रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र २५६
एक बन्धन और लगा दे। बाद दोनों बन्धनों के बीच में तेज औजार
से काट दे। नाल काटने के पहले बन्धन लगाना इस लिए बहुत
जरूरी होता है कि जिसमें बच्चे के शरीर का खून न निकलने पावे।
क्योंकि खून निकलने से बच्चा मर जाता है। नाल में दूसरा बन्धन
इस लिए लगाया जाता है कि शायद प्रसूता के पेट में दूसरा बालक
हो। यदि वह बन्धन न लगाया जाय और पेट में दूसरा बच्चा हो
तो रक्त निकल जाने के कारण वह तुरन्त ही मर जायगा। फिर तो
प्रसूता का बचना भी कठिन हो जाता है। इसी से दूसरा बन्धन
लगा देना भो आवश्यक है। क्योंकि पेट में जितने बच्चे होते हैं,
सबका नाल एक ही होता है। यदि पेट में दूसरा बच्चा हो तो
प्रसूता स्त्री से इसका हाल कभी न कहे। नहीं तो घबड़ा जाने के
कारण प्रसूता की जान खतरे में पड़ जानेकी सम्भावना रहती है।
नाल काटने से पहले एक बात पर ध्यान अवश्य देना उचित
है। यह कि, बच्चा निर्जीव तो नहीं है। यदि वह निर्जीव यानी
कमजोर अधिक हो तो नाल काटने से पहले नाल को माँ की ओर
से दुहकर बालक की नाभि तक ले आवे। ऐसा करने से कुछ खून
बच्चे के शरीर में चला जाता है। इतना करने के बाद नाल को
काटना उचित है। कमजोर बालक के लिए कुछ दाइयाँ नाल के
खून की दस पाँच बूँदें चटा देती हैं; किन्तु यह क्रिया हमें अच्छी
नहीं जँचती—यद्यपि इससे भी बालक की कमजोरी दूर हो जाती
है, क्योंकि माँ का खून बच्चे के लिए बहुत ही लाभदायक है, चाहे