महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
अकृतव्रणके द्वारा युधिष्ठिरसे परशुरामजीके उपाख्यानके प्रसंगमें ऋचीक मुनिका गाधिकन्याके साथ विवाह और भृगुऋषिकी कृपासे जमदग्निकी उत्पत्तिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
स तत्र तामुषित्वैकां रजनीं पृथिवीपतिः ।
तापसानां परं चक्रे सत्कारं भ्रातृभिः सह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस पर्वतपर एक रात निवास करके भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने तपस्वी मुनियोंका बहुत सत्कार किया ॥ १ ॥
लोमशस्तस्य तान् सर्वानचख्यौ तत्र तापसान् ।
भृगूनङ्गिरसश्चैव वसिष्ठानथ काश्यपान् ॥ २ ॥
लोमशजीने युधिष्ठिरसे उन सभी तपस्वी महात्माओंका परिचय कराया। उनमें भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ तथा कश्यपगोत्रके अनेक संत महात्मा थे ॥ २ ॥
तान् समेत्य स राजर्षिरभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
रामस्यानुचरं वीरमपृच्छदकृतव्रणम् ॥ ३ ॥
कदा तु रामो भगवांस्तापसान् दर्शयिष्यति ।
तेनैवाहं प्रसंगेन द्रष्टुमिच्छामि भार्गवम् ॥ ४ ॥
उन सबसे मिलकर राजर्षि युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और परशुरामजीके सेवक वीरवर अकृतव्रणसे पूछा—'भगवान् परशुरामजी इन तपस्वी महात्माओंको कब दर्शन देंगे? उसी निमित्तसे मैं भी उन भगवान् भार्गवका दर्शन करना चाहता हूँ' ॥ ३-४ ॥
अकृतव्रण उवाच
आयानेवासि विदितो रामस्य विदितात्मनः ।
प्रीतिस्त्वयि च रामस्य क्षिप्रं त्वां दर्शयिष्यति ॥ ५ ॥
चतुर्दशीमष्टमीं च रामं पश्यन्ति तापसाः ।
अस्यां रात्र्यां व्यतीतायां भवित्री श्वश्चतुर्दशी ॥ ६ ॥
अकृतव्रणने कहा—राजन्! आत्मज्ञानी परशुरामजीको पहले ही यह ज्ञात हो गया था कि आप आ रहे हैं। आपपर उनका बहुत प्रेम है, अतः वे शीघ्र ही आपको दर्शन देंगे। ये तपस्वीलोग प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमीको परशुरामजीका दर्शन करते हैं। आजकी रात बीत जानेपर कल सबेरे चतुर्दशी हो जायगी ॥ ५-६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भवाननुगतो रामं जामदग्न्यं महाबलम् ।
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पूर्ववृत्तस्य कर्मणः ॥ ७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—मुने! आप महाबली परशुरामजीके अनुगत भक्त हैं। उन्होंने पहले जो-जो कार्य किये हैं, उन सबको आपने प्रत्यक्ष देखा है ॥ ७ ॥
स भवान् कथयत्वद्य यथा रामेण निर्जिताः ।
आहवे क्षत्रियाः सर्वे कथं केन च हेतुना ॥ ८ ॥
अतः हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि परशुरामजीने किस प्रकार और किस कारणसे समस्त क्षत्रियोंको युद्धमें पराजित किया था। आप वह सब वृत्तान्त आज मुझे बताइये ॥ ८ ॥
अकृतव्रण उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् ।
भृगूणां राजशार्दूल वंशे जातस्य भारत ॥ ९ ॥
अकृतव्रणने कहा—भरतकुलभूषण नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! भृगुवंशी परशुरामजीकी कथा बहुत बड़ी और उत्तम है, मैं आपसे उसका वर्णन करूँगा ॥ ९ ॥
रामस्य जामदग्न्यस्य चरितं देवसम्मितम् ।
हैहयाधिपतेश्चैव कार्तवीर्यस्य भारत ॥ १० ॥
भारत! जमदग्निकुमार परशुराम तथा हैहयराज कार्तवीर्यका चरित्र देवताओंके तुल्य है ॥ १० ॥
रामेण चार्जुनो नाम हैहयाधिपतिर्हतः ।
तस्य बाहुशतान्यासंत्रीणि सप्त च पाण्डव ॥ ११ ॥
पाण्डुनन्दन! परशुरामजीने अर्जुन नामसे प्रसिद्ध जिस हैहयराज कार्तवीर्यका वध किया था, उसके एक हजार भुजाएँ थीं ॥ ११ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन विमानं काञ्चनं तथा ।
ऐश्वर्यं सर्वभूतेषु पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ १२ ॥
पृथिवीपते! श्रीदत्तात्रेयजीकी कृपासे उसे एक सोनेका विमान मिला था और भूतलके सभी प्राणियोंपर उसका प्रभुत्व था ॥ १२ ॥
अव्याहतगतिश्चैव रथस्तस्य महात्मनः ।
रथेन तेन तु सदा वरदानेन वीर्यवान् ॥ १३ ॥
ममर्द देवान् यक्षांश्च ऋषींश्चैव समन्ततः ।
भूतांश्चैव स सर्वांस्तु पीडयामास सर्वतः ॥ १४ ॥
महामना कार्तवीर्यके रथकी गतिको कोई भी रोक नहीं सकता था। उस रथ और वरके प्रभावसे शक्तिसम्पन्न हुआ कार्तवीर्य अर्जुन सब ओर घूमकर सदा देवताओं, यक्षों तथा ऋषियोंको रौंदता फिरता था और सम्पूर्ण प्राणियोंको भी सब प्रकारसे पीड़ा देता था ॥ १३-१४ ॥
ततो देवाः समेत्याहुर्ऋषयश्च महाव्रताः ।
देवदेवं सुरारिघ्नं विष्णुं सत्यपराक्रमम् ॥ १५ ॥
भगवन् भूतरक्षार्थमर्जुनं जहि वै प्रभो ।
विमानेन च दिव्येन हैहयाधिपतिः प्रभुः ॥ १६ ॥
शचीसहायं क्रीडन्तं धर्षयामास वासवम् ।
ततस्तु भगवान् देवः शक्रेण सहितस्तदा ।
कार्तवीर्यविनाशार्थं मन्त्रयामास भारत ॥ १७ ॥
कार्तवीर्यका ऐसा अत्याचार देख देवता तथा महान् व्रतका पालन करनेवाले ऋषि मिलकर दैत्योंका विनाश करनेवाले सत्यपराक्रमी देवाधिदेव भगवान् विष्णुके पास जा इस प्रकार बोले—'भगवन्! आप समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये कृतवीर्यकुमार अर्जुनका वध कीजिये।' एक दिन शक्तिशाली हैहयराजने दिव्य विमानद्वारा शचीके साथ क्रीड़ा करते हुए देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया। भारत! तब भगवान् विष्णुने कार्तवीर्य अर्जुनका नाश करनेके सम्बन्धमें इन्द्रके साथ विचार-विनिमय किया ॥ १५-१७ ॥
यत् तद् भूतहितं कार्यं सुरेन्द्रेण निवेदितम् ।
सम्प्रतिश्रुत्य तत् सर्वं भगवाँल्लोकपूजितः ॥ १८ ॥
जगाम बदरीं रम्यां स्वमेवाश्रममण्डलम् ।
समस्त प्राणियोंके हितके लिये जो कार्य करना आवश्यक था उसे देवेन्द्रने बताया। तत्पश्चात् विश्ववन्दित भगवान् विष्णुने वह सब कार्य करनेकी प्रतिज्ञा करके अत्यन्त रमणीय बदरीतीर्थकी यात्रा की, जहाँ उनका अपना ही विस्तृत आश्रम था ॥ १८ १/२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु पृथिव्यां पृथिवीपतिः ॥ १९ ॥
कान्यकुब्जे महानासीत् पार्थिवः सुमहाबलः ।
गाधीति विश्रुतो लोके वनवासं जगाम ह ॥ २० ॥
वने तु तस्य वसतः कन्या जज्ञेऽप्सरःसमा ।
ऋचीको भार्गवस्तां च वरयामास भारत ॥ २१ ॥
इसी समय इस भूतलपर कान्यकुब्जदेशमें एक महाबली महाराज शासन करते थे जो गाधिके नामसे विख्यात थे। वे राजधानी छोड़कर वनमें गये और वहीं रहने लगे। उनके वनवासकालमें ही एक कन्या उत्पन्न हुई जो अप्सराके समान सुन्दरी थी। भारत! विवाहके योग्य होनेपर भृगुपुत्र ऋचीक मुनिने उसका वरण किया ॥ १९—२१ ॥
तमुवाच ततो गाधिर्ब्राह्मणं संशितव्रतम् ।
उचितं नः कुले किंचित् पूर्वैर्यत् सम्प्रवर्तितम् ॥ २२ ॥
एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
सहस्रं वाजिनां शुल्कमिति विद्धि द्विजोत्तम ॥ २३ ॥
उस समय राजा गाधिने कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षि ऋचीकसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! हमारे कुलमें पूर्वजोंने जो कुछ शुल्क लेनेका नियम चला रखा है, उसका पालन करना हमलोगोंके लिये भी उचित है। अतः आप यह जान लें कि इस कन्याके लिये एक सहस्र वेगशाली अश्व शुल्करूपमें देने पड़ेंगे, जिनके शरीरका रंग तो सफेद और पीला मिला हुआ-सा और कान एक ओरसे काले रंगके हों॥ २२-२३॥
न चापि भगवान् वाच्यो दीयतामिति भार्गव ।
देया मे दुहिता चैव त्वद्विधाय महात्मने ॥ २४ ॥
‘भृगुनन्दन! आप कोई निन्दनीय तो हैं नहीं, यह शुल्क चुका दीजिये, फिर आप-जैसे महात्माको मैं अवश्य अपनी कन्या ब्याह दूँगा’॥ २४ ॥
ऋचीक उवाच
एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
दास्याम्यश्वसहस्रं ते मम भार्या सुतास्तु ते ॥ २५ ॥
ऋचीक बोले—राजन्! मैं आपको एक ओरसे श्याम कर्णवाले पाण्डुरंगके वेगशाली अश्व एक हजारकी संख्यामें अर्पित करूँगा। आपकी पुत्री मेरी धर्मपत्नी बने॥ २५॥
अकृतव्रण उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय राजन् वरुणमब्रवीत् ।
एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ॥ २६ ॥
सहस्रं वाजिनामेकं शुल्कार्थं मे प्रदीयताम् ।
तस्मै प्रादात् सहस्रं वै वाजिनां वरुणस्तदा ॥ २७ ॥
अकृतव्रण कहते हैं—राजन्! इस प्रकार शुल्क देनेकी प्रतिज्ञा करके ऋचीक मुनिने वरुणके पास जाकर कहा—‘देव! मुझे शुल्कमें देनेके लिये एक हजार ऐसे अश्व प्रदान करें, जिनके शरीरका रंग पाण्डुर और कान एक ओरसे श्याम हों। साथ ही वे सभी अश्व तीव्रगामी होने चाहिये।’ उस समय वरुणने उनकी इच्छाके अनुसार एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दे दिये॥
तदश्वतीर्थं विख्यातमुत्थिता यत्र ते हयाः ।
गङ्गायां कान्यकुब्जे वै ददौ सत्यवतीं तदा ॥ २८ ॥
ततो गाधिः सुतां चास्मै जन्याश्चासन् सुरास्तदा ।
लब्ध्वा हयसहस्रं तु तांश्च दृष्ट्वा दिवौकसः ॥ २९ ॥
जहाँ वे श्यामकर्ण घोड़े प्रकट हुए थे, वह स्थान अश्वतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। तत्पश्चात् राजा गाधिने शुल्करूपमें एक हजार श्यामकर्ण घोड़े प्राप्त करके गंगातटपर कान्यकुब्ज नगरमें ऋचीक मुनिको अपनी पुत्री सत्यवती ब्याह दी! उस समय देवता बराती बने थे। देवता उन सबको देखकर वहाँसे चले गये ।। २८-२९ ।।
धर्मेण लब्ध्वा तां भार्यामृचीको द्विजसत्तमः ।
यथाकामं यथाजोषं तया रेमे सुमध्यया ।। ३० ।।
विप्रवर ऋचीकने धर्मपूर्वक सत्यवतीको पत्नीरूपमें प्राप्त करके उस सुन्दरीके साथ अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक रमण किया ।। ३० ।।
तं विवाहे कृते राजन् सभार्यमवलोककः ।
आजगाम भृगुः श्रेष्ठं पुत्रं दृष्ट्वा ननन्द ह ।। ३१ ।।
राजन्! विवाह करनेके पश्चात् पत्नीसहित ऋचीकको देखनेके लिये महर्षि भृगु उनके आश्रमपर आये और अपने श्रेष्ठ पुत्रको विवाहित देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए ।। ३१ ।।
भार्यापती तमासीनं गुरुं सुरगणार्चितम् ।
अर्चित्वा पर्युपासीनौ प्राञ्जली तस्थतुस्तदा ।। ३२ ।।
उन दोनों पति-पत्नीने पवित्र आसनपर विराजमान देववृन्दवन्दित गुरु (पिता एवं श्वशुर)-का पूजन किया और उनकी उपासनामें संलग्न हो वे हाथ जोड़े खड़े रहे ।। ३२ ।।
ततः स्नुषां स भगवान् प्रहृष्टो भृगुरब्रवीत् ।
वरं वृणीष्व सुभगे दाता ह्यस्मि तवेप्सितम् ।। ३३ ।।
भगवान् भृगुने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपनी पुत्रवधूसे कहा—'सौभाग्यवती बहू! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी इच्छाके अनुरूप वर प्रदान करूँगा' ।। ३३ ।।
सा वै प्रसादयामास तं गुरुं पुत्रकारणात् ।
आत्मनश्चैव मातुश्च प्रसादं च चकार सः ।। ३४ ।।
सत्यवतीने श्वशुरको अपने और अपनी माताके लिये पुत्र-प्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्रसन्न किया। तब भृगुजीने उसपर कृपादृष्टि की ।। ३४ ।।
भृगुरुवाच
ऋतौ त्वं चैव माता च स्नाते पुंसवनाय वै ।
आलिङ्गेतां पृथग् वृक्षौ साश्वत्थं त्वमुदुम्बरम् ।। ३५ ।।
**भृगुजी बोले—**बहू! ऋतुकालमें स्नान करनेके पश्चात् तुम और तुम्हारी माता पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे दो भिन्न-भिन्न वृक्षोंका आलिंगन करो। तुम्हारी माता तो पीपलका और तुम गूलरका आलिंगन करना ।। ३५ ।।
चरुद्वयमिदं भद्रे जनन्याश्च तवैव च ।
विश्वमावर्तयित्वा तु मया यत्नेन साधितम् ।। ३६ ।।
भद्रे! मैंने विराट् पुरुष परमात्माका चिन्तन करके तुम्हारे और तुम्हारी माताके लिये यत्नपूर्वक दो चरु तैयार किये हैं ।। ३६ ।।
प्राशितव्यं प्रयत्नेन चेत्युक्त्वादर्शनं गतः ।
आलिङ्गने चरौ चैव चक्रतुस्ते विपर्ययम् ॥ ३७ ॥
तुम दोनों प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने चरुका भक्षण करना; ऐसा कहकर भृगुजी अन्तर्धान हो गये। इधर सत्यवती और उसकी माताने वृक्षोंके आलिंगन और चरु-भक्षणमें उलट-फेर कर दिया ॥ ३७ ॥
ततः पुनः स भगवान् काले बहुतिथे गते ।
दिव्यज्ञानाद् विदित्वा तु भगवानागतः पुनः ॥ ३८ ॥
तदनन्तर बहुत दिन बीतनेपर भगवान् भृगु अपनी दिव्य ज्ञानशक्तिसे सब बातें जानकर पुनः वहाँ आये ॥ ३८ ॥
अथोवाच महातेजा भृगुः सत्यवतीं स्नुषाम् ।
उपयुक्तश्चरुर्भद्रे वृक्षे चालिङ्गनं कृतम् ॥ ३९ ॥
विपरीतेन ते सुभ्रूर्मात्रा चैवासि वञ्चिता ।
ब्राह्मणः क्षत्रवृत्तिर्वै तव पुत्रो भविष्यति ॥ ४० ॥
उस समय महातेजस्वी भृगु अपनी पुत्रवधू सत्यवतीसे बोले—‘भद्रे! तुमने जो चरुभक्षण और वृक्षोंका आलिङ्गन किया है, उसमें उलट-फेर करके तुम्हारी माताने तुम्हें ठग लिया। सुभ्रू! इस भूलके कारण तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचारवाला होगा’ ॥ ३९-४० ॥
क्षत्रियो ब्राह्मणाचारो मातुस्तव सुतो महान् ।
भविष्यति महावीर्यः साधूनां मार्गमास्थितः ॥ ४१ ॥
‘और तुम्हारी माताका पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित आचार-विचारका पालन करनेवाला होगा। वह महापराक्रमी बालक साधु-महात्माओंके मार्गका अवलम्बन करेगा’ ॥ ४१ ॥
ततः प्रसादयामास श्वशुरं सा पुनः पुनः ।
न मे पुत्रो भवेदीदृक् कामं पौत्रो भवेदिति ॥ ४२ ॥
तब सत्यवतीने बारंबार प्रार्थना करके पुनः अपने श्वशुरको प्रसन्न किया और कहा—‘भगवन्! मेरा पुत्र ऐसा न हो। भले ही, पौत्र क्षत्रियस्वभावका हो जाय’ ॥ ४२ ॥
एवमस्त्विति सा तेन पाण्डव प्रतिनन्दिता ।
जमदग्निं ततः पुत्रं जज्ञे सा काल आगते ॥ ४३ ॥
पाण्डुनन्दन! तब ‘एवमस्तु’ कहकर भृगुजीने अपनी पुत्रवधूका अभिनन्दन किया। तत्पश्चात् प्रसवका समय आनेपर सत्यवतीने जमदग्निनामक पुत्रको जन्म दिया ॥ ४३ ॥
तेजसा वर्चसा चैव युक्तं भार्गवनन्दनम् ।
स वर्धमानस्तेजस्वी वेदस्याध्ययनेन च ॥ ४४ ॥
बहूनृषीन् महातेजाः पाण्डवेयात्यवर्तत ।
भार्गवनन्दन जमदग्नि तेज और ओज (बल) दोनोंसे सम्पन्न थे। युधिष्ठिर! बड़े होनेपर महातेजस्वी जमदग्नि मुनि वेदाध्ययनद्वारा अन्य बहुत-से ऋषियोंसे आगे बढ़ गये ।। ४४ १/२ ।।
तं तु कृत्स्नो धनुर्वेदः प्रत्यभाद् भरतर्षभ ।
चतुर्विधानि चास्त्राणि भास्करोपमवर्चसम् ।। ४५ ।।
भरतश्रेष्ठ! सूर्यके समान तेजस्वी जमदग्निकी बुद्धिमें सम्पूर्ण धनुर्वेद और चारों प्रकारके अस्त्र स्वतः स्फुरित हो गये ।। ४५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कार्तवीर्योपाख्याने पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कार्तवीर्योपाख्यानविषयक एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११५ ।।