महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 805, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंउचितं नः कुले किंचित् पूर्वैर्यत् सम्प्रवर्तितम् ॥ २२ ॥
एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
सहस्रं वाजिनां शुल्कमिति विद्धि द्विजोत्तम ॥ २३ ॥
उस समय राजा गाधिने कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षि ऋचीकसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! हमारे कुलमें पूर्वजोंने जो कुछ शुल्क लेनेका नियम चला रखा है, उसका पालन करना हमलोगोंके लिये भी उचित है। अतः आप यह जान लें कि इस कन्याके लिये एक सहस्र वेगशाली अश्व शुल्करूपमें देने पड़ेंगे, जिनके शरीरका रंग तो सफेद और पीला मिला हुआ-सा और कान एक ओरसे काले रंगके हों॥ २२-२३॥
न चापि भगवान् वाच्यो दीयतामिति भार्गव ।
देया मे दुहिता चैव त्वद्विधाय महात्मने ॥ २४ ॥
‘भृगुनन्दन! आप कोई निन्दनीय तो हैं नहीं, यह शुल्क चुका दीजिये, फिर आप-जैसे महात्माको मैं अवश्य अपनी कन्या ब्याह दूँगा’॥ २४ ॥
ऋचीक उवाच
एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ।
दास्याम्यश्वसहस्रं ते मम भार्या सुतास्तु ते ॥ २५ ॥
ऋचीक बोले—राजन्! मैं आपको एक ओरसे श्याम कर्णवाले पाण्डुरंगके वेगशाली अश्व एक हजारकी संख्यामें अर्पित करूँगा। आपकी पुत्री मेरी धर्मपत्नी बने॥ २५॥
अकृतव्रण उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय राजन् वरुणमब्रवीत् ।
एकतः श्यामकणीनां पाण्डुराणां तरस्विनाम् ॥ २६ ॥
सहस्रं वाजिनामेकं शुल्कार्थं मे प्रदीयताम् ।
तस्मै प्रादात् सहस्रं वै वाजिनां वरुणस्तदा ॥ २७ ॥
अकृतव्रण कहते हैं—राजन्! इस प्रकार शुल्क देनेकी प्रतिज्ञा करके ऋचीक मुनिने वरुणके पास जाकर कहा—‘देव! मुझे शुल्कमें देनेके लिये एक हजार ऐसे अश्व प्रदान करें, जिनके शरीरका रंग पाण्डुर और कान एक ओरसे श्याम हों। साथ ही वे सभी अश्व तीव्रगामी होने चाहिये।’ उस समय वरुणने उनकी इच्छाके अनुसार एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दे दिये॥
तदश्वतीर्थं विख्यातमुत्थिता यत्र ते हयाः ।
गङ्गायां कान्यकुब्जे वै ददौ सत्यवतीं तदा ॥ २८ ॥
ततो गाधिः सुतां चास्मै जन्याश्चासन् सुरास्तदा ।
लब्ध्वा हयसहस्रं तु तांश्च दृष्ट्वा दिवौकसः ॥ २९ ॥