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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2110, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2110

यशः सत्यं दमः शौचमार्जवं ह्रीरचापलम् ।
दानं तपो ब्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम ॥ ७ ॥
यश, सत्य, दम, शौच, सरलता, लज्जा, अचंचलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य—ये सब मेरे शरीर हैं ॥ ७ ॥

अहिंसा समता शान्तिरानृशंस्यममत्सरः ।
द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रियो ह्यसि सदा मम ॥ ८ ॥
अहिंसा, समता, शान्ति, दया और अमत्सर—डाहका न होना—इन्हें मेरे पास पहुँचनेके द्वार समझो। तुम मुझे सदा प्रिय हो ॥ ८ ॥

दिष्ट्या पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्ट्या ते षट्पदी जिता ।
द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते साम्परायिके ॥ ९ ॥
सौभाग्यवश तुम्हारा शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान—इन पाँचों साधनोंपर अनुराग है तथा सौभाग्यसे तुमने भूख-प्यास, शोक-मोह और जरा-मृत्यु—इन छहों दोषोंको जीत लिया है। इनमेंसे पहले दो दोष आरम्भसे ही रहते हैं, बीचके दो तरुणावस्था आनेपर होते हैं तथा बादवाले दो दोष अन्तिम समयपर आते हैं ॥ ९ ॥

धर्मोऽहमिति भद्रं ते जिज्ञासुस्त्वामिहागतः ।
आनृशंस्येन तुष्टोऽस्मि वरं दास्यामि तेऽनघ ॥ १० ॥
तुम्हारा मंगल हो। मैं धर्म हूँ और तुम्हारा व्यवहार जाननेकी इच्छासे ही यहाँ आया हूँ। निष्पाप राजन्! तुम्हारी दयालुता और समदर्शितासे मैं तुमपर प्रसन्न हूँ और तुम्हें वर देना चाहता हूँ ॥ १० ॥

वरं वृणीष्व राजेन्द्र दाता ह्यस्मि तवानघ ।
ये हि मे पुरुषा भक्ता न तेषामस्ति दुर्गतिः ॥ ११ ॥
पापरहित राजेन्द्र! तुम मनोऽनुकूल वर माँग लो। मैं तुम्हें अवश्य दे दूँगा। जो मनुष्य मेरे भक्त हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अरणीसहितं यस्य मृगो ह्यादाय गच्छति ।
तस्याग्नयो न लुप्येरन् प्रथमोऽस्तु वरो मम ॥ १२ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भगवन्! पहला वर तो मैं यही माँगता हूँ कि जिस ब्राह्मणके अरणीसहित मन्थन-काष्ठको मृग लेकर भाग गया है, उसके अग्निहोत्रका लोप न हो ॥ १२ ॥

यक्ष उवाच

अरणीसहितं ह्यस्य ब्राह्मणस्य हृतं मया ।
मृगवेषेण कौन्तेय जिज्ञासार्थं तव प्रभो ॥ १३ ॥