महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 370)
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
संजयका धृतराष्ट्रके प्रति श्रीकृष्णादिके द्वारा की हुई दुर्योधनादिके वधकी प्रतिज्ञाका वृत्तान्त सुनाना
वैशम्पायन उवाच
तेषां तच्चरितं श्रुत्वा मनुष्यातीतमद्भुतम् ।
चिन्ताशोकपरीतात्मा मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥ १ ॥
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
अब्रवीत् संजयं सूतमामन्त्र्य पुरुषर्षभ ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—पुरुषरत्न जनमेजय! पाण्डवोंका वह अद्भुत एवं अलौकिक चरित्र सुनकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रका मन चिन्ता और शोकमें डूब गया। वे अत्यन्त खिन्न हो उठे और लंबी एवं गरम साँसें खींचकर अपने सारथि संजयको निकट बुलाकर बोले— ॥ १-२ ॥
न रात्रौ न दिवा सूत शान्तिं प्राप्नोमि वै क्षणम् ।
संचिन्त्य दुर्नयं घोरमतीतं द्यूतजं हि तत् ॥ ३ ॥
'सूत! मैं बीते हुए द्यूतजनित घोर अन्यायका स्मरण करके दिन तथा रातमें क्षणभर भी शान्ति नहीं पाता ॥
तेषामसह्यवीर्याणां शौर्यं धैर्यं धृतिं पराम् ।
अन्योन्यमनुरागं च भ्रातृणामतिमानुषम् ॥ ४ ॥
'मैं देखता हूँ, पाण्डवोंके पराक्रम असह्य हैं। उनमें शौर्य, धैर्य तथा उत्तम धारणाशक्ति है। उन सब भाइयोंमें परस्पर अलौकिक प्रेम है ॥ ४ ॥
देवपुत्रौ महाभागौ देवराजसमद्युती ।
नकुलः सहदेवश्च पाण्डवौ युद्धदुर्मदौ ॥ ५ ॥
'देवपुत्र महाभाग नकुल-सहदेव देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। वे दोनों ही पाण्डव युद्धमें प्रचण्ड हैं ॥ ५ ॥
दृढायुधौ दूरपातौ युद्धे च कृतनिश्चयौ ।
शीघ्रहस्तौ दृढक्रोधौ नित्ययुक्तौ तरस्विनौ ॥ ६ ॥
'उनके आयुध दृढ़ हैं। वे दूरतक निशाना मारते हैं। युद्धके लिये उनका भी दृढ़ निश्चय है। वे दोनों ही बड़ी शीघ्रतासे हस्तसंचालन करते हैं। उनका क्रोध भी अत्यन्त दृढ़ है। वे सदा उद्योगशील और बड़े वेगवान् हैं ॥ ६ ॥
भीमार्जुनौ पुरोधाय यदा तौ रणमूर्धनि ।
स्थास्येते सिंहविक्रान्तावश्विनाविव दुःसहौ ॥ ७ ॥
न शेषमिह पश्यामि मम सैन्यस्य संजय ।
तौ ह्यप्रतिरथौ युद्धे देवपुत्रौ महारथौ ॥ ८ ॥
‘जिस समय भीमसेन और अर्जुनको आगे रखकर वे दोनों सिंहके समान पराक्रमी और अश्विनीकुमारोंके समान दुःसह वीर युद्धके मुहानेपर खड़े होंगे, उस समय मुझे अपनी सेनाका कोई वीर शेष रहता नहीं दिखायी देता है। संजय! देवपुत्र महारथी नकुल-सहदेव युद्धमें अनुपम हैं। कोई भी रथी उनका सामना नहीं कर सकता ॥ ७-८ ॥
द्रौपद्यास्तं परिक्लेशं न क्षंस्येते त्वमर्षिणौ ।
वृष्णयोऽथ महेष्वासाः पञ्चाला वा महौजसः ॥ ९ ॥
युधि सत्याभिसंधेन वासुदेवेन रक्षिताः ।
प्रधक्ष्यन्ति रणे पार्थाः पुत्राणां मम वाहिनीम् ॥ १० ॥
‘अमर्षमें भरे हुए माद्रीकुमार द्रौपदीको दिये गये उस कष्टको कभी क्षमा नहीं करेंगे। महान् धनुर्धर वृष्णिवंशी, महातेजस्वी पांचाल योद्धा और युद्धमें सत्यप्रतिज्ञ वासुदेव श्रीकृष्णसे सुरक्षित कुन्तीपुत्र निश्चय ही मेरे पुत्रोंकी सेनाको भस्म कर डालेंगे ॥ ९-१० ॥
रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दन ।
न शक्यः सहितुं वेगः सर्वैस्तैरपि संयुगे ॥ ११ ॥
‘सूतनन्दन! बलराम और श्रीकृष्णसे प्रेरित वृष्णि-वंशी योद्धाओंके वेगको युद्धमें समस्त कौरव मिलकर भी नहीं सह सकते ॥ ११ ॥
तेषां मध्ये महेष्वासो भीमो भीमपराक्रमः ।
शैक्या वीरघातिन्या गदया विचरिष्यति ॥ १२ ॥
तथा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।
गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ॥ १३ ॥
‘उनके बीचमें जब भयानक पराक्रमी महान् धनुर्धर भीमसेन बड़े-बड़े वीरोंका संहार करनेवाली आकाशमें ऊपर उठी हुई गदा लिये विचरेंगे तब उन भीमकी गदाके वेगको तथा वज्रगर्जनके समान गाण्डीव धनुषकी टंकारको भी कोई नरेश नहीं सह सकता ॥ १२-१३ ॥
ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगः ।
स्मरणीयाः स्मरिष्यामि मया या न कृताः पुरा ॥ १४ ॥
‘उस समय मैं दुर्योधनके वशमें होनेके कारण अपने हितैषी सुहृदोंकी उन याद रखनेयोग्य बातोंको याद करूँगा, जिनका पालन मैंने पहले नहीं किया’ ॥ १४ ॥
संजय उवाच
व्यतिक्रमोऽयं सुमहांस्त्वया राजन्नुपेक्षितः ।
समर्थेनापि यन्मोहात् पुत्रस्ते न निवारितः ॥ १५ ॥
संजयने कहा— राजन्! आपके द्वारा यह बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, जिसकी आपने जान-बूझकर उपेक्षा की है (उसे रोकनेकी चेष्टा नहीं की है); वह यह है कि आपने समर्थ होते हुए भी मोहवश अपने पुत्रको कभी रोका नहीं ॥ १५ ॥
श्रुत्वा हि निर्जितान् द्यूते पाण्डवान् मधुसूदनः ।
त्वरितः काम्यके पार्थान् सम्भावयदच्युतः ॥ १६ ॥
भगवान् मधुसूदनने ज्यों ही सुना कि पाण्डव द्यूतमें पराजित हो गये, त्यों ही वे काम्यकवनमें पहुँचकर कुन्तीपुत्रोंसे मिले और उन्हें आश्वासन दिया ॥ १६ ॥
द्रुपदस्य तथा पुत्रा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
विराटो धृष्टकेतुश्च केकयाश्च महारथाः ॥ १७ ॥
इसी प्रकार द्रुपदके धृष्टद्युम्न आदि पुत्र, विराट, धृष्टकेतु और महारथी कैकय—इन सबने पाण्डवोंसे भेंट की ॥ १७ ॥
तैश्च यत् कथितं राजन् दृष्ट्वा पार्थान् पराजितान् ।
चारेण विदितं सर्वं तन्मयाऽऽवेदितं च ते ॥ १८ ॥
राजन्! पाण्डवोंको जूएमें पराजित देखकर उन सबने जो बातें कहीं, उन्हें गुप्तचरोंद्वारा जानकर मैंने आपकी सेवामें निवेदन कर दिया था ॥ १८ ॥
समागम्य वृतस्तत्र पाण्डवैर्मधुसूदनः ।
सारथ्ये फाल्गुनस्याजौ तथेत्याह च तान् हरिः ॥ १९ ॥
पाण्डवोंने मिलकर मधुसूदन श्रीकृष्णको युद्धमें अर्जुनका सारथि होनेके लिये वरण किया और श्रीहरिने 'तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया ॥ १९ ॥
अमर्षितो हि कृष्णोऽपि दृष्ट्वा पार्थांस्तथा गतान् ।
कृष्णाजिनोत्तरासंगानब्रवीच्च युधिष्ठिरम् ॥ २० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण भी कुन्तीपुत्रोंको उस अवस्थामें काला मृगचर्म ओढ़कर आये हुए देख उस समय अमर्षमें भर गये और युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥
या सा समृद्धिः पार्थानामिन्द्रप्रस्थे बभूव ह ।
राजसूये मया दृष्टा नृपैरन्यैः सुदुर्लभा ॥ २१ ॥
'इन्द्रप्रस्थमें कुन्तीकुमारोंके पास जो समृद्धि थी तथा राजसूययज्ञके समय जिसे मैंने अपनी आँखों देखा था, वह अन्य नरेशोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ थी ॥ २१ ॥
यत्र सर्वान् महीपालाञ्छस्त्रतेजोभयार्दितान् ।
सवङ्गाङ्गान् सपौण्ड्रोड्रान् सचोलद्राविडान्ध्रकान् ॥ २२ ॥
सागरानूपकांश्चैव ये च प्रान्ताभिवासिनः ।
सिंहलान् बर्बरान् म्लेच्छान् ये च लङ्कानिवासिनः ॥ २३ ॥
पश्चिमानि च राष्ट्राणि शतशः सागरान्तिकान् ।
पह्लवान् दरदान् सर्वान् किरातान् यवनाञ्छकान् ॥ २४ ॥
हारहूणांश्च चीनांश्च तुषारान् सैन्धवांस्तथा ।
जागुडान् रामठान् मुण्डान् स्त्रीराज्यमथ तङ्गणान् ॥ २५ ॥
केकयान् मालवांश्चैव तथा काश्मीरकानपि ।
अद्राक्षमहमाहूतान् यज्ञे ते परिवेषकान् ॥ २६ ॥
'उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे। अंग, वंग, पुण्ड्र, उड्र, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे। सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र, सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था ॥ २२—२६ ॥
सा ते समृद्धिरैरात्ता चपला प्रतिसारिणी ।
आदाय जीवितं तेषामाहरिष्यामि तामहम् ॥ २७ ॥
'सब ओर फैली हुई आपकी उस चंचल समृद्धिको जिन लोगोंने छलसे छीन लिया है, उनके प्राण लेकर भी मैं उसे पुनः वापस लाऊँगा ॥ २७ ॥
रामेण सह कौरव्य भीमार्जुनयमैस्तथा ।
अक्रूरगदसाम्बैश्च प्रद्युम्नेनाहुकेन च ॥ २८ ॥
धृष्टद्युम्नेन वीरेण शिशुपालात्मजेन च ।
दुर्योधनं रणे हत्वा सद्यः कर्णं च भारत ॥ २९ ॥
दुःशासनं सौबलेयं यश्चान्यः प्रतियोत्स्यते ।
ततस्त्वं हास्तिनपुरे भ्रातृभिः सहितो वसन् ॥ ३० ॥
धार्तराष्ट्रीं श्रियं प्राप्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् ।
'कुरुनन्दन! भरतकुलतिलक! बलराम, भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, अक्रूर, गद, साम्ब, प्रद्युम्न, आहुक, वीर धृष्टद्युम्न और शिशुपालपुत्र धृष्टकेतुके साथ आक्रमण करके युद्धमें दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन एवं शकुनिको तथा और जो कोई योद्धा सामना करने आयेगा, उसे भी शीघ्र ही मारकर मैं आपकी सम्पत्ति लौटा लाऊँगा। तदनन्तर आप भाइयोंसहित हस्तिनापुरमें निवास करते हुए धृतराष्ट्रकी राज्यलक्ष्मीको पाकर इस सारी पृथ्वीका शासन कीजिये' ॥ २८—३० १/२ ॥
अथैनमब्रवीद् राजा तस्मिन् वीरसमागमे ॥ ३१ ॥
शृण्वत्स्वेतेषु वीरेषु धृष्टद्युम्नमुखेषु च ।
तब राजा युधिष्ठिरने उस वीरसमुदायमें इन धृष्टद्युम्न आदि शूरवीरोंके सुनते हुए श्रीकृष्णसे कहा ॥ ३१ १/२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
प्रतिगृह्णामि ते वाचमिमां सत्यां जनार्दन ॥ ३२ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**जनार्दन! मैं आपकी सत्य वाणीको शिरोधार्य करता हूँ ॥ ३२ ॥
अमित्रान् मे महाबाहो सानुबन्धान् हनिष्यसि ।
वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं सत्यं मां कुरु केशव ॥ ३३ ॥
प्रतिज्ञातो वने वासो राजमध्ये मया ह्ययम् ।
महाबाहो! केशव! तेरहवें वर्षके बाद आप मेरे सम्पूर्ण शत्रुओंको उनके बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट कीजियेगा। ऐसा करके आप मेरे सत्य (वनवासके लिये की गयी प्रतिज्ञा)-की रक्षा कीजिये। मैंने राजाओंकी मण्डलीमें वनवासकी प्रतिज्ञा की है ॥ ३३ १/२ ॥
तद् धर्मराजवचनं प्रतिश्रुत्य सभासदः ॥ ३४ ॥
धृष्टद्युम्नपुरोगास्ते शमयामासुरोजसा ।
केशवं मधुरैर्वाक्यैः कालयुक्तैरमर्षितम् ॥ ३५ ॥
धर्मराजकी वह बात सुनकर धृष्टद्युम्न आदि सभासदोंने समयोचित मधुर वचनोंद्वारा अमर्षमें भरे हुए श्रीकृष्णको शीघ्र ही शान्त किया ॥ ३४-३५ ॥
पाञ्चालीं प्राहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः ।
दुर्योधनस्तव क्रोधाद् देवि त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने क्लेशरहित हुई द्रौपदीसे भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए कहा—‘देवि! दुर्योधन तुम्हारे क्रोधसे निश्चय ही प्राण त्याग देगा ॥ ३६ ॥
प्रतिजानीमहे सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि ।
ये स्म तेऽक्षजितां कृष्णे दृष्ट्वा त्वां प्राहसंस्तदा ।
मांसानि तेषां खादन्तो हरिष्यन्ति वृकद्विजाः ॥ ३७ ॥
‘वरवर्णिनि! हम यह सच्ची प्रतिज्ञा करते हैं, तुम शोक न करो। कृष्णे! उस समय तुम्हें जूएमंे जीती हुई देखकर जिन लोगोंने हँसी उड़ायी है, उनके मांस भेड़िये और गीध खायेंगे और नोच-नोचकर ले जायँगे ॥ ३७ ॥
पास्यन्ति रुधिरं तेषां गृध्रा गोमायवस्तथा ।
उत्तमाङ्गानि कर्षन्तो यैः कृष्टासि सभातले ॥ ३८ ॥
‘इसी प्रकार जिन्होंने तुम्हें सभाभवनमें घसीटा है, उनके कटे हुए सिरोंको घसीटते हुए गीध और गीदड़ उनके रक्त पीयेंगे ॥ ३८ ॥
तेषां द्रक्ष्यसि पाञ्चालि गात्राणि पृथिवीतले ।
क्रव्यादैः कृष्यमाणानि भक्ष्यमाणानि चासकृत् ॥ ३९ ॥
‘पांचालराजकुमारि! तुम देखोगी कि उन दुष्टोंके शरीर इस पृथ्वीपर मांसाहारी गीदड़-गीध आदि पशु-पक्षियोंद्वारा बार-बार घसीटे और खाये जा रहे हैं ॥ ३९ ॥
परिक्लिष्टासि यैस्तत्र यैश्चासि समुपेक्षिता।
तेषामुत्कृत्तशिरसां भूमिः पास्यति शोणितम्॥ ४०॥
'जिन लोगोंने तुम्हें सभामें क्लेश पहुँचाया और जिन्होंने चुपचाप रहकर उस अन्यायकी उपेक्षा की है, उन सबके कटे हुए मस्तकोंका रक्त यह पृथ्वी पीयेगी'॥ ४०॥
एवं बहुविधा वाचस्त ऊचुर्भरतर्षभ।
सर्वे तेजस्विनः शूराः सर्वे चाहतलक्षणाः॥ ४१॥
भरतकुलतिलक! इस प्रकार उन वीरोंने अनेक प्रकारकी बातें कही थीं। वे सब-के-सब तेजस्वी और शूरवीर हैं। उनके शुभ लक्षण अमित हैं॥ ४१॥
ते धर्मराजेन वृता वर्षादूर्ध्वं त्रयोदशात्।
पुरस्कृत्योपयास्यन्ति वासुदेवं महारथाः॥ ४२॥
धर्मराजने तेरहवें वर्षके बाद युद्ध करनेके लिये उनका वरण किया है। वे महारथी वीर भगवान् श्रीकृष्णको आगे रखकर आक्रमण करेंगे॥ ४२॥
रामश्च कृष्णश्च धनंजयश्च
प्रद्युम्नसाम्बौ युयुधानभीमौ।
माद्रीसुतौ केकयराजपुत्राः
पाञ्चालपुत्राः सह मत्स्यराज्ञा॥ ४३॥
एतान् सर्वान् लोकवीरानजेयान्
महात्मनः सानुबन्धान् ससैन्यान्।
को जीवितार्थी समरेऽभ्युदीयात्
क्रुद्धान् सिंहान् केसरिणो यथैव॥ ४४॥
बलराम, श्रीकृष्ण, अर्जुन, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, भीमसेन, नकुल, सहदेव, केकयराजकुमार, द्रुपद और उनके पुत्र तथा मत्स्यनरेश विराट—ये सब-के-सब विश्वविख्यात अजेय वीर हैं। ये महामना जब अपने सगे-सम्बन्धियों और सेनाके साथ धावा करेंगे, उस समय क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहोंके समान उन महावीरोंका समरमें जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन पुरुष सामना करेगा? ॥ ४३-४४॥
धृतराष्ट्र उवाच
यन्माब्रवीद् विदुरो द्यूतकाले
त्वं पाण्डवाञ्जेष्यसि चेन्नरेन्द्र।
ध्रुवं कुरूणामयमन्तकालो
महाभयो भविता शोणितौघः॥ ४५॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! जब जूआ खेला जा रहा था, उस समय विदुरने मुझसे जो यह बात कही थी कि नरेन्द्र! यदि आप पाण्डवोंको जूएमं जीतेंगे तो निश्चय ही यह कौरवोंके
लिये खूनकी धारासे भरा हुआ अत्यन्त भयंकर विनाशकाल होगा ॥ ४५ ॥
मन्ये तथा तद् भवितेति सूत
यथा क्षत्ता प्राह वचः पुरा माम् ।
असंशयं भविता युद्धमेतद्
गते काले पाण्डवानां यथोक्तम् ॥ ४६ ॥
सूत! विदुरने पहले जो बात कही थी, वह अवश्य ही उसी प्रकार होगी, ऐसा मेरा विश्वास है। वनवासका समय व्यतीत होनेपर पाण्डवोंके कथनानुसार यह घोर युद्ध होकर ही रहेगा, इसमें संशय नहीं ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे
एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें धृतराष्ट्रविलापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥