महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन
द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन
मार्कण्डेय उवाच
एवं तु सूक्ष्मे कथिते धर्मव्याधेन भारत ।
ब्राह्मणः स पुनः सूक्ष्मं पप्रच्छ सुसमाहितः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भारत! इस प्रकार धर्मव्याधके द्वारा सूक्ष्म तत्त्वका निरूपण होनेपर कौशिक ब्राह्मणने एकाग्रचित्त होकर पुनः एक सूक्ष्म प्रश्न उपस्थित किया ॥ १ ॥
ब्राह्मण उवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम् ।
गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छतः ॥ २ ॥
ब्राह्मण बोला— व्याध! मैं यहाँ यथोचितरूपसे एक प्रश्न उपस्थित करता हूँ। वह यह है कि सत्त्व, रज और तमका गुण (स्वरूप) क्या है? यह मुझे यथार्थरूपसे बताओ ॥ २ ॥
व्याध उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
एषां गुणान् पृथक्त्वेन निबोध गदतो मम ॥ ३ ॥
धर्मव्याधने कहा— ब्रह्मन्! आप मुझसे जो बात पूछ रहे हैं, मैं अब उसे कहूँगा। सत्त्व, रज और तम—इन तीनोंके गुणोंका पृथक्-पृथक् वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥ ३ ॥
मोहात्मकं तमस्तेषां रज एषां प्रवर्तकम् ।
प्रकाशबहुत्वाच्च सत्त्वं ज्याय इहोच्यते ॥ ४ ॥
इन तीनों गुणोंमें जो तमोगुण है वह मोहात्मक—मोह उत्पन्न करनेवाला है। रजोगुण कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला है। परंतु सत्त्वगुणमें प्रकाशकी बहुलता है, इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है ॥ ४ ॥
अविद्याबहुलो मूढः स्वप्नशीलो विचेतनः ।
दुर्हृषीकस्तमोध्वस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ॥ ५ ॥
जिसमें अज्ञानकी बहुलता है, जो मूढ़ (मोहग्रस्त) और अचेत होकर सदा नींद लेता रहता है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें न होनेके कारण दूषित हैं, जो अविवेकी, क्रोधी और आलसी है, ऐसे मनुष्यको तमोगुणी जानना चाहिये ॥ ५ ॥
प्रवृत्तवाक्यो मन्त्री च यो नराग्र्योऽनसूयकः ।
विधित्समानो विप्रर्षे स्तब्धो मानी स राजसः ॥ ६ ॥
ब्रह्मर्षे! जो प्रवृत्तिमार्गकी ही बातें करनेवाला, सलाह देनेमें कुशल और दूसरोंके गुणोंमें दोष न देखनेवाला है; जो सदा कुछ-न-कुछ करनेकी इच्छा रखता है, जिसमें कठोरता और अभिमानकी अधिकता है, वह मनुष्योंपर रोब जमानेवाला पुरुष रजोगुणी कहा गया है ॥ ६ ॥
प्रकाशबहुलो धीरो निर्विधित्सोऽनसूयकः ।
अक्रोधनो नरो धीमान् दान्तश्चैव स सात्त्विकः ॥ ७ ॥
जिसमें प्रकाश (ज्ञान)-की बहुलता है, जो धीर और नये-नये कार्य आरम्भ करनेकी उत्सुकतासे रहित है, जिसमें दूसरोंके दोष देखनेकी प्रवृत्तिका अभाव है जो क्रोधशून्य, बुद्धिमान् और जितेन्द्रिय है, वह मनुष्य सात्त्विक माना जाता है ॥ ७ ॥
सात्त्विकस्त्वथ सम्बुद्धो लोकवृत्तेन क्लिश्यते ।
यदा बुध्यति बोद्धव्यं लोकवृत्तं जुगुप्सते ॥ ८ ॥
सात्त्विक पुरुष ज्ञानसम्पन्न हो रजोगुण और तमोगुणके कार्यभूत लौकिक व्यवहारमें पड़नेका कष्ट नहीं उठाता। वह जब जाननेयोग्य तत्त्वको जान लेता है, तब उसे सांसारिक व्यवहारसे ग्लानि हो जाती है ॥ ८ ॥
वैराग्यस्य च रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते ।
मृदुर्भवत्यहङ्कारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ॥ ९ ॥
सात्त्विक पुरुषमें वैराग्यका लक्षण पहले ही प्रकट हो जाता है। उसका अहंकार ढीला पड़ जाता है और सरलता प्रकाशमें आने लगती है ॥ ९ ॥
ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम् ।
न चास्य संशयो नाम क्वचिद् भवति कश्चन ॥ १० ॥
तदनन्तर इसके राग-द्वेष आदि सम्पूर्ण द्वन्द्व परस्पर शान्त हो जाते हैं। इसके हृदयमें कभी कोई संशय नहीं उठता ॥ १० ॥
शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः ।
वैश्यत्वं लभते ब्रह्मन् क्षत्रियत्वं तथैव च ॥ ११ ॥
ब्रह्मन्! शूद्रयोनिमें उत्पन्न मनुष्य भी यदि उत्तम गुणोंका आश्रय ले, तो वह वैश्य तथा क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥
आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यमभिजायते ।
गुणास्ते कीर्तिताः सर्वे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
जो 'सरलता' नामक गुणमें प्रतिष्ठित है, उसे ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन किया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे
द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-
संवादविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥