महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 84)
षष्ठोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका संजयको भेजकर विदुरको वनसे बुलवाना और उनसे क्षमा-प्रार्थना
वैशम्पायन उवाच
गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान् प्रति ।
धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः पर्यतप्यत भारत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! जब विदुरजी पाण्डवोंके आश्रमपर चले गये, तब महाबुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रको बड़ा पश्चात्ताप हुआ ॥ १ ॥
विदुरस्य प्रभावं च संधिविग्रहकारितम् ।
विवृद्धिं च परां मत्वा पाण्डवानां भविष्यति ॥ २ ॥
उन्होंने सोचा, विदुर संधि और विग्रह आदिकी नीतिको अच्छी तरह जानते हैं, जिसके कारण उनका बहुत बड़ा प्रभाव है। वे पाण्डवोंके पक्षमें हो गये तो भविष्यमें उनका महान् अभ्युदय होगा ॥ २ ॥
स सभाद्वारमागम्य विदुरस्मारमोहितः ।
समक्षं पार्थिवेन्द्राणां पपाताविष्टचेतनः ॥ ३ ॥
विदुरका स्मरण करके वे मोहित-से हो गये और सभाभवनके द्वारपर आकर सब राजाओंके देखते-देखते अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३ ॥
स तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां समुत्थाय महीतलात् ।
समीपोपस्थितं राजा संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ ४ ॥
फिर होशमें आनेपर वे पृथ्वीसे उठ खड़े हुए और समीप आये हुए संजयसे इस प्रकार बोले— ॥ ४ ॥
भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद् धर्म इवापरः ।
तस्य स्मृत्याद्य सुभृशं हृदयं दीर्यतीव मे ॥ ५ ॥
‘संजय! विदुर मेरे भाई और सुहृद् हैं। वे साक्षात् दूसरे धर्मके समान हैं। उनकी याद आनेसे आज मेरा हृदय अत्यन्त विदीर्ण-सा होने लगा है ॥ ५ ॥
तमानयस्व धर्मज्ञं मम भ्रातरमाशु वै ।
इति ब्रुवन् स नृपतिः कृपणं पर्यदेवयत् ॥ ६ ॥
‘तुम मेरे धर्मज्ञ भ्राता विदुरको शीघ्र यहाँ बुला लाओ।’ ऐसा कहते हुए राजा धृतराष्ट्र दीनभावसे फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ६ ॥
पश्चात्तापाभिसंतप्तो विदुरस्मारमोहितः ।
भ्रातृस्नेहादिदं राजा संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥
महाराज धृतराष्ट्र विदुरकी याद आनेसे मोहित हो पश्चात्तापसे खिन्न हो उठे और भ्रातृस्नेहवश संजयसे पुनः इस प्रकार बोले— ॥ ७ ॥
गच्छ संजय जानीहि भ्रातरं विदुरं मम ।
यदि जीवति रोषेण मया पापेन निर्धुतः ॥ ८ ॥
संजय! जाओ, मेरे भाई विदुरका पता लगाओ। मुझ पापीने क्रोधवश उन्हें निकाल दिया। वे जीवित तो हैं न? ॥ ८ ॥
न हि तेन मम भ्रात्रा सुसूक्ष्ममपि किंचन ।
व्यलीकं कृतपूर्वं वै प्राज्ञेनामितबुद्धिना ॥ ९ ॥
‘अपरिमित बुद्धिवाले मेरे उन विद्वान् भाईने पहले कभी कोई छोटा-सा भी अपराध नहीं किया है ॥ ९ ॥
स व्यलीकं परं प्राप्तो मत्तः परमबुद्धिमान् ।
त्यक्ष्यामि जीवितं प्राज्ञ तं गच्छानय संजय ॥ १० ॥
‘बुद्धिमान् संजय! मुझसे परम मेधावी विदुरका बड़ा अपराध हुआ। तुम जाकर उन्हें ले आओ, नहीं तो मैं प्राण त्याग दूँगा’ ॥ १० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राज्ञस्तमनुमान्य च ।
संजयो बाढमित्युक्त्वा प्राद्रवत् काम्यकं प्रति ॥ ११ ॥
सोऽचिरेण समासाद्य तद् वनं यत्र पाण्डवाः ।
रौरवाजिनसंवीतं ददर्शाथ युधिष्ठिरम् ॥ १२ ॥
विदुरेण सहासीनं ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ।
भ्रातृभिश्चाभिसंगुप्तं देवैरिव पुरंदरम् ॥ १३ ॥
राजाका यह वचन सुनकर संजयने उनका आदर करते हुए ‘बहुत अच्छा’ कहकर काम्यकवनको प्रस्थान किया। जहाँ पाण्डव रहते थे, उस वनमें शीघ्र ही पहुँचकर संजयने देखा, राजा युधिष्ठिर मृगचर्म धारण करके विदुरजी तथा सहस्रों ब्राह्मणोंके साथ बैठे हुए हैं। और देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति अपने भाइयोंसे सुरक्षित हैं ॥ ११—१३ ॥
युधिष्ठिरमुपागम्य पूजयामास संजयः ।
भीमार्जुनयमाश्चापि तद्युक्तं प्रतिपेदिरे ॥ १४ ॥
युधिष्ठिरके पास पहुँचकर संजयने उनका सम्मान किया। फिर भीम, अर्जुन और नकुल-सहदेवने संजयका यथोचित सत्कार किया ॥ १४ ॥
राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च संजयः ।
शशंसागमने हेतुमिदं चैवाब्रवीद् वचः ॥ १५ ॥
राजा युधिष्ठिरके कुशल-प्रश्न करनेके पश्चात् जब संजय सुखपूर्वक बैठ गया, तब अपने आनेका कारण बताते हुए उसने इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥
संजय उवाच
राजा स्मरति ते क्षत्तर्धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
तं पश्य गत्वा त्वं क्षिप्रं संजीवय च पार्थिवम् ॥ १६ ॥
**संजयने कहा—**विदुरजी! अम्बिकानन्दन महाराज धृतराष्ट्र आपको स्मरण करते हैं। आप जल्दी चलकर उनसे मिलिये और उन्हें जीवनदान दीजिये ॥ १६ ॥
सोऽनुमान्य नरश्रेष्ठान् पाण्डवान् कुरुनन्दनान् ।
नियोगाद् राजसिंहस्य गन्तुमर्हसि सत्तम ॥ १७ ॥
साधुशिरोमणे! आप कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले इन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंसे आदरपूर्वक विदा लेकर महाराजके आदेशसे शीघ्र उनके पास चलें ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु विदुरो धीमान् स्वजनवल्लभः ।
युधिष्ठिरस्यानुमते पुनरायाद् गजाह्वयम् ॥ १८ ॥
तमब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ दिष्ट्या स्मरसि मेऽनघ ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! स्वजनोंके परम प्रिय बुद्धिमान् विदुरजीसे जब संजयने इस प्रकार कहा, तब वे युधिष्ठिरकी अनुमति लेकर फिर हस्तिनापुरमें आये। वहाँ महातेजस्वी अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने उनसे कहा—‘धर्मज्ञ विदुर! तुम आ गये, यह मेरे बड़े सौभाग्यकी बात है। अनघ! यह भी मेरे सौभाग्यकी बात है कि तुम मुझे भूले नहीं ॥ १८-१९ ॥
अद्य रात्रौ दिवा चाहं त्वत्कृते भरतर्षभ ।
प्रजागरे प्रपश्यामि विचित्रं देहमात्मनः ॥ २० ॥
‘भरतकुलभूषण! मैं आज दिन-रात तुम्हारे लिये जागते रहनेके कारण अपने शरीरकी विचित्र दशा देख रहा हूँ' ॥ २० ॥
सोऽङ्कमानीय विदुरं मूर्ध्न्याघ्राय चैव ह ।
क्षम्यतामिति चोवाच यदुक्तोऽसि मयानघ ॥ २१ ॥
ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने विदुरको अपने हृदयसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघते हुए कहा—‘निष्पाप विदुर! मैंने तुमसे जो अप्रिय बात कह दी है, उसके लिये मुझे क्षमा करो' ॥ २१ ॥
विदुर उवाच
क्षान्तमेव मया राजन् गुरुर्मे परमो भवान् ।
एषोऽहमागतः शीघ्रं त्वद्दर्शनपरायणः ॥ २२ ॥
भवन्ति हि नरव्याघ्र पुरुषा धर्मचेतसः ।
दीनाभिपातिनो राजन् नात्र कार्या विचारणा ॥ २३ ॥
विदुरने कहा— राजन्! मैंने तो सब क्षमा कर ही दिया है। आप मेरे परम गुरु हैं। मैं शीघ्रतापूर्वक आपके दर्शनके लिये आया हूँ। नरश्रेष्ठ! धर्मात्मा पुरुष दीन जनोंकी ओर अधिक झुकते हैं। आपको इसके लिये मनमें विचार नहीं करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥
पाण्डोः सुता यादृशा मे तादृशास्तव भारत ।
दीना इतीव मे बुद्धिरभिपन्नाद्य तान् प्रति ॥ २४ ॥
भारत! मेरे लिये जैसे पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही आपके भी। परंतु पाण्डव इन दिनों दीन दशामें हैं, अतः उनके प्रति मेरे हृदयका झुकाव हो गया ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
अन्योन्यमनुनीयैवं भ्रातरौ द्वौ महाद्युती ।
विदुरो धृतराष्ट्रश्च लेभाते परमां मुदम् ॥ २५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वे दोनों महातेजस्वी भाई विदुर और धृतराष्ट्र एक-दूसरेसे अनुनय-विनय करके अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरप्रत्यागमने षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें विदुरप्रत्यागमनविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥