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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

२७२ असली कोकशास्त्र
समुद्रसोख, कायफल, सालवमिश्री, हंसराज, शकाकुल और सफेद
मुसली ये सब चार-चार तोला बंसलोचन एक तोला, छोटी इलाइची
एक तोला, बादाम पावभर, गरी आधपाव, छुहाड़ा और दाख
आध-आध पाव, घी डेढ़ सेर, आटा डेढ़ सेर और देशी शकर दो
सेर। गोंद को घी में तल कर फुला लेना चाहिए। इन सबको
पंजीरी बनाकर उसमें सफेद मुसली और स्याह मुसली एक सेर,
दखिनी सुपारी, सिरयाली के बीज, गाजर के बीज, बीचबन्द,
मँजीठ, कौंच के बीज, धाय के फूल, पलास की गोंद, इन्द्र जौ,
तेजबल, पीपलामुल, माईं, समुद्रसोख, वायविडंग, देशी आजवायन
तालमखाना, सोंठ, गोखरू, माँजूफल, दालचीनी, मोचरस, कमर-
कस, बबूल की कली, बड़ी इलाइची, असगन्ध सब एक-एक तोला
और संगजराहत तीन तोला इन सबको कूट कपड़छान करके उसमें
डाल दे। बाद यही पंजीरी बलाबल के अनुसार खिलावे। इससे
शीघ्र रक्त-स्राव बन्द हो जाता है।
जब तक स्त्री बच्चा होने बाद पुनः पूर्ववत् रजस्वला होकर शुद्ध
नहीं हो जाती, तब तक उसे प्रसूता ही कहा जाता है। प्रसव के
बाद प्रायः महीने डेढ़ महीने में स्त्रियाँ ऋतुमती होती हैं। बहुत से
लोग सौर में बारह दिन तक रहने को ही प्रसूता मानते हैं; किन्तु
यह उनकी भूल है। आयुर्वेद में लिखा है:—
प्रसूतासार्धमासान्तेदृष्टेवापुनरार्त्तवे ।
अर्थात्—प्रसव के दिन से पैंतालिस दिन पर्यन्त अथवा पुनः

१८ असली कोकशास्त्र २१३
रजस्वला होने तक स्त्री की 'प्रसूत' संज्ञा है ।
इस लिए डेढ़ महीने तक अर्थात् जब तक किसी शास्त्रकारों के
कथनानुसार प्रसूता रहे, उसकी देख-रेख बड़ी ही सावधानी से
करनी चाहिए । सूतिका-गृह को शुद्ध और सुगन्धित रखना चाहिए
तथा प्रसूता के खान-पान की ओर पूरा ध्यान रखना चाहिए ।
पाठिकायें पूछ सकती हैं कि सौर घर को सुगन्धित किस प्रकार
रक्खा जाय ? क्या इत्र इत्यादि से ? नहीं, इच्छा हो तो इत्र से
भी सुगन्धित रक्खे नहीं तो केवल सुगन्धित चीजों की धूनी ही कर
दिया करे । इन चीजों की धूनी कर देने से घर सुगन्धित हो सकता
है:—कपूर कचरी पावभर, चन्दन का चूर्ण पावभर, नागरमोथा
आधापाव, अगर-तगर, लाल चन्दन, गिलोय ढाई-ढाई तोला,
गुग्गुल पाँच तोला, मँजीठ छः माशा, देवदारू एक तोला, मखाना
दो तोला, दालचीनी एक तोला, लौंग एक तोला, ओर बड़ी
इलायची एक तोला इन चीजों को कूट कर गाय का घी, देशी खाँड़
और शहद मिलाकर रख दे । और उसमें से थोड़ा आग में डालकर
धुआँ करके सूतिका-गृह को सुगन्धित कर दिया करे ।
हमारे यहाँ सूतिका-गृह में बहुधा हर समय भीड़ सी लगी
रहती है; स्त्रियाँ बारी-बारी से प्रसूता के पास बैठकर व्यर्थ की बातें
किया करती हैं । इन कामों से बड़ो ही हानि होती है । एक तो
अधिक आदमियों के रहने से सूतिका-गृह की वायु दूषित हो जाती
है, जिससे नाजुक बच्चे की तन्दुरुस्ती बिगड़ जाती है, दूसरे व्यर्थ

२७४ असली कोकशास्त्र
की बातें सुनने से प्रसूता शान्ति-लाभ नहीं कर सकती, जिससे
बहुत सी लक्षित तथा अलक्षित बुराइयाँ पैदा होती हैं। इस लिए
सूतिका घर में अधिक स्त्रियों को फालतू कभी न रहने देना चाहिए
और न तो किसी को व्यर्थ की गप्पें मारने के लिए ही स्वतन्त्रता
दे रखनी चाहिए। क्योंकि ये दोनों ही विशेष हानिकारक हैं। इस
समय प्रसूता का शान्त और सात्विक भाव रखना बहुत ही
आवश्यक है। इससे बच्चे पर बड़ा ही सुन्दर प्रभाव पड़ता है।
कोई यह न समझे कि बच्चे इस वक्त कुछ सीखते ही नहीं।
—:०:—
गर्भ में बालक को शिक्षा
यह बात पहले कही जा चुकी है कि माता जैसा आचरण
करती है, वैसा प्रभाव गर्भस्थ बच्चे पर पड़ता है। गर्भ में बालक
को माता जितनी शिक्षा दे सकती है और उस शिक्षा का जितना
असर पड़ सकता है, उतनी न तो और समय में शिक्षा ही मिल
सकती है ओर न उसका उतना असर ही पड़ सकता है। देखिये,
जब अभिमन्यु गर्भ में थे, तब अर्जुन ने उनकी माता से चक्रव्यूह
वर्णन किया था। पूरा वर्णन वह नहीं कर पाये थे कि वे गहरी नींद
में सो गयीं। परिणाम यह हुआ कि चक्रव्यूह के युद्ध में जहाँ बड़े
बड़े योद्धा हृदय में हार मानकर भययुक्त हो गये, वहाँ कुमार
अभिमन्यु बड़ी वीरता के साथ लड़े ओर फाटक पर फाटक जीतते

असली कोकशास्त्र २१५
चले गये । अन्त में उस स्थल पर मारे गये, जिस स्थल का वर्णन
उनके पिता अर्जुन से उनकी माता नहीं सुन पायी थीं । गर्भ के
बच्चों पर इतना प्रभाव शिक्षा का पड़ता है ।
प्राचीन समय में हमारे देश की देवियाँ जिस ढंग के बच्चे
पैदा करना चाहती थीं, उसी ढंग का बालक पैदा करती थीं । ऐसे
बहुत से उदाहरण हमारे प्राचीन ग्रन्थों में पाये जाते हैं कि एक ही
माता ने अपने एक बच्चे को सर्वस्वत्यागी बनाया, दूसरे को नीति-
कुशल बनाया और तीसरे को शिल्प-कला में दक्ष ! वे माताएँ
जिस गुण वाली सन्तान पैदा करना चाहती थीं, गर्भ धारण करने
पर मनोयोगपूर्वक उसी विषय की बातें सुन, समझ, पढ़ और
विचार कर गर्भ के बालक पर प्रभाव डालती थीं ; किन्तु दुःख है
कि आज हमारी माताओं में वे बातें नहीं रह गयीं ओर न उक्त
विषय की जानकारी ही रह गयी ।
नैपोलियन बोनापार्ट कितना बड़ा बहादुर था, यह सब लोग
जानते हैं । जब वह अपनी माता के उदर में था, तब उसकी माँ
प्लूटार्क की लिखी हुई जीवनियों और ओसियन वीर-साहित्य को
मन लगाकर बड़े चाव से पढ़ा करती थी । उसकी माँ तेज घोड़े
की सवारी करती, घोड़े तथा अपने पति के अधीन सैनिकों पर रानी
की तरह हुकूमत करती और उन्हें अधिकार में रखती थी । क्या
उसके इन कार्यों का प्रभाव उसके गर्भस्थ बच्चे पर न पड़ा होगा ?
जिस समय नैपोलियन गर्भ में था, उसकी माँ अपने पति के

२७६ असली कोकशास्त्र
साथ लड़ाई पर गयी थी। दिनभर युद्ध करने के बाद जब उसके
पति आते थे, तब वह लड़ाई का सारा हाल पूछा करती थी।
इस प्रकार वह अपने पति के मुख से युद्ध-क्षेत्र की वीरता-पूर्ण
घटनाओं को बड़े प्रेम से सुना करती थी। इन बातों को देखते हुए
कौन कह सकता है कि माता के कार्यों का प्रभाव गर्भस्थ बालक
पर नहीं पड़ता ?
सन्तान के लिए माता का उदर महाविद्यालय के समान है।
अथर्व वेद में लिखा है:—
ब्रह्मचारी जनयन्ब्रह्मागोलोकप्रजापतिं परमेष्ठिनं
विराजम् । गर्भो भूत्वामृतस्ययोना विन्द्रोहंभूत्त्वास-
सुरांस्ततर्ह ॥
जो ज्ञानामूल के केन्द्र-स्थान में गर्भरूप रहकर ब्रह्मचारी हुआ,
वही ज्ञान, कर्म, जानता, प्रजापालक राजा और विशेष तेजस्वी
परमात्मा को प्रकट करता हुआ इन्द्र बनकर अवश्यमेव राक्षसों
का नाश करता है।
अस्तु ; इस विषय पर एक नहीं सैकड़ों-हजारों उदाहरण दिये
जा सकते हैं कि गर्भस्थ बालक पर कैसा-कैसा प्रभाव पड़ा है और
पड़ता है ; किन्तु अधिक प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं। यहाँ पर
एक बात का और ध्यान रखना चाहिए। वह यह कि जिस प्रकार
उत्तम शिक्षाओं का प्रभाव गर्भस्थ बालक पर पड़ता है, उसी प्रकार

असली कोकशास्त्र २७७
कुशिक्षाओं का भी। जो माता इस बात पर ध्यान नहीं रखती और
टेढ़ा-मेढ़ा कार्य किया करती है, उसकी सन्तान किसी भी दशा में
दुर्गुणों से खाली नहीं रह सकती। अब यदि इसके विषय में भी
दो-एक उदाहरण दे दिया जाय तो अनुमानतः लाभदायक ही होगा।
आँखों देखी बात है कि एक जगह स्त्री-पुरुष में बराबर लड़ाई
हुआ करती थी। स्त्री बड़ी फूहड़ थी। कोई भी काम सफाई से
करना तो मानो उसके स्वभाव-विरुद्ध था। यदि कोई पास-पड़ोस
की स्त्री उससे कभी यह कहती कि तुम काम सफाई से क्यों नहीं
करतीं ? तो वह फौरन ही जल-भुन कर खाक हो जाती और दिन-
भर उस स्त्री के प्रति कुछ-न-कुछ बड़बड़ाया करती थी। कहती, —
“चली हैं मुझे सहूर सिखलाने। यह न जानें कहाँ की सहूरदार
हैं।” संयोग से उस स्त्री के लड़का पैदा हुआ। बचपन में बहुत
रोता और छैलाता था। जब पाँच वर्ष का हुआ, तब तो ठीक उसमें
उन सारी बातों का प्रत्यक्ष दर्शन ही मिलने लगा जो उसकी मां में
थीं। वह लड़का बड़ी म्लेच्छता से रहता था। कभी-कभी तो वह
यहाँ तक किया करता था कि कि अपने ही अंगरखे या गमछे पर टट्टी
फिर देता और उसे गठरी की तरह बनाकर दिनभर अपने पास
लिये रहता था। यदि कोई लड़का उसे टोंकता तो वह फौरन ही
बिगड़ खड़ा होता और कहता, —‘ई साला आमको कैता है ओर
आप गू काता है ( खाता ) है।” इतना ही नहीं, वह अपने माँ-बाप
को भी गालियाँ दिया करता था। इस प्रकार हूबहू वह लड़का

२७८ असली कोकशास्त्र
अपनी माँ के समान ही काम करता था और ठीक उसी तरह बातें
भी करता था
वही स्त्री जब दूसरी बार गर्भिणी हुई तो उसके पति का देहांत
हो गया। पति के मरते ही उस स्त्री में अपूर्व परिवर्त्तन हो गया।
दिन-रात रोया करती, न किसी से कुछ बोलना न चालना, अकेले
में बैठी रहती और रह-रह कर 'आह राम' कहा करती थी। अब
उसका झगड़ना बिलकुल ही बन्द हो गया। वास्तव में यदि विचार
पूर्वक देखा जाय तो कभी-कभी मानस पर आकस्मिक चोट लगने
के कारण मनुष्य के स्वभाव में विचित्र ही परिवर्त्तन हो जाता है।
अन्त में उसके गर्भ से कन्या उत्पन्न हुई। तीन वर्ष की अवस्था में
वह लड़की हमेशा और बच्चों से अलग चुपचाप बैठी रहा करती
थी और यदि कोई बालक उसे छेड़ता था; तो वह झट रोने लगती
थी। एकान्त में बैठना उसे बहुत प्रिय था। अब तो वह लड़की
सयानी हो गयी होगी, बिना देखे यह कहना कठिन है कि अब
उसका स्वभाव कैसा है; पर अनुमान से मालूम होता है कि अवश्य
ही वह उसी स्वभाव की होगी।
इस लिए गर्भिणी को उचित है कि वह अपने गर्भस्थ बालक
पर अच्छा संस्कार डाले। जिस विषय की शिक्षा देनी हो, उस
विषय को ध्यान से सोचे-समझे और अपने मन में यह धारणा
रक्खे कि इस विषय की शिक्षा मेरे गर्भस्थ सन्तान को मिल रही
है। यदि बालक को गणित शास्त्र की शिक्षा देनी हो, तो गणित

असली कोकशास्त्र २७६
शास्त्र पर, पदार्थ-विज्ञान की शिक्षा देनी हो तो पदार्थ विज्ञान पर,
खगोल विद्या का धुरन्धर बनाना हो तो खगोल विद्या पर, इति-
हासज्ञ बनाने की रुचि हो तो इतिहास पर, रसायन-शास्त्र का ज्ञाता
बनाना हो तो रसायनशास्त्र पर, आध्यात्मिक शिक्षा देनी हो तो
आध्यात्म-विषय, आयुर्वेद की शिक्षा देनी हो तो आयुर्वेद पर,
योद्धा बनाना हो तो वीरतापूर्ण घटनाओं पर, कृषि-विद्या में प्रवीण
बनाना हो तो खेती के विषय पर ही गर्भिणी को बातें करनी चाहिए,
उसी विषय का चिन्तन करना चाहिए और उसी विषय में मन
लगाना चाहिए ।
यदि गर्भिणी स्त्री शान्ति के साथ रहे, कभी किसी से झगड़ा
न करे, क्रोध न करे, बुरा भाव मन में फटकने न दे, ईश्वर को
समूचे विश्व-ब्रह्मांड का रचयिता और जीवमात्र में शक्ति प्रदान
करनेवाला समझ कर उस पर पूर्ण भक्ति रक्खे, किसी तरह की
कठिनाई पड़ने पर घबड़ा न जाय, हमेशा सत्य बोले, मन में किसी
तरह का कपट छल न रक्खे, झूठ न बोले, प्राणिमात्र पर दया
भाव रक्खे, दीन-दुखियों के प्रति सहानुभूतिसूचक शब्द मुख से
निकाले; कभी किसी को कोई कड़ी बात न कहे, दूसरों की भलाई
करने में सदा तत्पर रहे, गर्भ की रक्षा करते हुए परिश्रम से मुख
न मोड़े, किसी काम में आलस्य न करे, सदा प्रसन्नचित्त रहे,
कृपणता न करे, किसी काम में व्यर्थ खर्च न करे, बड़ों का हमेशा
आदर करे, यदि कोई कुछ कह दे तो प्रसन्नतापूर्वक उसे सहन कर

२८० असली कोकशास्त्र
ले—प्रत्युत्तर में कोई कड़वी बात न कहे, हँसी-दिल्लगी में समय
न बितावे, गम्भीरता से रहे, अधिक व्यसन न करे, सादगी से
रहने में ही अपना गौरव समझे, सदा स्वच्छ रहे, पहले हानि-
लाभ को सोच लिया करे पीछे उस काम को करे, लकटा न लगावे,
स्वदेश, स्वजाति, और स्वकुटुम्ब पर प्रेम रक्खे, चापलूसी न करे,
हर काम में और हर बात में संतोष रक्खे, सदा निर्भीक रहे, सच
बोलने में किसी से न डरे, प्रति दिन सोते जागते ईश्वर का स्मरण
किया करे, प्रत्येक कार्य को नियमित समय पर किया करे,
सात्विक भोजन करे, गन्दे गीत और गन्दी बातें न तो कभी अपने
मुख से निकाले और न कान से सुने, ओछी और तुच्छ बातों पर
ध्यान न दे, सदा ऊँचे ऊँचे विचारों पर मन लगावे, कभी किसी
काम से हताश न हो, अपने मन में बड़े से बड़े काम को बिना
किसी की सहायता के कर डालने की हिम्मत रक्खे, जो काम
सामने आये उसे पूरा करके छोड़े, अपने को तुच्छ न समझे किसी
बात का घमंड न करे, जो बात कहे, उसका पालन करे, तथा सब
के साथ मित्र व्यवहार रक्खे, तो अवश्यमेव उसका बालक सर्व-
गुणसम्पन्न, माता-पिता पर भक्ति रखनेवाला, और देश में
कीर्ति फैलानेवाला, हो सकता है। उक्त बातों पर पूर्ण रीति से
ध्यान देना और तदनुकूल चलाना ही गर्भस्थ बालक को शिक्षा
देना है।
――: : :――

असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ९
वीर्यकीट और रजोकोष का मिश्रण
चित्र नं० १०
प्रथम पक्ष

(इस पृष्ठ पर कोई सुपाठ्य पाठ उपलब्ध नहीं है / रिक्त पृष्ठ)

असली कोकशास्त्र २८१
उत्तम सन्तानोत्पत्ति के लिए स्त्री
शिक्षा का प्रयोजन
उत्तम सन्तान पैदा करने तथा बालकों को उत्तम शिक्षा देने
के लिए स्त्री-शिक्षा की बहुत बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि यह बात
पहले ही लिखी जा चुकी है कि शिशु के लिए माता ही आदि गुरु
है, और शिशु एक बार सबको होना पड़ता है, बाद लोग अन्यान्य
अवस्थाओं में प्रवेश करते हैं, इस लिए माता ही जगत् की आदि
गुरु है। यह कितने दुःख की बात है कि हमारे देश की माताएँ
बिलकुल अशिक्षिता हैं। जिस स्त्री-जाति के ऊपर इतनी बड़ी
जिम्मेदारी है, जो स्त्री-जाति अपने गुण और दोष से समूचे देश को
आनन-फानन समुन्नत और पवित्र बना सकती है, उसकी आज कैसी
शोचनीय दशा हो रही है कि सोचकर हृदय हिल जाता है। गुरु
के अनभिज्ञ होने पर शिष्य के पण्डित होने की आशा करना दुराशा
नहीं तो और क्या है ? यदि आज हमारे देश में स्त्री-शिक्षा का
काफी प्रचार होता, स्त्रियाँ शिक्षिता होतीं, अपने दायित्व को सम-
झती होतीं तो देश की इतनी पतित और घृणित दशा कदापि न
होने पाती। उन्हीं के मूर्खा होने के कारण आज चारों ओर स्कूलों
में, कालेजों में, घरों में, शहरों में, गाँवों में, खेतों में, कारखानों में,
राह में, तीर्थों में, धर्मशालाओं में सब जगह पापाचार हो रहा है।

२८२ असली कोकशास्त्र
सुधारक चिल्लाते चिल्लाते अपने जीवन की आहुति दे रहे हैं, लेखक-
गण लेखनी रगड़ते-रगड़ते आँखें फोड़ रहे हैं; किन्तु फल कुछ भी
नहीं होरहा है। कारण ? कारण यही कि स्त्री-शिक्षा का अभाव !
यदि आज हमारी मातायें शिक्षिता होतीं, तो यह अनर्थ कभी न
होता। क्योंकि वे बचपन से बच्चों को उचित शिक्षा देतीं जिससे
स्वाभाविक ही सब लोग सदाचारी और कर्त्तव्यपरायण होते । 'न
रहता बाँस और न बजती बाँसुरी ।' फिर न तो ऐसे नीचतापूर्ण
कार्य ही होते और न उनके सुधारने की आवश्यकता ही पड़ती ।
बच्चे अपनी माता की देख-रेख में ही अधिक रहते हैं। उनकी
देखभाल जितनी माता कर सकती है, उतनी और कोई नहीं कर
सकता। माताओं की अशिक्षा के कारण बच्चे अपनी तबीयत के
अनुसार खेलते-कूदते और कुसंगति में पड़कर बुरी आदतें डाल
लेते हैं। माताएँ उधर ध्यान नहीं देतीं। यदि उनमें शिक्षा की
कमी न होती और सन्तान-शिक्षा आदि की विधियाँ वे जानती
होतीं तो इस ओर उनका पूरा ध्यान रहता। हरवक्त बच्चों पर
कड़ी नजर रखतीं और अपने पास उन्हें बैठाकर अच्छी-अच्छी
बातों की शिक्षा देतीं। उस अवस्था में बचपन से ही प्रत्येक जीवन
आदर्श के साँचे में ढला हुआ निकलता और एक अपूर्व ही दृश्य
दिखलायी पड़ता। तब न तो देश में इतना दुराचार ही फैला हुआ
दिखलायी पड़ता और न इस प्रकार के शक्तिहीन और अल्पायु
मनुष्य ही होते। महाकवि कालिदास ने लिखा है—

असली कोकशास्त्र २ : ३
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।
स्माइल्स ने लिखा है कि,—“भावी सन्तान की स्वास्थ्यरक्षा
का भार ईश्वर की ओर से खियों को ही सौंपा गया है। शारीरिक
स्वास्थ्य में ही चरित्र-बल और मानसिक शक्ति की पवित्रता
निहित है ।
किन्तु आज ऐसी कितनी खियाँ हैं जो ईश्वर की ओर से सौंपे
गये इस भार को वहन करने में समर्थ हैं ? वे इस बात को जानतीं
ही नहीं कि किस प्रणाली से सन्तान का पालन तथा उनकी शिक्षा
का विधान होना चाहिए । इस लिए कभी-कभी अपनी सन्तान की
भलाई करती हुई भी वे अपनी अनभिज्ञता के कारण उसकी बुराई
कर डालती हैं। सभी माताएँ यह चाहती हैं कि हमारे बच्चे
सुन्दर हों, दस में गिने जाने के लायक हों, दीर्घजीवी हों । इसके
लिए अपनी-अपनी विद्या-बुद्धि के अनुसार वे कोई यत्न उठा भी
नहीं रखतीं; किन्तु जिस बात को वे स्वयं नहीं जानतीं, उसमें वे
बेचारी क्या कर सकती हैं ? अपनी इस अनभिज्ञता के कारण
आज वे भी महान दुःख भोग रही हैं। एक तो नासमझी के कारण

२८४ असली कोकशास्त्र
शक्ति उठा न रक्खें। पुरुष सन्तान-पालन विधि को जानते हुए भी
लापरवाही कर सकता है, पर स्त्री ऐसा कभी भी नहीं कर सकती,
यह निश्चय है।
हाय ! सन्तान-पालन ही स्त्रियों का मुख्य कर्त्तव्य है और उसे
ही वे अबलायें नहीं जानतीं। एक वंगीय विद्वान ने लिखा है:—
“मातृत्व ही नारी-जीवन का प्रधान उद्देश्य और चरम लक्ष्य है।
उनके लिए सबसे बढ़कर गौरव की बात यही है कि वे मातायें हैं।
गर्भ-धारण तथा सन्तान-पालन से बढ़कर महत्त्वपूर्ण कार्य नारी-
जीवन के लिए दूसरा नहीं है; क्योंकि इन्हीं दो बातों से सृष्टि की
रक्षा होती है। इसीसे इनका महत्त्व और गौरव भी अधिक है।
किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि हिन्दू-जाति आज
अपनी कन्याओं को इस योग्य होने ही नहीं देती कि वे समय आने
पर सच्ची माताएँ बन सकें और माता की तरह जीवन यापन कर
सकें। क्या यह समाज के लिए अत्यन्त लज्जा की बात नहीं है ?
नाथ ! प्रभो !! भगवान !!! वह दिन कब आवेगा, जब हिन्दू जाति
को अपनी यह भद्दी भूल स्पष्ट रीति से दिखलायी पड़ेगी, और वह
इस त्रुटि को दूर करने के लिए स्त्री-शिक्षा प्रचार करने में जी-जान
से, कमर कसकर तैयार होगी ? क्या देश की दुर्दशा की आह भरी
पुकार तुम्हारे कानों तक अभी भी नहीं पहुँची ? कितना सतावोगे
जगदीश्वर ! तुम्हारे इस प्रकार सोते रहने से इस अनाथ देश की
रक्षा कौन करेगा दीनबन्धु ! क्या कलि के प्रभाव से तुम भी असमय

असली कोकशास्त्र २८५
में ही सोने लग गये ? तुम तो प्रलयकाल में सोया करते थे, फिर
यह क्या कह रहे हो ? क्या सृष्टि का काम करते-करते तुम्हें भी
थकायी आ गयी ? किन्तु वेद तो कहता है कि तुम सदा एक रस
रहते हो ? सब कुछ करते हुए भी अकर्त्ता हो ? जरा इधर भी
निगाहें फेरो लला ! देखो हिन्दू-समाज की दुर्दशा से, दुर्दशा की
भी दुर्दशा हो रही है— वह भी अब चिल्लाने लग गयी है ! यदि
तुम विश्राम ही करना चाहते हो तो करो विश्राम, मुझे कुछ नहीं
कहना है; पर एक बात इस अकिंचन की सुन लो ! यही कि यदि
तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो प्रलय करके चैन से विश्राम करो,
व्यर्थ ही अपने सिर पर पहपट क्यों कराते हो ! तेज-स्वरूप
होकर डरो न नाथ ! अन्धकार तो तुम्हारे दृष्टि-निक्षेप से ही भाग
जायगा । तनिक अपने वचन की ओर निगाहें फेरो:—
यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
—श्रीमद्भगवद्गीता
कहो, अब इससे बढ़कर उपयुक्त समय और कौन सा आवेगा ?
बता दो न ? भारतीय देवियाँ अज्ञता के कारण नाना प्रकार की
यन्त्रणायें भोग रही हैं, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह तथा बेमेल विवाह
का दमन-चक्र जोरों से चारों ओर चल रहा है, दुराचार का प्रचंड

२८६ असली कोकशास्त्र
प्रवाह प्रलय करने के लिए विकराल स्वर में 'हू हू' कर रहा है,
फिर भी अभी तुम किसी अलक्षित समय की प्रतीक्षा कर रहे हो !
उतना ही गुदगुदाओ, जितना नीक लगे लला !
ओफ ! आदि गुरु की खराबी से ही आज हम दासत्व की
श्रृंखला में भी जकड़े हुए हैं। हम में शक्ति नहीं बल नहीं भ्रातृत्व
बन्धुत्व नहीं, देश-प्रेम नहीं, स्वाभिमान नहीं, एक स्वर में बोलने
का साहस नहीं—कुछ भी नहीं ! है एक वस्तु—कायरता ! यदि
हमारी माताओं में बुद्धि होती, जानकारी होती, तो पहले ही से
उनके द्वारा उक्त वस्तुएँ हमें प्राप्त रहतीं ओर अवसर पड़ने पर
सिंह की तरह दहाड़ कर भारतमाता की इकतीस कोटि सन्तान
रण-भूमि में शत्रु पर विजय प्राप्त कर जननी-जन्म-भूमि के नत-
मस्तक को ऊपर उठाने में समर्थ होते। फिर संसार हमारो बोरत
के गीत गाता और हम मस्त कानों से उन गीतों का आनन्द लेते !
पर अभी तो यह सब दुरासा मात्र ही है। जमोन पर रहकर बादल
चाटने की कोशिश करना निरी मूर्खता है। यदि ऐसी अभिलाषा
देशवासियों के मन में हो कि 'हम मरमिटेंगे पर दास बनकर
जोवित कभी न रहेंगे' तो सबसे पहले आवश्यकता इस बात
की है कि देश में स्त्री-शिक्षा का प्रचार किया जाय—ताकि देशमें
वीर, साहसी और स्वाभिमानी बच्चे पैदा हों। किन्तु यदि ऐसा
भाव देशवासियों का हो जाय तो फिर दासता टिक ही कैसे सकती
है। ऐसी अभिलाषा तो वार साहसो देश के लोग ही कर सकते हैं।

असली कोकशास्त्र २८७
याद रहे कि सारे विषयों की शिक्षा केवल माता से ही
प्राप्त हो जाती है। शिशु के जीवन पर माता का ही प्रभाव सबकी
अपेक्षा अधिक पड़ता है। यदि माता पढ़ी-लिखी हो तो वह गर्भ से
लेकर पाठशाला या स्कूल में जाने के योग्य होने तक अपने बच्चे
को इतनी शिक्षा दे सकती है, कि उस बच्चे को देखकर लोगों को
दंग रह जाना पड़े। जिस प्रकार बालक थोड़ी ही उम्र में सुनते-सुनते
अपनी मातृभाषा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार वह बड़ी
बड़ी बातों को आसानी से माता के पास रहकर ही सीख सकता
है। बचपन में पड़े हुए संस्कार कितने पुष्ट होते हैं, यह किसी से
बतलाने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि इस बात को सभी लोग
जानते हैं कि कोई भी वस्तु कोमल रहने पर ही अपनी इच्छा के
अनुकूल मुकायी या बनायी जा सकती है; पर कठोर हो जाने पर
उसके झुकाने का प्रयत्न करना व्यर्थ जाता है—बल्कि कभी-कभी
वह अधिक जोर दे देने के कारण टूट भी जाती है; ठीक यही हाल
मानव-शरीर का है। बचपन में तो चाहे जैसा उसे बनाया जा
सकता है, पर शुद्ध हृदय पर वाहियात के कुसंस्कारों की मैल बैठ
जाने पर कठिन हो जाता है। इस लिए माता का पूर्ण विदुषी होना
जरूरी है। केवल स्तन-पान कराकर बच्चे का पोषण करने और
लाड़-प्यार से उसकी तबियत खुश रखने से ही बच्चे की उन्नति
कभी नहीं हो सकती। बच्चे को योग्य बनाने के लिए माँ की
सहायता मिलना विशेष प्रयोजनीय है।

२८८ असली कोकशास्त्र
रामायण और महाभारत के उपाख्यान हमारे देश की स्त्रियों
को अत्यन्त प्रिय हैं। इन दोनों को छोड़कर गार्हस्थ्य-धर्म की शिक्षा
देनेवाले ऐसे उत्कृष्ट ग्रन्थ इस देश में अन्य नहीं। सीता और
सावित्री के दुःख, दमयन्ती और चिन्ता का पातिव्रत्य एवं नाना
प्रकार के कष्टों के विवरण आँसुओं से लिखे गये हैं। इन कथाओं
को पढ़कर स्त्रियों का स्वाभाविक कोमल हृदय पिघले बिना नहीं
रहता। उपन्यासों के पढ़ने से भी कितनी ही बार कारुणिक घटनाओं
पर आँख से आँसु लुढ़क पड़ते हैं। किन्तु पौराणिक कथाओं और
वर्त्तमान उपन्यासों में अन्तर है। आधुनिक लेखक-मण्डली कहीं-
कहीं केवल पाठकों के मन में कष्ट को जागृत करने के लिए ही
किसी परिवार की घटना का वर्णन करते हैं, केवल दुःख-पूर्ण घट-
नाओं को पढ़कर मन में दुःख पैदा करने से क्या लाभ ? जिस
प्रकार छोटे लड़के उड़ने और फुदकने वाले जन्तुओं को पकड़ कर
उनके पंख और पैरों में खोदकर आमोद पाते हैं, आजकल के अधि-
कांश लेखक भी उसी प्रकार किसी सुन्दरी युवती या युवक के एक
दुःख से दूसरे दुःख में पड़ने के दास्तान को कारुणिक भाषा में
वर्णन कर सन्तुष्ट होते हैं। किन्तु इस प्रकार दुःखद घटनाओं से
क्या लाभ ? यदि धर्म के लिए अथवा किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के
लिए कोई आत्मोत्सर्ग करे और कष्ट भोगे, तब तो उस घटना से
पाठक-पाठिकाओं का मन समुन्नत होता है और हृदय में धर्मभाव
उत्पन्न हो जाता है, अन्यथा कुछ नहीं। स्वामी को प्राप्त करने के

१६ असली कोकशास्त्र २८६
लिए बेहुला अथवा सावित्री ने जिन कष्टों को स्वीकार किये थे,
उन्हें पढ़कर किस स्त्री का मन विस्मय और उच्च भावों से पूर्ण नहीं
हो उठेगा ? कोई तो पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए बन
गया है, कोई बाल्यावस्था में ही सर्वस्वत्यागी योगी होकर ईश्वरा-
राधन में प्रवृत्त हुआ है और किसी ने नाना प्रकार के ऐश्वर्य-प्रलो-
भनों को पैरों से ठुकरा कर पातिव्रत्य-धर्म का पालन करके जगत्
के सामने अपने को रख दिया है । किन्तु आजकल के उपन्यासों में
कहीं तो बहू ने अपनी सास को विष देकर निष्ठुरतापूर्वक मार डाला
है और कहीं सास ने ही बहू की हत्या की है । ऐसे वृत्तान्तों को
पढ़ने या सुनने से क्षणभर के लिए उत्तेजना या कष्ट हो सकता है,
किन्तु इनसे लाभ कुछ भी नहीं हो सकता । इस लिए स्त्री-समाज
को उत्तमोत्तम शिक्षाप्रद ग्रन्थों का अवलोकन करना चाहिए ओर
अच्छे-अच्छे उपाख्यानों को आपस में कहना-सुनना चाहिए ।
अब हम यहाँ पर थोड़ा-सा इस बात पर भी विचार करेंगे कि
स्त्री-शिक्षा किस ढंग की होनी चाहिए। वास्तव में यह विषय बड़ा
ही कठिन है। यहाँ की विद्वन्मण्डली अभी तक एक राय नहीं हो
सकी है। इस लिए अभी हम सिर्फ इतना ही कहेंगे कि स्त्रियों में
प्रत्येक विषय की साधारणतया जानकारी होनी चाहिए । जैसे,
गणित का साधारण ज्ञान भी होने से वे अपने बच्चों को हँसाते-
खेलाते, गिनती, पहाड़ा, सवैया, पौना, ड्योढ़ा, जोड़, बाकी आदि
जबानी पढ़ा सकती हैं, साथ ही छोटे-छोटे हिसाब भी बतला सकती