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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 1079 में से

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पृष्ठ 476

सूर्यप्रभ द्वारा सम्मानिता जया इतना कहकर अन्तर्हित हो गई। सुमेरु ने भी उसी दिन
शीघ्रता पूर्वक लग्न का निश्चय किया और वहीं पर उत्तुंग महामूल्य रत्नों के स्तम्भों तथा छतों
से युक्त सुन्दर वेदी बनवाई। रत्नों की चमकीली लाल किरणों से मानों वेदी सब ओर से
अग्नि द्वारा छाई हुई-सी लग रही थी ॥१२९-३१ ॥
वहीं उसने अपनी सुन्दरी कन्या कामचूड़ामणि को बुलवाया जिसके लावण्य को चंचल
होकर देवता और असुर सभी अपने नेत्रों से पी रहे थे ॥१३२॥
उमा हिमालय से उत्पन्न हुई थी और यह सुमेरु से। मानो इसीलिए वह पार्वती के
समान सुन्दरी थी ॥१३३॥
तदनन्तर, विवाह-वेश में सजी हुई कन्या को सुमेरु ने वेदी पर बैठाकर उसे सूर्यप्रभ को
प्रदान कर दिया ॥१३४॥
सूर्यप्रभ ने भी तन्तु आदि के द्वारा बाँधे गये कामचूड़ामणि के हाथ को ग्रहण
किया ॥१३५॥
पहले लाजा-होम के समय उसी क्षण आई हुई और पार्वती द्वारा भेजी गई जया ने
मन्दरो नाम की दिव्य माला उसे प्रदान की। सुमेरु ने भी अनन्त और अमूल्य रत्न उस अवसर
पर प्रदान किए और ऐरावत से उत्पन्न सुन्दर हाथी भी प्रदान किया ॥१३६-१३६॥
दूसरे लाजा-होम के समय जया ने एक रत्नों की माला भेंट की जिसके गले में रहने पर
मृत्यु, भूख और प्यास का कष्ट नहीं होता था ॥१३७॥
सुमेरु ने भी पहले से अधिक धनराशि और उच्चैश्रवा से उत्पन्न घोड़े का बच्चा
प्रदान किया ॥१३८॥
तीसरे लाजा-हवन के समय जया ने मोतियों की एक लड़ीवाली माला दी। जिसके गले
में रहने से यौवन का क्षय नहीं होता था ॥१३९॥
और, सुमेरु ने भी तिगुनी धनराशि और सब प्रकार की सिद्धियों के उपयोग में आनेवाली
एक अँगूठी दी ॥१४० ॥
इस प्रकार, विवाह-संस्कार पूर्ण होने पर सुमेरु ने सुरों असुरों विद्याधरों और दैवमाताओं
से इस प्रकार निवेदन किया ॥१४१॥
आज आप लोगों को मेरे घर पर भोजन करना चाहिए और मुझ पर कृपा करनी चाहिए।
मैं सिर पर अंजलि बाँधकर आप लोगों से निवेदन करता हूँ ॥१४२॥
उन सब ने जब भोजन करना न चाहा, तब शिवजी का नन्दी वहाँ आकर
उपस्थित हुआ ॥१४३॥