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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 300

जैसे पर्वतपर बिजलीकी गड़गड़ाहट और वज्रपातका भयंकर शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनों बाणोंके आघातका शब्द हुआ ।। १५ ।।
स विद्धो बहुभिर्बाणैर्दीप्तास्यैः पन्नगैरिव ।
ममार राक्षसं रूपं भूयः कृत्वा विभीषणम् ।। १६ ।।
इस प्रकार प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान अनेक बाणोंसे घायल होकर वह दानव फिर अपने भयानक राक्षसरूपको प्रकट करते हुए मर गया ।। १६ ।।
स ददर्श ततो जिष्णुः पुरुषं काञ्चनप्रभम् ।
किरातवेषसंच्छन्नं स्त्रीसहायममित्रहा ।। १७ ।।
तमब्रवीत् प्रीतमनाः कौन्तेयः प्रहसन्निव ।
को भवानटते शून्ये वने स्त्रीगणसंवृतः ।। १८ ।।
इसी समय शत्रुनाशक अर्जुनने सुवर्णके समान कान्तिमान् एक तेजस्वी पुरुषको देखा, जो स्त्रियोंके साथ आकर अपनेको किरातवेषमें छिपाये हुए थे। तब कुन्तीकुमारने प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए-से कहा—‘आप कौन हैं जो इस सूने वनमें स्त्रियोंसे घिरे हुए घूम रहे हैं? ।। १७-१८ ।।
न त्वमस्मिन् वने घोरे बिभेषि कनकप्रभ ।
किमर्थं च त्वया विद्धो वराहो मत्परिग्रहः ।। १९ ।।
‘सुवर्णके समान दीप्तिमान् पुरुष! क्या आपको इस भयानक वनमें भय नहीं लगता? यह सूअर तो मेरा लक्ष्य था, आपने क्यों उसपर बाण मारा? ।। १९ ।।
मयाभिपन्नः पूर्वं हि राक्षसोऽयमिहागतः ।
कामात् परिभवाद् वापि न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ।। २० ।।
‘यह राक्षस पहले यहीं मेरे पास आया था और मैंने इसे काबूमें कर लिया था। आपने किसी कामनासे इस शूकरको मारा हो या मेरा तिरस्कार करनेके लिये। किसी दशामें भी मैं आपको जीवित नहीं छोड़ूँगा ।। २० ।।
न ह्येष मृगयाधर्मो यस्त्वयाद्य कृतो मयि ।
तेन त्वां भ्रंशयिष्यामि जीवितात् पर्वताश्रयम् ।। २१ ।।
‘यह मृगयाका धर्म नहीं है, जो आज आपने मेरे साथ किया है। आप पर्वतके निवासी हैं तो भी उस अपराधके कारण मैं आपको जीवनसे वंचित कर दूँगा’ ।। २१ ।।
इत्युक्तः पाण्डवेयेन किरातः प्रहसन्निव ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा पाण्डवं सव्यसाचिनम् ।। २२ ।।
पाण्डुनन्दन अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर किरात-वेषधारी भगवान् शंकर जोर-जोरसे हँस पड़े और सव्यसाची पाण्डवसे मधुर वाणीमें बोले— ।। २२ ।।
न मत्कृते त्वया वीर भीः कार्या वनमन्तिकात् ।
इयं भूमिः सदास्माकमुचिता वसतां वने ।। २३ ।।