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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 276 में से

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पृष्ठ 116

१०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

नीशः संबध्यते जीवः; अपि तु | करता है तथा मायाधीन जीव उसमें
ज्ञाज्ञौ द्वौ ज्ञ ईश्वरोऽज्ञो जीवस्ता- | बँध जाता है—केवल इतना ही नहीं,
वजाै जन्मादिरहितौ । ब्रह्मण | अपि तु वे दोनों क्रमशः ज्ञ और अज्ञ
एवाविकृतस्य जीवेश्वरात्मना- | हैं—ईश्वर ज्ञ (सर्वज्ञ) है और जीव
वस्थानात् । तथा च श्रुतिः— | अज्ञ है। तथा वे दोनों ही अज—
“पुरश्चक्रे द्विपदः | जन्मादिरहित हैं; क्योंकि एकमात्र
पुरश्चक्रे चतुष्पदः । | अविकारी ब्रह्म ही जीव और ईश्वर-
पुरः स पक्षी भूत्वा | भावसे स्थित है। ऐसा ही श्रुति भी
पुरः पुरुष आविशत्॥” | कहती है—“पुरुषने दो पैरोंवाला
(बृ० उ० २।५।१८) | शरीर बनाया और चार पैरोंवाला
इति । | शरीर बनाया और वह पक्षी होकर
“एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं | उन पुरोंमें प्रवेश कर गया,” “इसी
रूपं प्रतिरूपो बहिश्च” (कठ० उ० | प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका वह एक ही
२।२।९) इति च । ईश- | अन्तरात्मा प्रत्येक रूपमें उसके अनु-
नीशौ, छान्दसं ह्रस्वत्वम् । | रूप हो रहा है तथा उनके बाहर भी
नन्वद्वैतवादिनो यदि भोक्तृ- | है।” ‘ईशनीशौ’ इस समस्त पदमें
[जीवेश्वरयो-बैलक्षण्यभाव-शङ्कनम्] भोग्यलक्षणप्रपञ्च- | शकारकी ह्रस्वता वैदिक है।
सिद्धिः स्यात्तदा सर्वेशः परमेश्वरः, | किन्तु अद्वैतवादीके सिद्धान्तमें
अनीशो जीवः, सर्वज्ञः परमे- | यदि प्रपञ्चकी सिद्धि हो सकती हो
श्वरः, असर्वज्ञो जीवः, सर्व- | तभी परमेश्वर सर्वेश्वर है, जीव
कृत्परमेश्वरः, असर्वकृज्जीवः, | अनीश्वर है, परमेश्वर सर्वज्ञ है, जीव
सर्वभृत्परमेश्वरः, देहादिभृ- | असर्वज्ञ है, परमेश्वर सब कुछ करने-
ज्जीवः, सर्वात्मा परमेश्वरः, | वाला है, जीव कुछ भी नहीं कर
| सकता, परमेश्वर सबका पोषण
| करनेवाला है, जीव देहादिका ही
| पोषक है, परमेश्वर सबका आत्मा है,