस्त
सिद्धिः। न च तयोर्वस्त्वन्तरस्य | लौकिक और वैदिक व्यवहार सिद्ध
सद्भावाद्वैतवादप्रसक्तिः । मा- | हो सकता है और उन अन्य वस्तुओं-
याया अनिर्वाच्यत्वेन वस्तुत्वा- | के रहनेसे द्वैतवादकी भी प्राप्ति
योगात् । तथाह—“एषा हि | नहीं हो सकती, क्योंकि अनिर्वचनीय
भगवन्माया सदसद्व्यक्तिवर्जिता” | होनेके कारण माया कोई वस्तु नहीं
इति । | है । ऐसा ही कहा भी है—“यह
| भगवान्‌की माया सदसद्भावसे रहित
| है” इत्यादि ।

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
यस्मादजैव भोक्त्रादिरूपा | क्योंकि अजा—प्रकृति ही
तस्मात्तत्स्वीकृतस्य मिथ्यासिद्ध- | भोक्तादिरूप है इसलिये उसका
| कल्पना किया हुआ प्रपञ्च मिथ्या
वस्तुत्वसंभवादनन्तश्चात्मा । च- | और असत् वस्तु होनेसे आत्मा तो
| अनन्त ही है । मूलमें 'च' शब्द
शब्दोऽवधारणे । अनन्त एवा- | निश्चयार्थक है; अर्थात् आत्मा अनन्त
त्मा । अस्यान्तः परिच्छेदो | ही है, यानी देश, काल या वस्तु
| किसीसे भी इसका अन्त—परिच्छेद
देशतः कालतो वस्तुतो वा न | नहीं है । विश्वरूप अर्थात् विश्व
विद्यत इति । विश्वरूपो विश्व- | इसीका रूप है, क्योंकि परमात्मा
| स्वयं तो विश्वरूप है नहीं [अर्थात्
मस्यैव रूपमिति; परस्याविश्व- | विश्वरूपमें उसका परिणाम नहीं
रूपत्वात् । "वाचारम्भणं विकारो | होता ] । "विकार वाणीसे आरम्भ
| होनेवाला नाममात्र है" इस श्रुतिके
नामधेयम्" इति रूपस्य रूपि- | अनुसार रूप रूपवान्‌से भिन्न नहीं
व्यतिरेकेणाभावाद्द्विश्वरूपत्वाद- | होता, इसलिये विश्वरूप होनेसे भी
| इसकी अनन्तता ही सिद्ध होती है ।*
प्यानन्त्यं सिद्धमित्यर्थः। हिशब्दो | यहाँ 'हि' शब्द 'क्योंकि' अर्थमें है,
यस्मादर्थे। यस्माद्विश्वरूपवैश्वरूप्यं | क्योंकि विश्वरूप बहुरूपता परमात्मा-
| का ही लक्षण है, इसलिये तात्पर्य यह
लक्षणं परमात्मन इत्येवमादिभि- | है कि इन सब हेतुओंसे भी आत्माका
रात्मनो विश्वरूपत्वमित्यर्थः। यत | विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । क्योंकि

  • तात्पर्य यह है कि यद्यपि आत्मा परमार्थतः विश्वरूप नहीं है, क्योंकि
    ऐसा माननेसे तो वह सावयव और परिणामी सिद्ध होगा; तथापि विश्व उससे भिन्न
    भी नहीं है। अघटनघटनापटीयसी मायाकी महिमासे विशुद्ध आत्मतत्त्वमें ही
    विश्वरूपभ्रान्ति होती है। अतः आत्मासे पृथक् विश्वकी सत्ता न होनेसे उसकी
    अनन्ततामें कोई अन्तर नहीं आता।

१०६ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १

१०६ | श्वेताश्वतरोपनिषद् | [ अध्याय १


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

एवानन्तो विश्वरूप आत्मात एवा-
कर्ता कर्तृत्वादिसंसारधर्मरहित
इत्यर्थः ।
कदैवमनन्तो विश्वरूपः कर्तृ-
त्वादिसकलसंसारधर्मवर्जितो मुक्तः
पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मरूपेणैवाव-
तिष्ठते ? इत्यत्राह—त्रयं यदा
विन्दते ब्रह्ममेतदिति । त्रयं
भोक्तृभोगभोग्यरूपम् । मायात्म-
कत्वादधिष्ठानभूतब्रह्मव्यतिरेकेण
नास्ति किन्तु ब्रह्मैवेति यदा विन्दते
तदा निवृत्त निखिलविकल्पपूर्णान-
न्दाद्वितीयब्रह्मभाकर्तृत्वादिसकल-
संसारधर्मवर्जितो वीतशोकः कृत-
कृत्योऽवतिष्ठत इत्यर्थः । अथवा
ज्ञाज्ञात्मकजीवेश्वरप्रकृतिरूप-
त्रयं ब्रह्म यदा विन्दते लभते तदा
मुच्यत इति । ब्रह्ममिति मका-
रान्तं ब्रह्ममेतु मां मधुमेतु माम्
इतिवच्छान्दसम् ॥ ९ ॥


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

आत्मा अनन्त और विश्वरूप है इसी-
लिये वह अकर्ता अर्थात् कर्तृत्वादि
संसारके धर्मोंसे रहित है ।
आत्मा इस प्रकार अनन्त,
विश्वरूप, कर्तृत्वादि सम्पूर्ण सांसारिक
धर्मोंसे रहित, मुक्त और पूर्णानन्द
अद्वितीय ब्रह्मरूपसे ही कब स्थित
होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति
कहती है—'त्रयं यदा विन्दते ब्रह्म-
मेतत्' त्रय अर्थात् भोक्ता, भोग और
भोग्यरूप मायामय होनेसे अपने
अधिष्ठान ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, किन्तु
ब्रह्म ही है—ऐसा जिस समय
अनुभव करता है उस समय जीवात्मा
सम्पूर्ण विकल्पोंके निवृत्त हो जानेसे
पूर्णानन्द अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होकर
कर्तृत्वादि सकल संसारधर्मोंसे रहित,
शोकहीन और कृतकृत्य होकर
स्थित होता है—ऐसा इसका तात्पर्य
समझना चाहिये । अथवा ऐसा जानो
कि क्रमशः यह ज्ञ, अज्ञ और अजारूप
ईश्वर, जीव एवं प्रकृति इन तीनोंको
यह ब्रह्मरूपसे प्राप्त (अनुभव) कर
लेता है उस समय यह मुक्त हो
जाता है। मूलमें 'ब्रह्मम्' यह मकारान्त
प्रयोग 'ब्रह्ममेतु माम्' 'मधुमेतु माम्'
इत्यादिके समान वैदिक है ॥ ९ ॥