रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
पृष्ठ 269, कुल 440 में से
संदर्भ में पढ़ें१७ असली कोकशास्त्र २५७
प्रसव-पीड़ा शुरू होने पर चतुर दाई को चाहिए कि वह अपना
हाथ गरम पानी से खूब साफ करके भीतर डालकर आँवल को
रोक दे और बच्चे को पहले बाहर निकल आने दे ।
कभी-कभी गर्भ में एक से अधिक बच्चे भी रहते हैं । इसमें
भी दाई को खूब सावधानी से काम लेना चाहिए । क्योंकि इसमें
भी प्रसुता को बहुत कष्ट होता है ।
—o—
नवजात शिशु
बालक उत्पन्न हो चुकने पर दो बातों की ओर ध्यान देना
चाहिए । एक तो उसके रोने पर और दूसरे मल-त्याग पर । बच्चा
पैदा होते ही रोने लगता है । यह उसकी स्वास्थ्यता की खास
पहचान है । रोने से यह सूचित होता है कि उसके फेफड़े हवा से
भर गये और श्वासप्रच्छ्वास क्रिया आरम्भ हो गयी । यदि बालक
न रोवे तो समझना चाहिए कि अभी वह हाँफ रहा है ।
बच्चे के पैदा होते ही सबसे पहले उसके गले के नाल को
देखना उचित है । बहुधा बच्चों के गले में नाल (नार) लिपटा
हुआ आता है । इस लिए यदि वह लिपटा हुआ हो तो उसे छुड़ा
देना चाहिए । कभी-कभी थैली में ही लिपटा हुआ भी बच्चा पैदा
होता है, ऐसी अवस्था में तुरन्त झिल्ली को फाड़कर बच्चा निकाल
लेना उचित है । बाद यह देखे कि बालक हाँफता तो नहीं है । यदि