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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

१. परिच्छेद १-४: पद्मिनी, चित्रिणी, शङ्खिनी, हस्तिनी एवं शश, मृग, वृष, अश्व लक्षण

२० असली कोकशास्त्र
मिल सकते हैं, तब वह मलाई, रबड़ी, लड्डू, पेड़ा आदि अनेकों
प्रकार की मिठाइयाँ क्यों बनाकर खाता है ? सामान्य वस्त्र से
शीत निवारण किया जा सकता है, फिर ऊनी, रेशमी आदि नाना-
विध वस्त्रों की क्या आवश्यकता ? सामान्य कुटिया में गर्मी, सर्दी
की निवृत्ति की जा सकती है, फिर महल-अटारियों की क्या जरूर-
रत ? इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि मनुष्य प्रत्येक वस्तु का उप-
भोग बड़ी खूबसूरती के साथ करना चाहता है ।
जब इन छोटे छोटे कामों के लिये इतने विचार की आवश्य-
कता है, तब इस 'काम' जैसे महत्वपूर्ण विषय की उपेक्षा करना
कितनी भारी गलती है। जिस मनुष्य-शरीर के लिये समस्त
दुनियाँ के प्रपंच किये जाते हैं, उसकी रचना के लिये किसी भी
उच्च ज्ञान की आवश्यकता नहीं, ऐसा समझना कितनी अदूरदर्शिता
की बात है !
यही कारण है कि आज छोटे से लेकर बड़े-बड़े घरानों तक
में विषाद ही विषाद दिखायी देता है । एक आलीशान पक्की चित्र-
विचित्र रंगों से रंगी हुई लाखों रुपयों की इमारत के अन्दर एक
सुन्दर नवयौवना विवाहिता स्त्री रहती है, जिसका पति सहस्रों
रुपया माहवारी कमाता है, उस स्त्री की मनमानी मांगों को पूरी
करता है। अर्थात् वस्त्र, आभूषण, खाद्यपदार्थ आदि किसी वस्तु
की त्रुटि नहीं करता । भोजन बनाने के लिये तथा सेवा-शुश्रुषा के
लिये सेविकायें प्रस्तुत रखता है और स्वयं भी रूप-यौवन-संपन्न

असली कोकशास्त्र २१
अपनी पत्नी के समान ही है। इतना होने पर भी वह सुन्दरी अपने
महल की सुख-शय्या को छोड़कर अंधकारमयी रात्रि में चोर की
भाँति छिप-छिप कर ऐसे पर-पुरुष के पास जाती दिखायी देती है
जो जाति से नीच और आचार-विहीन होता है।
उदाहरण में भर्तृहरीजी को ही ले लीजिये । उनकी रानी को
राजमहलों में किस बात का कष्ट था ? रहने को महल, सेवा के
लिये दास-दासियाँ थीं । स्वयं उसके पति भर्तृहरी भी उसे प्राणों
से अधिक प्यार करते थे। यह किसी से छिपा नहीं है। सब कुछ
रहने पर भी वह रानी एक नीच जाति के सईस के साथ फँस
जाती है और उससे इतना अधिक स्नेह करती है कि जो अमृत-फल
महाराज भर्तृहरी को अमर करने के लिये प्राप्त हुआ था, वह
फल उन्होंने अपनी स्त्री को प्रेम-विह्वल होकर खाने के लिये दे
दिया था। किन्तु वह भी उसने खुद न खाकर सईस को अमर
रखने के लिये दे दिया ।
अब पुरुषों को लीजिये । उन्हीं सर्व-गुण-सम्पन्न अटारियों में
बसनेवाले नौजवान अपनी अपूर्व सुन्दरी आज्ञाकारिणी पत्नी को
छोड़कर रंडियों के कोठे पर जा पहुँचते हैं। वहाँ धन, बल, मान-
मर्यादा का नाश करते हुए उन रंडियों की फटकार, जूतियें खाकर
भी जबतक सर्वनाश नहीं हो जाता तबतक उसका साथ नहीं
छोड़ते ।
इसका क्या कारण ? यह विपरीत गति क्यों दिखायी दे रही

२२ असली कोकशास्त्र
है ? इससे साफ प्रतीत होता है कि उन दोनों की कामेच्छा पूर्ण न
होने से उन्हें जहाँ-तहाँ टक्करें मारनी पड़ती हैं। अब यहाँ यह
प्रश्न उत्पन्न होता है कि स्त्रियों का काम पुरुष से आठ-गुणा अधिक
होने से पुरुष उसकी तृप्ति किस प्रकार कर सकता है। कहा है—
‘काम अष्टगुणः स्मृतः ।’
इस वाक्य का अर्थ समझने में भारी भूल है। इसका यह
अर्थ नहीं कि एक स्त्री आठ पुरुषों से रति कर सकती है। स्त्री की
रति पूरी होने पर वह भी पुरुष के समान तृप्त हो जाती है। फिर
वह आठ से तो क्या, तृप्ति हो जाने पर, तृप्त पुरुष के समान फिर
एक से भी रति नहीं कर सकती।
उपरोक्त वाक्य का अर्थ यह है कि स्त्री पुरुष से अष्ट गुणा
अधिक बलवती होती है, अर्थात् आठ पुरुषों की रति के बराबर
बल लग जाने पर एक स्त्री की रति पूर्ण होती है। इतना बल
किसी विशेष ही पुरुष में होता है। अतएव स्त्री को तृप्त करने के
लिये सामान्य से सामान्य पुरुष को किन उपायों का अवलम्बन
करना चाहिये, जिससे हर पुरुष हर स्त्री को रति-सुख से तृप्त
करके सुसन्तान प्राप्त करा सके इसका परिज्ञान कराना इस कोक-
शास्त्र लिखने का प्रयोजन है। रति-सुख के सुगम से सुगम उपाय
इसमें बतलाये गये हैं।
—:*:—

असली कोकशास्त्र २३
शरीर की बनावट
हड्डी, खून, मांस और खाल से हमारा शरीर बना हुआ है।
सारे शरीर का मुख्य आधार हड्डियाँ हैं। इन्हीं की शक्ति पर
हमारा खड़ा होना, चलना-फिरना अवलंवित है। हड्डियाँ ही हमारे
कोमलांगों की रक्षा करती हैं। सिर की हड्डीयों से दिमाग और
पसलियों से हृदय तथा फेफड़ों की हिफाजत होती है। डाक्टरों के
सिद्धान्त से शरीर में १३८ हड्डियाँ हैं। उनका ऊपरी भाग कठिन
तथा भीतरी पोला और कोमल होता है। हड्डियों के सन्धि-स्थल
में मज्जा का परदा होता है। इस मज्जा को भी नरम हड्डियों में
ही गिनते हैं।
दाँत भी हड्डी के ही होते हैं। छोटी उमर में पहले दूध के
दाँत होते हैं और फिर जब बच्चा अन्न खाने लगता है तब अन्न के
दाँत निकलते हैं। बच्चा पैदा होने के ६ से ८ महीने बाद दूध के
दाँत निकलते हैं और वे दो-ढाई वर्ष की उमर तक पूर्ण निकल
आते हैं। इनके एक-एक गिरने के बाद अन्न के दाँत निकलते हैं
जो पाँच वर्ष की आयु से लेकर पचीस वर्ष की आयु तक निकलते
रहते हैं।
चमड़े को छूने से बहुत जगह हमको मांस का लचलचापन
मालूम होगा। मांस के इस भाग का नाम स्नायु है। स्नायुओं
(पुट्ठों) द्वारा ही हम अपने हाथ सिकोड़ सकते हैं, फैला सकते

२४ असली कोकशास्त्र
हैं, जबड़े हिला सकते हैं; आँखें बन्द कर सकते हैं।
हम इस पुस्तक में शरीर-सम्बन्धी विशेष ज्ञान का वर्णन नहीं
करना चाहते। केवल समझने योग्य शरीर के मुख्य भागों
पर विचार किया जायगा। सब से मुख्य भाग पाकाशय अथवा
मेदा (कोठा) है। इसके क्षणभर भी आलस्य करने से
हमारा सारा शरीर ढीला और शिथिल हो जाता है। मेदे पर
हम जितना भार डालते हैं उतना सहने की ताकत बड़े-बड़े विक-
राल जन्तुओं में भी नहीं होती। मेदा भोजन को पचाकर उसके
द्वारा शरीर का पोषण करता है। इस भाग से शरीर को वही
सहायता मिलती है जो रेलगाड़ी को एञ्जिन के वैलट से, मेदा पस-
लियों के अन्दर वायों आर होता है। इसमें अनेक क्रियायें होकर
भिन्न-भिन्न प्रकार के रस तैयार होते हैं और भोजन का तत्व
खींचता है। बचा हुआ निकम्मा पदार्थ मल-मूत्र बनकर आंतों के रास्ते
बाहर निकल जाता है। इसके ऊपरी हिस्से में हृदय है। मेदे के
बायीं ओर तिल्ली है। यकृत् पसलियों के अन्दर दाहिनी ओर है।
इसका काम पित्त पैदा करना है। यह पित्त पाचन क्रिया के लिये
बहुत हो उपयोगी होता है।
अब देह के आधाररूप, बहने वाले खून पर विचार करना
चाहिये। खून से हमारा पोषण होता है। वह भोजन में से पोषक
भाग को खींचकर निरुपयोगी भाग को मल-मूत्र के रूप में बाहर
निकाल देता और सारे शरीर को गरम रखता है। खून शरीर के

असली कोकशास्त्र २५
अन्दर की नलियों, नसों द्वारा सदा फिरा करता है। खून की गति के
कारण ही हमारी नाड़ी एक मिनट में लगभग ७२ बार चलती
उछलती है। बच्चों की नाड़ी तेज चलती है बूढ़ों की सुस्त।
खून की सफाई का सबसे बड़ा साधन हवा है। शरीर में
चक्कर लगाकर जो खून फेफड़ों में जाता है वह निकम्मा हो जाता
है, उसमें जहरीले पदार्थ पैदा हो जाते हैं। जो हवा भीतर जाती है
वह उन जहरीले पदार्थों को खींच लेती है और अपने में मिली हुई
प्राणवायु खून को दे देती है। यह क्रिया सदा होती रहती है।
भीतर गई हुई हवा खून के जहरीले पदार्थ लेकर बाहर निकल
आती है और प्राणवायु खून में मिलाकर नसों के द्वारा सारे शरीर में
चक्कर लगाया करती है। इससे समझा जा सकता है कि बाहर
निकली हुई साँस कितनी जहरीली होती है। हवा का प्रभाव हमारे
शरीर पर अधिक रहता है।
सामान्यतः मनुष्य उन मनुष्यों को आरोग्य समझते हैं जो
खाते-पीते चलते-फिरते और वैद्यों को घर पर नहीं बुलाते। किन्तु
विचार करने पर मालूम होता है कि यह उनकी भूल है। ऐसे उदा-
हरणों की कमी नहीं है, जो खाने-पीने आदि के सभी व्यापार करते
हुए भी रोगी हैं, किन्तु अपने को रोगी नहीं समझते और साथ
ही रोग की परवाह भी नहीं करते। निरोग मनुष्य संसार में बहुत
ही कम हैं।
एक विदेशी लेखक का कहना है कि निरोग मनुष्य वे ही

२६ असली कोकशास्त्र
होते हैं, जिनके पवित्र शरीर में शुद्ध मन आवास करता हो। शरीर
का नाम तो मनुष्य नहीं, शरीर तो उसका निवासस्थान है। मन
और इन्द्रियों का शरीर के साथ इतना घनिष्ट सम्बन्ध है कि एक
के बिगड़ने से दूसरों के बिगड़ने में जरा भी विलंब नहीं लगता।
शरीर को गुलाब के फूल की उपमा दी गयी है, अर्थात् गुलाब का
फूल शरीर है और उसमें रहने वाली गन्ध उसकी आत्मा है।
कागज के बने हुए नकली गुलाब के फूल की उतनी कदर नहीं होती
जितनी कि असली और सुगन्ध-युक्त की। क्योंकि सूँघने पर
निर्गन्ध-पुष्प से सुगन्ध नहीं आयगी, वह केवल देखने की शोभा
मात्र है। उसमें उसका असली तत्त्व गन्ध नहीं है। जिस प्रकार
मनुष्य गन्धहीन पुष्प को पसन्द नहीं करते, प्रत्युत फेंक देते हैं, उसी
प्रकार उस मनुष्य से भी कोई प्रेम नहीं करता जो देखने में तो
ऊपर से अच्छा प्रतीत होता हो और उसके भीतर के व्यवहार अच्छे
न हों। चरित्र-हीन मनुष्य निरोग नहीं होते। जिसका शरीर
स्वस्थ हो वह अवश्य पवित्र-मन होगा। क्योंकि मन के ही अनु-
कूल मनुष्य कर्म करता है उसीका प्रभाव सब शरीर पर पड़ता है।
पाश्चात्य देशों में इस मत का एक पन्थ है। उसका यही सिद्धान्त
है कि जिसका मन शुद्ध होता है उसके शरीर में रोग होते ही नहीं
और यदि हो भी जायँ तो मनोबल के योग से हटा भी दिये जाते
हैं। सार यही है कि आरोग्यता का सबसे बड़ा साधन मन ही है।
अतएव मन की शुद्धि से ही आरोग्यता प्राप्त होती हैं।

असली कोकशास्त्र २७
तामस भाव, आलस्य और बहरापन ये सब रोग के ही
लक्षण है; कई-एक डाक्टर चोरी आदि को भी रोग ही मानते हैं।
विलायत में अनेक धनिक-स्त्रियाँ भी छोटी-छोटी चोरी करती पायी
गयी हैं। जिनकी डाक्टरी परीक्षा करायी जाने पर, डाक्टरों ने
“क्लेप्टेनिया” की बीमारी बतलायी। कोई मनुष्य स्वभाव से ही
खूँखार होते हैं। उन्हें बिना खून किये चैन नहीं पड़ता। यह भी
एक प्रकार का रोग है।
अब यह कहा जा सकता है कि जिनका शरीर सब इन्द्रियों से
पूर्ण है अर्थात् आँख, नाक कान आदि सभी पूर्ण है और उनमें
किसी प्रकार का विकार नहीं, अंग-प्रत्यंग सुडौल सुन्दर जिनसे
किसी प्रकार की बदबू नहीं आती और मन स्वाधीन है वे ही निरोग
हैं। स्वास्थ्य प्राप्त कर लेने पर भी उसका भोगना सरल नहीं।
माता-पिता का रोगी होना भी हमारे रोग का कारण है। माता-
पिता यदि निरोग होकर सन्तान पैदा करें तो उनको सन्तान उनसे
कहीं अधिक स्वस्थ और बलवती हो। विकासवादी इस बात को
मुक्तकण्ठ से स्वीकार करते हैं कि रोग-रहित पुरुष को मृत्यु का
भय नहीं लगता। मृत्यु से हमारा अत्यन्त डरना, यह सिद्ध करता
है कि हम रोगी हैं। इस लिये ऊपर दिखाये हुए स्वास्थ्य लाभ
करने का प्रयत्न हमको सदैव करना चाहिये। क्योंकि वह हमारा
परम कर्त्तव्य है।
स्वास्थ्य लाभ से ही प्रकृत जीवन प्राप्त होता है, यह नियम-

१८ असली कोकशास्त्र
सिद्ध बात है। प्रकृत-जीवन ही यथार्थ जीवन का नाम है। जहाँ
असली जीवन है वहीं सुख सम्पत्ति अधिवास करती है, अन्यथा
रुग्ण अवस्था में जैसा आज सार्व-भौम दुःख दिखायी देता है,
उसका चित्र-पट स्पष्ट ही है।
——:*:——
पुरुष-जननेन्द्रिय
पुरुष-जननेन्द्रिक संबंधि-ज्ञान प्रत्येक मनुष्य के लिये आवश्यक
है। शरीर से मूत्र और वीर्य निकलने का मार्ग एक ही होता है।
लिंग के अग्र भाग में एक आवरण चमड़ा होता हैं, जिससे लिंग
की सुपारी ढकी रहती है। वह चमड़ा बराबर आगे-पीछे हटाया-
बढ़ाया जा सकता है। माता या दाइयों की असावधानी के कारण
बचपन में यदि वह हटाया-बढ़ाया नहीं जाता, तो वह इतना तंग
हो जाता है कि मूत्र निकलने में भी तकलीफ पहुँचाने लगता है और
कभी-कभी यहाँ तक देखा गया है कि वह सड़ जाता है। इन
दोनों हालतों में डाक्टर से आपरेशन कराना पड़ता है। उस चमड़े
के नीचे और सुपारी की जड़ में प्रायः सफेद रंग का कीट जम
जाता है। उसको हमेशा साफ करते रहना चाहिये। उसकी सफ़ायी
न रखने से बुद्धि-मन्दता और स्वप्नदोष की बीमारी हो जाती है।
इस इन्द्रिय में बेलनाकार तीन डंडे होते हैं। इन तीनों डंडों में

असली कोकशास्त्र २६
दो मोटे-मोटे ऊपर की ओर और तीसरा भीतर से पोला दोनों के
नीचे की तरफ होता है। यही मूत्र-मार्ग है। तीनों दंडों में छोटे-
छोटे आशय होते हैं, जिनमें उत्तेजना के समय रक्त भर जाता है,
और लिंग ठोस और कड़ा हो जाता है। मैथुन-क्रिया के समाप्त
होते ही आशयों का रक्त शिराओं से वापस लौट जाता है और
फिर लिंग पूर्ववत् मुलायम हो जाता है।
अण्डकोश
जननेन्द्रिय के नीचे एक थैली लगी रहती है। जिसमें दो मांस
की गोलियें रहती हैं। ध्यानपूर्वक देखने से उनमें एक प्रकार की
क्रिया होती दिखलायी देती है। यह क्रिया त्वचा के संकोच-विकाश
से पैदा होती है।
सर्दी और गर्मी के कारण अण्डकोषों में संकोच-विकाश भी
होता है। वृद्ध और निर्बल मनुष्य के अण्डकोष ढीले पड़ जाते
हैं। कई मनुष्यों को एक ही अण्ड होता है और किन्हीं के वह
भी नहीं। अण्ड-हीन मनुष्य सन्तान नहीं पैदा कर सकता। अण्डों
में अधिक श्रम और चोट लगने से सन्तान उत्पन्न करने में बाधा
पड़ती है। यदि बचपन में अण्ड निकाल दिये जायें तो शरीर की
वृद्धि नहीं होगी। और मूंछें भी नही आयेंगी।

३० असली कोकशास्त्र
स्त्री जननेन्द्रिय
शंखनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्ता सा प्रकीर्तिता ।
तस्यास्तृतीये त्वावर्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ॥
शंख नाभी के समान आकार वाली, तीन लपेट से युक्त योनि
होती है। उसकी तीसरी लपेट में गर्भ शय्या प्रतिष्ठित है।
यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः ।
तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ॥
रोहू मछली के मुख के समान भी गर्भाशय का आकार कहा
गया है।
आभुग्नोऽग्रमुखः शेते गर्भो गर्भाशये स्त्रियाः ।
स योनि शिरसा याति स्वभावात्प्रसवं प्रति ॥
गर्भाशय के मुख पर सुकड़ा हुआ गर्भस्थ बालक शयन करता
है। वह स्वभाव से ही प्रसव-काल में शिर के बल योनि से बाहर
निकल आता है।
इसके सम्बन्ध में पुरुषों को विशेष रूप से जानने की आवश्य-
कता है। कारण पुरुषों को इस सम्बन्ध का ज्ञान बहुत कम होता
है। जिस स्थान पर पुरुष को जननेन्द्रिय होती है, ठीक उसी
जगह स्त्री की योनि होती है। इसे ही भग कहते हैं। यह भग दो

असली कोकशास्त्र ३१
ओष्ठ सदृश भागों के समान बना हुआ होता है। इसो लिये
इसको भगोष्ठ भी कहते हैं। यह भगोष्ठ भीतरी अवयवों की रक्षा
करती है। इसमें भी सफेद मैल जम जाता है। उसको साफ न
करते रहने से भी अनेक बीमारियाँ पैदा होती हैं। उन भगोष्ठों के
नीचे दो छोटे-बड़े छिद्र होते हैं। जो बड़ा छिद्र होता है, उसी से
पुरुष का वीर्य योनि में जाता है और बच्चा भी उसी मार्ग से बाहर
निकलता है, तथा मासिकधर्म भी उसी छिद्र से होता है।
दूसरा छोटा छिद्र मूत्र-मार्ग है। जो निचले छिद्र से एक डेढ़
इन्च ऊपर होता है।
जिन स्त्रियों की योनि क्षत नहीं हुई होती, उनका योनि-मुख
एक पतली खाल से ढका रहता है। पूरे युवती होने पर मासिक-
धर्म के निकलने से वह द्वार कुछ खुल जाता है। प्रसंग के समय
वह पर्दा फट जाता है। इससे स्त्रियों को दर्द भी होता है और
रक्त भी निकलता है। बाज लोग पर्दे का फटा हुआ होना स्त्री-
मैथुन की साक्षी मानते हैं। किन्तु कभी-कभी चोट लग जाने से
भी पर्दा फट जाता है।
भगोष्ठ ऊपर से मिला और उभरा हुआ होता है। बारह-
तेरह वर्ष की अवस्था में उस पर बाल आने लगते हैं। इन भगोष्ठों
के नीचे और मूत्र-द्वार के ऊपर एक छोटा-सा अंकुर होता है, जिसे
भगनासा कहते हैं। स्त्री का यह अंग पुरुष के शिश्न के समान
होता है। इसमें तीन डंडों के स्थान में दो ही दंड होते हैं और

३२ असली कोकशास्त्र
आकृति में शिश्न से बहुत छोटा होता है। लिंग पर जिस प्रकार
हटने-बढ़ने वाली त्वचा होती है, वैसी ही इस पर भी होती है।
मैथुनकाल में इसकी नालियों में भी रक्त भर जाता है। शिश्न
और भगनासा की रगड़ से स्त्री को वहुत आनन्द मालूम होता है।
मैथुन के बाद शिश्न की भाँति भगनासा का रक्त भी लौट जाता
है और वह शि शिल हो जाती है।
पुरुष की शुक्र-ग्रन्थियों की तरह स्त्री के भी डिम्ब-ग्रन्थियाँ
होती हैं। पुरुष के शुक्र और डिम्ब के मिलने से ही गर्भ स्थिर
होता है। ये डिम्ब ग्रन्थियाँ वस्ति-गह्वर की दाहिनी-बायीं दीवारों
से सटी रहती हैं। ग्रन्थि की शक्ल और तौल कबूतर के अंडे की
तरह होती है और इसकी लम्बाई एक इन्च तथा चौड़ाई पौन इन्च
के लगभग होती है। मोटाई आध इन्च तथा छः से आठ माशे
तक वजन होता है।
योनि का रूप एक नली के समान होता है। उसके ऊपर का
सिरा गर्भाशय की गर्दन के निचले हिस्से में चारो ओर लगा
होता है। उसके भीतर गर्भाशय का बाह्यद्वार रहता है। उस
नली की लम्बाई लगभग तीन-चार इन्च के होती है। उसके सामने
वाली दीवार पिछली दीवार की अपेक्षा कुछ मोटी होती है। योनि का
द्वार तंग होता है। भीतर कुछ फैलाकर फिर गर्भाशय के पास
तंग होता है। योनि-द्वार में बहुत सी शिराएँ होती हैं, जो मैथुन-
काल में रक्त से भरकर मोटी हो जाती हैं।

३ असली कोकशास्त्र ३३
गर्भाशय
योनि-मुख से मिला हुआ गर्भाशय होता है। वह वस्ति-गह्वर
में ही होता है। उसके सम्मुख मूत्र-स्थान और पीछे मल-स्थान होता
है। गर्भाशय के कुछ ही दूर पर दोनों डिम्ब ग्रन्थियाँ भी रहती
हैं। गर्भाशय की शक्ल नासपाती के समान होती है। किन्तु
उसका स्थूल भाग गोल होने की अपेक्षा कुछ चपटा होता है।
वस्ति-गह्वर में गर्भाशय सीधा खड़ा न रहकर मूत्राशय की
ओर झुका रहता है। गर्भाशय अन्दर से पोला रहता है और
उसमें भी जगह बहुत कम होती है। गर्भ धारण करने के पूर्व
गर्भाशय छोटा रहता है, किन्तु गर्भ स्थित हो जाने पर वह धीरे-
धीरे बढ़ जाता है। तीसरे महीने में टटोल कर देखने से प्रतीति भी
की जा सकती है। सामान्यतया गर्भाशय का दिग्दर्शन कराकर
अब रज और वीर्य पर विचार किया जायगा।
वीर्य की उत्पत्ति
मनुष्य-शरीर के सार-तत्त्व का नाम वीर्य है। वैद्यक शास्त्र ने
जीवन का मूल तत्त्व इस वीर्य को ही माना है। यह वीर्य आहार
का अन्तिम तत्त्व है। आयुर्वेद का मत है:—

३४ असली कोकशास्त्र
रसाद्रक्तं ततोमांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।
मेदस्यास्थिस्ततो मज्जा मज्जायाः शुक्र सम्भवः ।
—सुश्रुताचार्य
अर्थात्—भोजन के पचने पर रस, रस से रक्त, रक्त से मांस,
मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य
पैदा होता है। इससे लेकर मज्जा तक प्रत्येक धातु पाँच दिन-रात
और डेढ़ घड़ी तक अपनी अवस्था में रहती है। बाद तीस दिन
रात ओर नौ घड़ी में रस से वीर्य बनता है। ऐसा भोज तथा अन्य
आचार्यों ने लिखा है। स्पष्ट रीति से यों समझना चाहिए कि
मनुष्य जो कुछ आज भोजन करता है, उसका वाय बनने में पूरा
एक महीना लगता है। इसी प्रकार ओर इतने ही समय में स्त्री-
शरीर में रज पैदा होता है। शरीर के बलाबल के अनुसार इस
समय में न्यूनाधिकता भी हो जाती है।
इसी पुरुष-वीर्य और स्त्री-रज के अधीन स्त्री-पुरुष की शारी-
रिक और मानसिक सारी शक्तियाँ रहती हैं। इसी के प्रभाव से
ब्रह्मचारी पुरुषों ओर ब्रह्मचारिणी स्त्रियों का शरीर बल-वीर्य से
पूर्ण, सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट तथा पवित्र देखा जाता है। यदि यह न
रहे, तो शरीर एक क्षण भी न टिके। शरीर-स्थिति का मूल-तत्त्व
यही है। अब यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि वीर्य की
उत्पत्ति शरीर में किस अवस्था से होती है। यों तो शरीर की

असली कोकशास्त्र ३५
उत्पत्ति ही वीर्य से होती है। अतः वीर्य-शून्य तो कभी शरीर
रहता ही नहीं और न वीर्य-हीन शरीर जीवित रह सकता है।
पर स्पष्ट रूप से १२—१३ वर्ष की अवस्था से शरीर में वीर्य बनने
लगता है। इससे पहले शरीर में जो वीर्य बनता है, वह सब का
सब शरीर की वृद्धि और उसके विकास में खर्च हो जाया करता
है और किशोरावस्था के आरम्भ में वह दिखलायी पड़ने लगता
हैं। पचीस वर्ष की अवस्था तक पुरुष-शरीर का वृद्धि-क्रम जारी
रहता है। तत्पश्चात् उसमें पुष्टता आती है। इसी अवस्था में
वीर्य परिपक्व भी होता है। जो मनुष्य इस अवस्था से पहले ही
वीर्य-पात करना प्रारम्भ कर देता है, उसका वीर्य कभी भी पुष्ट
नहीं होता और साथ ही उसके शरीर की बाढ़ भी मारी जाती
है। अतएव पचीस वर्ष की अवस्था तक वीर्य का संचय करना
अत्यन्तावश्यक है। सुश्रुताचार्य ने लिखा है—
ऊन षोडशवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम् ।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विनश्यति ॥
अर्थात्—सोलह वर्ष से कम उम्र की स्त्री और पचीस से कम
अवस्था के पुरुष के रज-वीर्य से जो गर्भाधान होता है वह नष्ट
हो जाता है। अभिप्राय यह है कि उससे जो सन्तान पैदा होती
है, वह सर्वगुण-सम्पन्न और दीर्घायु नहीं होती। यह वीर्य बहुत
ही कम मात्रा में तैयार होता है। कुछ लोगों का कहना है कि ४०

३६ असली कोकशास्त्र
ग्रास आहार से १ बूँद रक्त और ४० बूँद रक्त से १ बूँद वीर्य
तैयार होता है। वैज्ञानिकों का मत है कि २ तोला वीर्य के लिए
१ सेर रक्त और १ सेर रक्त के लिए १ मन आहार की आवश्य-
कता होती है।
अब यह बात मालूम हो गयी कि यदि निरोग मनुष्य सेर-
भर अन्न रोज खाये तो ४० दिन में वह ४० सेर अन्न खा सकेगा।
अतएव उसकी ४० दिनकी कमाई दो तोला वीर्य है। इस
हिसाब से ३० दिन की कमाई में केवल डेढ़ तोला वीर्य ही हृष्ट-
पुष्ट मनुष्य को प्राप्त होता है। ऐसे मूल्यवान पदार्थ को शरीर से
निकाल देना कितना अनर्थ है। इस पर लोग पूछ सकते हैं कि
जब यह इतना कम तैयार होता है, तब रात-दिन विषय करने-
वालों के शरीर में यह आता कहाँ से है ? प्रश्न बहुत ही ठीक है।
बात यह है कि मनुष्य के शरीर में वीर्य सदा कुछ-न-कुछ तैयार
रहता है। हम पहले ही कह आये हैं कि वीर्य के बिना शरीर
जीवित नहीं रह सकता। दूसरी बात यह है कि रात-दिन विषय
करने वाले मनुष्य का वीर्य अच्छी तरह से पकने तो पाता नहीं,
वह तो अपने असली रूप में आने से पहले बाहर निकल जाता है;
अतः उनके वीर्य को तो वीर्य कहना ही अनुचित है।
यहाँ पर एक बात का और उल्लेख कर देना आवश्यक है।
वह यह कि बहुत लोग समझते होंगे, यदि वीर्य हमेशा बनता है;
और वह आहार का अन्तिम सार है तो कुछ समय में बहुत

असली कोकशास्त्र ३७
अधिक मात्रा में एकत्र हो जाता होगा। यदि उसे काम में न लाया
जाय तो अन्ततः वह किस काम आवेगा। इसका साधारण
उत्तर यही है कि आहार किये हुए पदार्थ से रस, रस से रक्त,
रक्त से मांस, मांस से मेदा, मेदा से अस्थि (हड्डी) हड्डी
से मज्जा और फिर उससे वीर्य बनता है। बाद वीर्य की
भी पाचन क्रिया होती है। स्थूल भाग तो वीर्य में रहता है और
सूक्ष्म भाग का 'ओज' बन जाता है। कहने का अभिप्राय
यह है कि सब धातुओं में सर्वश्रेष्ठ वस्तु वीर्य है और वीर्य का
श्रेष्ठ भाग ओज है। इसी ओज का दूसरा नाम बल भी है।
इस ओज की ज्यों-ज्यों वृद्धि होती है, त्यों-त्यों शरीर की वृद्धि
होती है और इसकी न्यूनता से शरीर का नाश होता है।
उत्साह, साहस, धैर्य, लावण्य, संयम, तेज, सौन्दर्य, प्रसन्नता,
बुद्धि आदि इसी ओज की विभूतियाँ हैं। अधिक मात्रा में वीर्य
का नाश करने वालों में ये विभूतियां नहीं रहतीं। यही कारण है
कि हमारे शास्त्रकारों ने सन्तानोत्पत्ति के लिए छोड़कर और किसी
भी अवस्था में वीर्यनाश करने की आज्ञा नहीं दी है।
───:❉:───

३८ असली कोकशास्त्र
वीर्य का स्थान
वीर्य सारे-शरीर में फैला रहता है—इसके रहने का कोई
विशेष स्थान नहीं है। जिस प्रकार दूध में मक्खन रहता है, उसी
प्रकार शरीर में वीर्य। जिस प्रकार दूध को मथने से मक्खन
बाहर आ जाता है, उसी प्रकार रति करने से सारी शारीरिक
इन्द्रियों का मथन होकर वीर्य अंडकोष में जमा हो जाता है और
'उपस्थेन्द्रिय' द्वारा बाहर निकलता है।
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वीर्य में कौनसे पदार्थ हैं ?
पश्चिमी विद्वानों ने 'सूक्ष्म-दर्शक-यन्त्र' द्वारा वीर्य का निरीक्षण
करके पता लगाया है कि पुरुष-वीर्य में एक प्रकार के अत्यन्त
छोटे जन्तु होते हैं जो कि आँखों से दिखलायी नहीं पड़ते। ये
जन्तु किसी बढ़िया यंत्र से स्पष्ट दिखलायी पड़ते हैं। इन जन्तुओं
के केवल सिर और पूँछ होती है। इनमें सजीव जन्तुओं के समान
संचालन शक्ति और स्त्री-कोष में जाकर बच्चे का जीवन बनाने की
शक्ति होती है। पुरुष-वीर्य इसी प्रकार के जन्तुओं का समूह है।
डाक्टर "टाल" का कहना है कि "अबतक स्पष्टतया यह बात नहीं
मालूम हो सकी है। वीर्य की बनावट जहाँतक रसायनिक क्रिया से
सम्बन्ध है, उसके विषय में मैं केवल अपना अभिप्राय ही देना

असली कोकशास्त्र ३६
उचित समझता हूँ कि प्राण-तत्व और रासायनिक पृथक्करण के
तरीक़ों में कोई प्राकृतिक सम्बन्ध नहीं है । रसायन-शास्त्र केवल
इतना ही बतलाता है कि पृथक्करण के बाद शेष क्या रहा ।
सूक्ष्म-दर्शक यंत्र से मालूम होता है कि पुरुष-वीर्य के ये सूक्ष्म
जन्तु ही स्त्री-कोष को गर्भ-रूप में परिणत करने वाले हैं। इन
जन्तुओं को नीचे लिखे नामों से पुकारा जाता है—
१—स्परमेटोजा
२—सेमिनल फिलेमेण्ट
३—जूसपर्मस
४—सेमिनल एनेमल्क्यूल्स
५—स्परमेटोजोएड्स
इसके अतिरिक्त वैनर आदि विद्वानों ने पुरुष-वीर्य में सेमिनल
ग्रेन्यूल्स नाम के दाने भी मालूम किये हैं जो कि सेमिनल फिलेमेण्ट
( वीर्य कीटों ) की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। शुद्ध-वीर्य, वीर्य-कीट
और वीर्य के दानों से बना हुआ होता है । कलिकर के मतानुसार
पुरुष-वीर्य का प्रत्येक जन्तु १/६०० इंच का होता है । इन
जन्तुओं का अगला भाग चिपटा और गोला होता है; पिछला भाग
लम्बा और पतला होता है । सिर की लम्बाई १/१०००० इंच और
चौड़ाई भी उतनी ही होती है । इनके सिर की जड़ में एक बहुत
ही नाजुक और बारीक तार भी होता है, जो इसके आकार से