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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान

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चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान

युधिष्ठिर उवाच

अन्तर्हितानि भूतानि बलवन्ति महान्ति च ।
अग्निना तपसा चैव शक्यं गन्तुं वृकोदर ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भीमसेन! यहाँ बहुत-से बलवान् और विशालकाय राक्षस छिपे रहते हैं; अतः अग्निहोत्र एवं तपस्याके प्रभावसे ही हमलोग यहाँसे आगे बढ़ सकते हैं ॥ १ ॥

संनिवर्तय कौन्तेय क्षुत्पिपासे बलाश्रयात् ।
ततो बलं च दाक्ष्यं च संश्रयस्व वृकोदर ॥ २ ॥
वृकोदर! तुम बलका आश्रय लेकर अपनी भूख-प्यास मिटा दो। फिर शारीरिक शक्ति और चतुरताका सहारा लो ॥ २ ॥

ऋषेस्त्वया श्रुतं वाक्यं कैलासं पर्वतं प्रति ।
बुद्ध्या प्रपश्य कौन्तेय कथं कृष्णा गमिष्यति ॥ ३ ॥
भैया! कैलास पर्वतके विषयमें महर्षिने जो बात कही है, वह तुमने भी सुना ही है; अब स्वयं अपनी बुद्धिसे विचार करके देखो, द्रौपदी इस दुर्गम प्रदेशमें कैसे चल सकेगी? ॥ ३ ॥

अथवा सहदेवेन धौम्येन च समं विभो ।
सूतैः पौरोगवैश्चैव सर्वैश्च परिचारकैः ॥ ४ ॥
रथैरश्वैश्च ये चान्ये विप्राः क्लेशासहाः पथि ।
सर्वैस्त्वं सहितो भीम निवर्तस्वायतेक्षण ॥ ५ ॥
अथवा विशालनेत्रोंवाले भीम! तुम सहदेव, धौम्य, सारथि, रसोइये, समस्त सेवकगण, रथ, घोड़े तथा मार्गके कष्टको सहन न कर सकनेवाले जो अन्य ब्राह्मण हैं, उन सबके साथ यहींसे लौट जाओ ॥ ४-५ ॥

त्रयो वयं गमिष्यामो लघ्वाहारा यतव्रताः ।
अहं च नकुलश्चैव लोमशश्च महातपाः ॥ ६ ॥
ममागमनमाकाङ्क्षन् गङ्गाद्वारे समाहितः ।
वसेह द्रौपदीं रक्षन् यावदागमनं मम ॥ ७ ॥
केवल मैं, नकुल तथा महातपस्वी लोमशजी—ये तीन व्यक्ति ही संयम और व्रतका पालन करते हुए यहाँसे आगेकी यात्रा करेंगे। हम तीनों ही स्वल्पाहारसे जीवन-निर्वाह

करेंगे। तुम गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में एकाग्रचित्त हो मेरे आगमनकी प्रतीक्षा करो और जबतक मैं लौटकर न आऊँ, तबतक द्रौपदीकी रक्षा करते हुए वहीं निवास करो।। ६-७ ।।

भीम उवाच

राजपुत्री श्रमेणार्ता दुःखार्ता चैव भारत ।
व्रजत्येव हि कल्याणी श्वेतवाहदिदृक्षया ।। ८ ।।
**भीमसेनने कहा—**भारत! राजकुमारी द्रौपदी यद्यपि रास्तेकी थकावटसे और मानसिक दुःखसे भी पीड़ित है; तो भी यह कल्याणमयी देवी अर्जुनको देखनेकी इच्छासे उत्साहपूर्वक हमारे साथ चल ही रही है ।। ८ ।।
तव चाप्यरतिस्तीव्रा वर्तते तमपश्यतः ।
गुडाकेशं महात्मानं संग्रामेष्वपलायिनम् ।। ९ ।।
संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले निद्राविजयी महात्मा अर्जुनको न देखनेके कारण आपके मनमें भी अत्यन्त खिन्नता हो रही है ।। ९ ।।
किं पुनः सहदेवं च मां च कृष्णां च भारत ।
द्विजाः कामं निवर्तन्तां सर्वे च परिचारकाः ।। १० ।।
सूताः पौरोगवाश्चैव यं च मन्येत नो भवान् ।
न ह्यहं हातुमिच्छामि भवन्तमिह कर्हिचित् ।। ११ ।।
शैलेऽस्मिन् राक्षसाकीर्णे दुर्गेषु विषमेषु च ।
इयं चापि महाभागा राजपुत्री पतिव्रता ।। १२ ।।
त्वामृते पुरुषव्याघ्र नोत्सहेद् विनिवर्तितुम् ।
तथैव सहदेवोऽयं सततं त्वामनुव्रतः ।। १३ ।।
न जातु विनिवर्तेत मनोज्ञो ह्यहमस्य वै ।
अपि चात्र महाराज सव्यसाचिदिदृक्षया ।। १४ ।।
सर्वे लालसभूताः स्म तस्माद् यास्यामहे सह ।
यद्यशक्यो रथैर्गन्तुं शैलोऽयं बहुकन्दरः ।। १५ ।।
पद्भिरैव गमिष्यामो मा राजन् विमना भव ।
अहं वहिष्ये पाञ्चालीं यत्र यत्र न शक्ष्यति ।। १६ ।।
फिर सहदेवके, मेरे तथा द्रौपदीके लिये तो कहना ही क्या है? भारत! ये ब्राह्मणलोग चाहें तो यहाँसे लौट सकते हैं। समस्त सेवक, सारथि, रसोइये तथा हममेंसे और जिस-जिसको आप लौटाना उचित समझें-वे सभी जा सकते हैं। राक्षसोंसे भरे हुए इस पर्वतपर तथा ऊँचे-नीचे दुर्गम प्रदेशोंमें मैं आपको कदापि अकेला छोड़ना नहीं चाहता। नरश्रेष्ठ! यह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकुमारी कृष्णा भी आपको छोड़कर लौटनेको कभी तैयार न होंगी। इसी प्रकार यह सहदेव भी आपमें सदा अनुराग रखनेवाला है, आपको छोड़कर

कभी नहीं लौटेगा। मैं इसके मनकी बात जानता हूँ। महाराज! सव्यसाची अर्जुनको देखनेकी इच्छासे हम सभी लालायित हो रहे हैं; अतः सब साथ ही चलेंगे। राजन्! अनेक कन्दराओंसे युक्त इस पर्वतपर यदि रथोंके द्वारा यात्रा सम्भव न हो तो हम पैदल ही चलेंगे। आप इसके लिये उदास न हों। जहाँ-जहाँ द्रौपदी नहीं चल सकेगी वहाँ-वहाँ मैं स्वयं इसे कंधेपर चढ़ाकर ले जाऊँगा॥ १०—१६॥

इति मे वर्तते बुद्धिर्मा राजन् विमना भव ।
सुकुमारौ तथा वीरौ माद्रीनन्दिकरावुभौ ।
दुर्गे संतारयिष्यामि यत्राशक्तौ भविष्यतः ॥ १७ ॥

राजन्! मेरा ऐसा ही विचार है, आप उदास न हों। वीर माद्रीकुमार नकुल और सहदेव दोनों सुकुमार हैं। जहाँ कहीं दुर्गम स्थानमें ये असमर्थ हो जायँगे वहाँ मैं इन्हें पार लगाऊँगा ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

एवं ते भाषमाणस्य बलं भीमाभिवर्धताम् ।
यत् त्वमुत्सहसे वोढुं पाञ्चालीं च यशस्विनीम् ॥ १८ ॥
यमजौ चापि भद्रं ते नैतदन्यत्र विद्यते ।
बलं तव यशश्चैव धर्मः कीर्तिश्च वर्धताम् ॥ १९ ॥
यत् त्वमुत्सहसे नेतुं भ्रातरौ सह कृष्णया ।
मा ते ग्लानिर्महाबाहो मा च तेऽस्तु पराभवः ॥ २० ॥

**युधिष्ठिर बोले—**भीमसेन! इस प्रकार (उत्साहपूर्ण) बातें करते हुए तुम्हारा बल बढ़े, क्योंकि तुम यशस्विनी द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवको भी वहन करके ले चलनेका उत्साह रखते हो। तुम्हारा कल्याण हो। यह साहस तुम्हारे सिवा और किसीमें नहीं है। तुम्हारे बल, यश, धर्म और कीर्तिका विस्तार हो। महाबाहो! तुम द्रौपदीसहित दोनों भाई नकुल-सहदेवको भी स्वयं ही ले चलनेकी शक्ति रखते हो, इसलिये कभी तुम्हें ग्लानि न हो तथा किसीसे भी तुम्हें तिरस्कृत न होना पड़े ॥ १८—२० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः कृष्णाब्रवीद् वाक्यं प्रहसन्ती मनोरमा ।
गमिष्यामि न संतापः कार्यो मां प्रति भारत ॥ २१ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब सुन्दरी द्रौपदीने हँसते हुए कहा—'भारत! मैं आपके साथ ही चलूँगी; आप मेरे लिये चिन्ता न करें' ॥ २१ ॥

लोमश उवाच

तपसा शक्यते गन्तुं पर्वतो गन्धमादनः ।

तपसा चैव कौन्तेय सर्वे योक्ष्यामहे वयम् ॥ २२ ॥
नकुलः सहदेवश्च भीमसेनश्च पार्थिव ।
अहं च त्वं च कौन्तेय द्रक्ष्यामः श्वेतवाहनम् ॥ २३ ॥
लोमशजीने कहा— कुन्तीनन्दन! गन्धमादन पर्वतपर तपस्याके बलसे ही जाया जा सकता है। हम सब लोगोंको तपःशक्तिका संचय करना होगा। महाराज! नकुल, सहदेव, भीमसेन, मैं और तुम सभी लोग तपोबलसे ही अर्जुनको देख सकेंगे ॥ २२-२३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्भाषमाणास्ते सुबाहुविषयं महत् ।
ददृशुर्मुदिता राजन् प्रभूतगजवाजिमत् ॥ २४ ॥
किराततङ्कणाकीर्णं पुलिन्दशतसंकुलम् ।
हिमवत्यमरैर्जुष्टं बह्वाश्चर्यसमाकुलम् ।
सुबाहुश्चापि तान् दृष्ट्वा पूजया प्रत्यगृह्णत ॥ २५ ॥
विषयान्ते कुलिन्दानामीश्वरः प्रीतिपूर्वकम् ।
ततस्ते पूजितास्तेन सर्व एव सुखोषिताः ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार बातचीत करते हुए वे सब लोग आगे बढ़े। कुछ दूर जानेपर उन्हें कुलिन्दराज सुबाहुका विशाल राज्य दिखायी दिया, जहाँ हाथी-घोड़ोंकी बहुतायत थी, और सैकड़ों किरात, तंगण एवं कुलिन्द आदि जंगली जातियोंके लोग निवास करते थे। वह देवताओंसे सेवित देश हिमालयके अत्यन्त समीप था। वहाँ अनेक प्रकारकी आश्चर्यजनक वस्तुएँ दिखायी देती थीं। सुबाहुका वह राज्य देखकर उन सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। कुलिन्दोंके राजा सुबाहुको जब यह पता लगा कि मेरे राज्यमें पाण्डव आये हैं, तब उसने राज्यकी सीमापर जाकर बड़े आदर-सत्कारके साथ उन्हें अपनाया। उसके द्वारा प्रेमसे पूजित होकर वे सब लोग बड़े सुखसे वहाँ रहे ॥ २४—२६ ॥

प्रतस्थुर्विमले सूर्ये हिमवन्तं गिरिं प्रति ।
इन्द्रसेनमुखांश्चापि भृत्यान् पौरोगवांस्तथा ॥ २७ ॥
सूदांश्च पारिबर्हांश्च द्रौपद्याः सर्वशो नृप ।
राज्ञः कुलिन्दाधिपतेः परिदाय महारथाः ॥ २८ ॥
पद्भिरैव महावीर्या ययुः कौरवनन्दनाः ।
ते शनैः प्राद्रवन् सर्वे कृष्णया सह पाण्डवाः ।
तस्माद् देशात् सुसंहृष्टा द्रष्टुकामा धनंजयम् ॥ २९ ॥
दूसरे दिन निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर उन सबने हिमालय पर्वतकी ओर प्रस्थान किया। जनमेजय! इन्द्रसेन आदि सेवकों, रसोइयों और पाक-शालाके अध्यक्षको तथा द्रौपदीके सारे सामानोंको कुलिन्दराज सुबाहुके यहाँ सौंपकर वे महापराक्रमी महारथी

कुरुकुलनन्दन पाण्डव द्रौपदीके साथ धीरे-धीरे पैदल ही चल दिये। उनके मनमें अर्जुनको देखनेकी बड़ी उत्कण्ठा थी। अतः वे बड़े हर्ष और उल्लासके साथ उस देशसे प्रस्थित हुए॥ २७—२९॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४०॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४०॥