महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३१४-
चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
यक्षका चारों भाइयोंको जिलाकर धर्मके रूपमें प्रकट हो युधिष्ठिरको वरदान देना
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते यक्षवचनादुदतिष्ठन्त पाण्डवाः ।
क्षुत्पिपासे च सर्वेषां क्षणेन व्यपगच्छताम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर यक्षके कहते ही सब पाण्डव उठकर खड़े हो गये तथा एक क्षणमें ही उन सबकी भूख-प्यास जाती रही ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
सरस्येकेन पादेन तिष्ठन्तमपराजितम् ।
पृच्छामि को भवान् देवो न मे यक्षो मतो भवान् ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**इस सरोवरमें एक पैरसे खड़े हुए, किसीसे भी पराजित न होनेवाले आपसे मैं पूछता हूँ—आप कौन देवश्रेष्ठ हैं? मुझे तो आप यक्ष नहीं मालूम होते ॥ २ ॥
वसूनां वा भवानेको रुद्राणामथवा भवान् ।
अथवा मरुतां श्रेष्ठो वज्री वा त्रिदशेश्वरः ॥ ३ ॥
आप वसुओंमेंसे, रुद्रोंमेंसे अथवा मरुद्गणोंमेंसे कोई एक श्रेष्ठ पुरुष तो नहीं हैं? अथवा आप स्वयं वज्रधारी देवराज इन्द्र ही हैं? ॥ ३ ॥
मम हि भ्रातर इमे सहस्रशतयोधिनः ।
तं योधं न प्रपश्यामि येन सर्वे निपातिताः ॥ ४ ॥
मेरे ये भाई तो लाखों वीरोंसे युद्ध करनेवाले हैं। ऐसा तो मैंने कोई योद्धा नहीं देखा, जिसने इन सभीको रणभूमिमें गिरा दिया हो ॥ ४ ॥
सुखं प्रतिप्रबुद्धानामिन्द्रियाण्युपलक्षये ।
स भवान् सुहृदोऽस्माकमथवा नः पिता भवान् ॥ ५ ॥
अब जीवित होनेपर भी इनकी इन्द्रियाँ सुखकी नींद सोकर उठे हुए पुरुषोंके समान स्वस्थ दिखायी देती हैं, अतः आप हमारे कोई सुहृद् हैं अथवा पिता? ॥ ५ ॥
यक्ष उवाच
अहं ते जनकस्तात धर्मोऽमृदुपराक्रम ।
त्वां दिदृक्षुरनुप्राप्तो विद्धि मां भरतर्षभ ॥ ६ ॥
**यक्षने कहा—**प्रचण्ड पराक्रमी भरतश्रेष्ठ तात! युधिष्ठिर! मैं तुम्हारा जन्मदाता पिता धर्मराज हूँ। तुम्हें देखनेकी इच्छासे ही मैं यहाँ आया हूँ, मुझे पहचानो ॥ ६ ॥
यशः सत्यं दमः शौचमार्जवं ह्रीरचापलम् ।
दानं तपो ब्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम ॥ ७ ॥
यश, सत्य, दम, शौच, सरलता, लज्जा, अचंचलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य—ये सब मेरे शरीर हैं ॥ ७ ॥
अहिंसा समता शान्तिरानृशंस्यममत्सरः ।
द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रियो ह्यसि सदा मम ॥ ८ ॥
अहिंसा, समता, शान्ति, दया और अमत्सर—डाहका न होना—इन्हें मेरे पास पहुँचनेके द्वार समझो। तुम मुझे सदा प्रिय हो ॥ ८ ॥
दिष्ट्या पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्ट्या ते षट्पदी जिता ।
द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्परायिके ॥ ९ ॥
सौभाग्यवश तुम्हारा शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान—इन पाँचों साधनोंपर अनुराग है तथा सौभाग्यसे तुमने भूख-प्यास, शोक-मोह और जरा-मृत्यु—इन छहों दोषोंको जीत लिया है। इनमेंसे पहले दो दोष आरम्भसे ही रहते हैं, बीचके दो तरुणावस्था आनेपर होते हैं तथा बादवाले दो दोष अन्तिम समयपर आते हैं ॥ ९ ॥
धर्मोऽहमिति भद्रं ते जिज्ञासुस्त्वामिहागतः ।
आनृशंस्येन तुष्टोऽस्मि वरं दास्यामि तेऽनघ ॥ १० ॥
तुम्हारा मंगल हो। मैं धर्म हूँ और तुम्हारा व्यवहार जाननेकी इच्छासे ही यहाँ आया हूँ। निष्पाप राजन्! तुम्हारी दयालुता और समदर्शितासे मैं तुमपर प्रसन्न हूँ और तुम्हें वर देना चाहता हूँ ॥ १० ॥
वरं वृणीष्व राजेन्द्र दाता ह्यस्मि तवानघ ।
ये हि मे पुरुषा भक्ता न तेषामस्ति दुर्गतिः ॥ ११ ॥
पापरहित राजेन्द्र! तुम मनोऽनुकूल वर माँग लो। मैं तुम्हें अवश्य दे दूँगा। जो मनुष्य मेरे भक्त हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अरणीसहितं यस्य मृगो ह्यादाय गच्छति ।
तस्याग्नयो न लुप्येरन् प्रथमोऽस्तु वरो मम ॥ १२ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भगवन्! पहला वर तो मैं यही माँगता हूँ कि जिस ब्राह्मणके अरणीसहित मन्थन-काष्ठको मृग लेकर भाग गया है, उसके अग्निहोत्रका लोप न हो ॥ १२ ॥
यक्ष उवाच
अरणीसहितं ह्यस्य ब्राह्मणस्य हृतं मया ।
मृगवेषेण कौन्तेय जिज्ञासार्थं तव प्रभो ॥ १३ ॥
यक्षने कहा—कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणके अरणीसहित मन्थनकाष्ठको तो तुम्हारी परीक्षाके लिये मैं ही मृगरूपसे लेकर भाग गया था ।।
वैशम्पायन उवाच
ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत ।
अन्यं वरय भद्रं ते वरं त्वममरोपम ॥ १४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—इसके बाद भगवान् धर्मने उत्तर दिया कि (लो, अरणी और मन्थनकाष्ठ) तुम्हें दे ही देता हूँ। देवोपम नरेश! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम कोई दूसरा वर माँगो ।। १४ ।।
युधिष्ठिर उवाच
वर्षाणि द्वादशारण्ये त्रयोदशमुपस्थितम् ।
तत्र नो नाभिजानीयुर्वसतो मनुजाः क्वचित् ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर बोले—हम बारह वर्षतक वनमें रह चुके। अब तेरहवाँ वर्ष आ लगा है। अतः ऐसा वर दीजिये कि इसमें कहीं भी रहनेपर लोग हमें पहचान न सकें ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत ।
भूयश्चाश्वासयामास कौन्तेयं सत्यविक्रमम् ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! यह सुनकर भगवान् धर्मने उत्तरमें कहा—'मैं तुम्हें यह वर भी देता हूँ।' इसके बाद धर्मराजने पुनः सत्यपराक्रमी युधिष्ठिरको आश्वासन देते हुए कहा— ।। १६ ।।
यद्यपि स्वेन रूपेण चरिष्यथ महीमिमाम् ।
न वो विज्ञास्यते कश्चित् त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १७ ॥
'भरतनन्दन! यद्यपि तुम इस पृथ्वीपर इसी रूपसे विचरोगे, तो भी तीनों लोकोंमें कोई भी तुम्हें नहीं पहचान सकेगा ।। १७ ।।
वर्षं त्रयोदशमिदं मत्प्रसादात् कुरूद्वहाः ।
विराटनगरे गूढा अविज्ञाताश्चरिष्यथ ॥ १८ ॥
'कुरुनन्दन पाण्डवगण! मेरी कृपासे तुमलोग तेरहवें वर्षमें गूप्तरूपसे विराटनगरमें रहते हुए किसीसे भी पहचाने न जाकर विचरण करोगे ।। १८ ।।
यद् वः संकल्पितं रूपं मनसा यस्य यादृशम् ।
तादृशं तादृशं सर्वे छन्दतो धारयिष्यथ ॥ १९ ॥
'तथा तुममेंसे जो-जो मनसे जैसा संकल्प करेगा, वह इच्छानुसार वैसा-वैसा ही रूप धारण कर सकेगा ।। १९ ।।
अरणीसहितं चेदं ब्राह्मणाय प्रयच्छत ।
जिज्ञासार्थं मया ह्येतदाहृतं मृगरूपिणा ॥ २० ॥
‘यह अरणीसहित मन्थनकाष्ठ उस ब्राह्मणको दे दो। तुम्हारी परीक्षाके लिये ही मैंने मृगका रूप धारण करके इसका हरण किया था ॥ २० ॥
प्रवृणीष्वापरं सौम्य वरमिष्टं ददानि ते ।
न तृप्यामि नरश्रेष्ठ प्रयच्छन् वै वरांस्तथा ॥ २१ ॥
‘सौम्य! इसके अतिरिक्त तुम एक और भी अभीष्ट वर माँग लो। वह मैं तुम्हें दूँगा। नरश्रेष्ठ! तुम्हें वर देते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २१ ॥
तृतीयं गृह्यतां पुत्र वरमप्रतिमं महत् ।
त्वं हि मत्प्रभवो राजन् विदुरश्च ममांशजः ॥ २२ ॥
‘बेटा! तुम तीसरा भी महान् एवं अनुपम वर माँग लो। राजन्! तुम मेरे पुत्र हो और विदुरने भी मेरे ही अंशसे जन्म लिया है’ ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
देवदेवो मया दृष्टो भवान् साक्षात् सनातनः ।
यं ददासि वरं तुष्टस्तं ग्रहीष्याम्यहं पितः ॥ २३ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पिताजी! आप सनातन देवाधिदेव हैं। आज मुझे साक्षात् आपके दर्शन हो गये। आप प्रसन्न होकर मुझे जो भी वर देंगे, उसे मैं शिरोधार्य करूँगा ॥ २३ ॥
जयेयं लोभमोहौ च क्रोधं चाहं सदा विभो ।
दाने तपसि सत्ये च मनो मे सततं भवेत् ॥ २४ ॥
विभो! मुझे ऐसा वर दीजिये कि मैं लोभ, मोह और क्रोधको जीत सकूँ तथा दान, तप और सत्यमें सदा मेरा मन लगा रहे ॥ २४ ॥
धर्म उवाच
उपपन्नो गुणैरेतैः स्वभावेनासि पाण्डव ।
भवान् धर्मः पुनश्चैव यथोक्तं ते भविष्यति ॥ २५ ॥
**धर्मराजने कहा—**पाण्डुपुत्र! तुम तो स्वयं धर्म-स्वरूप ही हो। अतः इन गुणोंसे तो स्वभावसे ही सम्पन्न हो। आगे भी तुम्हारे कथनानुसार तुममें ये सब धर्म बने रहेंगे ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वान्तर्दधे धर्मो भगवाँल्लोकभावनः ।
समेताः पाण्डवाश्चैव सुखसुप्ता मनस्विनः ॥ २६ ॥
उपेत्य चाश्रमं वीराः सर्व एव गतक्लमाः ।
आरणेयं ददुस्तस्मै ब्राह्मणाय तपस्विने ॥ २७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! ऐसा कहकर लोकरक्षक भगवान् धर्म अन्तर्धान हो गये एवं सुखपूर्वक सोकर उठनेसे श्रमरहित हुए मनस्वी वीर पाण्डवगण एकत्र होकर आश्रममें लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने उस तपस्वी ब्राह्मणको उसकी अरणी एवं मन्थनकाष्ठ दे दिये॥
इदं समुत्थानसमागतं महत्
पितुश्च पुत्रस्य च कीर्तिवर्धनम्।
पठन् नरः स्याद् विजितेन्द्रियो वशी
सपुत्रपौत्रः शतवर्षभाग् भवेत्॥ २८॥
भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवके पुनः जीवनलाभ करनेसे सम्बन्ध रखनेवाले तथा पिता धर्म और पुत्र युधिष्ठिरके संवाद तथा समागमरूप कीर्तिको बढ़ानेवाले इस प्रशस्त उपाख्यानका जो पुरुष पाठ करता है, वह जितेन्द्रिय, वशी तथा पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न होकर सौ वर्षतक जीवित रहता है॥ २८॥
न चाप्यधर्मे न सुहृद्द्विभेदने
परस्वहारे परदारमर्शने।
कदर्यभावे न रमेन्मनः सदा
नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम्॥ २९॥
तथा जो लोग सदा इस मनोहर उपाख्यानको स्मरण रखेंगे; उनका मन अधर्ममें, सुहृदोंके भीतर फूट डालनेमें, दूसरोंका धन हरनेमें, परस्त्रीगमनमें अथवा कृपणतामें कभी प्रवृत्त नहीं होगा॥ २९॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिजीवनादिवरप्राप्तौ
चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ ३१४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकुल आदिके जीवित होने आदि वरोंकी प्राप्तिविषयक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१४॥