महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन
लोमश उवाच
तं दृष्ट्वा घोरवदनं मदं देवः शतक्रतुः ।
आयान्तं भक्षयिष्यन्तं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ १ ॥
भयात् संस्तम्भितभुजः सृक्किणी लेलिहन् मुहुः ।
ततोऽब्रवीद् देवराजश्च्यवनं भयपीडितः ॥ २ ॥
सोमार्हावश्विनावेतावद्यप्रभृति भार्गव ।
भविष्यतः सत्यमेतद् वचो विप्रः प्रसीद मे ॥ ३ ॥
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! मुँह बाये हुए यमराजकी भाँति भयंकर मुखवाले उस मदासुरको निगलनेके लिये आते देख देवराज इन्द्र भयसे व्याकुल हो गये। जिनकी भुजाएँ स्तब्ध हो गयी थीं, वे इन्द्र मृत्युके डरसे घबराकर बार-बार ओष्ठप्रान्त चाटने लगे। उसी अवस्थामें उन्होंने महर्षि च्यवनसे कहा—‘भृगुनन्दन! ये दोनों अश्विनीकुमार आजसे सोमपानके अधिकारी होंगे। मेरी यह बात सत्य है, अतः आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ १—३ ॥
न ते मिथ्या समारम्भो भवत्वेष परो विधिः ।
जानामि चाहं विप्रर्षे न मिथ्या त्वं करिष्यसि ॥ ४ ॥
सोमार्हावश्विनावेतौ यथा वाद्य कृतौ त्वया ।
भूय एव तु ते वीर्यं प्रकाशेदिति भार्गव ॥ ५ ॥
सुकन्यायाः पितुश्चास्य लोके कीर्तिः प्रथेदिति ।
अतो मयैतद् विहितं तव वीर्यप्रकाशनम् ॥ ६ ॥
तस्मात् प्रसादं कुरु मे भवत्वेवं यथेच्छसि ।
‘आपके द्वारा किया हुआ यह यज्ञका आयोजन मिथ्या न हो। आपने जो कर दिया वही उत्तम विधान हो। ब्रह्मर्षे! मैं जानता हूँ, आप अपना संकल्प कभी मिथ्या न होने देंगे। आज आपने इन अश्विनीकुमारोंको जैसे सोमपानका अधिकारी बनाया है उसी प्रकार मेरा भी कल्याण कीजिये। भृगुनन्दन! आपकी अधिक-से-अधिक शक्ति प्रकाशमें आवे तथा जगत्में सुकन्या और इसके पिताकी कीर्तिका विस्तार हो। इस उद्देश्यसे मैंने यह आपके बल-वीर्यको प्रकाशित करनेवाला कार्य किया है। अतः आप प्रसन्न होकर मेरे ऊपर कृपा करें। आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही होगा’ ॥ ४—६½ ॥
एवमुक्तस्य शक्रेण भार्गवस्य महात्मनः ॥ ७ ॥
स मन्युर्व्यगमच्छीघ्रं मुमोच च पुरंदरम् ।
मदं च व्यभजद् राजन् पाने स्त्रीषु च वीर्यवान् ॥ ८ ॥
अक्षेषु मृगयायां च पूर्वसृष्टं पुनः पुनः ।
तदा मदं विनिक्षिप्य शक्रं संतर्प्य चेन्दुना ॥ ९ ॥
अश्विभ्यां सहितान् देवान् याजयित्वा च तं नृपम् ।
विख्याप्य वीर्यं लोकेषु सर्वेषु वदतां वरः ॥ १० ॥
सुकन्यया सहारण्ये विजहारानुकूलया ।
तस्यैतद् द्विजसंघुष्टं सरो राजन् प्रकाशते ॥ ११ ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन महामना च्यवनका क्रोध शीघ्र शान्त हो गया और उन्होंने देवेन्द्रको (उसी क्षण) सम्पूर्ण दुःखोंसे, मुक्त कर दिया। राजन्! उन शक्तिशाली ऋषिने मदको, जिसे पहले उन्होंने ही उत्पन्न किया था, मद्यपान, स्त्री, जूआ और मृगया (शिकार)—इन चार स्थानोंमें पृथक्-पृथक् बाँट दिया। इस प्रकार मदको दूर हटाकर उन्होंने देवराज इन्द्र और अश्विनीकुमारोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको सोमरससे तृप्त किया तथा राजा शर्यातिके यज्ञ पूर्ण कराकर समस्त लोकोंमें अपनी अद्भुत शक्तिको विख्यात करके वक्ताओंमें श्रेष्ठ च्यवन ऋषि अपनी मनोनुकूल पत्नी सुकन्याके साथ वनमें विहार करने लगे। युधिष्ठिर! यह जो पक्षियोंके कलरवसे गूँजता हुआ सरोवर सुशोभित हो रहा है, महर्षि च्यवनका ही है ॥ ७—११ ॥
अत्र त्वं सह सोदर्यैः पितॄन् देवांश्च तर्पय ।
एतद् दृष्ट्वा महीपाल सिकताक्षं च भारत ॥ १२ ॥
सैन्धवारण्यमासाद्य कुल्यानां कुरु दर्शनम् ।
पुष्करेषु महाराज सर्वेषु च जलं स्पृश ॥ १३ ॥
स्थाणोर्मन्त्राणि च जपन् सिद्धिं प्राप्स्यसि भारत ।
संधिर्द्वयोर्नरश्रेष्ठ त्रेताया द्वापरस्य च ॥ १४ ॥
तुम भाइयोंसहित इसमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करो। भूपाल! भरतनन्दन! इस सरोवरका और सिकताक्षतीर्थका दर्शन करके सैन्धवारण्यमें पहुँचकर वहाँकी छोटी-छोटी नदियोंके दर्शन करना। महाराज! यहाँके सभी तालाबमें जाकर जलका स्पर्श करो। भारत! स्थाणु (शिव)-के मन्त्रोंका जप करते हुए उन तीर्थोंमें स्नान करनेसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। नरश्रेष्ठ! यह त्रेता और द्वापरकी संधिके समय प्रकट हुआ तीर्थ है ॥ १२—१४ ॥
अयं हि दृश्यते पार्थ सर्वपापप्रणाशनः ।
अत्रोपस्पृश्य चैव त्वं सर्वपापप्रणाशने ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर! यह सब पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ दिखायी देता है। इस सर्वपापनाशन तीर्थमें स्नान करके तुम शुद्ध हो जाओगे ॥ १५ ॥
आर्चीकपर्वतश्चैव निवासो वै मनीषिणाम् ।
सदाफलः सदास्रोतो मरुतां स्थानमुत्तमम् ॥ १६ ॥
इसके आगे आर्चीक पर्वत है, जहाँ मनीषी पुरुष निवास करते हैं। वहाँ सदा फल लगे रहते हैं और निरन्तर पानीके झरने बहते हैं। इस पर्वतपर अनेक देवताओंके उत्तम स्थान हैं ॥ १६ ॥
चैत्याश्चैते बहुविधास्त्रिदशानां युधिष्ठिर ।
एतच्चन्द्रमसस्तीर्थमृषयः पर्युपासते ।
वैखानसा बालखिल्याः पावका वायुभोजनाः ॥ १७ ॥
शृङ्गाणि त्रीणि पुण्यानि त्रीणि प्रस्रवणानि च ।
सर्वाण्यनुपरिक्रम्य यथाकाममुपस्पृश ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! ये देवताओंके अनेकानेक मन्दिर दिखायी देते हैं, जो नाना प्रकारके हैं। यह चन्द्रतीर्थ है, जिसकी बहुत-से ऋषिलोग उपासना करते हैं। यहाँ बालखिल्य नामक वैखानस महात्मा रहते हैं जो वायुका आहार करनेवाले और परम पावन हैं। यहाँ तीन पवित्र शिखर और तीन झरने हैं। इन सबकी इच्छानुसार परिक्रमा करके स्नान करो ॥ १७-१८ ॥
शान्तनुश्चात्र राजेन्द्र शुनकश्च नराधिपः ।
नरनारायणौ चोभौ स्थानं प्राप्ताः सनातनम् ॥ १९ ॥
राजेन्द्र! यहाँ राजा शान्तनु, शुनक और नर-नारायण—ये सभी नित्य धाममें गये हैं ॥ १९ ॥
इह नित्यशया देवाः पितरश्च महर्षिभिः ।
आर्चीकपर्वते तेपुस्तान् यजस्व युधिष्ठिर ॥ २० ॥
युधिष्ठिर! इस आर्चीक पर्वतपर नित्य निवास करते हुए महर्षियोंसहित जिन देवताओं और पितरोंने तपस्या की है, तुम उन सबकी पूजा करो ॥ २० ॥
इह ते वै चरून् प्राश्नन्नृषयश्च विशाम्पते ।
यमुना चाक्षयस्रोता कृष्णश्चेह तपोरतः ॥ २१ ॥
यमौ च भीमसेनश्च कृष्णा चामित्रकर्शन ।
सर्वे चात्र गमिष्यामस्त्वयैव सह पाण्डव ॥ २२ ॥
एतत् प्रस्रवणं पुण्यमिन्द्रस्य मनुजेश्वर ।
यत्र धाता विधाता च वरुणश्चोर्ध्वमागताः ॥ २३ ॥
राजन्! यहाँ देवताओं और ऋषियोंने चरुभोजन किया था। इसके पास ही अक्षय प्रवाहवाली यमुना नदी बहती है। यहीं भगवान् कृष्णने भी तपस्या की है। शत्रुदमन! नकुल,
सहदेव, भीमसेन, द्रौपदी और हम सब लोग तुम्हारे साथ इसी स्थानपर चलेंगे। पाण्डुनन्दन! यह इन्द्रका पवित्र झरना है। नरेश्वर! यह वही स्थान है जहाँ धाता, विधाता और वरुण ऊर्ध्वलोक गये हैं ॥ २१—२३ ॥
इह तेऽप्यवसन् राजन् क्षान्ताः परमधर्मिणः ।
मैत्राणामृजुबुद्धीनामयं गिरिवरः शुभः ॥ २४ ॥
राजन्! वे क्षमाशील और परम धर्मात्मा पुरुष यहीं रहते थे। सरल बुद्धि तथा सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाले सत्पुरुषोंके लिये यह श्रेष्ठ पर्वत शुभ आश्रय है ॥ २४ ॥
एषा सा यमुना राजन् महर्षिगणसेविता ।
नानायज्ञचिता राजन् पुण्या पापभयापहा ॥ २५ ॥
अत्र राजा महेष्वासो मान्धातायजत स्वयम् ।
साहदेविश्च कौन्तेय सोमको ददतां वरः ॥ २६ ॥
राजन्! यही वह महर्षिगणसेवित पुण्यमयी यमुना है जिसके तटपर अनेक यज्ञ हो चुके हैं। यह पापके भयको दूर भगानेवाली है। कुन्तीनन्दन! यहीं महान् धनुर्धर राजा मान्धाताने स्वयं यज्ञ किया था। दानिशिरोमणि सहदेव-कुमार सोमकने भी इसीके तटपर यज्ञानुष्ठान किया ॥ २५-२६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥