श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 119, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 119अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
यस्मादजैव भोक्त्रादिरूपा | क्योंकि अजा—प्रकृति ही
तस्मात्तत्स्वीकृतस्य मिथ्यासिद्ध- | भोक्तादिरूप है इसलिये उसका
| कल्पना किया हुआ प्रपञ्च मिथ्या
वस्तुत्वसंभवादनन्तश्चात्मा । च- | और असत् वस्तु होनेसे आत्मा तो
| अनन्त ही है । मूलमें 'च' शब्द
शब्दोऽवधारणे । अनन्त एवा- | निश्चयार्थक है; अर्थात् आत्मा अनन्त
त्मा । अस्यान्तः परिच्छेदो | ही है, यानी देश, काल या वस्तु
| किसीसे भी इसका अन्त—परिच्छेद
देशतः कालतो वस्तुतो वा न | नहीं है । विश्वरूप अर्थात् विश्व
विद्यत इति । विश्वरूपो विश्व- | इसीका रूप है, क्योंकि परमात्मा
| स्वयं तो विश्वरूप है नहीं [अर्थात्
मस्यैव रूपमिति; परस्याविश्व- | विश्वरूपमें उसका परिणाम नहीं
रूपत्वात् । "वाचारम्भणं विकारो | होता ] । "विकार वाणीसे आरम्भ
| होनेवाला नाममात्र है" इस श्रुतिके
नामधेयम्" इति रूपस्य रूपि- | अनुसार रूप रूपवान्से भिन्न नहीं
व्यतिरेकेणाभावाद्द्विश्वरूपत्वाद- | होता, इसलिये विश्वरूप होनेसे भी
| इसकी अनन्तता ही सिद्ध होती है ।*
प्यानन्त्यं सिद्धमित्यर्थः। हिशब्दो | यहाँ 'हि' शब्द 'क्योंकि' अर्थमें है,
यस्मादर्थे। यस्माद्विश्वरूपवैश्वरूप्यं | क्योंकि विश्वरूप बहुरूपता परमात्मा-
| का ही लक्षण है, इसलिये तात्पर्य यह
लक्षणं परमात्मन इत्येवमादिभि- | है कि इन सब हेतुओंसे भी आत्माका
रात्मनो विश्वरूपत्वमित्यर्थः। यत | विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । क्योंकि
- तात्पर्य यह है कि यद्यपि आत्मा परमार्थतः विश्वरूप नहीं है, क्योंकि
ऐसा माननेसे तो वह सावयव और परिणामी सिद्ध होगा; तथापि विश्व उससे भिन्न
भी नहीं है। अघटनघटनापटीयसी मायाकी महिमासे विशुद्ध आत्मतत्त्वमें ही
विश्वरूपभ्रान्ति होती है। अतः आत्मासे पृथक् विश्वकी सत्ता न होनेसे उसकी
अनन्ततामें कोई अन्तर नहीं आता।