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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 719)

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देवताओंद्वारा वृत्रासुरके वधके लिये दधीचिसे उनकी अस्थियोंकी याचना


देवराज इन्द्रका वज्रके प्रहारसे वृत्रासुरका वध करना

'उसकी आकृति षट्कोणके समान होगी। वह महान् एवं घोर शत्रुनाशक अस्त्र भयंकर गड़गड़ाहट पैदा करनेवाला होगा। उस वज्रके द्वारा इन्द्र निश्चय ही वृत्रासुरका वध कर डालेंगे ।। ११ ।।

एतद् वः सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्रं विधीयताम् ।
एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् ।। १२ ।।
नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्वाश्रमं ययुः ।
सरस्वत्याः परे पारे नानाद्रुमलतावृतम् ।। १३ ।।

'ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दी हैं। अतः अब शीघ्रता करो।' ब्रह्माजीके ऐसा करनेपर सब देवता उनकी आज्ञा ले भगवान् नारायणको आगे करके दधीचके आश्रमपर गये। वह आश्रम सरस्वती नदीके उस पार था। अनेक प्रकारके वृक्ष और लताएँ उसे घेरे हुए थीं ।। १२-१३ ।।

षट्पदोद्गीतनिनादैर्विघुष्टं सामगैरिव ।
पुंस्कोकिलरवोन्मिश्रं जीवं जीवकनादितम् ।। १४ ।।

भ्रमरोंके गीतोंकी ध्वनिसे वह स्थान इस प्रकार गूँज रहा था, मानो सामगान करनेवाले ब्राह्मणोंद्वारा सामवेदका पाठ हो रहा हो। कोकिलके कलरवोंसे कूजित और दूसरे जन्तुओं (पशु-पक्षियों) के शब्दोंसे कोलाहलपूर्ण बना हुआ वह आश्रम सजीव-सा जान पड़ता था ।। १४ ।।

महिषैश्च वराहेश्च सृमरैश्चमरैरपि ।
तत्र तत्रानुचरितं शार्दूलभयवर्जितैः ।। १५ ।।

भैंसे, सूअर, बालमृग और चवँरी गायें बाघ-सिंहोंके भयसे रहित हो उस आश्रमके आस-पास विचर रही थीं ।। १५ ।।

करेणुभिर्वारणैश्च प्रभिन्नकरटामुखैः ।
सरोऽवगाढैः क्रीडद्भिः समन्तादनुनादितम् ।। १६ ।।

अपने कपोलोंसे मदकी धारा बहानेवाले हाथी और हथिनियाँ वहाँ सरोवरके जलमें गोते लगाकर क्रीड़ाएँ कर रहे थे, जिससे आश्रमके चारों ओर कोलाहल-सा हो रहा था ।। १६ ।।

सिंहव्याघ्रैर्महानादान्नदद्भिरनुनादितम् ।
अपरैश्चापि संलीनैर्गुहाकन्दरशायिभिः ।। १७ ।।

पर्वतोंकी गुफाओं तथा कन्दराओंमें लेटे, झाड़ियोंमें छिपे और वनमें विचरते हुए जोर-जोरसे दहाड़नेवाले सिंहों और व्याघ्रोंकी गर्जनासे वह स्थान गूँज रहा था ।।

तेषु तेष्ववकाशेषु शोभितं सुमनोरमम् ।
त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीचाश्रममागमन् ।। १८ ।।

विभिन्न स्थानोंमें अधिक शोभा पानेवाला महर्षि दधीचका वह मनोरम आश्रम स्वर्गके समान प्रतीत होता था। देवता लोग वहाँ आ पहुँचे ॥ १८ ॥
तत्रापश्यन् दधीचं ते दिवाकरसमद्युतिम् ।
जाज्वल्यमानं वपुषा यथा लक्ष्म्या पितामहम् ॥ १९ ॥
उन्होंने देखा, महर्षि दधीच भगवान् सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहे हैं। अपने शरीरकी दिव्य कान्तिसे साक्षात् ब्रह्माजीके समान जान पड़ते हैं ॥ १९ ॥

तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवाद्य प्रणम्य च ।
अयाचन्त वरं सर्वे यथोक्तं परमेष्ठिना ॥ २० ॥
राजन्! उस समय सब देवताओंने महर्षिके चरणोंमें अभिवादन एवं प्रणाम करके ब्रह्माजीने जैसे कहा था, उसी प्रकार उनसे वर माँगा ॥ २० ॥
ततो दधीचः परमप्रतीतः
सुरोत्तमांस्तानिदमभ्युवाच ।
करोमि यद् वो हितमद्य देवाः
स्वं चापि देहं स्वयमुत्सृजामि ॥ २१ ॥
तब महर्षि दधीचने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन श्रेष्ठ देवताओंसे इस प्रकार कहा—‘देवगण! आज मैं वही करूँगा, जिससे आपलोगोंका हित हो। अपने इस शरीरको मैं

स्वयं ही त्याग देता हूँ' ।। २१ ।।
स एवमुक्त्वा द्विपदां वरिष्ठः
प्राणान् वशी स्वान् सहसोत्ससर्ज ।
ततः सुरास्ते जगृहुः परासो-
रस्थीनि तस्याथ यथोपदेशम् ।। २२ ।।
ऐसा कहकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ, जितेन्द्रिय महर्षि दधीचने सहसा अपने प्राणोंका त्याग कर दिया। तब देवताओंने ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार महर्षिके निर्जीव शरीरसे हड्डियाँ ले लीं ।। २२ ।।
प्रहृष्टरूपाश्च जयाय देवा-
स्त्वष्टारमागम्य तमर्थमूचुः ।
त्वष्टा तु तेषां वचनं निशम्य
प्रहृष्टरूपः प्रयतः प्रयत्नात् ।। २३ ।।
चकार वज्रं भृशमुग्ररूपं
कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्टः ।
अनेन वज्रप्रवरेण देव
भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम् ।। २४ ।।
इसके बाद वे हर्षोल्लाससे भरकर विजयकी आशा लिये त्वष्टा प्रजापतिके पास आये और उनसे अपना प्रयोजन बताया। देवताओंकी बात सुनकर त्वष्टा प्रजापति बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने एकाग्रचित्त हो प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण किया। तत्पश्चात् वे हर्षमें भरकर इन्द्रसे बोले—'देव! इस उत्तम वज्रसे आप आज ही भयंकर देवद्रोही वृत्रासुरको भस्म कर डालिये ।।
ततो हतारिः सगणः सुखं वै
प्रशाधि कृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठः ।
त्वष्ट्रा तथोक्तस्तु पुरंदरस्तद्
वज्रं प्रहृष्टः प्रयतो ह्यगृह्णात् ।। २५ ।।
'इस प्रकार शत्रुके मारे जानेपर आप देवगणोंके साथ स्वर्गमें रहकर सुखपूर्वक सम्पूर्ण स्वर्गका शासन एवं पालन कीजिये।' त्वष्टा प्रजापतिके ऐसा कहनेपर इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने शुद्धचित्त होकर उनके हाथसे वह वज्र ले लिया ।। २५ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वज्रनिर्माणकथने
शततमोऽध्यायः ।। १०० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें वज्रनिर्माणकथनविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।।