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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

२२२-

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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुनःउनका प्राकट्य

मार्कण्डेय उवाच

आपस्य मुदिता भार्या सहस्य परमा प्रिया ।
भूपतिर्भुवभर्ता च जनयत् पावकं परम् ।। १ ।।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! जलमें निवासके कारण प्रसिद्ध हुए 'सह' नामक अग्निके एक परम प्रिय पत्नी थी जिसका नाम था मुदिता। उसके गर्भसे भूलोक और भुवर्लोकके स्वामी सहने 'अद्भुत'* नामक उत्कृष्ट अग्निको उत्पन्न किया ।। १ ।।

भूतानां चापि सर्वेषां यं प्राहुः पावकं पतिम् ।
आत्मा भुवनभर्तेति सान्वयेषु द्विजातिषु ।। २ ।।
ब्राह्मणलोगोंमें वंशपरम्पराके क्रमसे सभी यह मानते और कहते हैं कि 'अद्भुत' नामक अग्नि सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति हैं। वे ही सबके आत्मा और भुवनभर्ता हैं ।। २ ।।

महतां चैव भूतानां सर्वेषामिह यः पतिः ।
भगवान् स महातेजा नित्यं चरति पावकः ।। ३ ।।
‘वे ही इस जगत्के सम्पूर्ण महाभूतोंके पति हैं। उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य सुशोभित हैं। वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं ।। ३ ।।

अग्निर्गृहपतिर्नाम नित्यं यज्ञेषु पूज्यते ।
हुतं वहति यो हव्यमस्य लोकस्य पावकः ।। ४ ।।
‘जो अग्नि गृहपति नामसे सदा यज्ञमें पूजित होते हैं तथा हवन किये गये हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं, वे अद्भुत अग्नि ही इस जगत्को पवित्र करनेवाले हैं ।। ४ ।।

अपां गर्भो महाभागः सत्त्वभुग् यो महाद्भुतः ।
भूपतिर्भुवभर्ता च महतः पतिरुच्यते ।। ५ ।।
‘जो ‘आप’ नामवाले सहके पुत्र हैं, जो महाभाग, सत्त्वभोक्ता, भूलोकके पालक और भुवर्लोकके स्वामी हैं, वे अद्भुत नामक महान् अग्नि बुद्धितत्त्वके अधिपति बताये जाते हैं’ ।। ५ ।।

दहन् मृतानि भूतानि तस्याग्निर्भरतोऽभवत् ।
अग्निष्टोमे च नियतः क्रतुश्रेष्ठो भरस्य तु ।। ६ ।।
‘उन्हीं ‘अद्भुत’ या गृहपतिके एक अग्निस্বরূপ पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘भरत’ है। ये मरे हुए प्राणियोंके शवका दाह करते हैं। भरतका अग्निष्टोम यज्ञमें नित्य निवास है,

इसलिये उन्हें 'नियत' भी कहते हैं। नियतका संकल्प उत्तम है ।। ६ ।।
स वह्निः प्रथमो नित्यं देवैरन्विष्यते प्रभुः ।
आयान्तं नियतं दृष्ट्वा प्रविवेशार्णवं भयात् ।। ७ ।।
'प्रथम अग्नि 'सह' बड़े प्रभावशाली हैं। एक समय देवतालोग उनको ढूँढ़ रहे थे। उनके साथ अपने पौत्र नियतको भी आता देख (उससे छू जानेके) भयसे वे समुद्रके भीतर घुस गये ।। ७ ।।
देवास्तत्रापि गच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम् ।
दृष्ट्वा त्वग्निरथर्वाणं ततो वचनमब्रवीत् ।। ८ ।।
तब देवतालोग सब दिशाओंमें उनकी खोज करते हुए वहाँ भी पहुँचने लगे। एक दिन अथर्वा (अंगिरा)-को देखकर अग्निने उनसे कहा— ।। ८ ।।
देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बलः ।
अथ त्वं गच्छ मध्वक्षं प्रियमितत् कुरुष्व मे ।। ९ ।।
वीर! तुम देवताओंके पास उनका हविष्य पहुँचाओ। मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ। अब केवल तुम्हीं अग्निपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो' ।। ९ ।।
प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततोऽगमत् ।
मत्स्यास्तस्य समाचख्युः क्रुद्धस्तानग्निरब्रवीत् ।
भक्ष्या वै विविधैर्भावैर्भविष्यथ शरीरिणाम् ।। १० ।।
इस प्रकार अथर्वाको भेजकर अग्निदेव दूसरे स्थानमें चले गये। किंतु मत्स्योंने अथर्वासे उनकी स्थिति कहाँ है, यह बता दिया। इससे कुपित होकर अग्निने उन्हें शाप देते हुए कहा—'तुम लोग नाना प्रकारसे जीवोंके भक्ष्य बनोगे' ।।
अथर्वाणं तथा चापि हव्यवाहोऽब्रवीद् वचः ।। ११ ।।
अनुनीयमानो हि भृशं देववाक्याद्धि तेन सः ।
नैच्छद् वोढुं हविः सोढुं शरीरं चापि सोऽत्यजत् ।। १२ ।।
तदनन्तर अग्निने अथर्वासे फिर वही बात कही। उस समय देवताओंके कहनेसे अथर्वा मुनिने सह नामक अग्निदेवसे अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोनेका भार लेनेकी इच्छा की और न वे अपने उस जीर्ण शरीरका ही भार सह सके। अन्ततोगत्वा उन्होंने शरीर त्याग दिया ।। ११-१२ ।।
स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा ।
भूमिं स्पृष्ट्वासृजद् धातून् पृथक् पृथगतीव हि ।। १३ ।।
उस समय अपने उस शरीरको त्यागकर वे धरतीमें समा गये। भूमिका स्पर्श करके उन्होंने पृथक्-पृथक् बहुत-से धातुओंकी सृष्टि की ।। १३ ।।
पूयात् स गन्धं तेजश्च अस्थिभ्यो देवदारु च ।
श्लेष्मणः स्फाटिकं तस्य पित्तान्मारकतं तथा ।। १४ ।।

‘सह’ नामक अग्निने अपने पीब तथा रक्तसे गन्धक एवं तैजस धातुओंको उत्पन्न किया। उनकी हड्डियोंसे देवदारुके वृक्ष प्रकट हुए। कफसे स्फटिक तथा पित्तसे मरकतमणिका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १४ ॥
यकृत् कृष्णायसं तस्य त्रिभिरेव बभुः प्रजाः ।
नखास्तस्याभ्रपटलं शिराजालानि विद्रुमम् ॥ १५ ॥
और उनका यकृत् (जिगर) ही काले रंगका लोहा बनकर प्रकट हुआ। काष्ठ, पाषाण और लोहा—इन तीनोंसे ही प्रजाजनोंकी शोभा होती है। उनके नख मेघसमूहका रूप धारण करते हैं। नाड़ियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुई हैं ॥ १५ ॥
शरीराद् विविधाश्चान्ये धातवोऽस्याभवन् नृप ।
एवं त्यक्त्वा शरीरं च परमे तपसि स्थितः ॥ १६ ॥
राजन्! सह अग्निके शरीरसे अन्य नाना प्रकारके धातु उत्पन्न हुए। इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्यामें लग गये ॥ १६ ॥
भृग्वङ्गिरादिभिर्भूयस्तपसोत्थापितस्तदा ।
भृशं जज्वल तेजस्वी तपसाऽऽप्यायितः शिखी ॥ १७ ॥
जब भृगु और अंगिरा आदि ऋषियोंने पुनः उनको तपस्यासे उपरत कर दिया, तब वे तपस्यासे पुष्ट हुए तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे ॥ १७ ॥
दृष्ट्वा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् ।
तस्मिन् नष्टे जगद् भीतमथर्वाणमथाश्रितम् ।
अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादयः ॥ १८ ॥
महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा—अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की ॥ १८ ॥
अथर्वा त्वसृजल्लोकानात्मनाऽऽलोक्य पावकम् ।
मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम् ॥ १९ ॥
अथर्वाने सब प्राणियोंके देखते-देखते समुद्रको मथ डाला और अग्निदेवका दर्शन करके स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की ॥ १९ ॥
एवमग्निर्भगवता नष्टः पूर्वमथर्वणा ।
आहूतः सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा ॥ २० ॥
इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान् अंगिराने फिर बुलाया। जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं ॥ २० ॥
एवं त्वजनयद् धिष्ण्यान् वेदोक्तान् विबुधान् बहून् ।
विचरन् विविधान् देशान् भ्रममाणस्तु तत्र वै ॥ २१ ॥

उस समुद्रके भीतर नाना स्थानोंमें विचरण एवं भ्रमण करते हुए सह अग्निने इसी प्रकार विविध भाँतिके बहुत-से वेदोक्त अग्निदेवों तथा उनके स्थानोंको उत्पन्न किया ॥ २१ ॥

सिन्धुनदं पञ्चनदं देविकाथ सरस्वती ।
गङ्गा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डसाह्वया ॥ २२ ॥
चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तदा ।
ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्रोऽथ कौशिकी ॥ २३ ॥
तमसा नर्मदा चैव नदी गोदावरी तथा ।
वेणोपवेणा भीमा च वडवा चैव भारत ॥ २४ ॥
भारती सुप्रयोगा च कावेरी मुर्मुरा तथा ।
तुङ्गवेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च ॥ २५ ॥
एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः ।

सिन्धुनद, पंचनद, देविका, सरस्वती, गंगा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुंगवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र—ये सब नदियाँ और नद हैं, जो अग्नियोंके उत्पत्ति-स्थान कहे गये हैं ॥ २२—२५ १/२ ॥

अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसिः ॥ २६ ॥
यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव तु ।
अत्रेश्चाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसाः प्रजाः ॥ २७ ॥

अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके ‘विभूरसि’ नामक पुत्र हुआ। अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है। वे सब अग्नि ब्रह्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं ॥ २६-२७ ॥

अत्रिः पुत्रान् स्रष्टुकामस्तानेवात्मन्यधारयत् ॥ २८ ॥
तस्य तद्ब्रह्मणः कायान्निर्हरन्ति हुताशनाः ।

अत्रिको जब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने उन अग्नियोंको ही अपने हृदयमें धारण किया। फिर उन ब्रह्मर्षिके शरीरसे विभिन्न अग्नियोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ २८ १/२ ॥

एवमेते महात्मानः कीर्तितास्तेऽग्नयो मया ॥ २९ ॥
अप्रमेया यथोत्पन्नाः श्रीमन्तस्तिमिरापहाः ।

राजन्! इस प्रकार मैंने इन अप्रमेय, अन्धकारनिवारक तथा दीप्तिमान् महामना अग्नियोंकी जिस क्रमसे उत्पत्ति हुई है, उसका तुमसे वर्णन किया ॥ २९ १/२ ॥

अद्भुतस्य तु माहात्म्यं यथा वेदेषु कीर्तितम् ॥ ३० ॥

तादृशं विद्धि सर्वेषामेको ह्येषु हुताशनः ।
वेदोंमें 'अद्भुत' नामक अग्निके माहात्म्यका जैसा वर्णन है, वैसा ही सब अग्नियोंका समझना चाहिये; क्योंकि इन सबमें एक ही अग्नितत्त्व विद्यमान है ।। ३० १/२ ।।
एक एवैष भगवान् विज्ञेयः प्रथमोऽङ्गिराः ।। ३१ ।।
बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोमः क्रतुर्यथा ।
ये प्रथम भगवान् अग्नि, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं, ऐसा जानना चाहिये। जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्भिद् आदि अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीरसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हुआ है ।। ३१ १/२ ।।
इत्येष वंशः सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया ।
योऽर्चितो विविधैर्मन्त्रैर्हव्यं वहति देहिनाम् ।। ३२ ।।
इस प्रकार मेरेद्वारा अग्निदेवके महान् वंशका प्रतिपादन किया गया। वे भगवान् अग्नि विविध वेदमन्त्रोंद्वारा पूजित होकर देहधारियोंके दिये हुए हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं ।। ३२ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि
आङ्गिरसोपाख्यानेऽग्निसमुद्भवे द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २२२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक अग्निप्रादुर्भावसम्बन्धी दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२२ ।।


* 'सहसः पुत्रोऽद्भुतः' इति मन्त्रवर्णः।