महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1487)
न तेऽन्यद् दैवतं किंचिद् दैवतेष्वपि वर्तते ।
प्रयतत्वाद् द्विजातीनां दमेनासि समन्वितः ॥ १० ॥
हम इस घरमें इस प्रकार सुखसे रहते हैं मानो देवलोकमें पहुँच गये हों। देवताओंमें भी तुम्हारे लिये हम दोनोंके सिवा और कोई देवता नहीं है। तुम हमें ही देवता मानते हो। अपने मनको पवित्र एवं संयममें रखनेके कारण तुम द्विजोचित शम-दमसे सम्पन्न हो ॥ १० ॥
पितुः पितामहा ये च तथैव प्रपितामहाः ।
प्रीतास्ते सततं पुत्र दमेनावां च पूजया ॥ ११ ॥
वत्स! मेरे पिताके पितामह और प्रपितामह आदि सभी तुम्हारे इन्द्रियसंयमसे सदा प्रसन्न रहते हैं। हम दोनों भी तुम्हारे द्वारा की हुई पूजा-सेवासे बहुत संतुष्ट हैं ॥ ११ ॥
मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीयते ।
न चान्या हि तथा बुद्धिर्दृश्यते साम्प्रतं तव ॥ १२ ॥
तुम मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी हम दोनोंकी सेवा नहीं छोड़ते। इस समय भी तुम्हारा विचार इसके प्रतिकूल नहीं दिखायी देता ॥ १२ ॥
जामदग्न्येन रामेण यथा वृद्धौ सुपूजितौ ।
तथा त्वया कृतं सर्वं तद्विशिष्टं च पुत्रक ॥ १३ ॥
बेटा! जमदग्निनन्दन परशुरामने जिस प्रकार अपने वृद्ध माता-पिताकी सेवा-पूजा की थी, उसी प्रकार तथा उससे भी बढ़कर तुमने हमारी सब सेवाएँ की हैं ॥ १३ ॥
ततस्तं ब्राह्मणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदयत् ।
तौ स्वागतेन तं विप्रमर्चयामासतुस्तदा ॥ १४ ॥
तदनन्तर धर्मव्याधने अपने माता-पिताको उस कौशिक ब्राह्मणका परिचय दिया। तब उन दोनोंने भी स्वागतपूर्वक ब्राह्मणका पूजन किया ॥ १४ ॥
प्रतिपूज्य च तां पूजां द्विजः पप्रच्छ तावुभौ ।
सुपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद् वां कुशलं गृहे ॥ १५ ॥
अनामयं च वां कच्चित् सदैवॆह शरीरयोः ।
ब्राह्मणने उनके द्वारा की हुई पूजाको स्वीकार करके कृतज्ञता प्रकट की और उनसे पूछा—'आप दोनों इस घरमें अपने सुयोग्य पुत्र तथा सेवकोंके साथ सकुशल तो हैं न? आप दोनों शरीरसे भी सदा नीरोग रहते हैं न?' ॥ १५१/२ ॥
वृद्धावूचतुः
कुशलं नौ गृहे विप्र भृत्यवर्गे च सर्वशः ।
कच्चित् त्वमप्यविघ्नेन सम्प्राप्तो भगवन्निति ॥ १६ ॥
उन वृद्धोंने उत्तर दिया—ब्रह्मन्! इस घरमें हम दोनों सकुशल हैं। हमारे सेवक तथा कुटुम्बके लोग भी कुशलसे हैं। भगवन्! अपना समाचार कहें, आप यहाँ सकुशल पहुँच गये
न? किसी विघ्न-बाधाका सामना तो नहीं करना पड़ा? ।। १६ ।।
मार्कण्डेय उवाच
बाढमित्येव तौ विप्रः प्रत्युवाच मुदान्वितः ।
धर्मव्याधो निरीक्ष्याथ ततस्तं वाक्यमब्रवीत् ।। १७ ।।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! तब कौशिक ब्राह्मणने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया—'हाँ, मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ।' तदनन्तर धर्मव्याधने अपने पिता-माताकी ओर देखते हुए कौशिक ब्राह्मणसे कहा ।। १७ ।।
व्याध उवाच
पिता माता च भगवन्नेतौ मद्दैवतं परम् ।
यद् दैवतेभ्यः कर्तव्यं तदेताभ्यां करोम्यहम् ।। १८ ।।
**धर्मव्याध बोला—**भगवन्! ये माता-पिता ही मेरे प्रधान देवता हैं। जो कुछ देवताओंके लिये करना चाहिये, वह मैं इन्हीं दोनोंके लिये करता हूँ ।। १८ ।।
त्रयस्त्रिंशद् यथा देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।
सम्पूज्याः सर्वलोकस्य तथा वृद्धाविमौ मम ।। १९ ।।
जैसे समस्त संसारके लिये इन्द्र आदि तैंतीस* देवता पूजनीय हैं, उसी प्रकार मेरे लिये ये दोनों बूढ़े माता-पिता ही आराधनीय हैं ।। १९ ।।
उपाहारानाहरन्तो देवतानां यथा द्विजाः ।
कुर्वन्ति तद्वदेताभ्यां करोम्यहमतन्द्रितः ।। २० ।।
द्विजलोग देवताओंके लिये जैसे नाना प्रकारके उपहार समर्पण करते हैं, उसी प्रकार मैं इनके लिये करता हूँ। इनकी सेवामें मुझे आलस्य नहीं होता ।। २० ।।
एतौ मे परमं ब्रह्मन् पिता माता च दैवतम् ।
एतौ पुष्पैः फलै रत्नैस्तोषयामि सदा द्विज ।। २१ ।।
ब्रह्मन्! ये माता-पिता ही मेरे सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। मैं सदा फूल, फल तथा रत्नोंसे इन्हींको संतुष्ट करता हूँ ।। २१ ।।
एतावेवाग्नयो मह्यं यान् वदन्ति मनीषिणः ।
यज्ञा वेदाश्च चत्वारः सर्वमेतौ मम द्विज ।। २२ ।।
विप्रवर! जिन्हें विद्वान् लोग 'अग्नि' कहते हैं, वे मेरे लिये ये ही हैं। चारों वेद और यज्ञ सब कुछ मेरे लिये ये माता-पिता ही हैं ।। २२ ।।
एतदर्थं मम प्राणा भार्या पुत्रः सुहृज्जनः ।
सपुत्रदारः शुश्रूषां नित्यमेव करोम्यहम् ।। २३ ।।
मेरे प्राण, स्त्री, पुत्र, और सुहृद् सब इन्हींकी सेवाके लिये हैं। मैं स्त्री और पुत्रोंके साथ प्रतिदिन इन्हींकी शुश्रूषामें लगा रहता हूँ ।। २३ ।।
स्वयं च स्नापयाम्येतौ तथा पादौ प्रधावये ।
आहारं च प्रयच्छामि स्वयं च द्विजसत्तम ॥ २४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैं स्वयं ही इन्हें नहलाता हूँ, इनके चरण धोता हूँ और स्वयं ही भोजन परोसकर इन्हें जिमाता हूँ ॥ २४ ॥
अनुकूलं तथा वच्मि विप्रियं परिवर्जये ।
अधर्मेणापि संयुक्तं प्रियमाभ्यां करोम्यहम् ॥ २५ ॥
मैं वही बात बोलता हूँ, जो इनके मनके अनुकूल हो, जो इन्हें प्रिय न लगे, ऐसी बात मुँहसे कभी नहीं निकालता। इनको पसंद हो, तो मैं अधर्मयुक्त कार्य भी कर सकता हूँ ॥ २५ ॥
धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा करोमि द्विजसत्तम ।
अतन्द्रितः सदा विप्र शुश्रूषां वै करोम्यहम् ॥ २६ ॥
विप्रवर! इस प्रकार माता-पिताकी सेवारूप धर्मको ही महान् मानकर मैं उसका पालन करता हूँ। ब्रह्मन्! आलस्य छोड़कर मैं सदा इन्हीं दोनोंकी सेवामें लगा रहता हूँ ॥ २६ ॥
पञ्चैव गुरवो ब्रह्मन् पुरुषस्य बुभूषतः ।
पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च द्विजसत्तम ॥ २७ ॥
ब्राह्मणश्रेष्ठ! उन्नति चाहनेवाले पुरुषके पाँच ही गुरु हैं—पिता, माता, अग्नि, परमात्मा तथा गुरु ॥ २७ ॥
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम ।
भवेयुरग्नयस्तस्य परिचीर्णास्तु नित्यशः ।
गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य एष धर्मः सनातनः ॥ २८ ॥
द्विजश्रेष्ठ! जो इन सबके प्रति उत्तम बर्ताव करेगा, उस गृहस्थ-धर्मका पालन करनेवालेके द्वारा सदा सब अग्नियोंकी सेवा सम्पन्न होती रहेगी। यही सनातन धर्म है ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे
चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक दो सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१४ ॥
* आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इन्द्र और प्रजापति—ये तैंतीस देवता हैं।