महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१८०-
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्तमासाद्य सर्पभोगेन वेष्टितम् ।
दयितं भ्रातरं धीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सर्पके शरीरसे बँधे हुए अपने प्रिय भाई भीमसेनके पास पहुँचकर परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने इस प्रकार पूछा— ॥ १ ॥
कुन्तीमातः कथमिमामापदं त्वमवाप्तवान् ।
कश्चायं पर्वताभोगप्रतिमः पन्नगोत्तमः ॥ २ ॥
स धर्मराजमालक्ष्य भ्राता भ्रातरमग्रजम् ।
कथयामास तत् सर्वं ग्रहणादि विचेष्टितम् ॥ ३ ॥
'कुन्तीनन्दन! तुम कैसे इस विपत्तिमें फँस गये? और यह पर्वतके समान लम्बा-चौड़ा श्रेष्ठ नाग कौन है?' अपने बड़े भ्राता धर्मराज युधिष्ठिरको वहाँ उपस्थित देख भाई भीमसेनने अपने पकड़े जाने आदिकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं ॥ २-३ ॥
भीम उवाच
अयमार्य महासत्वो भक्षार्थं मां गृहीतवान् ।
नहुषो नाम राजर्षिः प्राणवानिव संस्थितः ॥ ४ ॥
भीम बोले—आर्य! ये वायुभक्षी सर्पके रूपमें बैठे हुए महान् शक्तिशाली साक्षात् राजर्षि नहुष हैं, इन्होंने मुझे अपना आहार बनानेके लिये पकड़ रखा है ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
मुच्यतामयमायुष्मन् भ्राता मेऽमितविक्रमः ।
वयमाहारमन्यं ते दास्यामः क्षुन्निवारणम् ॥ ५ ॥
तब युधिष्ठिरने सर्पसे कहा—आयुष्मन्! आप मेरे इस अनन्त पराक्रमी भाईको छोड़ दें। हमलोग आपकी भूख मिटानेके लिये दूसरा भोजन देंगे ॥ ५ ॥
सर्प उवाच
आहाते राजपुत्रोऽयं मया प्राप्तो मुखागतः ।
गम्यतां नेह स्थातव्यं श्वो भवानपि मे भवेत् ॥ ६ ॥
**सर्प बोला—**राजन्! यह राजकुमार मेरे मुखके पास स्वयं आकर मुझे आहाररूपमें प्राप्त हुआ है। तुम जाओ, यहाँ ठहरना उचित नहीं है; अन्यथा कलतक तुम भी मेरे आहार बन जाओगे ।। ६ ।।
व्रतमेतन्महाबाहो विषयं मम यो व्रजेत् ।
स मे भक्षो भवेत् तात त्वं चापि विषये मम ।। ७ ।।
महाबाहो! मेरा यह नियम है कि मेरी अधिकृत भूमिके भीतर जो भी आ जायगा, वह मेरा भक्ष्य बन जायगा। तात! इस समय तुम भी मेरे अधिकारकी सीमामें ही आ गये हो ।। ७ ।।
चिरेणाद्य मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव ।
नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यमभिकाङ्क्षये ।। ८ ।।
दीर्घकालतक उपवास करनेके बाद आज यह तुम्हारा छोटा भाई मुझे आहाररूपमें प्राप्त हुआ है, अतः न तो मैं इसे छोड़ूँगा और न इसके बदलेमें दूसरा आहार ही लेना चाहता हूँ ।। ८ ।।
युधिष्ठिर उवाच
देवो वा यदि वा दैत्य उरगो वा भवान् यदि ।
सत्यं सर्प वचो ब्रूहि पृच्छति त्वां युधिष्ठिरः ।
किमर्थं च त्वया ग्रस्तो भीमसेनो भुजङ्गम ॥ ९ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**सर्प! तुम कोई देवता हो या दैत्य अथवा वास्तवमें सर्प ही हो? सच बताओ, तुमसे युधिष्ठिर प्रश्न कर रहा है। भुजंगम! किस लिये तुमने भीमसेनको ही अपना ग्रास बनाया है? ॥ ९ ॥
किमाहृत्य विदित्वा वा प्रीतिस्ते स्याद् भुजङ्गम ।
किमाहारं प्रयच्छामि कथं मुञ्चेद् भवानिमम् ॥ १० ॥
बोलो, तुम्हारे लिये क्या ला दिया जाय? अथवा तुम्हें किस बातका ज्ञान करा दिया जाय? जिससे तुम प्रसन्न होओगे। मैं कौन-सा आहार दे दूँ अथवा किस उपायका अवलम्बन करूँ, जिससे तुम इन्हें छोड़ सकते हो? ॥ १० ॥
सर्प उवाच
नहुषो नाम राजाहमासं पूर्वस्तवानघ ।
प्रथितः पञ्चमः सोमादायुः पुत्रो नराधिप ॥ ११ ॥
**सर्प बोला—**निष्पाप नरेश! मैं पूर्वजन्ममें तुम्हारा विख्यात पूर्वज नहुष नामका राजा था। चन्द्रमासे पाँचवीं पीढ़ीमें जो आयु नामक राजा हुए थे, उन्हींका मैं पुत्र हूँ ॥ ११ ॥
क्रतुभिस्तपसा चैव स्वाध्यायेन दमेन च ।
त्रैलोक्यैश्वर्यमव्यग्रं प्राप्तोऽहं विक्रमेण च ॥ १२ ॥
मैंने अनेक यज्ञ किये, तपस्या की, स्वाध्याय किया तथा अपने मन और इन्द्रियोंके संयमरूप योगका अभ्यास किया। इन सत्कर्मोंसे तथा अपने पराक्रमसे भी मुझे तीनों लोकोंका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त हुआ था ॥ १२ ॥
तदैश्वर्यं समासाद्य दर्पो मामगमत् तदा ।
सहस्रं हि द्विजातीनामुवाह शिबिकां मम ॥ १३ ॥
ऐश्वर्यमदमत्तोऽहमवमन्य ततो द्विजान् ।
इमामगस्त्येन दशामानीतः पृथिवीपते ॥ १४ ॥
न तु मामजहात् प्रज्ञा यावदद्येति पाण्डव ।
तस्यैवानुग्रहाद् राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
तब उस ऐश्वर्यको पाकर मेरा अहंकार बढ़ गया। मैंने सहस्रों ब्राह्मणोंसे अपनी पालकी ढुलवायी। तदनन्तर ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो मैंने बहुत-से ब्राह्मणोंका अपमान किया। पृथ्वीपते! इससे कुपित हुए महर्षि अगस्त्यने मुझे इस अवस्थाको पहुँचा दिया। पाण्डुनन्दन नरेश! उन्हीं महात्मा अगस्त्यकी कृपासे आजतक मेरी स्मरणशक्ति मुझे छोड़ नहीं सकी है। (मेरी स्मृति ज्यों-की-त्यों बनी हुई है) ॥ १३—१५ ॥
षष्ठे काले मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव ।
नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यदपि कामये ॥ १६ ॥
महर्षिके शापके अनुसार दिनके छठे भागमें तुम्हारा यह छोटा भाई मुझे भोजनके रूपमें प्राप्त हुआ है। अतः मैं न तो इसे छोड़ूँगा और न इसके बदले दूसरा आहार लेना चाहता हूँ ॥ १६ ॥
प्रश्नानुच्चारितानद्य व्याहरिष्यसि चेन्मम ।
अथ पश्चाद् विमोक्ष्यामि भ्रातरं ते वृकोदरम् ॥ १७ ॥
परंतु एक बात है, यदि तुम मेरे पूछे हुए कुछ प्रश्नोंका अभी उत्तर दे दोगे, तो उसके बाद मैं तुम्हारे भाई भीमसेनको छोड़ दूँगा ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ब्रूहि सर्प यथाकामं प्रतिवक्ष्यामि ते वचः ।
अपि चेच्छक्नुयां प्रीतिमाहर्तुं ते भुजङ्गम ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने कहा— सर्प! तुम इच्छानुसार प्रश्न करो। मैं तुम्हारी बातका उत्तर दूँगा। भुजंगम! यदि हो सका, तो तुम्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करूँगा ॥ १८ ॥
वेद्यं च ब्राह्मणेनेह तद् भवान् वेत्ति केवलम् ।
सर्पराज ततः श्रुत्वा प्रतिवक्ष्यामि ते वचः ॥ १९ ॥
सर्पराज! ब्राह्मणको इस जीवनमें जो कुछ जानना चाहिये, वह केवल तत्त्व तुम जानते हो या नहीं। यह सुनकर मैं तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा ॥ १९ ॥
सर्प उवाच
ब्राह्मणः को भवेद् राजन् वेद्यं किं च युधिष्ठिर ।
ब्रवीह्यतिमतिं त्वां हि वाक्यैरनुमिमीमहे ॥ २० ॥
सर्प बोला— राजा युधिष्ठिर! यह बताओ कि ब्राह्मण कौन है और उसके लिये जाननेयोग्य तत्त्व क्या है? तुम्हारी बातें सुननेसे मुझे ऐसा अनुमान होता है कि तुम अतिशय बुद्धिमान् हो ॥ २० ॥
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा ।
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ २१ ॥
युधिष्ठिरने कहा— नागराज! जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, क्रूरताका अभाव, तपस्या और दया—से सद्गुण दिखायी देते हों, वही ब्राह्मण कहा गया है ॥ २१ ॥
वेद्यं सर्प परं ब्रह्म निर्दुःखमसुखं च यत् ।
यत्र गत्वा न शोचन्ति भवतः किं विवक्षितम् ॥ २२ ॥
सर्प! जाननेयोग्य तत्त्व तो परम ब्रह्म ही है, जो दुःख और सुखसे परे है तथा जहाँ पहुँचकर अथवा जिसे जानकर मनुष्य शोकके पार हो जाता है। बताओ, तुम्हें अब इस विषयमें क्या कहना है? ।। २२ ।।
सर्प उवाच
चातुर्वर्ण्यं प्रमाणं च सत्यं च ब्रह्म चैव हि ।
शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानमक्रोध एव च ।
आनृशंस्यमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर ।। २३ ।।
सर्प बोला— युधिष्ठिर! सत्य एवं प्रमाणभूत ब्रह्म तो चारों वर्णोंके लिये हितकर है। सत्य, दान, अक्रोध, क्रूरताका अभाव, अहिंसा और दया आदि सद्गुण तो शूद्रोंमें भी रहते हैं ।। २३ ।।
वेद्यं यच्चात्र निर्दुःखमसुखं च नराधिप ।
ताभ्यां हीनं पदं चान्यन्न तदस्तीति लक्षये ।। २४ ।।
नरेश्वर! तुमने यहाँ जो जाननेयोग्य तत्त्वको दुःख और सुखसे परे बताया है, सो दुःख और सुखसे रहित किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता ही मैं नहीं देखता हूँ ।। २४ ।।
युधिष्ठिर उवाच
शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते ।
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ।। २५ ।।
यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः ।
यत्रैतन्न भवेत् सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत् ।। २६ ।।
युधिष्ठिरने कहा— यदि शूद्रमें सत्य आदि उपर्युक्त लक्षण हैं और ब्राह्मणमें नहीं हैं तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है। सर्प! जिसमें ये सत्य आदि लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणोंका अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिये ।। २५-२६ ।।
यत् पुनर्भवता प्रोक्तं न वेद्यं विद्यतीति च ।
ताभ्यां हीनमतोऽन्यत्र पदमस्तीति चेदपि ।। २७ ।।
एवमेतन्मतं सर्प ताभ्यां हीनं न विद्यते ।
यथा शीतोष्णयोर्मध्ये भवेन्नोष्णं न शीतता ।। २८ ।।
एवं वै सुखदुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं क्वचित् ।
एषा मम मतिः सर्प यथा वा मन्यते भवान् ।। २९ ।।
अब तुमने जो यह कहा कि सुख-दुःखसे रहित कोई दूसरा वेद्य तत्त्व है ही नहीं, सो तुम्हारा यह मत ठीक है। सुख-दुःखसे शून्य कोई पदार्थ नहीं है। किंतु एक ऐसा पद है भी। जिस प्रकार बर्फमें उष्णता और अग्निमें शीतलता कहीं नहीं रहती, उसी प्रकार जो वेद्य-पद
है, वह वास्तवमें सुख-दुःखसे रहित ही है। नागराज! मेरा तो यही विचार है, फिर आप जैसा मानें॥ २७—२९॥
सर्प उवाच
यदि ते वृत्ततो राजन् ब्राह्मणः प्रसमीक्षितः ।
वृथा जातिस्तदाऽऽयुष्मन् कृतिर्यावन्न विद्यते ॥ ३० ॥
**सर्प बोला—**आयुष्मन् नरेश! यदि आचारसे ही ब्राह्मणकी परीक्षा की जाय, तब तो जबतक उसके अनुसार कर्म न हो जाति व्यर्थ ही है॥ ३०॥
युधिष्ठिर उवाच
जातिरत्र महासर्प मनुष्यत्वे महामते ।
संकरात् सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः ॥ ३१ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महासर्प! महामते! मनुष्योंमें जातिकी परीक्षा करना बहुत ही कठिन है; क्योंकि इस समय सभी वर्णोंका परस्पर संकर (सम्मिश्रण) हो रहा है, ऐसा मेरा विचार है॥ ३१॥
सर्वे सर्वास्वपत्यानि जनयन्ति सदा नराः ।
वाङ्मैथुनमथो जन्म मरणं च समं नृणाम् ॥ ३२ ॥
इदमार्षं प्रमाणं च ये यजामह इत्यपि ।
तस्माच्छीलं प्रधानेष्टं विदुर्यै तत्त्वदर्शिनः ॥ ३३ ॥
सभी मनुष्य सदा सब जातियोंकी स्त्रियोंसे संतान उत्पन्न कर रहे हैं। वाणी, मैथुन तथा जन्म और मरण—ये सब मनुष्योंमें एक-से देखे जाते हैं। इस विषयमें यह आर्षप्रमाण भी मिलता है—‘ये यजामहे’ यह श्रुति जातिका निश्चय न होनेके कारण ही जो हमलोग यज्ञ कर रहे हैं, ऐसा सामान्यरूपसे निर्देश करती है। इसलिये जो तत्त्वदर्शी विद्वान् हैं, वे शीलको ही प्रधानता देते हैं और उसे ही अभीष्ट मानते हैं॥ ३२-३३॥
प्राङ्नाभिवर्धनात् पुंसो जातकर्म विधीयते ।
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते ॥ ३४ ॥
जब बालकका जन्म होता है, तब नालच्छेदनके पूर्व उसका जातकर्म-संस्कार किया जाता है। उसमें उसकी माता सावित्री कहलाती है और पिता आचार्य॥
तावच्छूद्रसमो ह्येष यावद् वेदे न जायते ।
तस्मिन्नेवं मतिद्वैधे मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ३५ ॥
कृतकृत्याः पुनर्वर्णा यदि वृत्तं न विद्यते ।
संकरस्त्वत्र नागेन्द्र बलवान् प्रसमीक्षितः ॥ ३६ ॥
जबतक बालकका संस्कार करके उसे वेदका स्वाध्याय न कराया जाय, तबतक वह शूद्रहीके समान है। जातिविषयक संदेह होनेपर स्वायम्भुव मनुने यही निर्णय दिया है।
नागराज! यदि वैदिक संस्कार करके वेदाध्ययन करनेपर भी ब्राह्मणादि वर्णोंमें अपेक्षित शील और सदाचारका उदय नहीं हुआ तो उसमें प्रबल वर्णसंकरता है, ऐसा विचारपूर्वक निश्चय किया गया है ।।
यत्रेदानीं महासर्प संस्कृतं वृत्तमिष्यते ।
तं ब्राह्मणमहं पूर्वमुक्तवान् भुजगोत्तम ।। ३७ ।।
महासर्प! भुजंगमप्रवर! इस समय जिसमें संस्कारके साथ-साथ सदाचारकी उपलब्धि हो, वही ब्राह्मण है। यह बात मैं पहले ही बता चुका हूँ ।। ३७ ।।
सर्प उवाच
श्रुतं विदितवेद्यस्य तव वाक्यं युधिष्ठिर ।
भक्षयेयमहं कस्माद् भ्रातरं ते वृकोदरम् ।। ३८ ।।
**सर्प बोला—**युधिष्ठिर! तुम जाननेयोग्य सभी बातें जानते हो। मैंने तुम्हारी बात अच्छी तरह सुन ली। अब मैं तुम्हारे भाई भीमसेनको कैसे खा सकता हूँ? ।। ३८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि युधिष्ठिरसर्पसंवादे
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्ठिरसर्पसंवादविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८० ।।