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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

१६४-

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चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् नगेन्द्रे वसतां तु तेषां
महात्मनां सद्व्रतमास्थितानाम् ।
रतिः प्रमोदश्च बभूव तेषा-
माकाङ्क्षतां दर्शनमर्जुनस्य ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस पर्वतराज गन्धमादनपर उत्तम व्रतका आश्रय ले निवास करते हुए अर्जुनके दर्शनकी इच्छा रखनेवाले महामना पाण्डवोंके मनमें अत्यन्त प्रेम और आनन्दका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १ ॥

तान् वीर्ययुक्तान् सुविशुद्धकामां-
स्तेजस्विनः सत्यधृतिप्रधानान् ।
सम्प्रीयमाणा बहवोऽभिजग्मु-
र्गन्धर्वसङ्घाश्च महर्षयश्च ॥ २ ॥

वे सब-के-सब बड़े पराक्रमी थे। उनकी कामनाएँ अत्यन्त विशुद्ध थीं। वे तेजस्वी तो थे ही, सत्य और धैर्य उनके प्रधान गुण थे; अतः बहुतसे गन्धर्व तथा महर्षिगण उनसे प्रेमपूर्वक मिलने-जुलनेके लिये आने लगे ॥ २ ॥

तं पादपैः पुष्पधरैरुपेतं
नगोत्तमं प्राप्य महारथानाम् ।
मनःप्रसादः परमो बभूव
यथा दिवं प्राप्य मरुद्गणानाम् ॥ ३ ॥

वह श्रेष्ठ पर्वत विकसित वृक्षावलियोंसे विभूषित था। वहाँ पहुँच जानेसे महारथी पाण्डवोंके मनमें बड़ी प्रसन्नता रहने लगी। ठीक उसी तरह, जैसे मरुद्गणोंको स्वर्गलोकमें पहुँचनेपर प्रसन्नता होती है ॥ ३ ॥

मयूरहंसस्वननादितानि
पुष्पोपकीर्णानि महाचलस्य ।
शृङ्गाणि सानूनि च पश्यमाना
गिरेः परं हर्षमवाप्य तस्थुः ॥ ४ ॥

उस महान् पर्वतके शिखर मयूरों और हंसोंके कलनादसे गूँजते रहते थे। वहाँ सब ओर सुन्दर पुष्प व्याप्त हो रहे थे। उन मनोहर शिखरोंको देखते हुए पाण्डवलोग बड़े हर्षके साथ वहाँ रहने लगे ॥ ४ ॥

साक्षात् कुबेरेण कृताश्च तस्मिन्
नगोत्तमे संवृतकूलरोधसः ।
कादम्बकारण्डवहंसजुष्टाः
पद्माकुलाः पुष्करिणीरपश्यन् ॥ ५ ॥

उस श्रेष्ठ शैलपर साक्षात् भगवान् कुबेरने अनेक सुन्दर सरोवर बनवाये थे, जो कमल-समूहसे आच्छादित रहते थे। उनके जल शैवाल आदिसे ढके होते थे और उन सबमें हंस, कारण्डव आदि पक्षी सानन्द निवास करते थे। पाण्डवोंने उन सरोवरोंको देखा ॥ ५ ॥

क्रीडाप्रदेशांश्च समृद्धरूपान्
सुचित्रमाल्यावृतजातशोभान् ।
मणिप्रकीर्णांश्च मनोरमांश्च
यथा भवेयुर्धनदस्य राज्ञः ॥ ६ ॥

धनाध्यक्ष राजा कुबेरके लिये जैसे होने चाहिये, वैसे ही समृद्धिशाली क्रीडा-प्रदेश वहाँ बने हुए थे। विचित्र मालाओंसे समावृत होनेके कारण उनकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी। उनको मणि तथा रत्नोंसे अलंकृत किया गया था, जिससे वे क्रीड़ा-स्थल मनको मोहे लेते थे ॥

अनेकवर्णैश्च सुगन्धिभिश्च
महाद्रुमैः संततमभ्रजालैः ।
तपःप्रधानाः सततं चरन्तः
शृङ्गं गिरेर्श्चिन्तयितुं न शेकुः ॥ ७ ॥

अनेक वर्णवाले विशाल सुगन्धित वृक्षों तथा मेघसमूहोंसे व्याप्त उस पर्वतशिखरपर विचरते हुए सदा तपस्यामें ही संलग्न रहनेवाले पाण्डव उस पर्वतकी महत्ताका चिन्तन नहीं कर पाते थे ॥ ७ ॥

स्वतेजसा तस्य नगोत्तमस्य
महौषधीनां च तथा प्रभावात् ।
विभक्तभावो न बभूव कश्चि-
दहोनिशानां पुरुषप्रवीर ॥ ८ ॥

वीरवर जनमेजय! पर्वतराज गन्धमादनके अपने तेजसे तथा वहाँकी तेजस्विनी महौषधियोंके प्रभावसे वहाँ सदा प्रकाश व्याप्त रहनेके कारण दिन-रातका कोई विभाग नहीं हो पाता था ॥ ८ ॥

यमास्थितः स्थावरजङ्गमानि

विभावसुर्भावयतेऽमितौजाः ।
तस्योदयं चास्तमनं च वीरा-
स्तत्र स्थितास्ते ददृशुर्नृसिंहाः ॥ ९ ॥
जिन भगवान् सूर्यका आश्रय लेकर अमित तेजस्वी अग्निदेव सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंका पोषण करते हैं, उनके उदय और अस्तकी लीलाको पुरुषसिंह वीर पाण्डव वहाँ रहकर स्पष्ट देखते थे ॥ ९ ॥

रवेस्तमिस्रागमनिर्गमांस्ते
तथोदयं चास्तमनं च वीराः ।
समावृताः प्रेक्ष्य तमोनुदस्य
गभस्तिजालैः प्रदिशो दिशश्च ॥ १० ॥
स्वाध्यायवन्तः सततक्रियाश्च
धर्मप्रधानाश्च शुचिव्रताश्च ।
सत्ये स्थितास्तस्य महारथस्य
सत्यव्रतस्यागमनप्रतीक्षाः ॥ ११ ॥
वे वीर पाण्डव वहाँसे अन्धकारके आगमन और निर्गमनको अन्धकारविनाशक भगवान् सूर्यके उदय और अस्तकी लीलाको तथा उनके किरणसमूहोंसे व्याप्त हुई सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंको देखकर स्वाध्यायमें संलग्न रहते थे। सदा शुभकर्मोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहकर प्रधानरूपसे धर्मका ही आश्रय लेते थे। उनका आचार-व्यवहार अत्यन्त पवित्र था। वे सत्यमें स्थित होकर सत्यव्रतपरायण महारथी अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा करते थे ॥ १०-११ ॥

इहैव हर्षोऽस्तु समागतानां
क्षिप्रं कृतास्त्रेण धनंजयेन ।
इति ब्रुवन्तः परमाशिषस्ते
पार्थास्तपोयोगपरा बभूवुः ॥ १२ ॥
‘इस पर्वतपर आये हुए हम सब लोगोंको यहीं अस्त्रविद्या सीखकर पधारे हुए अर्जुनके दर्शनसे शीघ्र ही अत्यन्त हर्षकी प्राप्ति हो;’ इस प्रकार परस्पर शुभ-कामना प्रकट करते हुए वे सभी कुन्तीपुत्र तप और योगके साधनमें संलग्न रहते थे ॥ १२ ॥

दृष्ट्वा विचित्राणि गिरौ वनानि
किरीटिनं चिन्तयतामभीक्ष्णम् ।
बभूव रात्रिर्दिवसश्च तेषां
संवत्सरेणैव समानरूपः ॥ १३ ॥
उस पर्वतपर विचित्र वन-कुंजोंकी शोभा देखते और निरन्तर अर्जुनका चिन्तन करते हुए पाण्डवोंको एक दिन-रातका समय एक वर्षके समान प्रतीत होता था ॥ १३ ॥

यदैव धौम्यानुमते महात्मा
कृत्वा जटां प्रव्रजितः स जिष्णुः।
तदैव तेषां न बभूव हर्षः
कुतो रतिस्तद्गतमानसानाम् ॥ १४ ॥
जबसे धौम्य मुनिकी आज्ञा लेकर महामना अर्जुन सिरपर जटा धारण करके तपस्याके लिये प्रस्थित हुए थे, तभीसे उन पाण्डवोंके मनमें रंचमात्र भी हर्ष नहीं रह गया था। उनका मन निरन्तर अर्जुनमें ही लगा रहता था। ऐसी दशामें उन्हें सुख कैसे प्राप्त हो सकता था? ॥ १४ ॥

भ्रातुर्नियोगात् तु युधिष्ठिरस्य
वनादसौ वारणमत्तगामी।
यत् काम्यकात् प्रव्रजितः स जिष्णु-
स्तदैव ते शोकहता बभूवुः ॥ १५ ॥
गजराजके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले वे अर्जुन जब बड़े भाई युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर काम्यक वनसे प्रस्थित हुए थे, तभी समस्त पाण्डव शोकसे पीड़ित हो गये थे ॥ १५ ॥

तथैव तं चिन्तयतां सिताश्व-
मस्त्रार्थिनं वासवमभ्युपेतम्।
मासोऽथ कृच्छ्रेण तदा व्यतीत-
स्तस्मिन् नगे भारत भारतानाम् ॥ १६ ॥
जनमेजय! अस्त्रविद्याकी अभिलाषासे देवराज इन्द्रके समीप गये हुए श्वेतवाहन अर्जुनका चिन्तन करनेवाले पाण्डवोंका एक मास उस पर्वतपर बड़ी कठिनाईसे व्यतीत हुआ ॥ १६ ॥

उषित्वा पञ्च वर्षाणि सहस्राक्षनिवेशने।
अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि विबुधेश्वरात् ॥ १७ ॥
आग्नेयं वारुणं सौम्यं वायव्यमथ वैष्णवम्।
ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं पारमेष्ठ्यं प्रजापतेः ॥ १८ ॥
यमस्य धातुः सवितुस्त्वष्टुर्वैश्रवणस्य च।
तानि प्राप्य सहस्राक्षादभिवाद्य शतक्रतुम् ॥ १९ ॥
अनुज्ञातस्तदा तेन कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।
आगच्छदर्जुनः प्रीतः प्रहृष्टो गन्धमादनम् ॥ २० ॥
इधर अर्जुनने इन्द्र-भवनमें पाँच वर्ष रहकर देवेश्वर इन्द्रसे सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये। इस प्रकार अग्नि, वरुण, सोम, वायु, विष्णु, इन्द्र, पशुपति, ब्रह्मा, परमेष्ठी, प्रजापति, यम, धाता, सविता, त्वष्टा तथा कुबेरसम्बन्धी अस्त्रोंको भी देवेन्द्रसे ही प्राप्त करके उन्हें

प्रणाम किया। तदनन्तर उनसे अपने भाइयोंके पास लौटनेकी आज्ञा पाकर उनकी परिक्रमा करके अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए और हर्षोल्लासमें भरकर गन्धमादनपर आये ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वण्यर्जुनाभिगमने चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें अर्जुनाभिगमनविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥