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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

बृहस्पतिकी संततिका वर्णन

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एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

बृहस्पतिकी संततिका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

बृहस्पतेश्चान्द्रमसी भार्याऽऽसीद् या यशस्विनी ।
अग्नीन् साजनयत् पुण्यान् षडेकां चापि पुत्रिकाम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! बृहस्पतिजीकी जो यशस्विनी पत्नी चान्द्रमसी (तारा) नामसे विख्यात थी, उसने पुत्ररूपमें छः पवित्र अग्नियोंको तथा एक पुत्रीको भी जन्म दिया ॥ १ ॥

आहुतिष्वेव यस्याग्नेर्हविषाद्यं विधीयते ।
सोऽग्निर्बृहस्पतेः पुत्रः शंयुर्नाम महाव्रतः ॥ २ ॥
(दर्श-पौर्णमास आदिमें) प्रधान आहुतियोंको देते समय जिस अग्निके लिये सर्वप्रथम घीकी आहुति दी जाती है, वह महान् व्रतधारी अग्नि ही बृहस्पतिका 'शंयु' नामसे विख्यात (प्रथम) पुत्र है ॥ २ ॥

चातुर्मास्येषु यस्येष्टमश्वमेधेऽग्रजः प्रभुः ।
दीप्तो ज्वालैरनेकाभैरग्निरेकोऽथ वीर्यवान् ॥ ३ ॥
चातुर्मास्य-सम्बन्धी यज्ञोंमें तथा अश्वमेध-यज्ञमें जिसका पूजन होता है, जो सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवाला और सर्वसमर्थ है तथा जो अनेक वर्णकी ज्वालाओंसे प्रज्वलित है, वह अद्वितीय शक्तिशाली अग्नि ही शंयु है ॥ ३ ॥

शंयोरप्रतिमा भार्या सत्या सत्याथ धर्मजा ।
अग्निस्तस्य सुतो दीप्तस्तिस्रः कन्याश्च सुव्रताः ॥ ४ ॥
शंयुकी पत्नीका नाम था सत्या। वह धर्मकी पुत्री थी। उसके रूप और गुणोंकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सदा सत्यके पालनमें तत्पर रहती थी। उसके गर्भसे शंयुके एक अग्निस্বরূপ पुत्र तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली तीन कन्याएँ हुईं ॥ ४ ॥

प्रथमेनाज्यभागेन पूज्यते योऽग्निरध्वरे ।
अग्निस्तस्य भरद्वाजः प्रथमः पुत्र उच्यते ॥ ५ ॥
यज्ञमें प्रथम आज्यभागके द्वारा जिस अग्निकी पूजा की जाती है, वही शंयुका ज्येष्ठ पुत्र 'भरद्वाज' नामक अग्नि बताया जाता है ॥ ५ ॥

पौर्णमासेषु सर्वेषु हविषाऽऽज्यं स्रुवोद्यतम् ।
भरतो नामतः सोऽग्निर्द्वितीयः शंयुतः सुतः ॥ ६ ॥
समस्त पौर्णमास यागोंमें स्रुवासे हविष्यके साथ घी उठाकर जिसके लिये 'प्रथम आधार' अर्पित किया जाता है, वह 'भरत' (ऊर्ज) नामक अग्नि शंयुका द्वितीय पुत्र है

(इसका जन्म शंयुकी दूसरी स्त्रीके गर्भसे हुआ था) ॥ ६ ॥
तिस्रः कन्या भवन्त्यन्या यासां स भरतः पतिः ।
भरतस्तु सुतस्तस्य भरत्येका च पुत्रिका ॥ ७ ॥
शंयुके तीन कन्याएँ और हुई, जिनका बड़ा भाई भरत ही पालन करता था। भरत (ऊर्ज)-के ‘भरत’ नामवाला ही एक पुत्र तथा ‘भरती’ नामकी एक कन्या हुई ॥ ७ ॥
भरतो भरतस्याग्नेः पावकस्तु प्रजापतेः ।
महानत्यर्थमहितस्तथा भरतसत्तम ॥ ८ ॥
सबका भरण-पोषण करनेवाले प्रजापति भरत नामक अग्निसे ‘पावक’ की उत्पत्ति हुई। भरतश्रेष्ठ! वह अत्यन्त महनीय (पूज्य) होनेके कारण ‘महान्’ कहा गया है ॥ ८ ॥
भरद्वाजस्य भार्या तु वीरा वीरस्य पिण्डदा ।
प्राहुराज्येन तस्येज्यां सोमस्येव द्विजाः शनैः ॥ ९ ॥
शंयुके पहले पुत्र भरद्वाजकी पत्नीका नाम ‘वीरा’ था, जिसने वीर नामक पुत्रको शरीर प्रदान किया। ब्राह्मणोंने सोमकी ही भाँति वीरकी भी आज्यभागसे पूजा बतायी है³। इनके लिये आहुति देते समय मन्त्रका उपांशु उच्चारण किया जाता है ॥ ९ ॥
हविषा यो द्वितीयेन सोमेन सह युज्यते ।
रथप्रभू रथध्वानः कुम्भरेताः स उच्यते ॥ १० ॥
सोमदेवताके साथ इन्हींको द्वितीय आज्यभाग प्राप्त होता है। इन्हें ‘रथप्रभु’, ‘रथध्वान’ और ‘कुम्भरेता’ भी कहते हैं ॥ १० ॥
सरय्वां जनयत् सिद्धिं भानुं भाभिः समावृणोत् ।
आग्नेयमानयन् नित्यमाह्वाने ह्येष सूयते ॥ ११ ॥
वीरने ‘सरयू’ नामवाली पत्नीके गर्भसे ‘सिद्धि’ नामक पुत्रको जन्म दिया। सिद्धिने अपनी प्रभासे सूर्यको भी आच्छादित कर लिया। सूर्यके आच्छादित हो जानेपर उसने अग्निदेवता-सम्बन्धी यज्ञका अनुष्ठान किया। आह्वान-मन्त्र (अग्निमग्न आवह इत्यादि)-में इस सिद्धि नामक अग्निकी ही स्तुति की जाती है ॥ ११ ॥
यस्तु न च्यवते नित्यं यशसा वर्चसा श्रिया ।
अग्निर्निश्च्यवनो नाम पृथिवीं स्तौति केवलम् ॥ १२ ॥
बृहस्पतिके (दूसरे) पुत्रका नाम ‘निश्च्यवन’ है। ये यश, वर्चस् (तेज) और कान्तिसे कभी च्युत नहीं होते हैं। निश्च्यवन अग्नि केवल पृथिवीकी स्तुति करते हैं२ ॥
विपाप्मा कलुषैर्मुक्तो विशुद्धश्चार्चिषा ज्वलन् ।
विपापोऽग्निः सुतस्तस्य सत्यः समयधर्मकृत् ॥ १३ ॥
वे निष्पाप, निर्मल, विशुद्ध तथा तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हैं। उनका पुत्र ‘सत्य नामक अग्नि है; सत्य भी निष्पाप तथा कालधर्मके प्रवर्तक हैं ॥ १३ ॥

आक्रोशतां हि भूतानां यः करोति हि निष्कृतिम् ।
अग्निः स निष्कृतिर्नाम शोभयत्यभिसेविते ।। १४ ।।
वे वेदनासे पीडित होकर आर्तनाद करनेवाले प्राणियोंको उस कष्टसे निष्कृति (छुटकारा) दिलाते हैं, इसीलिये उन अग्निका एक नाम निष्कृति भी है। वे ही प्राणियोंद्वारा सेवित गृह और उद्यान आदिमें शोभाकी सृष्टि करते हैं ।। १४ ।।
अनुकूजन्ति येनेह वेदनार्ताः स्वयं जनाः ।
तस्य पुत्रः स्वनो नाम पावकः स रुजस्करः ।। १५ ।।
सत्यके पुत्रका नाम 'स्वन' है, जिनसे पीडित होकर लोग वेदनासे स्वयं कराह उठते हैं। इसीलिये उनका यह नाम पड़ा है। वे रोगकारक अग्नि हैं ।। १५ ।।
यस्तु विश्वस्य जगतो बुद्धिमाक्रम्य तिष्ठति ।
तं प्राहुरध्यात्मविदो विश्वजिन्नाम पावकम् ।। १६ ।।
(बृहस्पतिके तीसरे पुत्रका नाम 'विश्वजित्' है) वे सम्पूर्ण विश्वकी बुद्धिको अपने वशमें करके स्थित हैं, इसलिये अध्यात्मशास्त्रके विद्वानोंने उन्हें 'विश्वजित्' अग्नि कहा है ।। १६ ।।
अन्तरग्निः स्मृतो यस्तु भुक्तं पचति देहिनाम् ।
स जज्ञे विश्वभुङ्नाम सर्वलोकेषु भारत ।। १७ ।।
भरतनन्दन! जो समस्त प्राणियोंके उदरमें स्थित हो उनके खाये हुए पदार्थोंको पचाते हैं, वे सम्पूर्ण लोकोंमें 'विश्वभुक्' नामसे प्रसिद्ध अग्नि बृहस्पतिके (चौथे) पुत्रके रूपमें प्रकट हुए हैं ।। १७ ।।
ब्रह्मचारी यतात्मा च सततं विपुलव्रतः ।
ब्राह्मणाः पूजयन्त्येनं पाकयज्ञेषु पावकम् ।। १८ ।।
ये विश्वभुक् अग्नि ब्रह्मचारी, जितात्मा तथा सदा प्रचुर व्रतोंका पालन करनेवाले हैं। ब्राह्मणलोग पाकयज्ञोंमें इन्हींकी पूजा करते हैं ।। १८ ।।
पवित्रा गोमती नाम नदी यस्याभवत् प्रिया ।
तस्मिन् कर्माणि सर्वाणि क्रियन्ते धर्मकर्तृभिः ।। १९ ।।
पवित्र गोमती नदी इनकी प्रिय पत्नी हुईं। धर्माचरण करनेवाले द्विजलोग विश्वभुक् अग्निमें ही सम्पूर्ण कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं ।। १९ ।।
वडवाग्निः पिबत्यम्भो योऽसौ परमदारुणः ।
ऊर्ध्वभागूर्ध्वभाङ्नाम कविः प्राणाश्रितस्तु यः ।। २० ।।
जो अत्यन्त भयंकर वडवानलरूपसे समुद्रका जल सोखते रहते हैं, वे ही शरीरके भीतर ऊर्ध्वगति—'उदान' नामसे प्रसिद्ध हैं। ऊपरकी ओर गतिशील होनेसे ही उनका नाम 'ऊर्ध्वभाक्' है। वे प्राणवायुके आश्रित एवं त्रिकालदर्शी हैं। (उन्हें बृहस्पतिका पाँचवाँ पुत्र माना गया है) ।। २० ।।

उद्गद्वारं हविर्यस्य गृहे नित्यं प्रदीयते ।
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमः स्मृतः ॥ २१ ॥
प्रत्येक गृह्यकर्ममें जिस अग्निके लिये सदा घीकी ऐसी धारा दी जाती है जिसका प्रवाह उत्तराभिमुख हो और इस प्रकार दी हुई वह घृतकी आहुति अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि करती है। इसीलिये उस उत्कृष्ट अग्निका नाम ‘स्विष्टकृत्’ है। (उसे बृहस्पतिका छठा पुत्र समझना चाहिये) ॥ २१ ॥

यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति पावकः ।
क्रुद्धस्य तु रसो जज्ञे मन्युतीव्रा च पुत्रिका ।
स्वाहेति दारुणा क्रूरा सर्वभूतेषु तिष्ठति ॥ २२ ॥
जिस समय अग्निस্বরূপ बृहस्पतिका क्रोध प्रशान्त प्राणियोंपर प्रकट हुआ उस समय उनके शरीरसे जो पसीना निकला, वही उनकी पुत्रीके रूपमें परिणत हो गया। वह पुत्री अधिक क्रोधवाली थी। वह ‘स्वाहा’ नामसे प्रसिद्ध हुई। वह दारुण एवं क्रूर कन्या सम्पूर्ण भूतोंमें निवास करती है ॥ २२ ॥

त्रिदिवे यस्य सदृशो नास्ति रूपेण कश्चन ।
अतुलत्वात् कृतो देवैर्नाम्ना कामस्तु पावकः ॥ २३ ॥
स्वर्गमें भी कहीं तुलना न होनेके कारण जिसके समान रूपवान् दूसरा कोई नहीं है, उस स्वाहा-पुत्रको देवताओंने ‘काम’ नामक अग्नि कहा है ॥ २३ ॥

संहर्षाद् धारयन् क्रोधं धन्वी स्रग्वी रथे स्थितः ।
समरे नाशयेच्छत्रूनमोघो नाम पावकः ॥ २४ ॥
जो हृदयमें क्रोध धारण किये धनुष और मालासे विभूषित हो रथपर बैठकर हर्ष और उत्साहके साथ युद्धमें शत्रुओंका नाश करते हैं, उसका नाम है ‘अमोघ’ अग्नि ॥

उक्थो नाम महाभाग त्रिभिरुक्थैरभिष्टुतः ।
महावाचं त्वजनयत् समाश्वासं हि यं विदुः ॥ २५ ॥
महाभाग! ब्राह्मणलोग त्रिविध उक्थ मन्त्रोंद्वारा जिसकी स्तुति करते हैं, जिसने महावाणी (परा)-का आविष्कार किया है तथा ज्ञानी पुरुष जिसे आश्वासन देनेवाला समझते हैं; उस अग्निका नाम ‘उक्थ’ है ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने
एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१९ ॥

१. 'अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय' इस श्रुतिमें अग्नि और सोमको उपांशु मन्त्रोच्चारणपूर्वक आज्यभाग अर्पण करनेका विधान है। यहाँ सोमके साथ जिस अग्निको आज्यभागका अधिकारी बताया गया है, वह 'वीर' नामक अग्नि ही है।
२. ये वाक्‌के अभिमानी देवता हैं। 'तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्च' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।