रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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हैं। किन्तु ऐसा कभी न करना चाहिए। मस्तक के साथ एक नस
होती है, उसके खिंच आने से बालक की मृत्यु हो जाने का भय
रहता है। इस लिए दाई को चाहिए कि स्त्री के पेट पर धीरे-धीरे
हाथ फेरे। ऐसा करने से फिर प्रसव-वेदना शुरू हो जाती है और
बच्चे का शेष अंग भी बाहर निकल आता है, खींचने की जरूरत
नहीं पड़ती।
ऊपर जिस नाल की चर्चा की गयी है, यदि वह नाल बच्चे की
गर्दन में लिपटा हुआ हो तो धीरे-धीरे हलके हाथों से उसे खोलकर
सिर के ऊपर से उतार कर भीतर कर देना चाहिए। यदि नाल में
उलझन अधिक हो तो उसमें समय लगाना ठीक नहीं है। यदि सिर
निकल आने के बाद प्रसव की वेदना पेट पर हाथ फेरने से भी न
पैदा हो, तो समझना चाहिए कि अभी बच्चे का समूचा शरीर
निकलने में कुछ देर लगेगी। इस लिए ऐसे समय में चतुर दाई
बालक को खींचकर निकाल ले, यही अच्छा है। क्योंकि देर लगने
से भी बच्चे की मृत्यु की आशंका रहती है। परन्तु इतने पर भी
सिर पकड़ कर दाई कभी न खींचने पावे। उसे चाहिए कि वह अपने
दोनों हाथों की अँगुलियाँ भीतर डालकर बालक के बगलों में अंकुश
की तरह अड़ाकर खींचे। खींचते समय पीछे बैठी हुई स्त्री को
चाहिए कि वह प्रसूता का पेट दबाये रहे। पेट के दबाये रहने से
रक्त नहीं निकलने पाता। रक्त निकलने से बालक को हानि पहुँचाती
है। क्योंकि वह रक्त बालक के कान नाक ओर मुख में भर जाता है।
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किसी-किसी स्त्री को बालक पैदा होते समय बड़ा कष्ट होता
है, जल्द प्रसव होता ही नहीं। कई दिनों तक असह्य वेदना होती
रहती है। ऐसी दशा में नीचे लिखे यत्नों से काम लेना चाहिए ।
किन्तु यत्न करने के पहले इस बात को अच्छी तरह से जान लेना
चाहिए कि प्रसव-वेदना ही है या और कुछ । जब यह निश्चय हो
जाय कि प्रसव-वेदना ही है, तब नीचे लिखे उपायों को काम में
लाकर गर्भिणी के कष्टों को दूर करना चाहिए:—
प्रासविक उपचार
१—करंजुवा के पत्तों और बीजों का कल्क बनाकर या बकरी
के दूध में तिल के तेल को पकाकर प्रसव-स्थान में मलने से बच्चा
पैदा हो जाता है, विशेष कष्ट नहीं होता ।
२—भैंड़भाँड़ की जड़ कपड़े में लपेट कर प्रसविरणी की कमर
में बाँधे, यह दवा परीक्षित है, शर्तिया प्रसव हो जाता है ।
३—रेंड़ी का तेल पेडू पर धीरे-धीरे मलने से बहुत जल्द
प्रसव हो जाता है ।
४—सेहुँड़ का दूध नख और ढूँड़ी पर मले ।
५—सवा तोला अमलतास का छिलका पानी में औटाकर
ऊपर से चीनी मिलाकर पिला देने से भी प्रसव जल्द हो जाता है ।
६—यदि चुम्बक पत्थर को प्रसूता अपने हाथ में लिये रहे,
तब भी प्रसव जल्द हो जाता है ।
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७—फालसे की जड़ अथवा शालपर्णी की जड़ को पानी में
पीसकर नाभि, वस्ति और योनि पर लेप करने से भी लाभ होता है।
८—अपामार्ग (इसे ग्रामीण भाषा में चिरचिटा या चिचड़ी
कहते हैं) की जड़ महीन पीसकर नाभि के नीचे योनि और जंघों
पर लेप कर देने से भी प्रसव सुखपूर्वक हो जाता है।
९—अपामार्ग बड़ी ही तीक्ष्ण वस्तु है। यदि बहुत आवश्यकता
आ पड़े और बालक किसी तरह भी बाहर न निकलता हो, तब
इसकी जड़ (ताजी) जिसकी लम्बाई तीन-चार अँगुल हो, बड़ी
सावधानी से प्रसूता की योनि में रख दे। साधारण दशा में इसका
प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए, नहीं तो गर्भाशय तक बाहर
निकल पड़ेगा।
१०—मनुष्य के बाल जलाकर गुलाबजल में मिला दे, बाद
उसे स्त्री के तलवे पर मलने से भी जल्द प्रसव हो जाता है।
११—प्रसूता अपने लट को मुख में डाल ले। इससे भी शीघ्र
प्रसव हो जाता है।
१२—'अपीका' नामक अंग्रेजी दवा एक-एक रत्ती तीन बार
देने से सहज ही में प्रसव हो जाता है।
१३—बच को उबाल कर पीने से भी बहुत ही लाभ होता है।
१४—गर्भिणी के शरीर में अच्छी तरह से तेल लगाकर गरम
जल से स्नान कराना भी हितकर है।
१५—थोड़ी सी मूँग की खिचड़ी गरम-गरम खिलाना या गरम
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दूध पिलाना भी फायदेमन्द है ।
१६—साँप की केंचुर की धूनी गुह्य-स्थान में देने से भी प्रसव
होने में बड़ी सहायता मिलती है ।
१७—छींक आने के लिए कोई दवा देने से भी बच्चा शीघ्र
बाहर निकल आता है ।
१८—पाँच तोले गुड़ में एक तोला अजवाइन का काढ़ा बना-
कर कुनकुना पिलाने से भी प्रसव हो जाता है ।
१९—रेंडी की गिरी, पीपल और बच को तिल्ली के तेल में
पीसकर नाभि के ऊपर लेप करने से कितना ही कष्ट क्यों न हो,
फौरन दूर हो जाता है और सुख से सन्तान पैदा होती है ।
२०—मोरशिखा की जड़, विजयसार, सहिजन की जड़, पान,
कटाली और खरेंटी इन चीजों को बराबर-बराबर लेकर काँजी के
जल में पीस, नाभि में लेप करने से शीघ्र प्रसव हो जाता है । या
शालपर्णी की जड़ को चावल के पानी में पीसकर नाभि, भग और
वस्ति में लेप करने से सुख से बालक उत्पन्न हो जाता है ।
२१—चिरमिटी की जड़ को दस टुकड़े कर डाले । बाद सात
तार के लाल धागे में उनको अलग-अलग बाँधकर कष्टवाली स्त्री की
कमर में बाँध देने से सन्तान तत्क्षण उत्पन्न हो जाती है ।
२२—गाजर के बीज, सौंफ, सोया, मेथी के दाने, वटवृक्ष की
जड़, बनपशा और मुलहठी प्रत्येक तीन तीन माशे लेकर क्वाथ
बनावे। छानकर गर्भिणी को पिलाने से सुख से प्रसव हो जाता है ।
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साधारणतयः जिस प्रकार प्रसव होता है और प्रसवकाल में
जिन बातों का जानना आवश्यक है, उनका वर्णन यहाँ तक किया
जा चुका; किन्तु कभी-कभी ऐसी विकट समस्या उपस्थित हो
जाती है कि बालक और प्रसूता दोनों की जान जाने का भय
रहता है। जैसे, पहले सिर न निकल कर बच्चे का नितम्ब बाहर
निकल आता है। यह भयंकरता का चिह्न है। इस समय चतुर
दाई ही काम कर सकती है। कभी-कभी बच्चा अधिक मोटा होने
अथवा मर जाने के कारण बाहर नहीं निकलता। बच्चे का गर्भ
में मर जाना बड़ा ही भयंकर है। ऐसी दशा में फौरन डाक्टर को
बुलाना चाहिए। कभी-कभी आँवल पहले ही निकल आती है। यह
भी भयंकर बात है। इसको बच्चा पैदा होने के बाद निकलना
चाहिए; किन्तु कभी-कभी यह गर्भाशय के मुख के पास लग जाती
है। इसी से पहले यही निकल पड़ती है। जब रज पाँचवें अथवा
छठे महीने में प्रवाहित हो, तब समझना चाहिए कि आँवल गर्भा-
शय के पास ही है। आँवल गर्भाशय के मुख के पास है या नहीं,
यह जानने के लिए छठे महीने जब रुधिर बहे और इसी तरह बिना
किसी कारण के कभी-कभी बहने लगे, तब अंगुली डालकर यह
देखना चाहिए कि कोई मुलायम चमड़े की तरह चीज तो नहीं है।
यदि ऐसी चीज का अँगुली से स्पर्श हो, तो समझ लेना चाहिए
आँवल गर्भाशय के मुख के पास ही है। इसका निश्चय हो जाने
पर प्रसव के समय दाई को खूब सावधानी से काम करना चाहिए।
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प्रसव-पीड़ा शुरू होने पर चतुर दाई को चाहिए कि वह अपना
हाथ गरम पानी से खूब साफ करके भीतर डालकर आँवल को
रोक दे और बच्चे को पहले बाहर निकल आने दे ।
कभी-कभी गर्भ में एक से अधिक बच्चे भी रहते हैं । इसमें
भी दाई को खूब सावधानी से काम लेना चाहिए । क्योंकि इसमें
भी प्रसुता को बहुत कष्ट होता है ।
—o—
नवजात शिशु
बालक उत्पन्न हो चुकने पर दो बातों की ओर ध्यान देना
चाहिए । एक तो उसके रोने पर और दूसरे मल-त्याग पर । बच्चा
पैदा होते ही रोने लगता है । यह उसकी स्वास्थ्यता की खास
पहचान है । रोने से यह सूचित होता है कि उसके फेफड़े हवा से
भर गये और श्वासप्रच्छ्वास क्रिया आरम्भ हो गयी । यदि बालक
न रोवे तो समझना चाहिए कि अभी वह हाँफ रहा है ।
बच्चे के पैदा होते ही सबसे पहले उसके गले के नाल को
देखना उचित है । बहुधा बच्चों के गले में नाल (नार) लिपटा
हुआ आता है । इस लिए यदि वह लिपटा हुआ हो तो उसे छुड़ा
देना चाहिए । कभी-कभी थैली में ही लिपटा हुआ भी बच्चा पैदा
होता है, ऐसी अवस्था में तुरन्त झिल्ली को फाड़कर बच्चा निकाल
लेना उचित है । बाद यह देखे कि बालक हाँफता तो नहीं है । यदि
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हाँफता हो तो पहले उसके मुख में सावधानी से अँगुली डालकर
लार निकाल डाले। बाद ठण्डे पानी में अपना हाथ डुबाकर बच्चे
की छाती पर बहुत धीरे से हथोसना चाहिए। थोड़ा हथोसने पर
ही बालक रोने लगेगा। यदि इससे भी बालक न रोवे तो थोड़े से
ठण्डे जल का हलका छींटा उसके मुख पर देना चाहिए अथवा
बालक की पीठ पर हल्की थपकियाँ लगाकर रुलाना चाहिए। यदि
इतने पर भी बालक न रोवे तो उसे गोद में चित लिटा ले और
उसके दोनों हाथ पकड़ कर जरा ऊपर उठावे और उसके मुख में
दो चार फूँक लगावे, किन्तु फूँक लगानेवाली स्त्री का मुख बदबूदार
न हो, नहीं तो बच्चे के बीमार हो जाने का भय रहेगा। बहुत-सी
स्त्रियाँ बच्चे को रुलाने के लिए ठण्डे पानी में उसका सिर डुबा
देती हैं, पर यह काम अच्छा नहीं है।
यदि बालक होकर नीला पड़ जाय; तो उसकी नाभि से तीन
अंगुल छोड़कर नाल को काट दे। जब पैसे भर के अन्दाज खून
गिर जाय, तब उसे फौरन बाँध दे; बहुत खून न गिरने पावे। ऐसा
करने से मुख, आँख का नीलापन दूर हो जाता है। कितनी ही
दाइयाँ बच्चे को रुलाने के लिए काली मिर्च चबाकर उसके मुख
में फूँकती हैं, किन्तु इससे बच्चे की बहुत हानि होती है।
इस प्रकार पहले बच्चे को रुलाकर तब उसका नाल काटना
चाहिए। नाल काटने की रीति यह है:—नाल को नाभि से तीन
अंगुल छोड़कर बाँध दे। फिर उस बँधन से आधा अंगुल छोड़कर
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एक बन्धन और लगा दे। बाद दोनों बन्धनों के बीच में तेज औजार
से काट दे। नाल काटने के पहले बन्धन लगाना इस लिए बहुत
जरूरी होता है कि जिसमें बच्चे के शरीर का खून न निकलने पावे।
क्योंकि खून निकलने से बच्चा मर जाता है। नाल में दूसरा बन्धन
इस लिए लगाया जाता है कि शायद प्रसूता के पेट में दूसरा बालक
हो। यदि वह बन्धन न लगाया जाय और पेट में दूसरा बच्चा हो
तो रक्त निकल जाने के कारण वह तुरन्त ही मर जायगा। फिर तो
प्रसूता का बचना भी कठिन हो जाता है। इसी से दूसरा बन्धन
लगा देना भो आवश्यक है। क्योंकि पेट में जितने बच्चे होते हैं,
सबका नाल एक ही होता है। यदि पेट में दूसरा बच्चा हो तो
प्रसूता स्त्री से इसका हाल कभी न कहे। नहीं तो घबड़ा जाने के
कारण प्रसूता की जान खतरे में पड़ जानेकी सम्भावना रहती है।
नाल काटने से पहले एक बात पर ध्यान अवश्य देना उचित
है। यह कि, बच्चा निर्जीव तो नहीं है। यदि वह निर्जीव यानी
कमजोर अधिक हो तो नाल काटने से पहले नाल को माँ की ओर
से दुहकर बालक की नाभि तक ले आवे। ऐसा करने से कुछ खून
बच्चे के शरीर में चला जाता है। इतना करने के बाद नाल को
काटना उचित है। कमजोर बालक के लिए कुछ दाइयाँ नाल के
खून की दस पाँच बूँदें चटा देती हैं; किन्तु यह क्रिया हमें अच्छी
नहीं जँचती—यद्यपि इससे भी बालक की कमजोरी दूर हो जाती
है, क्योंकि माँ का खून बच्चे के लिए बहुत ही लाभदायक है, चाहे
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वह किसी भी रूप में उसके शरीर में प्रवेश कराया जाय । सबसे
अच्छा तरीका वही ऊपर वाला नाल को दुहकर बच्चे के शरीर में
रक्त पहुँचाना है। नाल काटने से पहले उसे शहद, घी और सेंधा
नमक से शुद्ध कर लेना बहुत ही उत्तम है। या सोने अथवा चाँदी
के बुझे हुए जल से नाल को शुद्ध करके तब काटे ।
नालोच्छेदन करने के बाद पहले से पीसकर रक्खी हुई एक
माशे लकड़ी के कोयले में दो चावल कस्तूरी की बुकनी मिलाकर
उस पर लगा देनी चाहिए। ऐसा करने से बच्चे को मसान का रोग
नहीं होता । पश्चात् घी, शहद, अनन्तमूल और ब्राह्मी के रस में
थोड़ा सा सोने का चूर्ण मिलाकर चटा दे; यह बहुत ही गुणदायक
है । इससे एक तो बालक का मल गिर जाता है और दूसरे बच्चे
की तन्दुरुस्ती पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है, यदि ये चीजें न
मिल सकें, तो बच्चे को शहद और घी चटाना चाहिए ।
यदि बालक सतमासा या गर्भ पूरा होने के कुछ पहले ही पैदा
हो जाय और वह निर्बल अधिक हो तो उसके लिए एक यत्न और
करना चाहिए। यह कि धुनी हुई रुई कड़वे तेल में भिगोकर उस
में दो या चार दिन तक बच्चे को रक्खे। इससे बच्चे का उतना
ही पोषण होता है, जितना कि माता के पेट में । ऐसा करने से
सतमासे बच्चे भी बहुत से जी जाते हैं ।
जिस छुरी या कैंची से नालोच्छेदन करना हो, उसे पहले खूब
खौलते हुए पानी में डालकर गरम कर लेना चाहिए । बाद उसको
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ठण्डा करके काम में लाना उचित है। ऐसा करने से लोहे के
औजार में कोई विकार नहीं रह जाता और नाल जल्द सूख जाता
है। नाल काटने के बाद बच्चे के शरीर में बेसन लगाकर उसे
किंचित गरम जल से नहला देना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे के
शरीर की मैल छूट जाती है। बालक के उत्पन्न होते ही चतुर दाई
को यह देख लेना चाहिए कि उसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग सब ठीक है या
कोई अङ्ग विकृत अथवा जुड़ा हुआ है। क्योंकि बहुत से बच्चों
की हाथ-पैर की अँगुलियाँ एक ही में जुड़ी हुई होती हैं। इसलिए
यदि ऐसा हो तो फौरन तेज छुरे से उसे अलग कर देना चाहिए।
ऐसा न करने से अँगुलियाँ जुड़ी हुई ही रह जाती हैं। इसी प्रकार
यदि आँखों की पलकें बन्द हों यानी जुड़ी हुई हों तो उन्हें भी
नश्तर देकर ठीक कर देना चाहिए। यदि गुदा का छिद्र बन्द हो तो
उसे भी खोल देना चाहिए। आजकल बहुत सी दाइयाँ काँच की
चूड़ी को तोड़कर उसकी नोक से चीर देती हैं; परन्तु यह बहुत
ही वाहियात काम है। इससे बहुत भय और हानि है यह काम
तेज छुरे से ही होना उचित है। इसी प्रकार यदि कोई अङ्ग बेडौल
हो तो उसे तुरन्त ठीक कर देना चाहिए। जैसे,यदि नाक चिपटी
हो तो उसे दुहकर ऊपर को उठा देनी चाहिए; यदि मस्तक टेढ़ा
हो तो उसे दोनों हाथों से दाब कर सुडौल कर देना चाहिए। इस
समय थोड़ी ही सावधानी और उपाय से बेडौल अङ्ग सुडौल हो
सकता है; क्योंकि शरीर की हड्डियाँ बहुत ही कोमल रहती हैं।
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परन्तु बच्चे के शरीर में ज्यों-त्यों हवा लगती है, त्यों-त्यों उसकी
हड्डियाँ कड़ी होती जाती हैं।
कभी-कभी बच्चा उत्पन्न होने पर चुपचाप पड़ा रहता है, उस
का कोई भी अङ्ग नहीं हिलता-डोलता। ऐसी दशा में बच्चे को
होशियारी से उल्टा अर्थात् सिर नीचे और पैर ऊपर करके १०-
१५ सिकेंड तक रखना चाहिए और उसकी छाती को धीरे-धीरे
दबाकर फेफड़ों में चैतन्यता लानी चाहिए। इस समय बच्चे के
मुँह में अँगुली डालकर बलगम वगैरह निकाल लेना उचित है।
कारण यह कि उल्टा करने से बच्चे के गले का बलगम मुख में
आ जाता है।
नाल काटने के बाद बच्चे को करवट के बल लिटा देना चाहिए
और उसे स्नान कराने का प्रबन्ध करना चाहिए। इस समय
बालक के समूचे शरीर में यदि शहद पोत दी जाय तो बहुत ही
उत्तम हो। शहद लगाने से बच्चा सदा के लिए रोगमुक्त हो जाता
है। कुछ देर के बाद शहद को कोमल तथा साफ कपड़े से पोंछ-
कर बालक को नहला देना चाहिए। तीन अँगुली बचे हुए नाल को
भी पानी में उबाले हुए मलमल के टुकड़े से लपेट देना चाहिए।
बच्चे को नहलाते समय उसके नाल पर मैला पानी जरा भी न पड़ने
दे। क्योंकि उसके भींजने से पक जाने या सड़ जाने का भय रहता
है। नाल काटते समय यदि रुधिर को पीछे हटाकर १२ अनबिंधे
मोती उसमें भर दिये जायँ और ऊपर से बाँधकर नाल को काटा
जाय, पश्चात् एक मोती नित्य-प्रति बच्चे को खिलाया जाय तो
आमरणपर्यन्त उसे चेचक रोग नहीं हो सकता ।
बच्चे को स्नान कराने के लिए जो पानी गरम किया जाय,
उसमें यदि पीपल, गूलर या बटवृक्ष की छाल डाल दी जाय तो
बड़ा लाभ होता है। यदि उक्त वृक्षों की छाल समय पर न मिल
सकें तो तपाई हुई चाँदी या सोने को पानी में बुझाकर उसी जल
से बच्चे को नहलाना उचित है। बच्चे को प्रतिदिन कुनकुने पानी
में जरा सा नमक मिलाकर स्नान कराने से बड़ा फायदा पहुँचता है।
बालक को पैदा होने के बाद दस्त होता है। इस दस्त का
होना बहुत जरूरी है यह दस्त जितना शीघ्र हो जाय उतना ही
अच्छा। इसके होने से बच्चे का पेट साफ हो जाता है और भूख
खूब ठिकाने से लगती है। यह मल गर्भ में बहुत दिनों का जुटने के
कारण बड़ा हानिकारक होता है। यदि दस्त न हो तो शुद्ध किया
हुआ दस बूँद रेंडी का तेल शहद में मिलाकर या योंही पिला देना
उचित है। इससे अवश्य दस्त उतर आता है और बच्चे को
आराम मिलता है। जब तक यह पहला दस्त नहीं हो जाता, तब
तक बच्चा बड़ा ही बेचैन रहता है, इसके होते ही उसे फुरसत मिल
जाती है। यदि यह मल बच्चे के पेट में दो-चार दिन रह जाता
है अर्थात् दो-चार दिन तक बच्चे को दस्त नहीं होता, तो वह
बालक रोगी हो जाता है और पेट की बीमारियाँ तो उसे बहुधा
हुआ करती हैं। इस लिए इसमें जरा भी ढिलाई नहीं करनी
२६४ असली कोकशास्त्र
चाहिए, बालक का पेट साफ करने के लिए उसकी माता का दूध
सबसे अधिक गुणकारी है। अतः पहले माता का दूध ही पिलाना
चाहिए। यदि माता के स्तनों में दूध न उतरा हो तो रेंडी का तेल
और मधु मिलाकर चटाना चाहिए।
यदि नाल से रुधिर निकलता हो तो उसे रेशम से बाँध देना
चाहिए। नाल से रुधिर का निकलना बहुत ही हानिकर है। आठ
नौ दिन में नाल अपने से सूखकर गिर जाता है। यदि वह आप ही
न गिरे तो उसे भूलकर भी खींचना नहीं चाहिए। यदि बालक की
खाल कहीं सिकुड़ी हुई हो और उसके पास कुछ मैल या छिला
हुआ अथवा कटा हुआ दिखलायी पड़े तो उसको नरम कपड़े या
स्पञ्ज से धो दिया करे तथा चिकनी खड़िया और चावल का आटा
या मैदा मिलाकर उस पर लगा दिया करे।
कभी-कभी बच्चों का नाल पक भी जाता है। इस लिए चतुर
दाई का कर्त्तव्य है कि वह ऐसे ढंग से सब काम करे कि उसके
पकने की नौबत ही न आये। यदि किसी कारणवश पक ही जाय
तो उस पर सफेदा या कलई लगा देना चाहिए। यदि नाल सूज
आया तो तो अफीम को तेल में घिसकर लगाने से अच्छा हो जाता
है। नाल काटने के बाद तुरन्त ही यदि कठ का तेल लगा दे तो
उसके पकने या सूजने का भय नहीं रहता। कठ तेल इस प्रकार
बनता है कि तेल और पानी को बराबर बराबर लेकर उसमें काठ
का चूर्ण डाल आग पर पकावे। जब सब पानी जल जाय और सिर्फ
असली कोकशास्त्र २६५
तेल रह जाय, तब उसे उतार कर कपड़े से छान डाले और शीशा
में रख दे यही कठ-तेल कहलाता है। यदि कठ तेल न हो तो तिल
का तेल ही लगा देना चाहिए। इसके लगाने से भी पकने का भय
बहुत कम रहता है।
बालक के लिये गाय के दूध से बढ़कर गुणकारी दूसरा दूध
नहीं है। अगर है तो केवल माता का दूध। किन्तु माता का दूध
तो अमृत तुल्य है अतः उसे दूध की श्रेणी में रखना ठीक नहीं। गाय
का दूध हलका, पुष्ट, निरोग और फुर्तीला होता है, इस लिए बालक
को सदा गाय का दूध ही पिलाना चाहिए।
─:०:─
प्रसूता के लिए उपचार
बालक उत्पन्न होने के बाद स्त्री के पेट से एक मांस की सी
थैली निकलती है जिसको विभिन्न प्रान्तों में 'आँवल' 'औनार'
'खेढ़ी' आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। जैसे गाय-भैंस
के बच्चा पैदा होने के बाद खेढ़ी गिरती है उसी प्रकार स्त्री के भी।
इसका न निकलना बड़ा ही हानिकारक है। जब तक यह न गिरे,
तबतक स्त्री के पेट पर से हाथ नहीं हटाना चाहिए। यदि यह अपने
से न गिरे तो खींचकर कभी भी निकालने की चेष्टा नहीं करनी
चाहिये। क्योंकि खींचकर निकालने से गर्भाशय को बड़ी हानि
पहुँचती है। प्रसव होने के आधा घण्टा बाद यह थैली अपने-आप ही
२६४ असली कोकशास्त्र
बाहर निकल आती है। यदि प्रसव के बाद एक घण्टा बीत जाय
और वह थैली बाहर न निकले, तब उसे बाहर निकालने का यत्न
करना आवश्यक है ।
दाई को प्रसूता के पेट पर हाथ फेरते रहना चाहिए । ऐसा
करने से पेट में पीड़ा होने लगती है और वह थैली बाहर निकल
आती है। ऐसा करने पर भी यदि वह न गिरे तो नीचे लिखे
आयुर्वेदशास्त्र के यत्नों को करना चाहिए ।
१—भोजपत्र और गुग्गल को कूटकर प्रसूता की कमर में
उसका धुआँ देना चाहिए ।
२—लाँगली की जड़ को पानी में पीसकर प्रसूता के हाथ-पैर
में लेप करने से वह थैली शीघ्र गिर पड़ती है ।
यदि इस तरह भी वह बाहर न निकले तो खुद दाई को चाहिए
कि वह अपने हाथ में नारियल का तेल पोतकर खूब सावधानी से
उसे इकट्ठा करके निकाले और एक हाथ से प्रसूता के पेट को
दबाये रहे। यदि पेट दबाया नहीं जायगा तो खून बहुत निकलेगा
और प्रसूता बिलकुल कमजोर हो जायगी। इस लिए इस बात की
ओर पूरा ध्यान रखना चाहिए। इसका थोड़ा अंश भी पेट में रह
जाने से प्रसूता का स्वास्थ्य आजन्म के लिए नष्ट हो जाता है, उसे
विषैला ज्वर आने लगता है ।
जब यह बाहर निकल आवे तब एक दुपट्टा चौपर्त कर पेडू से
कलेजे तक कस कर लपेट देना चाहिए। इससे खून का गिरना बन्द
असली कोकशास्त्र [२६७]
हो जाता है, प्रसूता का पेट नहीं डोलता, गर्भाशय डिगने नहीं पाता
तथा जी को आराम मिलता है। इस कपड़े को दूसरे-तीसरे दिन
खोलकर बाँधते रहना चाहिए, ऐसा करने से नसें खिंचने नहीं पातीं।
बहुत सी दाइयाँ बच्चा पैदा होने के बाद प्रसूता को बिठा देती
हैं। उनका कहना है कि इससे खून बाहर निकल जाता है। किन्तु
ऐसा कभी न करना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार खून निकालने से
प्रसूता निर्जीव हो जाती है।
प्रसूता की जठराग्नि कमजोर रहती है। इस लिए उसके लिए
दूध सबसे अच्छा भोजन है। दुःख की बात है कि हमारे देश में
अनभिज्ञता के कारण प्रसूता को गरिष्ट चीजें अधिक खिलायी जाती
हैं; किन्तु उसे ऐसा भोजन देना चाहिए जो हल्का हो और साथ ही
पौष्टिक। यदि सोंठ को पीस-छानकर उसकी एक फँकी लगाकर
ऊपर से प्रसूता दूध पिये तो उसे बहुत ही लाभ पहुँचे। इस बात
को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि देर में पचने वाला भोजन
प्रसूता के लिए बहुत ही हानिकारक है। उसके खान-पान में विशेष
सावधानी रखने की जरूरत होती है। कारण यह कि बच्चा पैदा
होने के बाद प्रसूता अत्यन्त निर्बल हो जाती है। उसके शरीर के
रक्त में रोगों के कीटाणुओं का सामना करने की शक्ति नहीं रहती;
इस लिए वह सहज ही में रोगाक्रान्त हो जाती है। ज्यों-ज्यों प्रसूता
की पाचनशक्ति बढ़ती जाय, त्यों त्यों अधिक पुष्टिकारक भोजन
देना तो ठीक है; पर शुरू में ही गरिष्ट भोजन देना कदापि ठीक नहीं।
२६८ असली कोकशास्त्र
प्रसव होने के दो-तीन घण्टे बाद प्रसूता को कुछ खिलाकर
सुला देना उचित है। इस समय किसी प्रकार का हल्ला-गुल्ला करना
प्रसूता के लिए दुःखदायी होता है। हमारे यहाँ लड़का पैदा होने
पर बन्दूकों की आवाजें की जाती हैं, स्त्रियाँ गाना-बजाना करती हैं;
किन्तु उस समय यह सब करना अच्छा नहीं। इन कामों से प्रसूता
की बेचैनी बढ़ जाती है। इस समय ऐसी शान्ति रखनी चाहिए,
जिससे प्रसूता को फौरन नींद आ जाय। जब वह सोकर उठे, तब
उसे पेशाब कराना चाहिए; किन्तु उसे उठाकर पेशाब न करावे, लेटे
ही लेटे, क्योंकि हिलने-डोलने से प्रसूता को बड़ा ही कष्ट होता है।
उठने-बैठने या हिलने-डोलने से रक्त-स्राव होने लगता है। पारसियों
के घरों की स्त्रियाँ प्रसव होने के चालीस दिन बाद बाहर निकलती
हैं। इतना नहीं तो कम-से-कम १५-२० दिन तक तो अवश्य ही
नियम का पालन करना प्रत्येक प्रसूता का कर्त्तव्य होना चाहिए।
इस समय गर्भाशय सिकुड़ कर इतना छोटा नहीं होगया रहता कि
वह उदर-गह्वर में जा सके। वह कहीं १५-१६ दिन में उदर-गह्वर
में जाने के योग्य होता है। इस लिए इतने दिनों तक विशेष
सावधानी की जरूरत रहती है। यही कारण है कि लेटे ही लेटे
पेशाब करने का आदेश किया गया है।
यदि मूत्र न उतरे तो गरम पानी में साफ कपड़ा भिगोकर उसे
निचोड़ डाले और उसे पेडू पर रक्खे। थोड़ी देर तक ऐसा करने
से पेशाब हो जायगा। किन्तु यदि इससे भी पेशाब न हो तो किसी
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अच्छे वैद्य से उपाय पूछना चाहिए। क्योंकि इस समय मूत्र-त्याग
करना प्रसूता के लिए बहुत ही आवश्यक है। इस समय पेशाब न
उतरने से रोग उत्पन्न हो जाता है। प्रसूता को मल-त्याग भी कराना
चाहिए। यदि मल न गिरे तो रेंड़ी के तेल में या दूध में सनाय
या और कोई हल्के विरेचन की चीज औटाकर देना चाहिए।
सौर के घर में राई, सफेद सरसों, नीम के पत्ते या इसबन्द
की धूनी देनी चाहिए; किन्तु इतना धुआँ न करना चाहिए कि
बच्चे या प्रसूता की आँखें दुखने लगें। प्रसूता तथा उसके व्यव-
हार के कपड़ों में भी यह धुआँ देना आवश्यक है। बहुधा स्त्रियाँ
प्रसूता की चारपाई के नीचे धधकती हुई आग रख देती हैं—चाहे
गर्मी हो या बरसात। इससे प्रसूता को तो कम, पर नाजुक बच्चे
को बड़ा कष्ट होता है। इस लिए ऐसा कभी न करना चाहिए।
कहीं-कहीं बच्चा पैदा होने के पाँच छः दिन बाद ही स्नान
करा दिया जाता है। यद्यपि स्वास्थ्य के लिए स्नान बहुत ही लाभ-
दायक काम है; तथापि प्रसूता के लिए दस-बारह दिन से पहले
स्नान कराना लाभदायक है, यह नहीं कहा जा सकता। इतने शीघ्र
स्नान कराने से प्रसूता को ज्वर होने तथा सर्दी लगने की सम्भावना
रहती है—जोकि इस समय के लिए घातक है। यदि स्वच्छता
रखना हो तो और ढंग से रक्खे, स्नान न करावे। चालीस दिन
तक प्रसूता के शरीर में प्रतिदिन तैल-मर्दन करना चाहिए। यदि
लाक्षादि तेल मला जाय तो और भी उत्तम हो। क्योंकि इससे
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वायु नहीं बढ़ पाती और शरीर में बल खूब बढ़ता है । दस दिन
बीत जाने पर तेल मलकर सबेरे गरम जल से प्रसूता को स्नान
करा देना चाहिए । इससे किसी तरह की हानि नहीं होती पर
लाभ होता है ।
प्रसूता को दस दिन तक बत्तीसा काढ़ा डालकर औटाया हुआ
पानी पीना चाहिए । ये बत्तीसों चीजें पंसारियों के यहाँ मिलती
हैं—जोकि बहुत ही गुणकारी हैं। उन बत्तीस चीजों में से यदि
इन चीजों का ही पानी बनाकर दिया जाय तब भी कोई हर्ज नहीं—
१-अजवायन दो तोला, २-सोंठ एक तोला, ३-लौंग तीन माशा,
४-पीपल तीन माशा, ५-पीपलामूल तीन माशा, ६-जावित्री डेढ़
माशा, ७-जायफल डेढ़ माशा, ८-कमरकस छः माशा, ९-लोध
छः माशा, १०-हल्दी छः माशा, ११-अम्बाहल्दी छः माशा,
१२-सुपारी के फूल छः माशा, १३-असगन्ध छः माशा, १४-मेदा
लकड़ी छः माशा, १५-कत्था तीन माशा, १६-माजूफल तीन माशा
१७-केशर डेढ़ माशा, १८-चिकनी सुपारी एक, १९-सनाय डेढ़
माशा, २०-मँजीठ तीन माशा, २१-झाड़ी बेर की जड़ एक तोला,
इन सबको जौकुट करके एक पोटली में बाँध दे । मिट्टी के बड़े
बर्तन में १५-२० सेर पानी भरकर आग पर चढ़ा दे और उसमें
उक्त पोटली डालकर पकावे, बाद यही पानी प्रसूता को पिलावे ।
यदि ये चीजें भी न मिलें या मौके पर उपस्थित न हों तो—पीपल,
पीपलामूल, गजपीपल, मोचरस, चीता, सोंठ और गुड़ इन्हीं चीजों
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को पानी में औटाकर पीना चाहिए । ये चीजें भी वैसी ही गुण-
कारी हैं । अथवा यदि दशमूल का काढ़ा पान करे तो और भी
अच्छा हो । यह पूर्व प्रसूत तक के उत्पन्न हुए रोगों को नष्ट कर
देता है । दशमूल के काढ़े में ये चीजें हैं:—१-शालपर्णी, २-पृष्ठिपर्णी
३--दोनों कटेरी, ४-गोखरू, ५-बेल की गिरी, ६-अरणी, ७-अरलू
८-पाढ़, ९-खम्भारो ( कुमेर ), १०-पीपल । दशमूल में इन दसों
चीजों की समान मात्रा है। यदि पहले से ही इनका अर्क उतारा
हुआ हो तो और भी अच्छा है ।
बहुत जगह की यह प्रथा है कि प्रसूता को पानी नहीं दिया
जाता । पर वास्तव में ऐसा करना ठीक नहीं । प्यास लगना ही
पानी की इच्छा सूचित करता है। इस लिए इस स्वाभाविक माँग
को पूर्ण न करना हानि के सिवा लाभ नहीं पहुँचा सकता । यदि
प्रसूता को प्यास लगे तो दूध देना चाहिए; किन्तु यदि उससे
उसकी तृप्ति न हो तो थोड़ा सा पानी दे देने में कोई हानि नहीं ।
हाँ, बालक पैदा होने के २४-३० घण्टे के भीतर अवश्य ही पानी
नहीं देना चाहिए ।
दाइयों की असावधानी के कारण प्रसूता के प्रसवद्वार से
स्वाभाविकता से अधिक खून गिरने लगता है। ऐसी दशा में नीचे
लिखी दवा बनाकर खिलानी चाहिए:—
दोनों सुपारी, भाँवरी गोंद, कटीरा, गोंद बबूल, पठानी लोध,
कमरकस और गुलधावा इन चीजों को आठ-आठ तोला, माँजूफल,