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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

(द्रौपदीहरणपर्व)

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(द्रौपदीहरणपर्व)

द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना

जनमेजय उवाच

वसत्स्वेवं वने तेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
रममाणेषु चित्राभिः कथाभिर्मुनिभिः सह ॥ १ ॥
सूर्यदत्ताक्षयान्नेव कृष्णाया भोजनावधि ।
ब्राह्मणांस्तर्पमाणेषु ये चान्नार्थमुपागताः ॥ २ ॥
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानः सर्वे दुर्योधनादयः ।
कथं तेष्वन्ववर्तन्त पापाचारा महामुने ॥ ३ ॥
दुःशासनस्य कर्णस्य शकुनेश्च मते स्थिताः ।
एतदाचक्ष्व भगवन् वैशम्पायन पृच्छतः ॥ ४ ॥

**जनमेजयने पूछा—**महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा-वार्ताद्वारा मनोरञ्जन करते थे तथा जबतक द्रौपदी भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन्! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये ॥ १—४ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तेषां तथा वृत्तिं नगरे वसतामिव ।
दुर्योधनो महाराज तेषु पापमरोचयत् ॥ ५ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**महाराज! जब दुर्योधनने सुना कि पाण्डवलोग तो वनमें भी उसी प्रकार दान-पुण्य करते हुए आनन्दसे रह रहे हैं, जैसे नगरके निवासी रहा करते हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करनेका विचार किया ॥ ५ ॥

तथा तैर्निकृतिप्रज्ञैः कर्णदुःशासनादिभिः ।

नानोपायैरघं तेषु चिन्तयत्सु दुरात्मसु ॥ ६ ॥
अभ्यागच्छत् स धर्मात्मा तपस्वी सुमहायशाः ।
शिष्यायुतसमोपेतो दुर्वासा नाम कामतः ॥ ७ ॥
इस प्रकार सोचकर छल-कपटकी विद्यामें निपुण कर्ण और दुःशासन आदिके साथ जब वे दुरात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र भाँति-भाँतिके उपायोंसे पाण्डवोंको संकटमें डालनेकी युक्तिका विचार कर रहे थे, उसी समय महायशस्वी धर्मात्मा तपस्वी महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्योंको साथ लिये हुए वहाँ स्वेच्छासे ही आ पहुँचे ॥ ६-७ ॥

तमागतमभिप्रेक्ष्य मुनिं परमकोपनम् ।
दुर्योधनो विनीतात्मा प्रश्रयेण दमेन च ॥ ८ ॥
सहितो भ्रातृभिः श्रीमानातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ।
परम क्रोधी दुर्वासा मुनिको आया देख भाइयों-सहित श्रीमान् राजा दुर्योधनने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखकर नम्रतापूर्वक विनीतभावसे उन्हें अतिथिसत्कारके रूपमें निमन्त्रित किया ॥ ८ १/२ ॥

विधिवत् पूजयामास स्वयं किङ्करवत् स्थितः ॥ ९ ॥
अहानि कतिचित् तत्र तस्थौ स मुनिसत्तमः ।
दुर्योधनने स्वयं दासकी भाँति उनकी सेवामें खड़े रहकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की। मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा कई दिनोंतक वहाँ ठहरे रहे ॥ ९ १/२ ॥

तं च पर्यचरद् राजा दिवारात्रमतन्द्रितः ॥ १० ॥
दुर्योधनो महाराज शापात् तस्य विशङ्कितः ।
महाराज जनमेजय! राजा दुर्योधन (श्रद्धासे नहीं, अपितु) उनके शापसे डरता हुआ दिन-रात आलस्य छोड़कर उनकी सेवामें लगा रहा ॥ १० १/२ ॥

क्षुधितोऽस्मि ददस्वान्नं शीघ्रं मम नराधिप ॥ ११ ॥
इत्युक्त्वा गच्छति स्नातुं प्रत्यागच्छति वै चिरात् ।
न भोक्ष्याम्यद्य मे नास्ति क्षुधेत्युक्त्वैत्यदर्शनम् ॥ १२ ॥
वे मुनि कभी कहते कि 'राजन्! मैं बहुत भूखा हूँ, मुझे शीघ्र भोजन दो' ऐसा कहकर वे स्नान करनेके लिये चले जाते और बहुत देरके बाद लौटते थे। लौटकर वे कह देते—'मैं नहीं खाऊँगा; आज मुझे भूख नहीं है' ऐसा कहकर अदृश्य हो जाते थे ॥ ११-१२ ॥

अकस्मादेत्य च ब्रूते भोजयास्मांस्त्वरान्वितः ।
कदाचिच्च निशीथे स उत्थाय निकृतौ स्थितः ॥ १३ ॥
पूर्ववत् कारयित्वान्नं न भुङ्क्ते गर्हयन् स्म सः ।
फिर कहींसे अकस्मात् आकर कहते—'हमलोगोंको जल्दी भोजन कराओ।' कभी आधी रातमें उठकर उसे नीचा दिखानेके लिये उद्यत हो पूर्ववत् भोजन बनवाकर उस भोजनकी निन्दा करते हुए भोजन करनेसे इनकार कर देते थे ॥ १३ १/२ ॥

वर्तमाने तथा तस्मिन् यदा दुर्योधनो नृपः ॥ १४ ॥
विकृतिं नैति न क्रोधं तदा तुष्टोऽभवन्मुनिः ।
आह चैनं दुराधर्षो वरदोऽस्मीति भारत ॥ १५ ॥
भारत! ऐसा उन्होंने कई बार किया, तो भी जब राजा दुर्योधनके मनमें विकार या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ, तब वे दुर्धर्ष मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ' ॥ १४-१५ ॥

दुर्वासा उवाच

वरं वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते ।
मयि प्रीते तु यद् धर्म्यं नालभ्यं विद्यते तव ॥ १६ ॥
दुर्वासा बोले—राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके लिये वर माँगो। मेरे प्रसन्न होनेपर जो धर्मानुकूल वस्तु होगी, वह तुम्हारे लिये अलभ्य नहीं रहेगी ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य महर्षेर्भावितात्मनः ।
अमन्यत पुनर्जातमात्मानं स सुयोधनः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि दुर्वासाका यह वचन सुनकर दुर्योधनने मन-ही-मन ऐसा समझा, मानो उसका नया जन्म हुआ हो ॥ १७ ॥

प्रागेव मन्त्रितं चासीत् कर्णदुःशासनादिभिः ।
याचनीयं मुनेस्तुष्टादिति निश्चित्य दुर्मतिः ॥ १८ ॥
अतिहर्षान्वितो राजन् वरमेनमायाचत ।
शिष्यैः सह मम ब्रह्मन् यथा जातोऽतिथिर्भवान् ॥ १९ ॥
अस्मत्कुले महाराजो ज्येष्ठः श्रेष्ठो युधिष्ठिरः ।
वने वसति धर्मात्मा भ्रातृभिः परिवारितः ॥ २० ॥
गुणवान् शीलसम्पन्नस्तस्य त्वमतिथिर्भव ।
मुनि संतुष्ट हों, तो क्या माँगना चाहिये, इस बातके लिये कर्ण और दुःशासन आदिके साथ उसकी पहलेसे ही सलाह हो चुकी थी। राजन्! उसी निश्चयके अनुसार दुर्बुद्धि दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह वर माँगा—'ब्रह्मन्! हमारे कुलमें महाराज युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं। इस समय वे धर्मात्मा पाण्डुकुमार अपने भाइयोंके साथ वनमें निवास करते हैं। युधिष्ठिर बड़े गुणवान् और सुशील हैं। जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए, उसी तरह शिष्योंके सहित आप उनके भी अतिथि होइये ॥ १८—२०१/२ ॥

यदा च राजपुत्री सा सुकुमारी यशस्विनी ॥ २१ ॥

भोजयित्वा द्विजान् सर्वान् पतींश्च वरवर्णिनी ।
विश्रान्ता च स्वयं भुक्त्वा सुखासीना भवेद् यदा ॥ २२ ॥
तदा त्वं तत्र गच्छेथा यद्यनुग्राह्यता मयि ।
‘यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो मेरी प्रार्थनासे आप वहाँ ऐसे समयमें जाइयेगा, जब परम सुन्दरी यशस्विनी सुकुमारी राजकुमारी द्रौपदी समस्त ब्राह्मणों तथा पाँचों पतियोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करनेके पश्चात् सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर रही हो’ ॥ २१-२२½ ॥

तथा करिष्ये त्वत्प्रीत्येत्येवमुक्त्वा सुयोधनम् ॥ २३ ॥
दुर्वासा अपि विप्रेन्द्रो यथागतमगात् ततः ।
कृतार्थमपि चात्मानं तदा मेने सुयोधनः ॥ २४ ॥
‘तुमपर प्रेम होनेके कारण मैं वैसा ही करूँगा’, दुर्योधनसे ऐसा कहकर विप्रवर दुर्वासा जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। उस समय दुर्योधनने अपने-आपको कृतार्थ माना ॥ २३-२४ ॥

करेण च करं गृह्य कर्णस्य मुदितो भृशम् ।
कर्णोऽपि भ्रातृसहितमित्युवाच नृपं मुदा ॥ २५ ॥
वह कर्णका हाथ अपने हाथमें लेकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। कर्णने भी भाइयोंसहित राजा दुर्योधनसे बड़े हर्षके साथ इस प्रकार कहा ॥ २५ ॥

कर्ण उवाच

दिष्ट्या कामः सुसंवृत्तो दिष्ट्या कौरव वर्धसे ।
दिष्ट्या ते शत्रवो मग्ना दुस्तरे व्यसनार्णवे ॥ २६ ॥
**कर्ण बोला—**कुरुनन्दन! सौभाग्यसे हमारा काम बन गया। तुम्हारा अभ्युदय हो रहा है, यह भी भाग्यकी ही बात है। तुम्हारे शत्रु विपत्तिके अपार महासागरमें डूब गये, यह कितने सौभाग्यकी बात है? ॥ २६ ॥

दुर्वासःक्रोधजे वह्नौ पतिताः पाण्डुनन्दनाः ।
स्वैरेव ते महापापैर्गता वै दुस्तरं तमः ॥ २७ ॥
पाण्डव दुर्वासाकी क्रोधाग्निमें गिर गये हैं और अपने ही महापापोंके कारण वे दुस्तर नरकमें जा पड़े हैं ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्थं ते निकृतिप्रज्ञा राजन् दुर्योधनादयः ।
हसन्तः प्रीतमनसो जग्मुः स्वं स्वं निकेतनम् ॥ २८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! छल-कपटकी विद्यामें प्रवीण दुर्योधन आदि इस प्रकार बातें करते और हँसते हुए प्रसन्न मनसे अपने-अपने भवनोंमें गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने
द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दुर्वासाका उपाख्यानविषयक
दो सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६२ ॥