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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२८८-

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अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

इन्द्रजित्का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा

मार्कण्डेय उवाच

ततः श्रुत्वा हतं संख्ये कुम्भकर्णं सहानुगम् ।
प्रहस्तं च महेष्वासं धूम्राक्षं चातितेजसम् ॥ १ ॥
पुत्रमिन्द्रजितं वीरं रावणः प्रत्यभाषत ।
जहि रामममित्रघ्न सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर सेवकोंसहित कुम्भकर्ण, महाधनुर्धर प्रहस्त तथा अत्यन्त तेजस्वी धूम्राक्षको संग्राममें मारा गया सुनकर रावणने अपने वीर पुत्र इन्द्रजित्‌से कहा—'शत्रुसूदन! तुम राम, लक्ष्मण तथा सुग्रीवका वध करो ॥ १-२ ॥

त्वया हि मम सत्पुत्र यशो दीप्तमुपार्जितम् ।
जित्वा वज्रधरं संख्ये सहस्राक्षं शचीपतिम् ॥ ३ ॥
'सुपुत्र! तुमने युद्धमें सहस्र नेत्रोंवाले वज्रधारी शचीपति इन्द्रको जीतकर उज्ज्वल यशका उपार्जन किया है ॥ ३ ॥

अन्तर्हितः प्रकाशो वा दिव्यैर्दत्तवरैः शरैः ।
जहि शत्रूनमित्रघ्न मम शस्त्रभृतां वर ॥ ४ ॥
'शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ शत्रुनाशन वीर! जिनके लिये देवताओंने तुम्हें वरदान दिया है, ऐसे दिव्यास्त्रों-द्वारा प्रकटरूपमें या अदृश्य होकर मेरे शत्रुओंका नाश करो ॥ ४ ॥

रामलक्ष्मणसुग्रीवाः शरस्पर्शं न तेऽनघ ।
समर्थाः प्रतिसोढुं च कुतस्तदनुयायिनः ॥ ५ ॥
'अनघ! स्वयं राम, लक्ष्मण और सुग्रीव भी तुम्हारे बाणोंका आघात सहन करनेमें समर्थ नहीं हैं, फिर उनके अनुयायी तो हो ही कैसे सकते हैं? ॥ ५ ॥

अकृता या प्रहस्तेन कुम्भकर्णेन चानघ ।
खरस्यापचितिः संख्ये तां गच्छ त्वं महाभुज ॥ ६ ॥
'निष्पाप महाबाहो! प्रहस्त और कुम्भकर्णने भी खरके वधका जो बदला नहीं चुकाया, उसे युद्धमें तुम चुकाओ ॥ ६ ॥

त्वमद्य निशितैर्बाणैर्हत्वा शत्रून् ससैनिकान् ।
प्रतिनन्दय मां पुत्र पुरा जित्वेव वासवम् ॥ ७ ॥

‘बेटा! तुमने पूर्वकालमें इन्द्रको जीतकर जिस प्रकार मुझे आनन्दित किया था, उसी प्रकार आज तुम तीखे बाणोंसे सैनिकोंसहित शत्रुओंका संहार करके मेरा आनन्द बढ़ाओ’॥ ७॥

इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा रथमास्थाय दंशितः।
प्रययाविन्द्रजिद् राजंस्तूर्णमायोधनं प्रति॥ ८॥
राजन्! रावणके द्वारा ऐसी आज्ञा देनेपर इन्द्रजित्ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर पिताकी आज्ञा स्वीकार की और वह कवच बाँध रथपर बैठकर तुरंत ही संग्रामभूमिकी ओर चल दिया॥ ८॥

ततो विश्राव्य विस्पष्टं नाम राक्षसपुङ्गवः।
आह्वयामास समरे लक्ष्मणं शुभलक्षणम्॥ ९॥
तत्पश्चात् उस राक्षसराजने स्पष्टरूपसे अपने नामकी घोषणा करके शुभलक्षण लक्ष्मणको युद्धके लिये ललकारा॥ ९॥

तं लक्ष्मणोऽभ्यधावच्च प्रगृह्य सशरं धनुः।
त्रासयंस्तलघोषेण सिंहः क्षुद्रमृगान् यथा॥ १०॥
तब लक्ष्मण भी धनुषपर बाण चढ़ाये हुए उसकी ओर बड़े वेगसे दौड़े और सिंह जैसे छोटे मृगोंको डरा देता है, उसी प्रकार वे अपने धनुषकी टंकारसे सब राक्षसोंको त्रास देने लगे॥ १०॥

तयोः समभवद् युद्धं सुमहज्जयगृद्धिनोः।
दिव्यास्त्रविदुषोस्तीव्रमन्योन्यस्पर्धिनोस्तदा॥ ११॥
वे दोनों ही विजयकी अभिलाषा रखनेवाले, दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता तथा परस्पर बड़ी स्पर्धा रखनेवाले थे। उन दोनोंमें उस समय बड़ा भारी युद्ध हुआ॥ ११॥

रावणिस्तु यदा नैनं विशेषयति सायकैः।
ततो गुरुतरं यत्नमतिष्ठद् बलिनां वरः॥ १२॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ रावणकुमार इन्द्रजित् जब बाण-वर्षा करनेमें लक्ष्मणसे आगे न बढ़ सका, तब उसने गुरुतर प्रयत्न आरम्भ किया॥ १२॥

तत एनं महावेगैदर्दयामास तोमरैः।
तानागतान् स चिच्छेद सौमित्रिर्निशितैः शरैः॥ १३॥
उसने अत्यन्त वेगशाली तोमरोंकी वर्षा करके लक्ष्मणको पीड़ा पहुँचानेकी चेष्टा की, परंतु लक्ष्मणने तीखे बाणोंसे उन सब तोमरोंको पास आते ही काट गिराया॥ १३॥

ते निकृत्ताः शरैस्तीक्ष्णैर्न्यपतन् धरणीतले।
तमङ्गदो वालिसुतः श्रीमानुद्यम्य पादपम्॥ १४॥
अभिद्रुत्य महावेगस्ताडयामास मूर्धनि।
तस्येन्द्रजिदसम्भ्रान्तः प्रासेनोरसि वीर्यवान्॥ १५॥

प्रहर्तुमैच्छत् तं चास्य प्रासं चिच्छेद लक्ष्मणः ।
लक्ष्मणके तीखे बाणोंसे टूक-टूक होकर वे तोमर पृथ्वीपर बिखर गये। तब महावेगशाली वालिपुत्र श्रीमान् अंगदने एक वृक्ष उठा लिया और दौड़कर इन्द्रजित्‌के मस्तकपर उसे दे मारा; परंतु इन्द्रजित् इससे तनिक भी विचलित न हुआ। उस पराक्रमी वीरने प्रासद्वारा अंगदकी छातीमें प्रहार करनेका विचार किया, किंतु लक्ष्मणने उसे पहले ही काट गिराया ।। १४-१५ १/२ ।।
तमभ्याशगतं वीरमङ्गदं रावणात्मजः ।। १६ ।।
गदयाताडयत् सव्ये पार्श्वे वानरपुङ्गवम् ।
तब रावणकुमारने अपने निकट आये हुए उस वानरश्रेष्ठ वीर अंगदकी बायीं पसलीमें गदासे आघात किया ।। १६ १/२ ।।
तमचिन्त्य प्रहारं स बलवान् वालिनः सुतः ।। १७ ।।
ससर्जेन्द्रजितः क्रोधाच्छालस्कन्धं तथाङ्गदः ।
बलवान् वालिनन्दन अंगदने इन्द्रजित्‌के उस गदाप्रहारकी कोई परवा न करके ऊपर क्रोधपूर्वक साखूका तना उठाकर दे मारा ।। १७ १/२ ।।
सोऽङ्गदेन रुषोत्सृष्टो वधायेन्द्रजितस्तरुः ।। १८ ।।
जघानेन्द्रजितः पार्थ रथं साश्वं ससारथिम् ।
युधिष्ठिर! अंगदके द्वारा इन्द्रजित्‌के वधके लिये रोषपूर्वक चलाये हुए उस वृक्षने उसके सारथि और घोड़ोंसहित रथको नष्ट कर दिया ।। १८ १/२ ।।
ततो हताश्वात् प्रस्कन्द्य रथात् स हतसारथिः ।। १९ ।।
तत्रैवान्तर्दधे राजन् मायया रावणात्मजः ।
राजन्! सारथिके मारे जानेपर रावणकुमार इन्द्रजित् उस अश्वहीन रथसे कूद पड़ा और मायाका आश्रय ले वहीं अन्तर्धान हो गया ।। १९ १/२ ।।
अन्तर्हितं विदित्वा तं बहुमायं च राक्षसम् ।। २० ।।
रामस्तं देशमागम्य तत् सैन्यं पर्यरक्षत ।
अनेक प्रकारकी माया जाननेवाले उस राक्षसको अदृश्य हुआ जान भगवान् श्रीराम उस स्थानपर आकर सब ओरसे अपनी सेनाकी रक्षा करने लगे ।। २० १/२ ।।
स राममुद्दिश्य शरैस्ततो दत्तवरैस्तदा ।। २१ ।।
विव्याध सर्वगात्रेषु लक्ष्मणं च महाबलम् ।
तब इन्द्रजित्‌ने भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणके सम्पूर्ण अंगोंको देवताओंसे वरदानके रूपमें प्राप्त हुए बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत कर दिया ।। २१ १/२ ।।
तमदृश्यं शरैः शूरौ माययान्तर्हितं तदा ।। २२ ।।
योधयामासतुरुभौ रावणिं रामलक्ष्मणौ ।

यद्यपि रावणका पुत्र मायासे तिरोहित हो जानेके कारण दिखायी नहीं देता था, तो भी शूरवीर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई उसके साथ युद्ध करते ही रहे ।। २२ १/२ ।।
स रुषा सर्वगात्रेषु तयोः पुरुषसिंहयोः ।। २३ ।।
व्यसृजत् सायकान् भूयः शतशोऽथ सहस्रशः ।
इन्द्रजित्ने पुरुषोंमें सिंहके समान पराक्रमी उन दोनों भाइयोंके समस्त अंगोंमें रोषपूर्वक सैकड़ों और हजारों बाणोंकी बारंबार वृष्टि की ।। २३ १/२ ।।
तमदृश्यं विचिन्वन्तः सृजन्तमनिशं शरान् ।। २४ ।।
हरयो विविशुर्व्योम प्रगृह्य महतीः शिलाः ।
वानरोंने देखा कि वह राक्षस छिपकर निरन्तर बाणोंकी झड़ी लगा रहा है, तब वे हाथोंमें बड़ी-बड़ी शिलाएँ लिये आकाशमें उड़ गये और उसकी खोज करने लगे ।। २४ १/२ ।।
तांश्च तौ चाप्यदृश्यः स शरैर्विव्याध राक्षसः ।। २५ ।।
स भृशं ताडयामास रावणिर्माययाऽऽवृतः ।
रावणकुमार अपनी मायासे आवृत होनेके कारण स्वयं किसीकी दृष्टिमें नहीं आता था; परंतु वह उन दोनों भाइयोंको तथा सम्पूर्ण वानरोंको भी निरन्तर अपने बाणोंद्वारा घायल कर रहा था ।। २५ १/२ ।।
तौ शरैराचितौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
पेततुर्गगनाद् भूमिं सूर्याचन्द्रमसाविव ।। २६ ।।
वे दोनों बन्धु श्रीराम और लक्ष्मण ऊपरसे नीचेतक बाणोंसे व्याप्त हो गये थे; अतः आकाशसे गिरे हुए सूर्य और चन्द्रमाकी भाँति इस पृथ्वीपर गिर पड़े ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि इन्द्रजिद्युद्धे
अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें इन्द्रजित्-युद्धविषयक दो सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८८ ।।