महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 298)
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति
वैशम्पायन उवाच
गतेषु तेषु सर्वेषु तपस्विषु महात्मसु ।
पिनाकपाणिर्भगवान् सर्वपापहरो हरः ॥ १ ॥
कैरातं वेषमास्थाय काञ्चनद्रुमसंनिभम् ।
विभ्राजमानो विपुलो गिरिर्मेरुरिवापरः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन सब तपस्वी महात्माओंके चले जानेपर सर्वपापहारी, पिनाक-पाणि, भगवान् शंकर किरातवेष धारण करके सुवर्णमय वृक्षके सदृश दिव्य कान्तिसे उद्भासित होने लगे। उनका शरीर दूसरे मेरुपर्वतके समान दीप्तिमान् और विशाल था ॥ १-२ ॥
श्रीमद् धनुरुपादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।
निष्पपात महावेगो दहनो देहवानिव ॥ ३ ॥
वे एक शोभायमान धनुष और सर्पोंके समान विषाक्त बाण लेकर बड़े वेगसे चले। मानो साक्षात् अग्निदेव ही देह धारण करके निकले हों ॥ ३ ॥
देव्या सहोमया श्रीमान् समानव्रतवेषया ।
नानावेषधरैर्हृष्टैर्भूतैरनुगतस्तदा ॥ ४ ॥
किरातवेषसंछन्नः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ।
अशोभत तदा राजन् स देशोऽतीव भारत ॥ ५ ॥
उनके साथ भगवती उमा भी थीं, जिनका व्रत और वेष भी उन्हींके समान था। अनेक प्रकारके वेष धारण किये भूतगण भी प्रसन्नतापूर्वक उनके पीछे हो लिये थे। इस प्रकार किरातवेषमें छिपे हुए श्रीमान् शिव सहस्रों स्त्रियोंसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे। भरतवंशी राजन्! उस समय वह प्रदेश उन सबके चलने-फिरनेसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ ४-५ ॥
क्षणेन तद् वनं सर्वं निःशब्दमभवत् तदा ।
नादः प्रस्रवणानां च पक्षिणां चाप्युपारमत् ॥ ६ ॥
एक ही क्षणमें वह सारा वन शब्दरहित हो गया। झरनों और पक्षियोंतककी आवाज बंद हो गयी ॥ ६ ॥
स संनिकर्षमागम्य पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः ।
मूकं नाम दनोः पुत्रं ददर्शाद्भुतदर्शनम् ॥ ७ ॥
वाराहं रूपमास्थाय तर्कयन्तमिवार्जुनम् ।
हन्तुं परं दीप्यमानं तमुवाचाथ फाल्गुनः ॥ ८ ॥
गाण्डीवं धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।
सज्यं धनुर्वरं कृत्वा ज्याघोषेण निनादयन् ॥ ९ ॥
अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुनके निकट आकर भगवान् शंकरने अद्भुत दीखनेवाले मूक नामक अद्भुत दानवको देखा, जो सूअरका रूप धारण करके अत्यन्त तेजस्वी अर्जुनको मार डालनेका उपाय सोच रहा था; उस समय अर्जुनने गाण्डीव धनुष और विषैले सर्पोंके समान भयंकर बाण हाथमें ले धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसकी टंकारसे दिशाओंको प्रतिध्वनित करके कहा— ॥ ७–९ ॥
यन्मां प्रार्थयसे हन्तुमनागसमिहागतम् ।
तस्मात् त्वां पूर्वमेवाहं नेताद्य यमसादनम् ॥ १० ॥
‘अरे! तू यहाँ आये हुए मुझ निरपराधको मारनेकी घातमें लगा है, इसीलिये मैं आज पहले ही तुझे यमलोक भेज दूँगा’ ॥ १० ॥
दृष्ट्वा तं प्रहरिष्यन्तं फाल्गुनं दृढधन्विनम् ।
कि
जैसे पर्वतपर बिजलीकी गड़गड़ाहट और वज्रपातका भयंकर शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनों बाणोंके आघातका शब्द हुआ ।। १५ ।।
स विद्धो बहुभिर्बाणैर्दीप्तास्यैः पन्नगैरिव ।
ममार राक्षसं रूपं भूयः कृत्वा विभीषणम् ।। १६ ।।
इस प्रकार प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान अनेक बाणोंसे घायल होकर वह दानव फिर अपने भयानक राक्षसरूपको प्रकट करते हुए मर गया ।। १६ ।।
स ददर्श ततो जिष्णुः पुरुषं काञ्चनप्रभम् ।
किरातवेषसंच्छन्नं स्त्रीसहायममित्रहा ।। १७ ।।
तमब्रवीत् प्रीतमनाः कौन्तेयः प्रहसन्निव ।
को भवानटते शून्ये वने स्त्रीगणसंवृतः ।। १८ ।।
इसी समय शत्रुनाशक अर्जुनने सुवर्णके समान कान्तिमान् एक तेजस्वी पुरुषको देखा, जो स्त्रियोंके साथ आकर अपनेको किरातवेषमें छिपाये हुए थे। तब कुन्तीकुमारने प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए-से कहा—‘आप कौन हैं जो इस सूने वनमें स्त्रियोंसे घिरे हुए घूम रहे हैं? ।। १७-१८ ।।
न त्वमस्मिन् वने घोरे बिभेषि कनकप्रभ ।
किमर्थं च त्वया विद्धो वराहो मत्परिग्रहः ।। १९ ।।
‘सुवर्णके समान दीप्तिमान् पुरुष! क्या आपको इस भयानक वनमें भय नहीं लगता? यह सूअर तो मेरा लक्ष्य था, आपने क्यों उसपर बाण मारा? ।। १९ ।।
मयाभिपन्नः पूर्वं हि राक्षसोऽयमिहागतः ।
कामात् परिभवाद् वापि न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ।। २० ।।
‘यह राक्षस पहले यहीं मेरे पास आया था और मैंने इसे काबूमें कर लिया था। आपने किसी कामनासे इस शूकरको मारा हो या मेरा तिरस्कार करनेके लिये। किसी दशामें भी मैं आपको जीवित नहीं छोड़ूँगा ।। २० ।।
न ह्येष मृगयाधर्मो यस्त्वयाद्य कृतो मयि ।
तेन त्वां भ्रंशयिष्यामि जीवितात् पर्वताश्रयम् ।। २१ ।।
‘यह मृगयाका धर्म नहीं है, जो आज आपने मेरे साथ किया है। आप पर्वतके निवासी हैं तो भी उस अपराधके कारण मैं आपको जीवनसे वंचित कर दूँगा’ ।। २१ ।।
इत्युक्तः पाण्डवेयेन किरातः प्रहसन्निव ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा पाण्डवं सव्यसाचिनम् ।। २२ ।।
पाण्डुनन्दन अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर किरात-वेषधारी भगवान् शंकर जोर-जोरसे हँस पड़े और सव्यसाची पाण्डवसे मधुर वाणीमें बोले— ।। २२ ।।
न मत्कृते त्वया वीर भीः कार्या वनमन्तिकात् ।
इयं भूमिः सदास्माकमुचिता वसतां वने ।। २३ ।।
‘वीर! तुम हमारे लिये वनके निकट आनेके कारण भय न करो। हम तो वनवासी हैं, अतः हमारे लिये इस भूमिपर विचरना सदा उचित ही है ॥ २३ ॥
त्वया तु दुष्करः कस्मादिह वासः प्ररोचितः ।
वयं तु बहुसत्त्वेऽस्मिन् निवसामस्तपोधन ॥ २४ ॥
‘किंतु तुमने यहाँका दुष्कर निवास कैसे पसंद किया? तपोधन! हम तो अनेक प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें सदा ही रहते हैं ॥ २४ ॥
भवांस्तु कृष्णवर्त्माभः सुकुमारः सुखोचितः ।
कथं शून्यमिमं देशमेकाकी विचरिष्यति ॥ २५ ॥
‘तुम्हारे अंगोंकी प्रभा प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ती है। तुम सुकुमार हो और सुख भोगनेके योग्य प्रतीत होते हो। इस निर्जन प्रदेशमें किसलिये अकेले विचर रहे हो?’ ॥ २५ ॥
अर्जुन उवाच
गाण्डीवमाश्रयं कृत्वा नाराचांश्चाग्निसंनिभान् ।
निवसामि महारण्ये द्वितीय इव पावकिः ॥ २६ ॥
**अर्जुनने कहा—**मैं गाण्डीव धनुष और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंका आश्रय लेकर इस महान् वनमें द्वितीय कार्तिकेयकी भाँति (निर्भय) निवास करता हूँ ॥ २६ ॥
एष चापि मया जन्तुर्मृगरूपं समाश्रितः ।
राक्षसो निहतो घोरो हन्तुं मामिह चागतः ॥ २७ ॥
यह प्राणी हिंसक पशुका रूप धारण करके मुझे ही मारनेके लिये यहाँ आया था, अतः इस भयंकर राक्षसको मैंने मार गिराया है ॥ २७ ॥
किरात उवाच
मयैष धन्वन्निर्मुक्तैस्ताडितः पूर्वमेव हि ।
बाणैरभिहतः शेते नीतश्च यमसादनम् ॥ २८ ॥
**किरातरूपधारी शिव बोले—**मैंने अपने धनुषद्वारा छोड़े हुए बाणोंसे पहले ही इसे घायल कर दिया था। मेरे ही बाणोंकी चोट खाकर यह सदाके लिये सो रहा है और यमलोकमें पहुँच गया ॥ २८ ॥
ममैष लक्ष्यभूतो हि मम पूर्वपरिग्रहः ।
ममैव च प्रहारेण जीविताद् व्यपरोपितः ॥ २९ ॥
मैंने ही पहले इसे अपने बाणोंका निशाना बनाया, अतः तुमसे पहले इसपर मेरा अधिकार स्थापित हो चुका था। मेरे ही तीव्र प्रहारसे इस दानवको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा है ॥ २९ ॥
दोषान् स्वान् नार्हसेऽन्यस्मै वक्तुं स्वबलदर्पितः ।
अवलिप्तोऽसि मन्दात्मन् न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ ३० ॥
मन्दबुद्धे! तुम अपने बलके घमंडमें आकर अपने दोष दूसरेपर नहीं मढ़ सकते। तुम्हें अपनी शक्तिपर बड़ा गर्व है; अतः अब तुम मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकते ॥ ३० ॥
स्थिरो भवस्व मोक्ष्यामि सायकानशनीनिव ।
घटस्व परया शक्त्या मुञ्च त्वमपि सायकान् ॥ ३१ ॥
धैर्यपूर्वक सामने खड़े रहो, मैं वज्रके समान भयानक बाण छोड़ूँगा। तुम भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर मुझे जीतनेका प्रयास करो। मेरे ऊपर अपने बाण छोड़ो ॥ ३१ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा किरातस्यार्जुनस्तदा ।
रोषमाहारयामास ताडयामास चेषुभिः ॥ ३२ ॥
किरातकी वह बात सुनकर उस समय अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने बाणोंसे उसपर प्रहार आरम्भ किया ॥ ३२ ॥
ततो हृष्टेन मनसा प्रतिजग्राह सायकान् ।
भूयो भूय इति प्राह मन्दमन्देत्युवाच ह ॥ ३३ ॥
प्रहरस्व शरानेतान् नाराचान् मर्मभेदिनः ।
तब किरातने प्रसन्नचित्तसे अर्जुनके छोड़े हुए सभी बाणोंको पकड़ लिया और कहा—‘ओ मूर्ख! और बाण मार और बाण मार, इन मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार कर’ ॥ ३३ १/२ ॥
इत्युक्तो बाणवर्षं स मुमोच सहसार्जुनः ॥ ३४ ॥
उसके ऐसा कहनेपर अर्जुनने सहसा बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ३४ ॥
ततस्तौ तत्र संरब्धौ राजमानौ मुहुर्मुहुः ।
शरैराशीविषाकारैस्ततक्षाते परस्परम् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर वे दोनों क्रोधमें भरकर बारंबार सर्पाकार बाणोंद्वारा एक-दूसरेको घायल करने लगे। उस समय उन दोनोंकी बड़ी शोभा होने लगी ॥ ३५ ॥
ततोऽर्जुनः शरवर्षं किराते समवासृजत् ।
तत् प्रसन्नेन मनसा प्रतिजग्राह शङ्करः ॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने किरातपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की; परंतु भगवान् शंकरने प्रसन्नचित्तसे उन सब बाणोंको ग्रहण कर लिया ॥ ३६ ॥
मुहूर्तं शरवर्षं तत् प्रतिगृह्य पिनाकधृक् ।
अक्षतेन शरीरेण तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ३७ ॥
पिनाकधारी शिव दो ही घड़ीमें सारी बाण-वर्षाको अपनेमें लीन करके पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे। उनके शरीरपर तनिक भी चोट या क्षति नहीं पहुँची थी ॥ ३७ ॥
स दृष्ट्वा बाणवर्षं तु मोघीभूतं धनंजयः ।
परमं विस्मयं चक्रे साधु साध्विति चाब्रवीत् ॥ ३८ ॥
अपनी की हुई सारी बाण-वर्षा व्यर्थ हुई देख धनंजयको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे किरातको साधुवाद देने लगे और बोले— ॥ ३८ ॥
अहोऽयं सुकुमाराङ्गो हिमवच्छिखराश्रयः ।
गाण्डीवमुक्तान् नाराचान् प्रतिगृह्णात्यविह्वलः ॥ ३९ ॥
‘अहो! हिमालयके शिखरपर निवास करनेवाले इस किरातके अंग तो बड़े सुकुमार हैं, तो भी यह गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंको ग्रहण कर लेता है और तनिक भी व्याकुल नहीं होता ॥ ३९ ॥
कोऽयं देवो भवेत् साक्षाद् रुद्रो यक्षः सुरोऽसुरः ।
विद्यते हि गिरिश्रेष्ठे त्रिदशानां समागमः ॥ ४० ॥
‘यह कौन है? साक्षात् भगवान् रुद्रदेव, यक्ष, देवता अथवा असुर तो नहीं है। इस श्रेष्ठ पर्वतपर देवताओंका आना-जाना होता रहता है ॥ ४० ॥
न हि मद्बाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रशः ।
शक्तोऽन्यः सहितुं वेगमृते देवं पिनाकिनम् ॥ ४१ ॥
‘मैंने सहस्रों बार जिन बाण-समूहोंकी वृष्टि की है, उनका वेग पिनाकधारी भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कोई नहीं सह सकता ॥ ४१ ॥
देवो वा यदि वा यक्षो रुद्रादन्यो व्यवस्थितः ।
अहमेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ ४२ ॥
‘यदि यह रुद्रदेवसे भिन्न व्यक्ति है तो यह देवता हो या यक्ष—मैं इसे तीखे बाणोंसे मारकर अभी यमलोक भेजता हूँ’ ॥ ४२ ॥
ततो हृष्टमना जिष्णुर्नाराचान् मर्मभेदिनः ।
व्यसृजच्छतधा राजन् मयूखानिव भास्करः ॥ ४३ ॥
राजन्! यह सोचकर प्रसन्नचित्त अर्जुनने सहस्रों किरणोंको फैलानेवाले भगवान् भास्करकी भाँति सैकड़ों मर्मभेदी नाराचोंका प्रहार किया ॥ ४३ ॥
तान् प्रसन्नेन मनसा भगवाँल्लोकभावनः ।
शूलपाणिः प्रत्यगृह्णाच्छिलावर्षमिवाचलः ॥ ४४ ॥
परंतु त्रिशूलधारी भूतभावन भगवान् भवने हर्षभरे हृदयसे उन सब नाराचोंको उसी प्रकार आत्मसात् कर लिया, जैसे पर्वत पत्थरोंकी वर्षाको ॥ ४४ ॥