महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२४१-
एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
कौरवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध और कर्णकी पराजय
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते सहिताः सर्वे दुर्योधनमुपागमन् ।
अब्रुवंश्च महाराज यदूचुः कौरवं प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! तदनन्तर वे सब लोग एक साथ कुरुराज दुर्योधनके पास गये और गन्धर्वोंने राजासे कहनेके लिये जो-जो बातें कही थीं, उन्हें कह सुनाया ॥ १ ॥
गन्धर्वैर्वारिते सैन्ये धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् ।
अमर्षपूर्णः सैन्यानि प्रत्यभाषत भारत ॥ २ ॥
भारत! गन्धर्वोंद्वारा अपनी सेनाके रोक दिये जानेपर प्रतापी राजा दुर्योधनने अमर्षमें भरकर समस्त सैनिकोंसे कहा— ॥ २ ॥
शास्तैनानधर्मज्ञान् मम विप्रियकारिणः ।
यदि प्रक्रीडते सर्वैर्देवैः सह शतक्रतुः ॥ ३ ॥
'अरे! यदि समस्त देवताओंके साथ इन्द्र भी यहाँ आकर क्रीडा करते हों, तो वे भी मेरा अप्रिय करनेवाले हैं। तुमलोग इन सब पापात्माओंको दण्ड दो' ॥ ३ ॥
दुर्योधनवचः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रा महाबलाः ।
सर्व एवाभिसंनद्धा योधाश्चापि सहस्रशः ॥ ४ ॥
दुर्योधनकी यह बात सुनकर महाबली कौरव और उनके सहस्रों योद्धा सब-के-सब युद्धके लिये कमर कसकर तैयार हो गये ॥ ४ ॥
ततः प्रमथ्य सर्वांस्तांस्तद् वनं विविशुर्बलात् ।
सिंहनादेन महता पूरयन्तो दिशो दश ॥ ५ ॥
तदनन्तर वे अपने महान् सिंहनादसे दसों दिशाओंको गुँजाते हुए उन समस्त गन्धर्वोंको रौंदकर बलपूर्वक द्वैतवनमें घुस गये ॥ ५ ॥
ततोऽपरैरवार्यन्त गन्धर्वैः कुरुसैनिकाः ।
ते वार्यमाणा गन्धर्वैः साम्नैव वसुधाधिप ॥ ६ ॥
ताननादृत्य गन्धर्वांस्तद् वनं विविशुर्महत् ।
यदा वाचा न तिष्ठन्ति धार्तराष्ट्राः सराजकाः ॥ ७ ॥
ततस्ते खेचराः सर्वे चित्रसेने न्यवेदयन् ।
राजन्! उस समय दूसरे-दूसरे गन्धर्वोंने शान्तिपूर्ण वचनोंद्वारा ही कौरव सैनिकोंको रोका। रोकनेपर भी उन गन्धर्वोंकी अवहेलना करके वे समस्त सैनिक उस महान् वनके भीतर प्रविष्ट हो गये। जब राजा दुर्योधनसहित समस्त कौरव वाणीद्वारा मना करनेपर न रुके, तब आकाशमें विचरनेवाले उन सभी गन्धर्वोंने राजा चित्रसेनसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ६-७ १/२ ॥
गन्धर्वराजस्तान् सर्वानब्रवीत् कौरवान् प्रति ॥ ८ ॥
अनार्याञ्छासतेत्येतांश्चित्रसेनोऽत्यमर्षतः ।
यह सुनकर गन्धर्वराज चित्रसेनको बड़ा अमर्ष हुआ। उन्होंने कौरवोंको लक्ष्य करके समस्त गन्धर्वोंको आज्ञा दी, 'अरे! इन दुष्टोंका दमन करो' ॥ ८ १/२ ॥
अनुज्ञाताश्च गन्धर्वाश्चित्रसेनेन भारत ॥ ९ ॥
प्रगृहीतायुधाः सर्वे धार्तराष्ट्रानभिद्रवन् ।
भारत! चित्रसेनकी आज्ञा पाते ही सब गन्धर्व अस्त्र-शस्त्र लेकर कौरवोंकी ओर दौड़े ॥ ९ १/२ ॥
तान् दृष्ट्वा पततः शीघ्रान् गन्धर्वानुद्यतायुधान् ॥ १० ॥
प्राद्रवंस्ते दिशः सर्वे धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ।
गन्धर्वोंको अस्त्र-शस्त्र लिये तीव्र वेगसे अपनी ओर आते देख वे सभी कौरव सैनिक दुर्योधनके देखते-देखते चारों ओर भागने लगे ॥ १० १/२ ॥
तान् दृष्ट्वा द्रवतःसर्वान् धार्तराष्ट्रान् पराङ्मुखान् ॥ ११ ॥
राधेयस्तु तदा वीरो नासीत् तत्र पराङ्मुखः ।
धृतराष्ट्रके सब पुत्रोंको युद्धसे विमुख हो भागते देखकर भी राधानन्दन वीर कर्णने वहाँ पीठ नहीं दिखायी ॥
आपतन्तीं तु सम्प्रेक्ष्य गन्धर्वाणां महाचमूम् ॥ १२ ॥
महता शरवर्षेण राधेयः प्रत्यवारयत् ।
गन्धर्वोंकी उस विशाल सेनाको अपनी ओर आती देख कर्णने भारी बाणवर्षा करके उसे आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १२ १/२ ॥
क्षुरप्रैर्विशिखैर्भल्लैर्वत्सदन्तैस्तथाऽयसैः ॥ १३ ॥
गन्धर्वाञ्छतशोऽभ्यघ्नँल्लघुत्वात् सूतनन्दनः ।
सूतपुत्र कर्णने अपने हाथोंकी फुर्तीके कारण लोहेके क्षुरप्र, विशिख, भल्ल और वत्सदन्त नामक बाणोंकी वर्षा करके सैकड़ों गन्धर्वोंको घायल कर दिया ॥ १३ १/२ ॥
पातयन्नुत्तमाङ्गानि गन्धर्वाणां महारथः ॥ १४ ॥
क्षणेन व्यधमत् सर्वां चित्रसेनस्य वाहिनीम् ।
गन्धर्वोंके मस्तक काटकर गिराते हुए महारथी कर्णने चित्रसेनकी सारी सेनाको क्षणभरमें छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ १४१/२ ॥
ते वध्यमाना गन्धर्वाः सूतपुत्रेण धीमता ॥ १५ ॥
भूय एवाभ्यवर्तन्त शतशोऽथ सहस्रशः ।
गन्धर्वभूता पृथिवी क्षणेन समपद्यत ॥ १६ ॥
आपतद्भिर्महावेगैश्चित्रसेनस्य सैनिकैः ।
परम बुद्धिमान् सूतपुत्र कर्णके द्वारा ज्यों-ज्यों गन्धर्वोंपर मार पड़ने लगी, त्यों-ही-त्यों वे सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें वहाँ आ-आकर एकत्र होने लगे। इस प्रकार चित्रसेनके अत्यन्त वेगशाली सैनिकोंके आनेसे क्षणभरमें वहाँकी सारी पृथ्वी गन्धर्वमयी हो गयी ॥ १५-१६१/२ ॥
अथ दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबलः ॥ १७ ॥
दुःशासनो विकर्णश्च ये चान्ये धृतराष्ट्रजाः ।
न्यहनंस्तत् तदा सैन्यं रथैर्गरुडनिःस्वनैः ॥ १८ ॥
तदनन्तर राजा दुर्योधन, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, विकर्ण तथा अन्य जो धृतराष्ट्रपुत्र वहाँ आये थे, उन सबने गरुड़के समान भयंकर शब्द करनेवाले रथोंपर आरूढ़ हो गन्धर्वोंकी उस सेनाका संहार आरम्भ किया ॥
भूयश्च योधयामासुः कृत्वा कर्णमथाग्रतः ।
महता रथसङ्घेन रथचारेण चाप्युत ॥ १९ ॥
वैकर्तनं परीप्सन्तो गन्धर्वान् समवाकिरन् ।
उन्होंने कर्णको आगे करके पुनः बड़े वेगसे गन्धर्वोंका सामना किया। उनके साथ रथोंका विशाल समूह था। वे रथोंको विचित्र गतियोंसे चलाते हुए कर्णकी रक्षा करने और गन्धर्वोंपर बाण बरसाने लगे ॥ १९१/२ ॥
ततः संन्यपतन् सर्वे गन्धर्वाः कौरवैः सह ॥ २० ॥
तदा सुतुमुलं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
ततस्ते मृदवोऽभूवन् गन्धर्वाः शरपीडिताः ॥ २१ ॥
उच्चक्रुशुश्च कौरव्या गन्धर्वान् प्रेक्ष्य पीडितान् ।
तत्पश्चात् सारे गन्धर्व संगठित हो कौरवोंके साथ भिड़ गये। उस समय उनमें घमासान युद्ध होने लगा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। तदनन्तर कौरवोंके बाणोंसे पीड़ित हो गन्धर्व कुछ ढीले पड़ने लगे और उन्हें कष्ट पाते देख कौरव-योद्धा जोर-जोरसे गरजने लगे ॥ २०-२११/२ ॥
गन्धर्वांस्त्रासितान् दृष्ट्वा चित्रसेनो ह्यमर्षणः ॥ २२ ॥
उत्पपातासनात् क्रुद्धो वधे तेषां समाहितः ।
गन्धर्वोंको भयभीत देखकर गन्धर्वराज चित्रसेनको बड़ा क्रोध हुआ। वे शत्रुओंके वधका दृढ़ संकल्प लेकर अपने आसनसे उछल पड़े ॥ २२ १/२ ॥
ततो मायास्त्रमास्थाय युयुधे चित्रमार्गवित् ।
तयामुह्यन्त कौरव्याश्चित्रसेनस्य मायया ॥ २३ ॥
वे युद्धकी विचित्र पद्धतियोंके ज्ञाता थे। उन्होंने मायामय अस्त्रका आश्रय लेकर युद्ध आरम्भ किया। चित्रसेनकी उस मायासे समस्त कौरवोंपर मोह छा गया ॥
एकैको हि तदा योधो धार्तराष्ट्रस्य भारत ।
पर्यवर्तत गन्धर्वैर्दशभिर्दशभिः सह ॥ २४ ॥
भारत! उस समय दुर्योधनका एक-एक सैनिक दस-दस गन्धर्वोंके साथ लोहा ले रहा था ॥ २४ ॥
ततः सम्पीड्यमानास्ते बलेन महता तदा ।
प्राद्रवन्त रणे भीता ये च राजञ्जिगीषवः ॥ २५ ॥
राजन्! तदनन्तर गन्धर्वोंकी विशाल सेनासे पीड़ित हो वे सभी योद्धा, जो पहले जीतनेका हौसला रखते थे, भयभीत हो युद्धसे भाग चले ॥ २५ ॥
भज्यमानेष्वनीकेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वशः ।
कर्णो वैकर्तनो राजंस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ २६ ॥
जनमेजय! जब कौरवोंके सभी सैनिक युद्ध छोड़कर भागने लगे, उस समय भी सूर्यपुत्र कर्ण पर्वतकी भाँति अविचलभावसे उस युद्धभूमिमें डटा रहा ॥ २६ ॥
दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः ।
गन्धर्वान् योधयामासुः समरे भृशविक्षताः ॥ २७ ॥
दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि—ये उस समरांगणमें यद्यपि बहुत घायल हो गये थे, तथापि गन्धर्वोंसे युद्ध करते रहे ॥ २७ ॥
सर्व एव तु गन्धर्वाः शतशोऽथ सहस्रशः ।
जिघांसमानाः सहिताः कर्णमभ्यद्रवन् रणे ॥ २८ ॥
इसपर सभी गन्धर्व एक साथ संगठित हो कर्णको मार डालनेकी इच्छासे सौ-सौ तथा हजार-हजारका दल बाँधकर रणभूमिमें कर्णके ऊपर टूट पड़े ॥ २८ ॥
असिभिः पट्टिशैः शूलैर्गदाभिश्च महाबलाः ।
सूतपुत्रं जिघांसन्तः समन्तात् पर्यवाकिरन् ॥ २९ ॥
उन महाबली वीरोंने सूतपुत्र कर्णके वधकी इच्छा रखकर उसके ऊपर चारों ओरसे तलवार, पट्टिश, शूल और गदाओंद्वारा प्रहार आरम्भ किया ॥ २९ ॥
अन्येऽस्य युगमच्छिन्दन् ध्वजमन्ये न्यपातयन् ।
ईषामन्ये हयानन्ये सूतमन्ये न्यपातयन् ॥ ३० ॥
किन्हींने उसके रथका जुआ काट दिया, दूसरोंने ध्वजा काटकर गिरा दी। कुछ लोगोंने ईषादण्डके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। कुछ गन्धर्वोंने कर्णके घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया तथा दूसरोंने सारथिको मार गिराया ।। ३० ।।
अन्ये छत्रं वरूथं च बन्धुरं च तथापरे ।
गन्धर्वा बहुसाहस्रास्तिलशो व्यधमन् रथम् ।। ३१ ।।
किसी एकने छत्र, दूसरोंने वरूथ* और अन्य सैनिकोंने रथके बन्धन काट डाले। गन्धर्वोंकी संख्या कई हजार थी। उन्होंने कर्णके रथको तिल-तिल करके काट दिया ।। ३१ ।।
ततो रथादवप्लुत्य सूतपुत्रोऽसिचर्मभृत् ।
विकर्णरथमास्थाय मोक्षायाश्वानचोदयत् ।। ३२ ।।
तब सूतपुत्र कर्ण हाथमें तलवार और ढाल लिये अपने रथसे कूद पड़ा और विकर्णके रथपर बैठकर अपने प्राण बचानेके लिये उसके घोड़ोंको जोर-जोरसे हाँकने लगा ।। ३२ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णपराभवे
एकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २४१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णपराजयविषयक दो सौ इकतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४१ ।।
* लोहेकी चद्दर या सीकड़ोंका बना हुआ आवरण वरूथ कहलाता है। पहले यह शत्रुके आघातसे रथको रक्षित रखनेके लिये उसके ऊपर डाला जाता था।