महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 433)
द्विषष्टितमोऽध्यायः
राजा नलकी चिन्ता और दमयन्तीको अकेली सोती छोड़कर उनका अन्यत्र प्रस्थान
नल उवाच
यथा राज्यं तव पितुस्तथा मम न संशयः ।
न तु तत्र गमिष्यामि विषमस्थः कथंचन ॥ १ ॥
नलने कहा— प्रिये! इसमें संदेह नहीं कि विदर्भराज्य जैसे तुम्हारे पिताका है, वैसे मेरा भी है, तथापि आपत्तिमें पड़ा हुआ मैं किसी तरह वहाँ नहीं जाऊँगा ॥ १ ॥
कथं समृद्धो गत्वाहं तव हर्षविवर्धनः ।
परिच्युतो गमिष्यामि तव शोकविवर्धनः ॥ २ ॥
एक दिन मैं भी समृद्धिशाली राजा था। उस अवस्थामें वहाँ जाकर मैंने तुम्हारे हर्षको बढ़ाया था और आज उस राज्यसे वंचित होकर केवल तुम्हारे शोककी वृद्धि कर रहा हूँ, ऐसी दशामें वहाँ कैसे जाऊँगा? ॥ २ ॥
बृहदश्व उवाच
इति ब्रुवन् नलो राजा दमयन्तीं पुनः पुनः ।
सान्त्वयामास कल्याणीं वाससोऽर्धेन संवृताम् ॥ ३ ॥
तावेकवस्त्रसंवीतावटमानावितस्ततः ।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ सभां कांचिदुपेयतुः ॥ ४ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! आधे वस्त्रसे ढकी हुई कल्याणमयी दमयन्तीसे बार-बार ऐसा कहकर राजा नलने उसे सान्त्वना दी; क्योंकि वे दोनों एक ही वस्त्रसे अपने अंगोंको ढककर इधर-उधर घूम रहे थे। भूख और प्याससे थके-माँदे वे दोनों दम्पति किसी सभाभवन (धर्मशाला)-में जा पहुँचे ॥ ३-४ ॥
तां सभामुपसम्प्राप्य तदा स निषधाधिपः ।
वैदर्भ्या सहितो राजा निषसाद महीतले ॥ ५ ॥
तब उस धर्मशालामें पहुँचकर निषधनरेश राजा नल वैदर्भीके साथ भूतलपर बैठे ॥ ५ ॥
स वै विवस्त्रो विकटो मलिनः पांसुगुण्ठितः ।
दमयन्त्या सह श्रान्तः सुष्वाप धरणीतले ॥ ६ ॥
वे वस्त्रहीन, चटाई आदिसे रहित, मलिन एवं धूलि-धूसरित हो रहे थे। दमयन्तीके साथ थककर भूमिपर ही सो गये ॥ ६ ॥
दमयन्त्यपि कल्याणी निद्रयापहृता ततः ।
सहसा दुःखमासाद्य सुकुमारी तपस्विनी ॥ ७ ॥
सुकुमारी तपस्विनी कल्याणमयी दमयन्ती भी सहसा दुःखमें पड़ गयी थी। वहाँ आनेपर उसे भी निद्राने घेर लिया ॥ ७ ॥
सुप्तायां दमयन्त्यां तु नलो राजा विशाम्पते ।
शोकोन्मथितचित्तात्मा न स्म शेते तथा पुरा ॥ ८ ॥
राजन्! राजा नलका चित्त शोकसे मथा जा रहा था। वे दमयन्तीके सो जानेपर भी स्वयं पहलेकी भाँति सो न सके ॥ ८ ॥
स तद् राज्यापहरणं सुहृत्त्यागं च सर्वशः ।
वने च तं परिध्वंसं प्रेक्ष्य चिन्तामुपेयिवान् ॥ ९ ॥
राज्यका अपहरण, सुहृदोंका त्याग और वनमें प्राप्त होनेवाले नाना प्रकारके क्लेशपर विचार करते हुए वे चिन्ताको प्राप्त हो गये ॥ ९ ॥
किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः ।
किं नु मे मरणं श्रेयः परित्यागो जनस्य वा ॥ १० ॥
वे सोचने लगे ‘ऐसा करनेसे मेरा क्या होगा और यह कार्य न करनेसे भी क्या होगा। मेरा मर जाना अच्छा है कि अपनी आत्मीया दमयन्तीको त्याग देना ॥ १० ॥
मामियं ह्यनुरक्तैवं दुःखमाप्नोति मत्कृते ।
मद्विहीना त्वियं गच्छेत् कदाचित् स्वजनं प्रति ॥ ११ ॥
‘यह मुझसे इस प्रकार अनुरक्त होकर मेरे ही लिये दुःख उठा रही है। यदि मुझसे अलग हो जाय तो यह कदाचित् अपने स्वजनोंके पास जा सकती है ॥ ११ ॥
मयि निःसंशयं दुःखमियं प्राप्स्यत्यनुव्रता ।
उत्सर्गे संशयः स्यात् तु विन्देतापि सुखं क्वचित् ॥ १२ ॥
‘मेरे पास रहकर तो यह पतिव्रता नारी निश्चय ही केवल दुःख भोगेगी। यद्यपि इसे त्याग देनेपर एक संशय बना रहेगा तो भी यह सम्भव है कि इसे कभी सुख मिल जाय’ ॥ १२ ॥
स विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ।
उत्सर्गं मन्यते श्रेयो दमयन्त्या नराधिप ॥ १३ ॥
राजन्! नल अनेक प्रकारसे बार-बार विचार करके एक निश्चयपर पहुँच गये और दमयन्तीका परित्याग कर देनेमें ही उसकी भलाई मानने लगे ॥ १३ ॥
न चैषा तेजसा शक्या कैश्चिद् धर्षयितुं पथि ।
यशस्विनी महाभागा मद्भक्तेयं पतिव्रता ॥ १४ ॥
‘यह महाभागा यशस्विनी दमयन्ती मेरी भक्त और पतिव्रता है। पातिव्रत-तेजके कारण मार्गमें कोई इसका सतीत्व नष्ट नहीं कर सकता’ ॥ १४ ॥
एवं तस्य तदा बुद्धिर्दमयन्त्यां न्यवर्तत ।
कलिना दुष्टभावेन दमयन्त्या विसर्जने ।। १५ ।।
ऐसा सोचकर उनकी बुद्धि दमयन्तीको अपने साथ रखनेके विचारसे निवृत्त हो गयी। बल्कि दुष्ट स्वभाववाले कलियुगसे प्रभावित होनेके कारण दमयन्तीको त्याग देनेमें ही उनकी बुद्धि प्रवृत्त हुई ।। १५ ।।
सोऽवस्त्रतामात्मनश्च तस्याश्चाप्येकवस्त्रताम् ।
चिन्तयित्वाध्यगाद् राजा वस्त्रार्धस्यावकर्तनम् ।। १६ ।।
तदनन्तर राजाने अपनी वस्त्रहीनता और दमयन्तीकी एकवस्त्रताका विचार करके उसके आधे वस्त्रको फाड़ लेना ही उचित समझा ।। १६ ।।
कथं वासो विकर्तेयं न च बुध्येत मे प्रिया ।
विचिन्त्यैवं नलो राजा सभां पर्यचरत्तदा ।। १७ ।।
फिर यह सोचकर कि 'मैं कैसे वस्त्रको काटूँ, जिससे मेरी प्रियाकी नींद न टूटे।' राजा नल धर्मशालामें (नंगे ही) इधर-उधर घूमने लगे ।। १७ ।।
परिधावन्नथ नल इतश्चेतश्च भारत ।
आससाद सभोद्देशे विकोशं खड्गमुत्तमम् ।। १८ ।।
भारत! इधर-उधर दौड़-धूप करनेपर राजा नलको उस सभाभवनमें एक अच्छी-सी नंगी तलवार मिल गयी ।। १८ ।।
तेनार्धं वाससश्छित्त्वा निवस्य च परंतपः।
सुप्तामुत्सृज्य वैदर्भीं प्राद्रवद् गतचेतनाम्॥ १९॥
उसीसे दमयन्तीका आधा वस्त्र काटकर परंतप नलने उसके द्वारा अपना शरीर ढँक लिया और अचेत सोती हुई विदर्भराजकुमारी दमयन्तीको वहीं छोड़कर वे शीघ्रतासे चले गये॥ १९॥
ततो निवृत्तहृदयः पुनरागम्य तां सभाम्।
दमयन्तीं तदा दृष्ट्वा रुरोद निषधाधिपः॥ २०॥
कुछ दूर जानेपर उनके हृदयका विचार पलट गया और वे पुनः उसी सभाभवनमें लौट आये। वहाँ उस समय दमयन्तीको देखकर निषधनरेश नल फूट-फूटकर रोने लगे॥ २०॥
यां न वायुर्न चादित्यः पुरा पश्यति मे प्रियाम्।
सेयमद्य सभामध्ये शेते भूमावनाथवत्॥ २१॥
(वे विलाप करते हुए कहने लगे—) ‘पहले जिस मेरी प्रियतमा दमयन्तीको वायु तथा सूर्य देवता भी नहीं देख पाते थे, वही आज इस धर्मशालामें भूमिपर अनाथकी भाँति सो रही है॥ २१॥
इयं वस्त्रावकर्तेन संवीता चारुहासिनी।
उन्मत्तेव वरारोहा कथं बुद्ध्वा भविष्यति॥ २२॥
‘यह मनोहर हास्यवाली सुन्दरी वस्त्रके आधे टुकड़ेसे लिपटी हुई सो रही है। जब इसकी नींद खुलेगी, तब पगली-सी होकर न जाने यह कैसी दशाको पहुँच जायगी॥ २२॥
कथमेका सती भैमी मया विरहिता शुभा।
चरिष्यति वने घोरे मृगव्यालनिषेविते॥ २३॥
‘यह भयंकर वन हिंसक पशुओं और सर्पोंसे भरा है। मुझसे बिछुड़कर शुभलक्षणा सती दमयन्ती अकेली इस वनमें कैसे विचरण करेगी?॥ २३॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ समरुद्गणौ।
रक्षन्तु त्वां महाभागे धर्मेणासि समावृता॥ २४॥
‘महाभागे! तुम धर्मसे आवृत हो, आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्गण—ये सब देवता तुम्हारी रक्षा करें’॥ २४॥
एवमुक्त्वा प्रियां भार्यां रूपेणाप्रतिमां भुवि।
कलिनापहृतज्ञानो नलः प्रातिष्ठदुद्यतः॥ २५॥
इस भूतलपर रूप-सौन्दर्यमें जिसकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी, उसी अपनी प्यारी पत्नी दमयन्तीके प्रति इस प्रकार कहकर राजा नल वहाँसे उठे और चल दिये। उस समय कलिने इनकी विवेकशक्ति हर ली थी॥ २५॥
गत्वा गत्वा नलो राजा पुनरेति सभां मुहुः।
आकृष्यमाणः कलिना सौहृदेनावकृष्यते ॥ २६ ॥
राजा नलको एक ओर कलियुग खींच रहा था और दूसरी ओर दमयन्तीका सौहार्द। अतः वे बार-बार जाकर फिर उस धर्मशालामें ही लौट आते थे ॥ २६ ॥
द्विधेव हृदयं तस्य दुःखितस्याभवत् तदा ।
दोलेव मुहुरायाति याति चैव सभां प्रति ॥ २७ ॥
उस समय दुःखी राजा नलका हृदय मानो दुविधामें पड़ गया था। जैसे झूला बार-बार नीचे-ऊपर आता-जाता रहता है, उसी प्रकार उनका हृदय कभी बाहर जाता, कभी सभाभवनमें लौट आता था ॥ २७ ॥
अवकृष्टस्तु कलिना मोहितः प्राद्रवन्नलः ।
सुप्तामुत्सृज्य तां भार्यां विलप्य करुणं बहु ॥ २८ ॥
अन्तमें कलियुगने प्रबल आकर्षण किया, जिससे मोहित होकर राजा नल बहुत देरतक करुण विलाप करके अपनी सोती हुई पत्नीको छोड़कर शीघ्रतासे चले गये ॥ २८ ॥
नष्टात्मा कलिना स्पृष्टस्तत् तद् विगणयन् नृपः ।
जगामैकां वने शून्ये भार्यामुत्सृज्य दुःखितः ॥ २९ ॥
कलियुगके स्पर्शसे उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी; अतः वे अत्यन्त दुःखी हो विभिन्न बातोंका विचार करते हुए उस सूने वनमें अपनी पत्नीको अकेली छोड़कर चल दिये ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीपरित्यागे
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीपरित्यागविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥