महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
किमकुर्वन् कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ॥ १ ॥
एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
प्रभासतीर्थमें बलरामजीके पाण्डवोंके प्रति सहानुभूतिसूचक दुःखपूर्ण उद्गार
जनमेजय उवाच
प्रभासतीर्थमासाद्य पाण्डवा वृष्णयस्तथा ।
किमकुर्वन् कथाश्चैषां कास्तत्रासंस्तपोधन ॥ १ ॥
ते हि सर्वे महात्मानः सर्वशास्त्रविशारदाः ।
वृष्णयः पाण्डवाश्चैव सुहृदश्च परस्परम् ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा— तपोधन! प्रभासतीर्थमें पहुँचकर पाण्डवों तथा वृष्णिवंशियोंने क्या किया? वहाँ उनमें कैसी बातचीत हुई? वे सब महात्मा यादव और पाण्डव सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् और एक-दूसरेका हित चाहनेवाले थे, (अतः उनमें क्या बात हुई? यह मैं जानना चाहता हूँ) ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रभासतीर्थं सम्प्राप्य पुण्यं तीर्थं महोदधेः ।
वृष्णयः पाण्डवान् वीराः परिवार्योपतस्थिरे ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! प्रभासक्षेत्र समुद्र-तटवर्ती एक पुण्यमय तीर्थ है। वहाँ जाकर वृष्णिवंशी वीर पाण्डवोंको चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ३ ॥
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभः ।
वनमाली हली रामो बभाषे पुष्करेक्षणम् ॥ ४ ॥
तदनन्तर गोदुग्ध, कुन्दकुसुम, चन्द्रमा, मृणाल (कमलनाल) तथा चाँदीकी-सी कान्तिवाले वनमाला-विभूषित हलधर बलरामने कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ ४ ॥
बलदेव उवाच
न कृष्ण धर्मश्चरितो भवाय
जन्तोर्धर्मश्च पराभवाय ।
युधिष्ठिरो यत्र जटी महात्मा
वनाश्रयः क्लिश्यति चीरवासाः ॥ ५ ॥
बलदेवजी बोले— श्रीकृष्ण! जान पड़ता है आचरणमें लाया हुआ धर्म भी प्राणियोंके अभ्युदयका कारण नहीं होता; और उनका किया हुआ अधर्म भी पराजयकी प्राप्ति
करानेवाला नहीं होता, क्योंकि महात्मा युधिष्ठिरको (जो सदा धर्मका ही पालन करते हैं) जटाधारी होकर वल्कल वस्त्र पहने वनमें रहते हुए महान् क्लेश भोगना पड़ रहा है ।। ५ ।।
दुर्योधनश्चापि महीं प्रशास्ति
** न चास्य भूमिविवरं ददाति ।**
धर्मादधर्मश्चरितो वरीया-
** नितीव मन्येत नरोऽल्पबुद्धिः ।। ६ ।।**
दुर्योधने चापि विवर्धमाने
** युधिष्ठिरे चासुखमात्तराज्ये ।**
किं त्वत्र कर्तव्यमिति प्रजाभिः
** शङ्का मिथः संजनिता नराणाम् ।। ७ ।।**
उधर, दुर्योधन (अधर्मपरायण होनेपर भी) पृथ्वीका शासन कर रहा है। उसके लिये यह पृथ्वी भी नहीं फटती है। इससे तो मन्द बुद्धिवाले मनुष्य यही समझेंगे कि धर्माचरणकी अपेक्षा अधर्मका आचरण ही श्रेष्ठ है। दुर्योधन निरन्तर उन्नति कर रहा है और युधिष्ठिर छलसे राज्य छिन जानेके कारण दुःख उठा रहे हैं। (युधिष्ठिर और दुर्योधनके दृष्टान्तको
सामने रखकर) मनुष्योंमें परस्पर महान् संदेह खड़ा हो गया है। प्रजा यह सोचने लगी है कि हमें क्या करना चाहिये—हमें धर्मका आश्रय लेना चाहिये या अधर्मका? ।। ६-७ ।।
अयं स धर्मप्रभवो नरेन्द्रो
धर्मे धृतः सत्यधृतिः प्रदाता ।
चलेद्धि राज्याच्च सुखाच्च पार्थो
धर्मादपेतस्तु कथं विवर्धेत् ।। ८ ।।
ये राजा युधिष्ठिर साक्षात् धर्मके पुत्र हैं। धर्म ही इनका आधार है। ये सदा सत्यका आश्रय लेते और दान देते रहते हैं। कुन्तीकुमार युधिष्ठिर राज्य और सुख छोड़ सकते हैं, (परंतु धर्मका त्याग नहीं कर सकते) भला, धर्मसे दूर होकर कोई कैसे अभ्युदयका भागी हो सकता है? ।। ८ ।।
कथं नु भीष्मश्च कृपश्च विप्रो
द्रोणश्च राजा च कुलस्य वृद्धः ।
प्रव्राज्य पार्थान् सुखमाप्नुवन्ति
धिक् पापबुद्धीन् भरतप्रधानान् ।। ९ ।।
पितामह भीष्म, ब्राह्मण कृपाचार्य, द्रोण तथा कुलके बड़े-बूढ़े राजा धृतराष्ट्र—ये कुन्तीके पुत्रोंको राज्यसे निकालकर कैसे सुख पाते हैं? भरतकुलके इन प्रधान व्यक्तियोंको धिक्कार है! क्योंकि इनकी बुद्धि पापमें लगी हुई है ।। ९ ।।
किं नाम वक्ष्यत्यवनिप्रधानः
पितॄन् समागम्य परत्र पापः ।
पुत्रेषु सम्यक् चरितं मयेति
पुत्रानपापान् व्यपरोप्य राज्यात् ।। १० ।।
पापी राजा धृतराष्ट्र परलोकमें पितरोंसे मिलनेपर उनके सामने कैसे यह कह सकेगा कि 'मैंने अपने और भाई पाण्डुके पुत्रोंके साथ न्याययुक्त बर्ताव किया है।' जबकि उसने इन निर्दोष पुत्रोंको राज्यसे वञ्चित कर दिया है ।। १० ।।
नासौ धिया सम्प्रति पश्यति स्म
किं नाम कृत्वाह मचक्षुरेवम् ।
जातः पृथिव्यामिति पार्थिवेषु
प्रव्राज्य कौन्तेयमिति स्म राज्यात् ।। ११ ।।
वह अब भी अपने बुद्धिरूप नेत्रोंसे यह नहीं देख पाता कि कौन-सा पाप करनेके कारण मुझे इस प्रकार अन्धा होना पड़ा है और आगे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राज्यसे निकालकर जब मैं भूतलके राजाओंमें फिरसे जन्म लूँगा, तब मेरी दशा कैसी होगी? ।। ११ ।।
नूनं समृद्धान् पितृलोकभूमौ
चामीकराभान् क्षितिजान् प्रफुल्लान् ।
विचित्रवीर्यस्य सुतः सपुत्रः
कृत्वा नृशंसं बत पश्यति स्म ॥ १२ ॥
विचित्रवीर्यका पुत्र धृतराष्ट्र और उसके पुत्र दुर्योधन आदि यह क्रूर कर्म करके (स्वप्नमें) निश्चय ही पितृलोककी भूमिमें सुवर्णके समान चमकनेवाले समृद्धिशाली एवं पुष्पित वृक्षोंको देख रहे हैं* ॥ १२ ॥
व्यूढोत्तरांसान् पृथुलोहिताक्षान्
नेमान् स्म पृच्छन् स शृणोति नूनम् ।
प्रास्थापयद् यत् सवनं सशङ्को
युधिष्ठिरं सानुजमात्तशस्त्रम् ॥ १३ ॥
धृतराष्ट्र सुदृढ़ कंधे तथा विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले इन भीष्म आदिसे कोई बात पूछता तो है, परंतु निश्चय ही उनकी बात सुनकर मानता नहीं है, तभी तो भाइयोंसहित शस्त्रधारी युधिष्ठिरके प्रति भी मनमें शंका रखकर इन्हें उसने वनमें भेज दिया है ॥ १३ ॥
योऽयं परेषां पृतनां समृद्धां
निरायुधो दीर्घभुजो निहन्यात् ।
श्रुत्वैव शब्दं हि वृकोदरस्य
मुञ्चन्ति सैन्यानि शकृत् समूत्रम् ॥ १४ ॥
(भला! वे कौरव इन पाण्डवोंका सामना कैसे कर सकते हैं?) ये बड़ी-बड़ी भुजाओंवाले भीमसेन बिना अस्त्र-शस्त्रोंके ही शत्रुओंकी शक्तिशाली सेनाका संहार कर सकते हैं। भीमका तो सिंहनाद सुनकर ही विरोधी दलके सैनिक मल-मूत्र करने लगते हैं ॥ १४ ॥
स क्षुत्पिपासाध्वकृशस्तरस्वी
समेत्य नानायुधबाणपाणिः ।
वने स्मरन् वासमिमं सुघोरं
शेषं न कुर्यादिति निश्चितं मे ॥ १५ ॥
वे ही वेगशाली भीम इन दिनों भूख-प्यास और रास्ता चलनेकी थकावटसे दुर्बल हो गये हैं। इस भयंकर वनवासका स्मरण करते हुए जब ये हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र एवं धनुष-बाण लिये शत्रुओंपर आक्रमण करेंगे, उस समय किसीको भी जीता न छोड़ेंगे—यह मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
न ह्यस्य वीर्येण बलेन कश्चित्
समः पृथिव्यामपि विद्यतेऽन्यः ।
स शीतवातातपकर्शिताङ्गो
न शेषमाजावसुहृत्सु कुर्यात् ॥ १६ ॥
इनके समान पराक्रमी और बलवान् वीर इस पृथ्वीपर कोई नहीं है। इस समय सर्दी-गरमी और वायुके कष्टसे यद्यपि इनका शरीर दुबला हो गया है तो भी समरमें शत्रुओंमेंसे किसीको भी ये शेष नहीं रहने देंगे ॥ १६ ॥
प्राच्यां नृपानेकरथेन जित्वा
वृकोदरः सानुचरान् रणेषु ।
स्वस्त्यागमद् योऽतिरथस्तरस्वी
सोऽयं वने क्लिश्यति चीरवासाः ॥ १७ ॥
यः सिन्धुकूले व्यजयन्नृदेवान्
समागतान् दाक्षिणात्यान् महीपान् ।
तं पश्यतेमं सहदेवमद्य
तरस्विनं तापसवेषरूपम् ॥ १८ ॥
जो पूर्वदिशामें (दिग्विजयकी यात्राके समय) केवल एक रथ लेकर युद्धमें बहुत-से राजाओंको सेवकोंसहित परास्त करके सकुशल लौट आये थे, वे ही अतिरथी और वेगशाली वीर वृकोदर आज वनमें वल्कल वस्त्र पहनकर कष्ट भोग रहे हैं। जिसने समुद्र-तटपर सामना करनेके लिये आये हुए दक्षिण दिशाके सम्पूर्ण राजाओंपर विजय पायी थी, उसी वेगवान् वीर इस सहदेवको देखो—यह आज तपस्वीकी-सी वेषभूषा धारण किये हुए दुःख पा रहा है ॥ १७-१८ ॥
यः पार्थिवानेकरथेन जिग्ये
दिशं प्रतीचीं प्रति युद्धशौण्डः ।
सोऽयं वने मूलफलेन जीव-
ञ्जटी चरत्यद्य मलाचिताङ्गः ॥ १९ ॥
जिस युद्धकुशल नकुलने एकमात्र रथकी सहायतासे पश्चिम दिशाके समस्त भूपालोंको जीत लिया था, वही आज वनमें फल-मूलसे जीवन-निर्वाह करता हुआ सिरपर जटा धारण किये मलिन शरीरसे विचर रहा है ॥ १९ ॥
सत्रे समृद्धेऽतिरथस्य राज्ञो
वेदीतलादुत्पतिता सुता या ।
सेयं वने वासमिमं सुदुःखं
कथं सहत्यद्य सती सुखार्हा ॥ २० ॥
जो अतिरथी राजा द्रुपदके समृद्धिशाली यज्ञमें वेदीसे प्रकट हुई थी, वही यह सुख भोगनेके योग्य सती-साध्वी द्रौपदी वनवासके इस महान् दुःखको कैसे सहन करती है? ॥ २० ॥
त्रिवर्गमुख्यस्य समीरणस्य
देवेश्वरस्याप्यथवाश्विनोश्च ।
एषां सुराणां तनयाः कथं नु
वनेऽचरन् ह्यस्तसुखाः सुखार्हाः ॥ २१ ॥
धर्म, वायु, इन्द्र और अश्विनीकुमारों-जैसे देवताओंके ये पुत्र सुख भोगनेके योग्य होते हुए भी आज सब प्रकारके सुखोंसे वञ्चित हो वनमें कैसे विचरण कर रहे हैं? ॥ २१ ॥
जिते हि धर्मस्य सुते सभार्ये
सभ्रातृके सानुचरे निरस्ते ।
दुर्योधने चापि विवर्धमाने
कथं न सीदत्यवनिः सशैला ॥ २२ ॥
पत्नीसहित धर्मराज युधिष्ठिर जुएमें हार गये और भाइयों एवं सेवकोंसहित राज्यसे बाहर कर दिये गये, उधर दुर्योधन (अनीतिपरायण होकर भी दिनोदिन) बढ़ रहा है, ऐसी दशामें पर्वतोंसहित यह पृथ्वी क्यों नहीं फट जाती? ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां बलरामवाक्ये
एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें बलरामवाक्यविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
* इस प्रकारके वृक्षोंको प्रत्यक्ष देखना मृत्युसूचक माना गया है।