रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
४. परिच्छेद १३-१५: वाजीकरण कल्प, यौवन-सुरक्षा, काम-चिकित्सा एवं ग्रन्थ उपसंहार
३२८ असली कोकशास्त्र
मरिच्यादि तैल बनाने की विधि
काली मिर्च, निसोथ, दातूर्णी, आक का दूध, गोबर का रस,
देवदारु, दोनों हल्दी, छड़, कूट, रक्तचन्दन, इन्द्रायन की जड़,
नागरमोथा, वायविडंग, पमार, सिरस की जड़, कलौंजी, हरताल,
मैनसिल, कनेर की जड़, चित्रक, कलिहारी की जड़, कुड़े की छाल,
नीम की छाल, सतौप की छाल, गिलोय, थूहर का दूध, किरमाला
की गिरी, खैरसार, बावची, वच, मालकांगनी, इन सबको दो-दो
टके भर, सिंघी मुहरा चार टके भर, कड़वा तेल चार सेर, गो-
मूत्र सोलह सेर इन सब चीजों को मधुर आँच से पकावे । जब
तेल मात्र रह जाय, तब उतार कर छान ले । और फिर उसी तेल
की मालिस करे तो प्रसूत रोग अच्छा हो जाता है । यह तेल भी
वायु का नाश करने में एक ही है ।
असली कोकशास्त्र ३२६
प्रसूत ज्वर
यह ज्वर स्त्रियों को प्रसवकाल में असंयम के कारण होता है।
इसमें हड़फूटन होती है, प्यास अधिक लगती है, हरवक्त ज्वर
लगा रहता है, बारम्बार मल-त्याग करना पड़ता है, शरीर भारी
और गरम रहता है। इसके लिए पूर्व लिखित दशमूल का क्वाथ
सबसे अधिक लाभदायक है। अथवा, अजमोदा, जीरा, बंसलोचन
खैरसार, विजयसार, सौंफ, धनियाँ और मोचरस, इन सब चीजों
को बराबर-बराबर लेकर दो-दो तोले की दस पुड़िया बनाकर रख
दे। फिर एक पुड़िया प्रति दिन आधसेर पानी में औटाकर जब
छटाँक भर पानी रह जाय तब छानकर पिलावे। इस दवा का
दस दिन सेवन करने से प्रसूत-ज्वर समूल नष्ट हो जाता है।
यदि गर्भावस्था में ही ज्वर आवे तो रक्तचन्दन, दारवा,
गौरीसर, खस, मुलहठी, महुआ, धनियाँ, नेत्रवाला और मिश्री का
सम भाग लेकर उसका क्वाथ सात दिन तक पिलावे तो ज्वर का
आना बन्द हो जाता है। अथवा मुलहठी, लाल चन्दन, खस,
गौरीसर, कमल की जड़ छः-छः माशे लेकर काढ़ा बनावे और
उसमें शहद और मिश्री मिलाकर सात-आठ दिन तक पिलाने से
ज्वर दब जाता है।
गर्भिणी स्त्री के मस्तक में प्रायः झनझनाहट होती है और
मूर्च्छा सी हो जाया करती है। ऐसी दशा में गर्भिणी को चारपाई
३३० असली कोकशास्त्र
पर चित्त सो जाना चाहिए और सिर के नीचे तकिया न रखना
चाहिए । उसे अपने कपड़ों को भी ढीला कर देना उचित है । मुख
पर ठण्डे पानी के छींटे लगाने से विशेष लाभ होता है ।
एक रोग गर्भिणी को और होता है । यह प्रायः छठे महीने
से लेकर बालक उत्पन्न होने तक होता है । इसमें गर्भिणी की नसें
बनने लगती हैं । इस लिए जब नसों में तनाव मालूम हो, तब
उसे कपड़े से कसकर बाँध देना चाहिए और अफीम के रस से
सेंक कर फिर नमक की पोटली से या बोतल में गरम पानी भर कर
सेंकना उचित है ।
असली कोकशास्त्र ३३१
मूर्च्छा रोग
यह रोग आधुनिक समय में बहुतायत से पाया जाता है ।
इसके लक्षण नाम ही से प्रकट हैं । किन्तु दुःख की बात है कि
आजकल लोग इसे भूत, प्रेत, असुर, चुड़ैल समझने लग गये हैं ।
यद्यपि यह भाव अब दिन पर दिन कम होता जा रहा है, तथापि
इसका प्रचार इतना बढ़ गया था कि अब भी ऐसे लोगों की संख्या
बहुत ही अधिक है । इस रोग के लक्षण ये हैं:—
१—सिर में भारीपन रहता है ।
२—आँखों की भौंहों में इतनी पीड़ा होती है, मानों कोई कील
ठोक रहा है । बिना कारण ही आँखों में आँसू भरे रहते हैं ।
३—मन सदा उदास रहता है, कोई काम करने का जी नहीं
चाहता ।
४—यदि पास में कोई न रहे, तो बहुत ही आराम मिलता
है । किसी से बातें करना जवाल मालूम होता है ।
५—कण्ठ रुक जाता है और उसमें गोला सा जान पड़ता है ।
इसी गोले के उठने से प्रतीत होता है कि मूर्च्छा आनेवाली है ।
६—हृदय में धड़कन हुआ करती है । साँस की गति भी तेज
पड़ जाती है ।
७—बायीं पसली में दर्द होता है ।
८—छाती में बहुत कष्ट मालूम होता है, मानों वहाँ का माँस
३३२ असली कोकशास्त्र
ही गला जा रहा है ।
९—डकारें बहुत आती हैं और पेट में मरोड़ हुआ करता है ।
आँतें सदा गड़गड़ाया करती हैं ।
१०—शरीर की सब नसें दुखती रहती हैं। कभी किसी जगह
पीड़ा रहती है, कभी किसी जगह ।
११—शरीर ऐंठ कर तन सा जाता है ।
१२—कभी-कभी सफेद पेशाब बहुत उतरता है ।
१३—किसी-किसी दिन पेट में अफरा जान पड़ता है और
वायु गड़गड़ा कर आँतों तक आ जाती है । इस समय कण्ठ भी
रुक सा जाया करता है । किसी दिन पेट इतना फूल आता है कि
गर्भ का सा मालूम होने लगता है ।
अच्छी पहचान इस रोग की यह है कि रोगी देव-मन्दिर आदि
में जाने से हिचकता है और यदि चला भी जाता है तो उसका
अपना कण्ठ घुटता सा और छाती गिरती सी जान पड़ती है ।
बाजा इत्यादि के शब्द सुनकर उसे मूर्छा आ जाती है अथवा वह
चिल्लाने लगता है । हवादार जगह में बैठने को जी चाहता है ।
यह रोग अधिकतर उन स्त्रियों को होता है जिनका गर्भ बार-
बार गिर जाता है या जल्दी-जल्दी सन्तान होती है या जिन स्त्रियों
को शोक अधिक रहता है । स्पष्ट रीति से यों समझना चाहिए कि
जिन कारणों से निर्बलता आती है उन्हीं कारणों से यह मूर्छा रोग
भी उत्पन्न होता है ।
असली कोकशास्त्र ३३३
इसका सबसे उत्तम और सरल उपाय यही है कि गर्भाशय को
ठीक करके शुद्ध कर देना चाहिए। यदि रजोधर्म ठीक समय पर न
होता हो तो उसका यत्न करना भी आवश्यक है। यह रोग कभी-
कभी अविवाहिता कन्याओं को भी हो जाता है, किन्तु बहुधा यह
रोग ऐसी स्त्रियों को होता है, जो ब्याही हुई होती हैं और बाँझ
होती हैं। पति-शोकाकुल स्त्री को भी यह रोग हो जाया करता है।
इस रोग में दूध के साथ पान का रस मिलाकर देना बड़ा ही
लाभदायक है। अथवा बादाम को खूब महीन पीस कर दूध में
मिला दे और ऊपर से थोड़ा सा शुद्ध गुलाबजल डालकर पिलावे।
गर्भावस्था में स्त्रियों के मसूड़े और दाँत अक्सर दुखते हैं।
कितनी ही स्त्रियों का प्रत्येक गर्भ में एक दाँत गिरता जाता है।
इसका उपाय यह है कि जब दाँतों में दर्द जान पड़े तब रूई से
कान बन्द कर लेना चाहिये। यदि इससे अच्छा न हो तो लौंग के
तेल में रूई भिगोकर दाँत में रक्खे या मसूड़ों पर पोत दे। मसूड़ों
पर उसी समय लगाना लाभदायक होता है; जब मसूड़े में दर्द हो,
अन्यथा नहीं।
यदि मसूड़े में दर्द हो और पेट में गड़बड़ हो तो फौरन दवा
करनी चाहिये। सबसे पहले पेट को शुद्ध कर लेना चाहिये। पहले
कहा जा चुका है कि शोधे हुए रेंडी के तेल का जुलाब गर्भिणी
और बच्चे के लिए बड़ा ही उपयोगी है। इस लिए जरा भी पेट
की शिकायत मालूम होने पर उसे यही जुलाब लेकर पेट को साफ
३३४ असली कोकशास्त्र
और हल्का कर डालना चाहिये। यहाँ पर पेट शुद्धी के लिए कुछ
ऐसी ओषधियों का लिखना आवश्यक प्रतीत होता है, जिनका
सेवन करके गर्भावस्था में भी पेट को साफ किया जा सके। क्योंकि
यह समय इतना नाजुक होता है कि जल्द कोई वैद्य जुलाब देने का
साहस नहीं करता और बिना जुलाब के पेट की शिकायतें रफा
नहीं होतीं।
१—रेंडी का तेल दूध में मिलाकर पीना चाहिए ।
२—दो तोले दाख, एक तोला गुलाब के फूल, दो अंजीर
इनको पीसकर चटनी बना ले ओर तीसरे-चौथे दिन सुपारी भर
खा लिया करे। यदि आवश्यकता समझे तो सोते समय थोड़ा सा
अधिक खाले।
३—रोटी के साथ शहद या खाँड़ खाने से भी पेट की शिकायत
दूर होती है। क्योंकि खांड़ भी दस्तावर चीज है।
४—पके अंगूर ओर भुने हुए सेब से भी कब्ज दूर होता है ।
५—सुपारी, बड़ी हड़ का छिलका, बबूल की कोंपल, इन सब
को एक-एक तोला लेकर तीन पाव पानी में ओटावे। जब छटाँकभर
पानी रह जाय तब उतार ले जितने दस्त लेना चाहे, उतनी ही
बार कपड़े से इस काढ़े को छानकर पी ले । जितनी बार छाना
जायगा, उतने ही दस्त आवेंगे यह निश्चय है। यह जुलाब सबसे
अच्छा है।
—:*:—
असली कोकशास्त्र ३३५
गर्भिणी की वायु
पाँच या सात बादाम के बीज और एक माशे गेहूँ की चोकर
प्रतिदिन खाने से वायु का कोप गर्भिणी स्त्री को कभी नहीं होता ।
यदि मूत्र न उतरता हो तो दाब की जड़, दूब की जड़ और
काँस की जड़ इनको थोड़ा सा लेकर दूध में औटावे और फिर
उसे पी जाय । इससे गर्भिणी को बिना किसी प्रकार के कष्ट के
पेशाब उतर जाता है ।
—०—
संग्रहणी
यदि भोजन न पचे, खाते ही दस्त हो जाय तो चावल का
सत्तू आम और जामुन के छिलके के काढ़े से खाना चाहिए । इससे
बहुत शीघ्र जठराग्नि ठीक होकर अपना काम करने लगती है ।
—:०:—
गर्भिणी को वमन
जब गर्भाधान हो जाता है, तब बहुधा स्त्रियाँ वमन करने
लगती हैं । इसमें गेरू को आग में गरम करके थोड़े से पानी में
बुझाकर वही पानी पीना चाहिए । या कपूरकचरी को पीसकर मूँग
के बराबर गोली बनाकर सेवन करे अथवा वट-वृक्ष की डाँढ़ी
जलाकर उसकी राख शहद में मिलाकर चाटे ।
३३६ असली कोकशास्त्र
गर्भिणी के पैरों की सूजन
यदि पैर फूल आवें तो थोड़ा-थोड़ा चलने-फिरने का अभ्यास
डालना चाहिए।
—:०:—
दूध बढ़ाने का यत्न
यदि स्तन में दूध कम हो तो भाड़ में गेहूँ कहलवा कर उसीके
बराबर अखरोट के परो मिला गाय के घी में उसकी पूड़ी बनावे
और सात दिन गाय के घी के साथ ही खाया करे। अथवा—गाय
के दूध में थोड़ी सी शतावर और खाँड़ मिलाकर पिया करे।
—:०::०:—
स्तन-रोग
माता के दूध में विकार रहने से बच्चों का स्वास्थ्य बिगड़ जाता
है; इस लिए दूध की परीक्षा कर लेना बालक की रक्षा के लिए
अत्यन्तावश्यक है। दूषित दूध की पहचान यह है:—जिस स्त्री का
दूध पानी में न डूबे, खट्टा या कड़वा हो, काला या पीला हो,
जिसको गार कर रख देने पर उसमें मलाई सी न पड़े, या जिसमें चींटी
डालने से मर जाय—जीती हुई तैरकर निकल न आवे, ऐसे लक्षणों
से युक्त दूध दूषित होता है। शुद्ध दूध पतला और नीलापन लिए
२२ असली कोकशास्त्र ३३७
हुए होता है। निर्दोष दूध मीठा होता है और उसमें मलाई पड़
जाती है। इस प्रकार दूध की परीक्षा करने पर यदि वह दूषित
प्रमाणित हो तो उसे औषधियों द्वारा शुद्ध करने की चेष्टा करनी
चाहिए और जब तक वह पूर्ण रीति से शुद्ध न हो जाय तब तक
बालक को स्तन-पान न करावे। किसी अच्छी शुद्ध दूध वाली दाई
का दूध पीने का प्रबन्ध कर दे। दाई ऐसी ही होनी चाहिए जिसकी
गोद में उतने ही दिनों का बालक हो, जितने दिन के बच्चे को दूध
पिलाना हो। दस-पाँच दिन न्यूनाधिक की तो बात दूसरी है, पर
अधिक दिनों का अन्तर रहना ठीक नहीं। कारण यह कि ज्यों-ज्यों
दिन बीतता जाता है त्यों-त्यों दूध गाढ़ा होता जाता है। इस लिए
यदि बच्चा दो महीने का हो और दूध पिलाने वाली दाई को छः
सात महीने प्रसविणी हुए हो गये हों तो उसका दूध पिलाने से
बच्चा बीमार पड़ जाता है; क्योंकि उतना गाढ़ा दूध पचाने की शक्ति
उसमें नहीं रहती। ईश्वर की बड़ी ही विचित्र लीला है। वह बच्चे
के बलाबल के अनुसार ही माता के स्तनों में गाढ़ा पतला दूध पैदा
करते हैं। जब बच्चा जन्म लेता है, तब माता का दूध बहुत ही
पतला होता है, फिर ज्यों-ज्यों उसमें ताकत आती जाती है और
पाचनशक्ति बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों दूध भी गाढ़ा होता जाता है।
इस लिए इस बात पर ध्यान देना बड़ा ही आवश्यक है। किन्तु
इतना करने से सब काम समाप्त नहीं हो जाता। जब बच्चे का
दूध पीना छुड़ा दिया जाय, तब माता का कर्त्तव्य है कि वह प्रति
३३८ असली कोकशास्त्र
दिन अपने स्तनों का दूध निचोड़ कर गिरा दिया करे । क्योंकि
स्तन में दूध रह जाने से स्तन पक जाते तथा और भी अनेक तरह
के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। जब दूध स्तन में रह जाता है, तब
माता को बड़ा ही कष्ट होता है। अतएव इसके निचोड़ने में
ढिलाई नहीं करनी चाहिए ।
अब हम दूषित दूध को शुद्ध करने का कुछ यत्न बतलाते हैं ।
मूँग का जूस पीना चाहिए । अथवा भारंगी, दारुहल्दी, वच,
अतीस तीन-तीन माशे पानी में घोटकर पिये । या पाढ़, मूर्वा,
मोथा, चिरायता, देवदारु, इन्द्रजव, कुटकी, इनका काढ़ा पिया करे ।
—०—
थनैला
जो स्त्रियाँ बालकों को दूध पिलाती हैं, उनके स्तनों में कई
कारणों से गाँठ पड़कर फोड़े हो जाते हैं और स्तन पक जाते हैं ।
जैसे, बालक के सिर की चोट लग जाने से गाँठ पड़ जाती है ।
स्तन गीले रहने से फट जाते हैं । रुधिर खराब होने से फोड़ा
निकल आता है । इस लिए यदि बालक के सिर की चोट लग
जाय तो गरम पानी में रुई डालकर सहने लायक गरम रहने पर
धीरे-धीरे सेंक देना चाहिए । स्तनों को गीला न रखना चाहिए ।
यह रोग बड़ा ही कष्टदायक होता है, अतः पहले से ही इसका
इलाज करना चाहिए ।
असली कोकशास्त्र ३३६
यदि थनैला हो जाय तो नागरमोथा और मेथी को बकरी के
दूध में पीसकर लगाना चाहिए । या रेंडी के पते का रस निकाल
कर उसमें कपड़ा भिगो भिगोकर बारम्बार लगाना चाहिए ।
अथवा गुलाब की पत्ती, सेब की पत्ती, मेंहदी की पत्ती और अनार
की पत्ती बराबर-बराबर लेकर खूब बारीक पीस डाले और आग
पर किंचित् गरम करके दिन भर में चार-पाँच बार स्तनों पर
लगाया करे । या सहिजन के पत्त पीसकर लेप किया करे ।
यदि स्तन तड़क गये हों या स्तनों में पीड़ा हो तो ग्लैसरिन
लगा देना चाहिए । अथवा घी में मोम मिलाकर लगा देना चाहिए
अथवा सुहागा दो तोले, गेहूँ का सत सात तोले, पीस-छानकर
स्तन पर मल दे । इस दवा से बालक के मुख में पड़े हुए फफोले
भी जाते रहते हैं ।
—०—
नेत्र रोग
आँखें लाल रहती हों तो छः माशे बकरी के दूध में चार रत्ती
अफीम पीसकर नेत्र के ऊपर लगाना उचित है; किन्तु यह भीतर
जरा भी न जाने पावे, नहीं तो बड़ा कष्ट होगा । या दो रत्ती फिट-
किरी को एक तोले पानी में पीसकर चार-पाँच बूँद आँखों में सुबह-
शाम टपका दिया करे । इससे भी लालिमा मिट जाती है ।
यदि आँखों से पानी गिरता हो और किसी-किसी समय
३४० असली कोकशास्त्र
धुँधला दिखलायी पड़ता हो तो शाम को मिट्टी के नये बर्त्तन में
कुएँ का पानी छानकर रख दे और तड़के उठकर शौचादि से निवृत्त
हो, उसी जल से आँखों पर खूब छींटा लगावे । कम से कम दो-
तीन सेर पानी का छींटा लगाना जरूरी है। घड़ा प्रतिदिन बदलने
की आवश्यकता नहीं। महीने भर के सेवन से नेत्र निरोग हो जाते
हैं और ज्योति भी ठीक हो जाती है। यह दवा हमारी आजमायी
हुई है।
रतौंधी होने पर गाय का घी, मिश्री और काली मिर्च का नित्य
सबेरे सेवन करना चाहिए। यह रोग निर्बलता के कारण मस्तक में
आयी हुई कमजोरी से उत्पन्न होता है; अतः मस्तक की पुष्टि का
इलाज करने से यह रोग दूर होता है। देशी स्याही दवात में से
निकाल कर तीन-चार दिन अंजन लगाने से भी रतौंधी बन्द हो जाती
है। या पान के रस की तीन-चार बूँदें आँखों में टपका देने के
बाद साफ पानी से धो डालने पर भी यह रोग दूर हो जाता है। यह
दवा कम से कम दस-बारह दिन में काम करती है, घबड़ा कर
छोड़ नहीं देना चाहिए ।
—०—
असली कोकशास्त्र ३४१
कान्तिबर्द्धक उबटन
पीली सरसो एक सेर, सफेद चन्दन का चूर्ण एक छटाँक,
बालछड़ एक छड़, नेत्रवाला आधी छटाँक, आम की छाल एक
छटाँक, केशर रुपये भर, चिरौंजी तीन छटाँक, इन सबको कूट-
छानकर रक्खे ओर इसे थोड़ा सा लेकर दुध में पीसकर शरीर में
लगाया करे। इस उबटन से शरीर सुगन्धित रहता है, कांति बढ़ती
है, स्वच्छता रहती है ओर शीघ्र कोई चर्म-जन्य रोग नहीं होता।
—०—
फोड़ा-फुन्सी
रक्त-विकार से ही शरीर में फोड़े-फुन्सियों का निकलना शुरू
होता है। इस लिए सबसे उत्तम बात तो यह है कि रक्त को ही
शुद्ध करने की चेष्टा करनी चाहिए। रक्त के शुद्ध हो जाने पर फोड़े
फुन्सियों की जड़ ही कट जाती है। इसे शुद्ध करने का सबसे सरल
ओर उत्तम उपाय तो यह है कि कोष्ठ-शुद्धि पर विशेष ध्यान रक्खे;
क्योंकि पेट को गड़बड़ी से ही सारे रोगों की उत्पत्ति होती है;
भोजन हल्का, शुद्ध और पचने पर करे। इससे रक्त धीरे-धीरे शुद्ध
हो जाता है। अथवा इसे करते हुए चैत के महीने में शुद्ध मधु का
एक महीना सेवन करे। या उसी महीने में नीम की मुलायम पत्ती
खाकर ऊपर से गाय का धारोष्ण दुध पिये और खट्टी-मीठी तथा
३४२ असली कोकशास्त्र
तिक्त चीजें न खाय । इस प्रकार महीना भर नीम का पत्ती का
सेवन करने से भी रक्त-वि कार दूर हो जाता है ।
यदि फोड़ा निकल आया हो तो तूतमलंगा पानी में फेंट कर
बाँधना चाहिए । यही परीक्षित दवा है । फोड़े को बैठाने में एक
ही चीज है। दिनभर में तीन-चार बार इसकी पुलटिस बदलनी
चाहिए। इसके बांधने से दर्द तो रात भर में ही रफा हो जाती है।
कितना ही बड़ा फोड़ा उभड़ता हो, यदि उभड़ते ही इसकी
पुलटिस बाँधी जाय तो फौरन वह दब जायगा—बढ़ नहीं सकता
और न पीड़ा ही दे सकता है।
यदि छोटी छोटी फुन्सियाँ निकलती हों तो क्यूटीक्यूरा साबुन
लगाकर धोना चाहिए और फिर भेड़ का मक्खन ( सौ पानी से
धोए हुए , में कालीमिर्च फेंटकर लगाना चाहिए । इससे फुन्सियाँ
अच्छी हो जाती हैं और खाज नहीं चलती ।
—:०:—
बवासीर
यह रोग खूनी और बादी दो तरह का होता है । खूनी में
पाखाने के साथ खून गिरता है और बादी में मस्से जोकि गुदा द्वार
पर होते हैं, सूज आते हैं । खूनो में छोटे-छोटे लाल रंग के मस्से
होते हैं, उन्हीं से खून गिरता है । मल त्यागने में बड़ा कष्ट होता
है । कभी-कभी मल त्याग के समय लाल रंग की भीतर की आँत
असली कोकशास्त्र ३४३
भी बाहर निकल आती है। खूनी में मनुष्य निर्बल बहुत हो जाता
है, परन्तु बादी की अपेक्षा इसमें पीड़ा कम होती है। दोनों तरह
के बवासीर होने के मूल कारण हैं, कब्ज रहना, अधिक बैठना,
तिक्त और गरिष्ठ चीजें खाना तथा खाने-पीने और मल-त्याग आदि
में व्यतिक्रम करना।
सूजे हुए मस्सौं के लिए अखरोट के तेल में रुई भिगोकर गुदा
में रखना लाभदायक है। इससे मस्से जल जाते हैं और इस रोग
से छुटकारा मिलता है।
गेंदे की पत्ती, काली मिर्च के साथ घोंटकर पीने से भी
बवासीर अच्छा हो जाता है।
थूहर-वृक्ष का दूध ६ छटाँक और हल्दी ३ छटाँक, इन दोनों
को बारीक पीसकर मरहम बना लेना चाहिए। अर्श रोगी मंगल
से शुक्रवार तक, यानी चारो दिन इसी का लेप करे तो नयी पुरानी
बवासीर नष्ट हो जाता है। बवासीर की यों तो सैकड़ों ओषधियाँ
वैद्यक ग्रन्थों में लिखा हैं, पर परीक्षित न होने के कारण व्यर्थ
उनका यहाँ उल्लेख करना हम उचित नहीं समझते।
अस्तु; खास रोगों की कुछ ओषधियाँ लिख दी गयीं। अब
इस प्रकरण को समाप्त करके आगे के प्रकरण में बच्चों के सम्बन्ध
में काम की बातें लिखी जायँगी।
─:०:─
३४४ असली कोकशास्त्र
बालरोग चिकित्सा
माता की लापरवाही या मूर्खता के कारण बच्चे बहुधा रोग-
ग्रस्त हो जाते हैं और कभी-कभी मर भी जाते हैं। इस लिए इस
प्रकरण में साधारण घरेलू चिकित्सा की मोटा-मोटी बातें लिख
देना माताओं के लिए बहुत ही उपयोगी होना सम्भव है । यद्यपि
बालक के रोगों की चिकित्सा करना बड़ा ही असाधारण काम है
और वह हम लोगों के समान मनुष्यों का काम भी नहीं है तथापि
यह विषय इस पुस्तक का मुख्य अंग होने के कारण प्राचीन ग्रन्थों
के आधार पर कुछ बातें लिखी जा रही हैं ।
सबसे पहले बालक का रोग समझना आवश्यक होता है ।
आयुर्वेद शास्त्र में दो खण्ड हैं; एक निदान खण्ड है और दूसरे का
नाम चिकित्सा खण्ड है । निदान खण्ड में रोग पहचानने की
विधियाँ, रोगों के लक्षण आदि हैं और चिकित्सा खण्ड में रोगों
के प्रतिकार के उपाय बतलाये गये हैं । आयुर्वेद की इस प्रणाली
से मालूम होता है कि पहले निदान है और पीछे चिकित्सा । ऐसे
भी देखने से निदान ही पहली वस्तु मालूम होती है । यदि यही न
मालूम होगा कि रोग क्या चीज है, तो फिर इलाज क्या किया जा
सकता है ? इस लिए माताओं का कर्तव्य है कि पहले वे बच्चे का
रोग खूब सावधानी से जानने की चेष्टा करें। आजकल की मातायें
बहुधा बच्चों के बीमार पड़ते ही दवा देने की ओर ध्यान न देकर
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० १३
पहला महीना
चित्र नं १४
दूसरा महीना
(इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित अथवा सुपाठ्य पाठ उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ/फ्लाईलीफ है।)
असली कोकशास्त्र ३४५
टोना , नजर, ग्रह, भूत, प्रेत आदि के भ्रम में पड़ जाती हैं । परि-
णाम यह होता है कि ठीक उपचार न होने के कारण वे बच्चे से
हाथ धो बैठती हैं । भला भूख लगी हो और कै होने की दवा दी जाय,
यह कहाँ की बुद्धिमानी है ? हमारे देश में ऐसे ही अट-सट यत्न
किये जाते हैं । किन्तु यह बात उचित नहीं है । सुश्रुत आदि मह-
र्षियों ने स्पष्ट लिखा है कि किसी प्रकार के असुख का मूल कारण
जानकर उसकी दवा करनी चाहिए । सब रोग औषधियों से ही
शान्त होते हैं ।
सुश्रुत संहिता में लिखा है कि अधिकार अपवित्रता के कारण
ही बच्चे रोग के शिकार बनते हैं । कारण यह कि उसका स्वभाव
अत्यन्त सुकुमार होता है, अतएव मामूली गन्दगी भी उनके रोग
का कारण हो जाती है । इसीसे आचार्यों ने इस बात पर बारम्बार
जोर दिया है कि बच्चों की सफाई की ओर पूरा ध्यान रखना
चाहिए । सौर में नीचे लिखी बातों पर यदि ध्यान रक्खा जाय तो
बच्चे जल्द बीमार नहीं पड़ सकते ।
१—गन्दी हवा न जाने दे तथा सोर के घर में किसी प्रकार
की गन्दगी न करे । शुद्ध वायु को रोके भी न
२—बहुत ही सावधानी से नालोच्छेदन किया जाय, ताकि
उसमें कोई रोग उत्पन्न होने की सम्भावना न रहे ।
३—बालक पैदा होने के बाद ही उसको एक दस्त कराया
जाय और उसके अंग-प्रत्यङ्ग की सफाई बहुत ही सावधानी से