रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र [२६७]
हो जाता है, प्रसूता का पेट नहीं डोलता, गर्भाशय डिगने नहीं पाता
तथा जी को आराम मिलता है। इस कपड़े को दूसरे-तीसरे दिन
खोलकर बाँधते रहना चाहिए, ऐसा करने से नसें खिंचने नहीं पातीं।
बहुत सी दाइयाँ बच्चा पैदा होने के बाद प्रसूता को बिठा देती
हैं। उनका कहना है कि इससे खून बाहर निकल जाता है। किन्तु
ऐसा कभी न करना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार खून निकालने से
प्रसूता निर्जीव हो जाती है।
प्रसूता की जठराग्नि कमजोर रहती है। इस लिए उसके लिए
दूध सबसे अच्छा भोजन है। दुःख की बात है कि हमारे देश में
अनभिज्ञता के कारण प्रसूता को गरिष्ट चीजें अधिक खिलायी जाती
हैं; किन्तु उसे ऐसा भोजन देना चाहिए जो हल्का हो और साथ ही
पौष्टिक। यदि सोंठ को पीस-छानकर उसकी एक फँकी लगाकर
ऊपर से प्रसूता दूध पिये तो उसे बहुत ही लाभ पहुँचे। इस बात
को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि देर में पचने वाला भोजन
प्रसूता के लिए बहुत ही हानिकारक है। उसके खान-पान में विशेष
सावधानी रखने की जरूरत होती है। कारण यह कि बच्चा पैदा
होने के बाद प्रसूता अत्यन्त निर्बल हो जाती है। उसके शरीर के
रक्त में रोगों के कीटाणुओं का सामना करने की शक्ति नहीं रहती;
इस लिए वह सहज ही में रोगाक्रान्त हो जाती है। ज्यों-ज्यों प्रसूता
की पाचनशक्ति बढ़ती जाय, त्यों त्यों अधिक पुष्टिकारक भोजन
देना तो ठीक है; पर शुरू में ही गरिष्ट भोजन देना कदापि ठीक नहीं।