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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 701)

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अष्टनवतितमोऽध्यायः

धन प्राप्त करनेके लिये अगस्त्यका श्रुतर्वा, ब्रध्नश्व और त्रसदस्यु आदिके पास जाना

लोमश उवाच

ततो जगाम कौरव्य सोऽगस्त्यो भिक्षितुं वसु ।
श्रुतर्वाणं महीपालं यं वेदाभ्यधिकं नृपैः ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**कुरुनन्दन! तदनन्तर अगस्त्यजी धन माँगनेके लिये महाराज श्रुतर्वाके पास गये, जिन्हें वे सब राजाओंसे अधिक वैभवसम्पन्न समझते थे ॥ १ ॥

स विदित्वा तु नृपतिः कुम्भयोनिमुपागतम् ।
विषयान्ते सहामात्यः प्रत्यगृह्णात् सुसत्कृतम् ॥ २ ॥
राजाको जब यह मालूम हुआ कि महर्षि अगस्त्य मेरे यहाँ आ रहे हैं, तब वे मन्त्रियोंके साथ अपने राज्यकी सीमापर चले आये और बड़े आदर-सत्कारसे उन्हें अपने साथ लिवा ले गये ॥ २ ॥

तस्मै चार्घ्यं यथान्यायमानीय पृथिवीपतिः ।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ॥ ३ ॥
भूपाल श्रुतर्वाने उनके लिये यथायोग्य अर्घ्य निवेदन करके विनीतभावसे हाथ जोड़कर उनके पधारनेका प्रयोजन पूछा ॥ ३ ॥

अगस्त्य उवाच

वित्तार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां पृथिवीपते ।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ मे ॥ ४ ॥
**तब अगस्त्यजीने कहा—**पृथिवीपते! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं धन माँगनेके लिये आपके यहाँ आया हूँ। दूसरे प्राणियोंको कष्ट न देते हुए यथाशक्ति अपने धनका जितना अंश मुझे दे सकें, दे दें ॥ ४ ॥

लोमश उवाच

तत आयव्ययौ पूर्णौ तस्मै राजा न्यवेदयत् ।
अतो विद्वन्नुपादत्स्व यदत्र वसु मन्यसे ॥ ५ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब राजा श्रुतर्वाने महर्षिके सामने अपने आय-व्ययका पूरा ब्योरा रख दिया और कहा—'ज्ञानी महर्षे! इस धनमेंसे जो आप ठीक समझें, वह ले लें' ॥ ५ ॥

तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः ।

सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ६ ॥
ब्रह्मर्षि अगस्त्यकी बुद्धि सम थी। उन्होंने आय और व्यय दोनोंको बराबर देखकर यह विचार किया कि इसमेंसे थोड़ा-सा भी धन लेनेपर दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ ६ ॥
स श्रुतर्वाणमादाय ब्रध्नश्वमगमत् ततः ।
स च तौ विषयस्यान्ते प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ॥ ७ ॥
तब वे श्रुतर्वाको साथ लेकर राजा ब्रध्नश्वके पास गये। उन्होंने भी अपने राज्यकी सीमापर आकर उन दोनों सम्माननीय अतिथियोंकी अगवानी की और विधिपूर्वक उन्हें अपनाया ॥ ७ ॥
तयोरर्घ्यं च पाद्यं च ब्रध्नश्वः प्रत्यवेदयत् ।
अनुज्ञाप्य च पप्रच्छ प्रयोजनमुपक्रमे ॥ ८ ॥
ब्रध्नश्वने उन दोनोंको अर्घ्य और पाद्य निवेदन किये, फिर उनकी आज्ञा ले अपने यहाँ पधारनेका प्रयोजन पूछा ॥ ८ ॥

अगस्त्य उवाच
वित्तकामाविह प्राप्तौ विद्ध्यावां पृथिवीपते ।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नौ ॥ ९ ॥
अगस्त्यजीने कहा— पृथिवीपते! आपको विदित हो कि हम दोनों आपके यहाँ धनकी इच्छासे आये हैं। दूसरे प्राणियोंको कष्ट न देते हुए जो धन आपके पास बचता हो, उसमेंसे यथाशक्ति कुछ भाग हमें भी दीजिये ॥ ९ ॥

लोमश उवाच
तत आयव्ययौ पूर्णौ ताभ्यां राजा न्यवेदयत् ।
अतो ज्ञात्वा तु गृह्णीतं यदत्र व्यतिरिच्यते ॥ १० ॥
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब राजा ब्रध्नश्वने भी उन दोनोंके सामने आय और व्ययका पूरा विवरण रख दिया और कहा—'आप दोनोंको इसमें जो धन अधिक जान पड़ता हो, वह ले लें' ॥ १० ॥
तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः ।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ११ ॥
तब समान बुद्धिवाले ब्रह्मर्षि अगस्त्यने उस विवरणमें आय और व्यय बराबर देखकर यह निश्चय किया कि इसमेंसे यदि थोड़ा-सा भी धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ ११ ॥
पौरुकुत्सं ततो जग्मुस्त्रसदस्युं महाधनम् ।
अगस्त्यश्च श्रुतर्वा च ब्रध्नश्वश्च महीपतिः ॥ १२ ॥

तब अगस्त्य, श्रुतर्वा और ब्रध्नश्व—तीनों पुरुकुत्सनन्दन-महाधनी त्रसदस्युके पास गये॥ १२॥

त्रसदस्युस्तु तान् दृष्ट्वा प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि।
अभिगम्य महाराज विषयान्ते महामनाः॥ १३॥
अर्चयित्वा यथान्यायमैक्ष्वाकू राजसत्तमः।
समस्तांश्च ततोऽपृच्छत् प्रयोजनमुपक्रमे॥ १४॥
महाराज! भूपालोंमें श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी महामना त्रसदस्युने उन्हें आते देख राज्यकी सीमापर पहुँचकर विधिपूर्वक उन सबका स्वागत-सत्कार किया और उन सबसे अपने यहाँ पधारनेका प्रयोजन पूछा॥ १३-१४॥

अगस्त्य उवाच
वित्तकामानिह प्राप्तान् विद्धि नः पृथिवीपते।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नः॥ १५॥
**अगस्त्यने कहा—**पृथ्वीपते! आपको विदित हो कि हम धनकी कामनासे यहाँ आये हैं। आप दूसरे प्राणियोंको पीड़ा न देते हुए यथाशक्ति अपने धनका कुछ भाग हम सबको दीजिये॥ १५॥

लोमश उवाच
तत आयव्ययौ पूर्णौ तेषां राजा न्यवेदयत्।
एतज्ज्ञात्वा ह्युपादध्वं यदत्र व्यतिरिच्यते॥ १६॥
तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत॥ १७॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब राजाने उन्हें अपने आय-व्ययका पूरा विवरण दे दिया और कहा—‘इसे समझकर जो धन शेष बचता हो, वह आपलोग ले लें।’ समबुद्धिवाले महर्षि अगस्त्यने वहाँ भी आय-व्ययका लेखा बराबर देखकर यही माना कि इसमेंसे धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है॥ १६-१७॥

ततः सर्वे समेत्याथ ते नृपास्तं महामुनिम्।
इदमूचुर्महाराज समवेक्ष्य परस्परम्॥ १८॥
महाराज! तब वे सब राजा परस्पर मिलकर एक-दूसरेकी ओर देखते हुए महामुनि अगस्त्यसे इस प्रकार बोले—॥ १८॥

अयं वै दानवो ब्रह्मन्निल्वलो वसुमान् भुवि।
तमतिक्रम्य सर्वेऽद्य वयं चार्थामहे वसु॥ १९॥
‘ब्रह्मन्! यह इल्वल दानव इस पृथ्वीपर सबसे अधिक धनी है। हम सब लोग उसीके पास चलकर आज धन माँगें’॥ १९॥

लोमश उवाच

तेषां तदासीदुचितमिल्वलस्यैव भिक्षणम् ।
ततस्ते सहिता राजन्निल्वलं समुपाद्रवन् ॥ २० ॥

**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस समय उन सबको इल्वलके यहाँ याचना करना ही ठीक जान पड़ा, अतः वे एक साथ होकर इल्वलके यहाँ शीघ्रतापूर्वक गये ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने
अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
अगस्त्योपाख्यानविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥