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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१२३-

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त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति

लोमश उवाच

कस्यचित् त्वथ कालस्य त्रिदशावश्विनौ नृप ।
कृताभिषेकां विवृतां सुकन्यां तामपश्यताम् ॥ १ ॥
तां दृष्ट्वा दर्शनीयाङ्गीं देवराजसुतामिव ।
ऊचतुः समभिद्रुत्य नासत्यावश्विनाविदम् ॥ २ ॥

लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर कुछ कालके बाद जब एक समय सुकन्या स्नान कर चुकी थी, उस समय उसके सब अंग ढके हुए नहीं थे। इसी अवस्थामें दोनों अश्विनीकुमार देवताओंने उसे देखा। साक्षात् देवराज इन्द्रकी पुत्रीके समान दर्शनीय अंगोंवाली उस राजकन्याको देखकर नासत्यसंज्ञक अश्विनीकुमारोंने उसके पास जा यह बात कही— ॥ १-२ ॥

कस्य त्वमसि वामोरु वनेऽस्मिन् किं करोषि च ।
इच्छाव भद्रे ज्ञातुं त्वां तत्त्वमाख्याहि शोभने ॥ ३ ॥

‘वामोरु! तुम किसकी पुत्री और किसकी पत्नी हो? इस वनमें क्या करती हो? भद्रे! हम तुम्हारा परिचय प्राप्त करना चाहते हैं। शोभने! तुम सब बातें ठीक-ठीक बताओ’ ॥ ३ ॥

ततः सुकन्या सव्रीडा तावुवाच सुरोत्तमौ ।
शर्यातितनयां वित्तं भार्यां मां च्यवनस्य च ॥ ४ ॥

तब सुकन्याने लज्जित होकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओंसे कहा—‘देवेश्वरो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं राजा शर्यातिकी पुत्री और महर्षि च्यवनकी पत्नी हूँ ॥ ४ ॥

(नाम्ना चाहं सुकन्येति नृलोकेऽस्मिन् प्रतिष्ठिता ।
साहं सर्वात्मना नित्यं पतिं प्रति सुनिष्ठिता ॥)
अथाश्विनौ प्रहस्यैतामब्रूतां पुनरेव तु ।
कथं त्वमसि कल्याणि पित्रा दत्ता गताध्वने ॥ ५ ॥
भ्राजसेऽस्मिन् वने भीरु विद्युतसौदामनी यथा ।
न देवेष्वपि तुल्यां हि त्वया पश्याव भाविनि ॥ ६ ॥

‘मेरा नाम इस जगत्‌में सुकन्या प्रसिद्ध है। मैं सम्पूर्ण हृदयसे सदा अपने पतिदेवके प्रति निष्ठा रखती हूँ।’ यह सुनकर अश्विनीकुमारोंने पुनः हँसते हुए कहा—‘कल्याणि!

तुम्हारे पिताने इस अत्यन्त बूढ़े पुरुषके साथ तुम्हारा विवाह कैसे कर दिया? भीरु! इस वनमें तुम विद्युत्की भाँति प्रकाशित हो रही हो। भामिनि! देवताओंके यहाँ भी तुम-जैसी सुन्दरीको हम नहीं देख पाते हैं ।। ५-६ ।।

अनाभरणसम्पन्ना परमाम्बरवर्जिता ।
शोभयस्यधिकं भद्रे वनमप्यनलंकृता ।। ७ ।।
'भद्रे! तुम्हारे अंगोंपर आभूषण नहीं है। तुम उत्तम वस्त्रोंसे भी वञ्चित हो और तुमने कोई शृंगार भी नहीं धारण किया है तो भी इस वनकी अधिकाधिक शोभा बढ़ा रही हो ।। ७ ।।

सर्वाभरणसम्पन्ना परमाम्बरधारिणी ।
शोभसे त्वनवद्याङ्गि न त्वेवं मलपङ्किनी ।। ८ ।।
'निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! यदि तुम समस्त भूषणोंसे भूषित हो जाओ और अच्छे-अच्छे वस्त्र पहन लो तो उस समय तुम्हारी जो शोभा होगी, वैसी इस मल और पंकसे युक्त मलिन वेशमें नहीं हो रही है ।। ८ ।।

कस्मादेवंविधा भूत्वा जराजर्रितं पतिम् ।
त्वमुपास्से ह कल्याणि कामभोगबहिष्कृतम् ।। ९ ।।
'कल्याणि! तुम ऐसी अनुपम सुन्दरी होकर कामभोगसे शून्य इस जरा-जर्जर बूढ़े पतिकी उपासना कैसे करती हो? ।। ९ ।।

असमर्थं परित्राणे पोषणे तु शुचिस्मिते ।
सा त्वं च्यवनमुत्सृज्य वरयस्वैकमावयोः ।। १० ।।
'पवित्र मुसकानवाली देवि! वह बूढ़ा तो तुम्हारी रक्षा और पालन-पोषणमें भी समर्थ नहीं है। अतः तुम च्यवनको छोड़कर हम दोनोंमेंसे किसी एकको अपना पति चुन लो ।। १० ।।

पत्यर्थं देवगर्भाभे मा वृथा यौवनं कृथाः ।
एवमुक्ता सुकन्यापि सुरौ ताविदमब्रवीत् ।। ११ ।।
'देवकन्याके समान सुन्दरी राजकुमारी! बूढ़े पतिके लिये अपनी इस जवानीको व्यर्थ न गँवाओ।' उनके ऐसा कहनेपर सुकन्याने उन दोनों देवताओंसे कहा— ।। ११ ।।

रताहं च्यवने पत्यौ मैवं मां पर्यशङ्कतम् ।
तावब्रूतां पुनस्त्वेनामावां देवभिषग्वरौ ।। १२ ।।
युवानं रूपसम्पन्नं करिष्यावः पतिं तव ।
ततस्तस्यावयोश्चैव वृणीष्वान्यतमं पतिम् ।। १३ ।।
एतेन समयेनैनमामन्त्रय पतिं शुभे ।

‘देवेश्वरो! मैं अपने पतिदेव च्यवनमुनिमें ही पूर्ण अनुराग रखती हूँ, अतः आप मेरे विषयमें इस प्रकारकी अनुचित आशंका न करें।’ तब उन दोनोंने पुनः सुकन्यासे कहा—‘शुभे! हम देवताओंके श्रेष्ठ वैद्य हैं। तुम्हारे पतिको तरुण और मनोहर रूपसे सम्पन्न बना देंगे। तब तुम हम तीनोंमेंसे किसी एकको अपना पति बना लेना। इस शर्तके साथ तुम चाहो तो अपने पतिको यहाँ बुला लो’ ॥ १२-१३ १/२ ॥

सा तयोर्वचनाद् राजन्नुपसंगम्य भार्गवम् ॥ १४ ॥
उवाच वाक्यं यत् ताभ्यामुक्तं भृगुसुतं प्रति ।
तच्छ्रुत्वा च्यवनो भार्यामुवाच क्रियतामिति ॥ १५ ॥
राजन्! उन दोनोंकी यह बात सुनकर सुकन्या च्यवन मुनिके पास गयी और अश्विनीकुमारोंने जो कुछ कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया। यह सुनकर च्यवनने अपनी पत्नीसे कहा—‘प्रिये! देववैद्योंने जैसा कहा है, वैसा करो’ ॥ १४-१५ ॥

(सा भर्त्रा समनुज्ञाता क्रियतामिति चाब्रवीत् ।
श्रुत्वा तदश्विनौ वाक्यं तस्यास्तत् क्रियतामिति ॥)
ऊचतू राजपत्रीं तां पतिस्तव विशत्वपः ।
ततोऽम्भश्च्यवनः शीघ्रं रूपार्थी प्रविवेश ह ॥ १६ ॥
पतिकी यह आज्ञा पाकर सुकन्याने अश्विनीकुमारोंसे कहा—‘आप मेरे पतिको रूप और यौवनसे सम्पन्न बना दें।’ उसका यह कथन सुनकर अश्विनीकुमारोंने राजकुमारी सुकन्यासे कहा—‘तुम्हारे पतिदेव इस जलमें प्रवेश करें।’ तब च्यवन मुनिने सुन्दर रूपकी अभिलाषा लेकर शीघ्रतापूर्वक उस सरोवरके जलमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥

अश्विनावपि तद् राजन् सरः प्राविशतां तदा ।
ततो मुहूर्तादुत्तीर्णाः सर्वे ते सरसस्तदा ॥ १७ ॥
दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो मृष्टकुण्डलाः ।
तुल्यवेषधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्धनाः ॥ १८ ॥
राजन्! उनके साथ ही दोनों अश्विनीकुमार भी उस सरोवरमें प्रवेश कर गये। तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् वे सब-के-सब दिव्य रूप धारण करके सरोवरसे बाहर निकले। उन सबकी युवावस्था थी। उन्होंने कानोंमें चमकीले कुण्डल धारण कर रखे थे। वेष-भूषा भी उनकी एक-सी ही थी और वे सभी मनकी प्रीति बढ़ानेवाले थे ॥ १७-१८ ॥

तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे वृणीष्वान्यतमं शुभे ।
अस्माकमीप्सितं भद्रे पतित्वे वरवर्णिनि ॥ १९ ॥
सरोवरसे बाहर आकर उन सबने एक साथ कहा—‘शुभे! भद्रे! वरवर्णिनि! हममेंसे किसी एकको जो तुम्हारी रुचिके अनुकूल हो, अपना पति बना लो’ ॥ १९ ॥

यत्र वाप्यभिकामासि तं वृणीष्व सुशोभने ।
सा समीक्ष्य तु तान् सर्वांस्तुल्यरूपधरान् स्थितान् ॥ २० ॥

निश्चित्य मनसा बुद्ध्या देवी वव्रे स्वकं पतिम् ।
लब्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वयो रूपं च वाञ्छितम् ॥ २१ ॥
हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः ।
यथाहं रूपसम्पन्नो वयसा च समन्वितः ॥ २२ ॥
कृतो भवद्भ्यां वृद्धः सन् भार्यां च प्राप्तवानिमाम् ।
तस्माद् युवां करिष्यामि प्रीत्याहं सोमपीथिनौ ।
मिषतो देवराजस्य सत्यमेतद् ब्रवीमि वाम् ॥ २३ ॥

‘अथवा शोभने! जिसको भी तुम मनसे चाहती होओ, उसीको पति बनाओ।’ देवी सुकन्याने उन सबको एक-जैसा रूप धारण किये खड़े देख मन और बुद्धिसे निश्चय करके अपने पतिको ही स्वीकार किया। महातेजस्वी च्यवन मुनिने अनुकूल पत्नी, तरुण अवस्था और मनोवाञ्छित रूप पाकर बड़े हर्षका अनुभव किया और दोनों अश्विनीकुमारोंसे कहा—‘आप दोनोंने मुझ बूढ़ेको रूपवान् और तरुण बना दिया, साथ ही मुझे अपनी यह भार्या भी मिल गयी; इसलिये मैं प्रसन्न होकर आप दोनोंको यज्ञमें देवराज इन्द्रके सामने ही सोमपानका अधिकारी बना दूँगा। यह मैं आपलोगोंसे सत्य कहता हूँ’ ॥ २०—२३ ॥

तच्छ्रुत्वा हृष्टमनसौ दिवं तौ प्रतिजग्मतुः ।

च्यवनश्च सुकन्या च सुराविव विजह्रतुः ॥ २४ ॥
यह सुनकर दोनों अश्विनीकुमार प्रसन्नचित्त हो देवलोकको लौट गये और च्यवन तथा सुकन्या देवदम्पतिकी भाँति विहार करने लगे ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राप्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं)