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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 863, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 863

युधिष्ठिर! यह सब पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ दिखायी देता है। इस सर्वपापनाशन तीर्थमें स्नान करके तुम शुद्ध हो जाओगे ॥ १५ ॥
आर्चीकपर्वतश्चैव निवासो वै मनीषिणाम् ।
सदाफलः सदास्रोतो मरुतां स्थानमुत्तमम् ॥ १६ ॥
इसके आगे आर्चीक पर्वत है, जहाँ मनीषी पुरुष निवास करते हैं। वहाँ सदा फल लगे रहते हैं और निरन्तर पानीके झरने बहते हैं। इस पर्वतपर अनेक देवताओंके उत्तम स्थान हैं ॥ १६ ॥
चैत्याश्चैते बहुविधास्त्रिदशानां युधिष्ठिर ।
एतच्चन्द्रमसस्तीर्थमृषयः पर्युपासते ।
वैखानसा बालखिल्याः पावका वायुभोजनाः ॥ १७ ॥
शृङ्गाणि त्रीणि पुण्यानि त्रीणि प्रस्रवणानि च ।
सर्वाण्यनुपरिक्रम्य यथाकाममुपस्पृश ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! ये देवताओंके अनेकानेक मन्दिर दिखायी देते हैं, जो नाना प्रकारके हैं। यह चन्द्रतीर्थ है, जिसकी बहुत-से ऋषिलोग उपासना करते हैं। यहाँ बालखिल्य नामक वैखानस महात्मा रहते हैं जो वायुका आहार करनेवाले और परम पावन हैं। यहाँ तीन पवित्र शिखर और तीन झरने हैं। इन सबकी इच्छानुसार परिक्रमा करके स्नान करो ॥ १७-१८ ॥
शान्तनुश्चात्र राजेन्द्र शुनकश्च नराधिपः ।
नरनारायणौ चोभौ स्थानं प्राप्ताः सनातनम् ॥ १९ ॥
राजेन्द्र! यहाँ राजा शान्तनु, शुनक और नर-नारायण—ये सभी नित्य धाममें गये हैं ॥ १९ ॥
इह नित्यशया देवाः पितरश्च महर्षिभिः ।
आर्चीकपर्वते तेपुस्तान् यजस्व युधिष्ठिर ॥ २० ॥
युधिष्ठिर! इस आर्चीक पर्वतपर नित्य निवास करते हुए महर्षियोंसहित जिन देवताओं और पितरोंने तपस्या की है, तुम उन सबकी पूजा करो ॥ २० ॥
इह ते वै चरून् प्राश्नन्नृषयश्च विशाम्पते ।
यमुना चाक्षयस्रोता कृष्णश्चेह तपोरतः ॥ २१ ॥
यमौ च भीमसेनश्च कृष्णा चामित्रकर्शन ।
सर्वे चात्र गमिष्यामस्त्वयैव सह पाण्डव ॥ २२ ॥
एतत् प्रस्रवणं पुण्यमिन्द्रस्य मनुजेश्वर ।
यत्र धाता विधाता च वरुणश्चोर्ध्वमागताः ॥ २३ ॥
राजन्! यहाँ देवताओं और ऋषियोंने चरुभोजन किया था। इसके पास ही अक्षय प्रवाहवाली यमुना नदी बहती है। यहीं भगवान् कृष्णने भी तपस्या की है। शत्रुदमन! नकुल,