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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 440 में से

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२५२ असली कोकशास्त्र
हैं। किन्तु ऐसा कभी न करना चाहिए। मस्तक के साथ एक नस
होती है, उसके खिंच आने से बालक की मृत्यु हो जाने का भय
रहता है। इस लिए दाई को चाहिए कि स्त्री के पेट पर धीरे-धीरे
हाथ फेरे। ऐसा करने से फिर प्रसव-वेदना शुरू हो जाती है और
बच्चे का शेष अंग भी बाहर निकल आता है, खींचने की जरूरत
नहीं पड़ती।
ऊपर जिस नाल की चर्चा की गयी है, यदि वह नाल बच्चे की
गर्दन में लिपटा हुआ हो तो धीरे-धीरे हलके हाथों से उसे खोलकर
सिर के ऊपर से उतार कर भीतर कर देना चाहिए। यदि नाल में
उलझन अधिक हो तो उसमें समय लगाना ठीक नहीं है। यदि सिर
निकल आने के बाद प्रसव की वेदना पेट पर हाथ फेरने से भी न
पैदा हो, तो समझना चाहिए कि अभी बच्चे का समूचा शरीर
निकलने में कुछ देर लगेगी। इस लिए ऐसे समय में चतुर दाई
बालक को खींचकर निकाल ले, यही अच्छा है। क्योंकि देर लगने
से भी बच्चे की मृत्यु की आशंका रहती है। परन्तु इतने पर भी
सिर पकड़ कर दाई कभी न खींचने पावे। उसे चाहिए कि वह अपने
दोनों हाथों की अँगुलियाँ भीतर डालकर बालक के बगलों में अंकुश
की तरह अड़ाकर खींचे। खींचते समय पीछे बैठी हुई स्त्री को
चाहिए कि वह प्रसूता का पेट दबाये रहे। पेट के दबाये रहने से
रक्त नहीं निकलने पाता। रक्त निकलने से बालक को हानि पहुँचाती
है। क्योंकि वह रक्त बालक के कान नाक ओर मुख में भर जाता है।