महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३०९-
नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
अधिरथ सूत तथा उसकी पत्नी राधाको बालक कर्णकी प्राप्ति, राधाके द्वारा उसका पालन, हस्तिनापुरमें उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा कर्णके पास इन्द्रका आगमन
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु धृतराष्ट्रस्य वै सखा ।
सूतोऽधिरथ इत्येव सदारो जाह्नवीं ययौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी समय राजा धृतराष्ट्रका मित्र अधिरथ सूत अपनी स्त्रीके साथ गङ्गाजीके तटपर आया ॥ १ ॥
तस्य भार्याभवद् राजन् रूपेणासदृशी भुवि ।
राधा नाम महाभागा न सा पुत्रमविन्दत ॥ २ ॥
राजन्! उसकी परम सौभाग्यवती पत्नी इस भूतलपर अनुपम सुन्दरी थी। उसका नाम था राधा। उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था ॥ २ ॥
अपत्यार्थे परं यत्नमकरोच्च विशेषतः ।
सा ददर्शार्थ मञ्जूषामुह्यमानां यदृच्छया ॥ ३ ॥
राधा पुत्रप्राप्तिके लिये विशेष यत्न करती रहती थी। दैवयोगसे उसीने गङ्गाजीके जलमें बहती हुई उस पिटारीको देखा ॥ ३ ॥
दत्तरक्षाप्रतिसरामन्वालम्भनशोभनाम् ।
ऊर्मीतरङ्गजाह्नव्याः समानीतामुपह्वरम् ॥ ४ ॥
पिटारीके ऊपर उसकी रक्षाके लिये लता लपेट दी गयी थी और सिन्दूरका लेप लगा होनेसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। गङ्गाकी तरंगोंके थपेड़े खाकर वह पिटारी तटके समीप आ लगी ॥ ४ ॥
सा तु कौतूहलात् प्राप्तां ग्राहयामास भामिनी ।
ततो निवेदयामास सूतस्याधिरथस्य वै ॥ ५ ॥
भामिनी राधाने कौतूहलवश उस पिटारीको सेवकोंसे पकड़वा मँगाया और अधिरथ सूतको इसकी सूचना दी ।।
स तामुद्धृत्य मञ्जूषामुत्सार्य जलमन्तिकात् ।
यन्त्रैरुद्घाटयामास सोऽपश्यत् तत्र बालकम् ॥ ६ ॥
अधिरथने उस पिटारीको पानीसे बाहर निकालकर जब यन्त्रों (औजारों) द्वारा उसे खोला, तब उसके भीतर एक बालकको देखा ॥ ६ ॥
तरुणादित्यसंकाशं हेमवर्मधरं तथा ।
मृष्टकुण्डलयुक्तेन वदनेन विराजता ।। ७ ।।
वह बालक प्रातःकालीन सूर्यके समान तेजस्वी था। उसने अपने अंगोंमें स्वर्णमय कवच धारण कर रखा था। उसका मुख कानोंमें पड़े हुए दो उज्ज्वल कुण्डलोंसे प्रकाशित हो रहा था ।। ७ ।।
स सूतो भार्यया सार्धं विम्मयोत्फुल्ललोचनः ।
अङ्कमारोप्य तं बालं भार्यां वचनमब्रवीत् ।। ८ ।।
उसे देखकर पत्नीसहित सूतके नेत्रकमल आश्चर्य एवं प्रसन्नतासे खिल उठे। उसने बालकको गोदमें लेकर अपनी पत्नीसे कहा— ।। ८ ।।
इदमत्यद्भुतं भीरु यतो जातोऽस्मि भाविनि ।
दृष्टवान् देवगर्भोऽयं मन्येऽस्माकमुपागतः ।। ९ ।।
'भीरु! भाविनि! जबसे मैं पैदा हुआ हूँ, तबसे आज ही मैंने ऐसा अद्भुत बालक देखा है। मैं समझता हूँ, यह कोई देवबालक ही हमें भाग्यवश प्राप्त हुआ है ।। ९ ।।
अनपत्यस्य पुत्रोऽयं देवैर्दत्तो ध्रुवं मम ।
इत्युक्त्वा तं ददौ पुत्रं राधायै स महीपते ।। १० ।।
'मुझ पुत्रहीनको अवश्य ही देवताओंने दया करके यह पुत्र प्रदान किया है।' राजन्! ऐसा कहकर अधिरथने वह पुत्र राधाको दे दिया ।। १० ।।
प्रतिजग्राह तं राधा विधिवद् दिव्यरूपिणम् ।
पुत्रं कमलगर्भाभं देवगर्भं श्रिया वृतम् ।। ११ ।।
(स्तन्यं समास्रवच्चास्या दैवादित्यथ निश्चयः ।)
राधाने भी कमलके भीतरी भागके समान कान्तिमान्, शोभाशाली तथा दिव्यरूपधारी उस देवबालकको विधि-पूर्वक ग्रहण किया। निश्चय ही दैवकी प्रेरणासे राधाके स्तनोंसे दूध भी झरने लगा ।। ११ ।।
पुपोष चैनं विधिवद् ववृधे स च वीर्यवान् ।
ततः प्रभृति चाप्यन्ये प्राभवन्नौरसाः सुताः ।। १२ ।।
उसने विधिपूर्वक उस बालकका पालन-पोषण किया और वह धीरे-धीरे सबल होकर दिनोदिन बढ़ने लगा। तभीसे उस सूत-दम्पतिके और भी अनेक औरस पुत्र उत्पन्न हुए ।। १२ ।।
वसुवर्मधरं दृष्ट्वा तं बालं हेमकुण्डलम् ।
नामास्य वसुषेणेति ततश्चक्रुर्द्विजातयः ।। १३ ।।
तदनन्तर वसु (सुवर्ण) मय कवच धारण किये तथा सोनेके ही कुण्डल पहने हुए उस बालकको देखकर ब्राह्मणोंने उसका नाम 'वसुषेण' रखा ।। १३ ।।
एवं स सूतपुत्रत्वं जगामामितविक्रमः ।
वसुषेण इति ख्यातो वृष इत्येव च प्रभुः ॥ १४ ॥
इस प्रकार वह अमितपराक्रमी एवं सामर्थ्यशाली बालक सूतपुत्र बन गया। लोकमें 'वसुषेण' और 'वृष' इन दो नामोंसे उसकी प्रसिद्धि हुई ॥ १४ ॥
सूतस्य ववृधेऽङ्गेषु श्रेष्ठः पुत्रः स वीर्यवान् ।
चारेण विदितश्चासीत् पृथया दिव्यवर्मभृत् ॥ १५ ॥
अधिरथ सूतका वह पराक्रमी श्रेष्ठ पुत्र अंगदेशमें पालित होकर दिनोदिन बढ़ने लगा। कुन्तीने गुप्तचर भेजकर मालूम कर लिया था कि मेरा दिव्य कवचधारी पुत्र अधिरथके यहाँ पल रहा है ॥ १५ ॥
सूतस्त्वधिरथः पुत्रं विवृद्धं समयेन तम् ।
दृष्ट्वा प्रस्थापयामास पुरं वारणसाह्वयम् ॥ १६ ॥
अधिरथ सूतने अपने पुत्रको बड़ा हुआ देख उसे यथासमय हस्तिनापुर भेज दिया ॥ १६ ॥
तत्रोपसदनं चक्रे द्रोणस्येष्वस्त्रकर्मणि ।
सख्यं दुर्योधनेनैवमगमत् स च वीर्यवान् ॥ १७ ॥
वहाँ उसने धनुर्वेदकी शिक्षा लेनेके लिये आचार्य द्रोणकी शिष्यता स्वीकार की। इस प्रकार पराक्रमी कर्णकी दुर्योधनके साथ मित्रता हो गयी ॥ १७ ॥
द्रोणात् कृपाच्च रामाच्च सोऽस्त्रग्रामं चतुर्विधम् ।
लब्ध्वा लोकेऽभवत् ख्यातः परमेष्वासतां गतः ॥ १८ ॥
वह द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा परशुरामसे चारों प्रकारकी अस्त्रविद्या सीखकर संसारमें एक महान् धनुर्धरके रूपमें विख्यात हुआ ॥ १८ ॥
संधाय धार्तराष्ट्रेण पार्थानां विप्रिये रतः ।
योद्धुमाशंसते नित्यं फाल्गुनेन महात्मना ॥ १९ ॥
धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे मिलकर वह कुन्ती-कुमारोंका अनिष्ट करनेमें लगा रहता और सदा महामना अर्जुनसे युद्ध करनेकी इच्छा व्यक्त किया करता था ॥ १९ ॥
सदा हि तस्य स्पर्धाऽऽसीदर्जुनेन विशाम्पते ।
अर्जुनस्य च कर्णेन यतो दृष्टो बभूव सः ॥ २० ॥
राजन्! अर्जुन और कर्णने जबसे एक-दूसरेको देखा था, तभीसे कर्ण अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता था और अर्जुन भी कर्णके साथ बड़ी स्पर्धा रखते थे ॥ २० ॥
एतद् गुह्यं महाराज सूर्यस्यासीन्न संशयः ।
यः सूर्यसम्भवः कर्णः कुन्त्यां सूतकुले तथा ॥ २१ ॥
महाराज! निःसंदेह सूर्यका यही वह गुप्त रहस्य है कि कुन्तीके गर्भसे सूर्यद्वारा उत्पन्न कर्ण सूतकुलमें पला था ॥ २१ ॥
तं तु कुण्डलिनं दृष्ट्वा वर्मणा च समन्वितम् ।
अवध्यं समरे मत्वा पर्यतप्यद् युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥
उसे दिव्य कुण्डल और कवचसे संयुक्त देख युद्धमें अवध्य जानकर राजा युधिष्ठिर सदा संतप्त होते रहते थे ॥ २२ ॥
यदा च कर्णो राजेन्द्र भानुमन्तं दिवाकरम् ।
स्तौति मध्यन्दिने प्राप्ते प्राञ्जलिः सलिले स्थितः ॥ २३ ॥
तत्रैनमुपतिष्ठन्ति ब्राह्मणा धनहेतुना ।
नादेयं तस्य तत्काले किञ्चिदस्ति द्विजातिषु ॥ २४ ॥
राजेन्द्र! जब कर्ण दोपहरके समय जलमें खड़ा हो हाथ जोड़कर अंशुमाली भगवान् दिवाकरकी स्तुति करता था, उस समय बहुत-से ब्राह्मण धनके लिये उसके पास आते थे। उस अवसरपर उसके पास कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो ब्राह्मणोंके लिये अदेय हो ॥
तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षां देहीत्युपस्थितः ।
स्वागतं चेति राधेयस्तमथ प्रत्यभाषत ॥ २५ ॥
इन्द्र भी उसी समय ब्राह्मण बनकर वहाँ उपस्थित हुए और बोले—‘मुझे भिक्षा दो।' यह सुनकर राधानन्दन कर्णने उत्तर दिया—‘विप्रवर! आपका स्वागत है' ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि राधाकर्णप्राप्तौ
नवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें राधाको कर्णकी प्राप्तिविषयक तीन सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/३ श्लोक हैं)