सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य-चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ततः सूर्योदये धौम्यः कृत्वाऽऽह्निकमरिंदम ।
आर्ष्टिषेणेन सहितः पाण्डवानभ्यवर्तत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—शत्रुदमन नरेश! तदनन्तर सूर्योदय होनेपर आर्ष्टिषेणसहित धौम्यजी नित्यकर्म पूरा करके पाण्डवोंके पास आये ॥ १ ॥

तेऽभिवाद्यार्ष्टिषेणस्य पादौ धौम्यस्य चैव ह ।
ततः प्राञ्जलयः सर्वे ब्राह्मणांस्तानपूजयन् ॥ २ ॥
तब समस्त पाण्डवोंने आर्ष्टिषेण तथा धौम्यके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर सब ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ २ ॥

ततो युधिष्ठिरं धौम्यो गृहीत्वा दक्षिणे करे ।
प्राचीं दिशमभिप्रेक्ष्य महर्षिरिदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
तदनन्तर महर्षि धौम्यने युधिष्ठिरका दाहिना हाथ पकड़कर पूर्व दिशाकी ओर देखते हुए कहा— ॥ ३ ॥

असौ सागरपर्यन्तां भूमिमावृत्य तिष्ठति ।
शैलराजो महाराज मन्दरोऽति विराजते ॥ ४ ॥
‘महाराज! वह पर्वतराज मन्दराचल प्रकाशित हो रहा है, जो समुद्रतककी भूमिको घेरकर खड़ा है ॥ ४ ॥

इन्द्रवैश्रवणावेतां दिशं पाण्डव रक्षतः ।
पर्वतैश्च वनान्तैश्च काननैश्चैव शोभिताम् ॥ ५ ॥
‘पाण्डुनन्दन! पर्वतों, वनान्त प्रदेशों और काननोंसे सुशोभित इस पूर्व दिशाकी रक्षा इन्द्र और कुबेर करते हैं ॥

एतदाहुर्महेन्द्रस्य राज्ञो वैश्रवणस्य च ।
ऋषयः सर्वधर्मज्ञाः सद्म तात मनीषिणः ॥ ६ ॥

अतश्चोद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठन्ति वै प्रजाः ।
ऋषयश्चापि धर्मज्ञाः सिद्धाः साध्याश्च देवताः ॥ ७ ॥

‘तात! सब धर्मोंके ज्ञाता मनीषी महर्षि इस दिशाको देवराज इन्द्र तथा कुबेरका निवासस्थान कहते हैं। इधरसे ही उदित होनेवाले सूर्यदेवकी समस्त प्रजा, धर्मज्ञ ऋषि, सिद्ध महात्मा तथा साध्य देवता उपासना करते हैं ।। ६-७ ।।
यमस्तु राजा धर्मज्ञः सर्वप्राणभृतां प्रभुः ।
प्रेतसत्त्वगतिं ह्येनां दक्षिणामाश्रितो दिशम् ।। ८ ।।
‘समस्त प्राणियोंके ऊपर प्रभुत्व रखनेवाले धर्मज्ञ राजा यम इस दक्षिण दिशाका आश्रय लेकर रहते हैं। इसमें मरे हुए प्राणी ही जा सकते हैं ।। ८ ।।
एतत् संयमनं पुण्यमतीवाद्भुतदर्शनम् ।
प्रेतराजस्य भवनमृद्ध्या परमया युतम् ।। ९ ।।
‘प्रेतराजका यह निवासस्थान अत्यन्त समृद्धिशाली परम पवित्र तथा देखनेमें अद्भुत है। राजन्! इसका नाम संयमन (या संयमनीपुरी) है ।। ९ ।।
यं प्राप्य सविता राजन् सत्येन प्रतितिष्ठति ।
अस्तं पर्वतराजानमेतमाहुर्मनीषिणः ।। १० ।।
एतं पर्वतराजानं समुद्रं च महोदधिम् ।
आवसन् वरुणो राजा भूतानि परिरक्षति ।। ११ ।।
‘राजन्! जहाँ जाकर भगवान् सूर्य सत्यसे प्रतिष्ठित होते हैं, उस पर्वतराजको मनीषी पुरुष अस्ताचल कहते हैं। गिरिराज अस्ताचल और महान् जलराशिसे भरे हुए समुद्रमें रहकर राजा वरुण समस्त प्राणियोंकी रक्षा करते हैं ।। १०-११ ।।
उदीचीं दीपयन्नेष दिशं तिष्ठति वीर्यवान् ।
महामेरुर्महाभाग शिवो ब्रह्मविदां गतिः ।। १२ ।।
‘महाभाग!’ यह अत्यन्त प्रकाशमान महामेरु पर्वत दिखायी देता है, जो उत्तर दिशाको उद्भासित करता हुआ खड़ा है। इस कल्याणकारी पर्वतपर ब्रह्मवेत्ताओंकी ही पहुँच हो सकती है ।। १२ ।।
यस्मिन् ब्रह्मसदश्चैव भूतात्मा चावतिष्ठते ।
प्रजापतिः सृजन् सर्वं यत् किञ्चिज्जङ्गमागमम् ।। १३ ।।
‘इसीपर ब्रह्माजीकी सभा है, जहाँ समस्त प्राणियोंके आत्मा ब्रह्मा स्थावर-जंगम समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करते हुए नित्य निवास करते हैं ।। १३ ।।
यानाहुर्ब्रह्मणः पुत्रान् मानसात् दक्षसप्तमान् ।
तेषामपि महामेरुः शिवं स्थानमनामयम् ।। १४ ।।
‘जिन्हें ब्रह्माजीका मानसपुत्र बताया जाता है और जिनमें दक्षप्रजापतिका स्थान सातवाँ है। उन समस्त प्रजापतियोंका भी यह महामेरु पर्वत ही रोग-शोकसे रहित सुखद स्थान है ।। १४ ।।
अत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनरेवोदयन्ति च ।

सप्त देवर्षयस्तात वसिष्ठप्रमुखाः सदा ॥ १५ ॥
‘तात! वसिष्ठ आदि सात देवर्षि इन्हीं प्रजापतिमें लीन होते और पुनः इन्हींसे प्रकट होते हैं॥ १५॥
देशं विरजसं पश्य मेरोः शिखरमुत्तमम् ।
यत्रात्मतृप्तैरध्यास्ते देवैः सह पितामहः ॥ १६ ॥
‘युधिष्ठिर! मेरुका वह उत्तम शिखर देखो, जो रजोगुण रहित प्रदेश है, वहाँ अपने-आपमें तृप्त रहनेवाले देवताओंके साथ पितामह ब्रह्मा निवास करते हैं॥ १६॥
यमाहुः सर्वभूतानां प्रकृतेः प्रकृतिं ध्रुवम् ।
अनादिनिधनं देवं प्रभुं नारायणं परम् ॥ १७ ॥
ब्रह्मणः सदनात् तस्य परं स्थानं प्रकाशते ।
देवा अपि न पश्यन्ति सर्वतेजोमयं शुभम् ॥ १८ ॥
अत्यर्कानलदीप्तं तत् स्थानं विष्णोर्महात्मनः ।
स्वयैव प्रभया राजन् दुष्प्रेक्ष्यं देवदानवैः ॥ १९ ॥
‘जो समस्त प्राणियोंकी पञ्चभूतमयी प्रकृतिके अक्षय उपादान हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष अनादि अनन्त दिव्य-स्वरूप परम प्रभु नारायण कहते हैं, उनका उत्तम स्थान उस ब्रह्मलोकसे भी ऊपर प्रकाशित हो रहा है। देवता भी उन सर्वतेजोमय शुभस्वरूप भगवान्‌का सहज ही दर्शन नहीं कर पाते। राजन्! परमात्मा विष्णुका वह स्थान सूर्य और अग्निसे भी अधिक तेजस्वी है और अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है। देवताओं और दानवोंके लिये उसका दर्शन अत्यन्त कठिन है॥ १७—१९॥
प्राच्यां नारायणस्थानं मेरावतिविराजते ।
यत्र भूतेश्वरस्तात सर्वप्रकृतिरात्मभूः ॥ २० ॥
भासयन् सर्वभूतानि सुश्रियाभिविराजते ।
नात्र ब्रह्मर्षयस्तात कुत एव महर्षयः ॥ २१ ॥
प्राप्नुवन्ति गतिं ह्येतां यतीनां भावितात्मनाम् ।
न तं ज्योतींषि सर्वाणि प्राप्य भासन्ति पाण्डव ॥ २२ ॥
‘तात! पूर्व दिशामें मेरुपर ही भगवान् नारायणका स्थान सुशोभित हो रहा है, जहाँ सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा सबके उपादान कारण स्वयंभू भगवान् विष्णु अपने उत्कृष्ट तेजसे सम्पूर्ण भूतोंको प्रकाशित करते हुए विराजमान होते हैं। वहाँ यत्नशील ज्ञानी महात्माओंकी ही पहुँच हो सकती है। उस नारायणधाममें ब्रह्मर्षियोंकी भी गति नहीं है। फिर महर्षि तो वहाँ जा ही कैसे सकते हैं। पाण्डुनन्दन! सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ भगवान्‌के निकट जाकर अपना तेज खो बैठते हैं—उनमें पूर्ववत् प्रकाश नहीं रह जाता॥ २०—२२॥
स्वयं प्रभुरचिन्त्यात्मा तत्र ह्यातिविराजते ।

यतयस्तत्र गच्छन्ति भक्त्या नारायणं हरिम् ॥ २३ ॥
'साक्षात् अचिन्त्यस्वरूप भगवान् विष्णु ही वहाँ विराजित होते हैं। यत्नशील महात्मा भक्तिके प्रभावसे वहाँ भगवान् नारायणको प्राप्त होते हैं ॥ २३ ॥

परेण तपसा युक्ता भाविताः कर्मभिः शुभैः ।
योगसिद्धा महात्मानस्तमोमोहविवर्जिताः ॥ २४ ॥
तत्र गत्वा पुनर्नेमं लोकमायान्ति भारत ।
स्वयम्भुवं महात्मानं देवदेवं सनातनम् ॥ २५ ॥
'भारत! जो उत्तम तपस्यासे युक्त हैं और पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे पवित्र हो गये हैं, वे अज्ञान और मोहसे रहित योगसिद्ध महात्मा उस नारायण-धाममें जाकर फिर इस संसारमें नहीं लौटते हैं। अपितु स्वयंभू एवं सनातन परमात्मा देवदेव विष्णुमें लीन हो जाते हैं ॥ २४-२५ ॥

स्थानमेतन्महाभाग ध्रुवमक्षयमव्ययम् ।
ईश्वरस्य सदा ह्येतत् प्रणमात्र युधिष्ठिर ॥ २६ ॥
'महाभाग युधिष्ठिर! यह परमेश्वरका नित्य, अविनाशी और अविकारी स्थान है। तुम यहींसे इसको प्रणाम करो ॥ २६ ॥

एनं त्वहरहर्मेरुं सूर्याचन्द्रमसौ ध्रुवम् ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य कुरुतः कुरुनन्दन ॥ २७ ॥
ज्योतींषि चाप्यशेषेण सर्वाण्यनघ सर्वतः ।
परियान्ति महाराज गिरिराजं प्रदक्षिणम् ॥ २८ ॥
'कुरुनन्दन! सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन इस निश्चल मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते रहते हैं। पापशून्य महाराज! सम्पूर्ण नक्षत्र भी गिरिराज मेरुकी सर्वतोभावेन परिक्रमा करते हैं ॥ २७-२८ ॥

एतं ज्योतींषि सर्वाणि प्रकर्षन् भगवानपि ।
कुरुते वितमस्कर्मा आदित्योऽभिप्रदक्षिणम् ॥ २९ ॥
'अन्धकारका निवारण करना ही जिनका मुख्य कर्म है, वे भगवान् सूर्य भी सम्पूर्ण ज्योतियोंको अपनी ओर खींचते हुए इस मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते हैं ॥ २९ ॥

अस्तं प्राप्य ततः संध्यामतिक्रम्य दिवाकरः ।
उदीचीं भजते काष्ठां दिशमेष विभावसुः ॥ ३० ॥
स मेरुमनुवृत्तः सन् पुनर्गच्छति पाण्डव ।
प्राङ्मुखः सविता देवः सर्वभूतहिते रतः ॥ ३१ ॥
'तदनन्तर अस्ताचलको पहुँचकर संध्याकालकी सीमाको लाँघकर ये भगवान् सूर्य उत्तर दिशाका आश्रय लेते हैं। पाण्डुनन्दन! मेरु पर्वतका अनुसरण करके उत्तर दिशाकी

सीमातक पहुँचकर ये समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् सूर्य पुनः पूर्वाभिमुख होकर चलते हैं ।। ३०-३१ ।।
स मासान् विभजन् काले बहुधा पर्वसंधिषु ।
तथैव भगवान् सोमो नक्षत्रैः सह गच्छति ॥ ३२ ॥
‘उसी प्रकार भगवान् चन्द्रमा भी नक्षत्रोंके साथ मेरु पर्वतकी परिक्रमा करते हैं और पर्वसंधिके समय विभिन्न मासोंका विभाग करते रहते हैं ।। ३२ ।।
एवमेतं त्वतिक्रम्य महामेरुमतन्द्रितः ।
भावयन् सर्वभूतानि पुनर्गच्छति मन्दरम् ॥ ३३ ॥
तथा तमिस्रहा देवो मयूखैर्भावयञ्जगत् ।
मार्गमेतदसम्बाधमादित्यः परिवर्तते ॥ ३४ ॥
‘इस तरह आलस्यरहित हो इस महामेरुका उल्लंघन करके समस्त प्राणियोंका पोषण करते हुए वे पुनः मन्दराचलको चले जाते हैं। उसी प्रकार अन्धकारनाशक भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हुए इस बाधारहित मार्गपर सदा चक्कर लगाते रहते हैं ।। ३३-३४ ।।
सिसृक्षुः शिशिराण्येव दक्षिणां भजते दिशम् ।
ततः सर्वाणि भूतानि कालोऽभ्यर्च्छति शैशिरः ॥ ३५ ॥
स्थावराणां च भूतानां जङ्गमानां च तेजसा ।
तेजांसि समुपादत्ते निवृत्तः स विभावसुः ॥ ३६ ॥
ततः स्वेदक्लमौ तन्द्री ग्लानिश्च भजते नरान् ।
प्राणिभिः सततं स्वप्नो ह्यभीक्ष्णं च निषेव्यते ॥ ३७ ॥
एवमेतदनिर्देश्यं मार्गमावृत्य भानुमान् ।
पुनः सृजति वर्षाणि भगवान् भावयन् प्रजाः ॥ ३८ ॥
‘शीतकी सृष्टि करनेकी इच्छासे ही सूर्यदेव दक्षिण दिशाका आश्रय लेते हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंपर शीतकालका प्रभाव पड़ने लगता है। दक्षिणायनसे निवृत्त होनेपर वे भगवान् सूर्य स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंका तेज अपने तेजसे हर लेते हैं, यही कारण है कि मनुष्योंको पसीना, थकावट, आलस्य और ग्लानिका अनुभव होता है तथा प्राणी सदा निद्राका ही बार-बार सेवन करते हैं। इस प्रकार इस अन्तरिक्ष मार्गको आवृत करके समस्त प्रजाकी पुष्टि करते हुए भगवान् सूर्य पुनः वर्षाकी सृष्टि करते हैं ।। ३५—३८ ।।
वृष्टिमारुतसंतापैः सुखैः स्थावरजङ्गमान् ।
वर्धयन् सुमहातेजाः पुनः प्रतिनिवर्तते ॥ ३९ ॥
‘महातेजस्वी सूर्यदेव वृष्टि, वायु और तापद्वारा सुखपूर्वक चराचर जीवोंकी पुष्टि करते हुए पुनः अपने स्थानपर लौट आते हैं ।। ३९ ।।
एवमेष चरन् पार्थ कालचक्रमतन्द्रितः ।

प्रकर्षन् सर्वभूतानि सविता परिवर्तते ॥ ४० ॥
‘कुन्तीनन्दन! इस प्रकार ये भगवान् सूर्य सावधान हो समस्त प्राणियोंका आकर्षण और पोषण करते हुए विचरते और कालचक्रका संचालन करते हैं ॥ ४० ॥

संतता गतिरेतस्य नैष तिष्ठति पाण्डव ।
आदायैव तु भूतानां तेजो विसृजते पुनः ॥ ४१ ॥
विभजन् सर्वभूतानामायुः कर्म च भारत ।
अहोरात्रं कलाः काष्ठाः सृजत्येष सदा विभुः ॥ ४२ ॥
‘युधिष्ठिर! यह सूर्यदेवकी निरन्तर चलनेवाली गति है। सूर्य कभी एक क्षणके लिये भी रुकते नहीं हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंके रसमय तेजको ग्रहण करके पुनः उसे वर्षाकालमें बरसा देते हैं। भारत! ये भगवान् सविता सम्पूर्ण भूतोंकी आयु और कर्मका विभाग करते हुए दिन-रात, कला-काष्ठा आदि समयकी निरन्तर सृष्टि करते रहते हैं’ ॥ ४१-४२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि मेरुदर्शने त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें मेरुदर्शनविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥