महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२५३-
त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान
जनमेजय उवाच
वसमानेषु पार्थेषु वने तस्मिन् महात्मसु ।
धार्तराष्ट्रा महेष्वासाः किमकुर्वत सत्तमाः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले— मुने! जब महात्मा पाण्डव उस वनमें निवास करते थे, उन दिनों महान् धनुर्धर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र-पुत्रोंने क्या किया? ॥ १ ॥
कर्णो वैकर्तनश्चैव शकुनिश्च महाबलः ।
भीष्मद्रोणकृपाश्चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ २ ॥
सूर्यपुत्र कर्ण, महाबली शकुनि, भीष्म, द्रोण तथा कृपाचार्य—इन सबने कौन-सा कार्य किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं गतेषु पार्थेषु विसृष्टे च सुयोधने ।
आगते हास्तिनपुरं मोक्षिते पाण्डुनन्दनैः ॥ ३ ॥
भीष्मोऽब्रवीन्महाराज धार्तराष्ट्रमिदं वचः ।
वैशम्पायनजीने कहा— महाराज! पाण्डवोंद्वारा गन्धर्वोंसे छुटकारा मिल जानेपर जब दुर्योधन विदा होकर हस्तिनापुर पहुँच गया और पाण्डव जाकर पूर्ववत् वनमें ही रहने लगे तब भीष्मजीने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे यह बात कही— ॥ ३ १/२ ॥
उक्तं तात यथा पूर्वं गच्छतस्ते तपोवनम् ॥ ४ ॥
गमनं मे न रुचितं तव तत्र कृतं च ते ।
‘तात! तुम्हारे तपोवन जाते समय जैसा कि मैंने पहले ही कह दिया था, वही आज भी कह रहा हूँ। मुझे तुम्हारा वहाँ जाना अच्छा नहीं लगा और वहाँ जाकर तुमने जो कुछ किया, वह भी पसंद नहीं आया ॥ ४ १/२ ॥
ततः प्राप्तं त्वया वीर ग्रहणं शत्रुभिर्बलात् ॥ ५ ॥
मोक्षितश्चासि धर्मज्ञैः पाण्डवैर्न च लज्जसे ।
‘वीर! शत्रुओंने तुम्हें वहाँ बलपूर्वक बंदी बना लिया और धर्मज्ञ पाण्डवोंने तुम्हें उस संकटसे छुड़ाया है। क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती? ॥ ५ १/२ ॥
प्रत्यक्षं तव गान्धारे ससैन्यस्य विशाम्पते ॥ ६ ॥
सूतपुत्रोऽपयाद् भीतो गन्धर्वाणां तदा रणात् ।
‘गान्धारीनन्दन! सेनासहित तुम्हारे सामने ही सूतपुत्र कर्ण गन्धर्वोंसे भयभीत हो युद्धभूमिसे भाग निकला ॥ ६ १/२ ॥
क्रोशस्रस्तव राजेन्द्र ससैन्यस्य नृपात्मज ॥ ७ ॥
दृष्टस्ते विक्रमश्चैव पाण्डवानां महात्मनाम् ।
राजेन्द्र! राजकुमार! जब सेनासहित तुम चीखते-चिल्लाते रहे उस समय महात्मा पाण्डवोंने जो पराक्रम कर दिखाया था वह भी तुमने प्रत्यक्ष देखा है ।। ७ १/२ ।।
कर्णस्य च महाबाहो सूतपुत्रस्य दुर्मतेः ॥ ८ ॥
न चापि पादभाक् कर्णः पाण्डवानां नृपोत्तम ।
धनुर्वेदे च शौर्ये च धर्मे वा धर्मवत्सल ॥ ९ ॥
महाबाहो! उस समय खोटी बुद्धिवाले सूतपुत्र कर्णका पराक्रम भी तुमसे छिपा नहीं था। नृपश्रेष्ठ! धर्मवत्सल! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि धनुर्वेद, शौर्य और धर्माचरणमें कर्ण पाण्डवोंकी अपेक्षा चौथाई योग्यता भी नहीं रखता है ।। ८-९ ।।
तस्मादहं क्षमं मन्ये पाण्डवैस्तैर्महात्मभिः ।
संधिं संधिविदां श्रेष्ठ कुलस्यास्य विवृद्धये ॥ १० ॥
‘अतः संधिवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश! मैं तो इस कुलके अभ्युदयके लिये उन महात्मा पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही उचित समझता हूँ’ ।। १० ।।
एवमुक्तश्च भीष्मेण धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः ।
प्रहस्य सहसा राजन् विप्रतस्थे ससौबलः ॥ ११ ॥
राजन्! भीष्मके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन हँस पड़ा और शकुनिके साथ सहसा वहाँसे अन्यत्र चला गया ।। ११ ।।
तं तु प्रस्थितमाज्ञाय कर्णदुःशासनादयः ।
अनुजग्मुर्महेष्वासा धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥ १२ ॥
महाबली दुर्योधनको अन्यत्र गया जान कर्ण और दुःशासन आदि महान् धनुर्धरोंने उसका अनुसरण किया ।। १२ ।।
तांस्तु सम्प्रस्थितान् दृष्ट्वा भीष्मः कुरुपितामहः ।
लज्जया व्रीडितो राजन् जगाम स्वं निवेशनम् ॥ १३ ॥
राजन्! उन सबको वहाँसे प्रस्थान करते देख कुरुकुलपितामह भीष्म लज्जित होकर अपने आवास-स्थानको चले गये ।। १३ ।।
गते भीष्मे महाराज धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः ।
पुनरागम्य तं देशममन्त्रयत मन्त्रिभिः ॥ १४ ॥
महाराज! भीष्मके चले जानेपर राजा दुर्योधन फिर उसी स्थानपर लौट आया और अपने मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा करने लगा— ।। १४ ।।
किमस्माकं भवेच्छ्रेयः किं कार्यमवशिष्यते ।
कथं च सुकृतं तत् स्यान्मन्त्रयामोऽद्य यद्धितम् ॥ १५ ॥
‘मित्रो! क्या करनेसे हमलोगोंकी भलाई होगी? हमारे लिये कौन-सा कार्य शेष रह गया है? कैसे करनेसे हमारा कार्य शुभ परिणामजनक होगा? क्या करनेमें हमारा हित है? आज इसी विषयपर हमलोगोंको विचार करना है’ ।। १५ ।।
कर्ण उवाच
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
भीष्मोऽस्मान् निन्दति सदा पाण्डवांश्च प्रशंसति ॥ १६ ॥
**कर्ण बोला—**कुरुकुलरत्न दुर्योधन! मैं तुमसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसपर ध्यान दो। भीष्म सदा हमारी निन्दा और पाण्डवोंकी प्रशंसा करते रहते हैं ॥ १६ ॥
त्वद् द्वेषाच्च महाबाहो ममापि द्वेष्टुमर्हति ।
विगर्हते च मां नित्यं त्वत्समीपे नरेश्वर ॥ १७ ॥
महाबाहो! वे तुम्हारे प्रति द्वेष होनेसे मुझसे भी द्वेष रखते हैं। नरेश्वर! तुम्हारे सामने वे सदा मेरी निन्दा ही किया करते हैं ॥ १७ ॥
सोऽहं भीष्मवचस्तद् वै न मृष्यामीह भारत ।
त्वत्समक्षं यदुक्तं च भीष्मेणामित्रकर्षण ॥ १८ ॥
पाण्डवानां यशो राजंस्तव निन्दां च भारत ।
अनुजानीहि मां राजन् सभृत्यबलवाहनम् ॥ १९ ॥
भारत! तुम्हारे सामने भीष्मने जो कुछ कहा है, उसे मैं सहन नहीं कर सकता। शत्रुदमन! भरतकुलनन्दन! उन्होंने जो पाण्डवोंका यश गाया और तुम्हारी निन्दा की है, यह मेरे लिये असह्य है। अतः तुम मुझे सेवक, सेना तथा सवारियोंके साथ दिग्विजय करनेकी आज्ञा दो ॥
जेष्यामि पृथिवीं राजन् सशैलवनकाननाम् ।
जिता च पाण्डवैर्भूमिश्चतुर्भिर्बलशालिभिः ॥ २० ॥
तामहं ते विजेष्यामि एक एव न संशयः ।
सम्पश्यतु सुदुर्बुद्धिर्भीष्मः कुरुकुलाधमः ॥ २१ ॥
राजन्! मैं पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वीको जीत लूँगा। जिस भूमिपर चार बलशाली पाण्डवोंने मिलकर विजय पायी है उसे मैं तुम्हारे लिये अकेला ही जीत लूँगा, इसमें संशय नहीं है। खोटी बुद्धिवाला कुरु-कुलाधम भीष्म मेरे इस पराक्रमको अपनी आँखों देखे ॥
अनिन्द्यं निन्दते यो हि अप्रशंस्यं प्रशंसति ।
स पश्यतु बलं मेऽद्य आत्मानं तु विगर्हतु ॥ २२ ॥
जो अनिन्दनीयकी निन्दा और अप्रशंसनीयकी प्रशंसा करता है, वह भीष्म आज मेरा बल देख ले और अपने-आपको धिक्कारे ॥ २२ ॥
अनुजानीहि मां राजन् ध्रुवो हि विजयस्तव ।
प्रतिजानामि ते सत्यं राजन्नायुधमालभे ॥ २३ ॥
राजन्! मुझे आज्ञा दो। तुम्हारी विजय निश्चित है। यह मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक सत्य कहता हूँ और शस्त्र छूकर शपथ करता हूँ ॥ २३ ॥
तच्छ्रुत्वा तु वचो राजन् कर्णस्य भरतर्षभ ।
प्रीत्या परमया युक्तः कर्णमाह नराधिपः ॥ २४ ॥
भरतश्रेष्ठ राजन्! कर्णकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधनने बड़ी प्रसन्नताके साथ उससे कहा— ॥ २४ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे त्वं महाबलः ।
हितेषु वर्तसे नित्यं सफलं जन्म चाद्य मे ॥ २५ ॥
‘वीर! मैं धन्य हूँ, तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ; क्योंकि तुम-जैसे महाबली सुहृद् सदा मेरे हितसाधनमें लगे रहते हैं। आज मेरा जन्म सफल हो गया ॥ २५ ॥
यदा च मन्यसे वीर सर्वशत्रुनिबर्हणम् ।
तदा निर्गच्छ भद्रं ते ह्यनुशाधि च मामिति ॥ २६ ॥
‘वीरवर! जब तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे द्वारा सब शत्रुओंका संहार हो सकता है तब तुम दिग्विजयके लिये यात्रा करो। तुम्हारा कल्याण हो। मुझे आवश्यक व्यवस्थाके लिये आज्ञा दो ॥ २६ ॥
एवमुक्तस्तदा कर्णो धार्तराष्ट्रेण धीमता ।
सर्वमाज्ञापयामास प्रायात्रिकमरिंदम ॥ २७ ॥
जनमेजय! बुद्धिमान् दुर्योधनके इस प्रकार कहनेपर कर्णने यात्रासम्बन्धी सारी आवश्यक तैयारीके लिये आज्ञा दे दी ॥ २७ ॥
प्रययौ च महेष्वासो नक्षत्रे शुभदैवते ।
शुभे तिथौ मुहूर्ते च पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ २८ ॥
मङ्गलैश्च शुभैः स्नातो वाग्भिश्चापि प्रपूजितः ।
नादयन् रथघोषेण त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २९ ॥
तदनन्तर महान् धनुर्धर कर्णने मांगलिक शुभ पदार्थोंसे जलके द्वारा स्नान करके द्विजातियोंकी आशीर्वादमय वाणीसे सम्मानित एवं प्रशंसित हो शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि और शुभ मुहूर्तमें यात्रा की। उस समय वह अपने रथकी घर्घराहटसे चराचर भूतोंसहित समस्त त्रिलोकीको प्रतिध्वनित कर रहा था ॥ २८-२९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये
त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयविषयक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५३ ॥