कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
७४६ कथासरित्सागर
७४६ कथासरित्सागर
तन्मिन्नहं समं शुक्या शुकस्तस्यां कृतालयः ।
तस्मादपोढमुत्पन्नस्तस्यां दुष्कर्मयोगतः ॥४३८॥
जातस्य च मे माता शुकी सा पञ्चतां गता ।
तातस्तु वृद्धः पक्षांस्तः क्षिप्त्वा वर्धयति स्म माम् ॥४३९॥
निग्म्यशुकानीतमुक्तशेषफलानि च ।
मन्नन् मह्यं च वितरन्नथ तत्रास्त मन्पिता ॥४४०॥
एकदा तत्र सूयाग्निष्मातपोग्रार्जुननादिनी ।
आग्नेत्वाय समगाद् भिल्लसेना भयङ्करी ॥४४१॥
विद्रस्तकृष्णमागक्षी धूलिव्यालोसितांशुका ।
सम्भ्रमोद्वल्लचमरीविभ्रमत्कवरीभग ॥४४२॥
विद्रुतव्याघ्नुतवाभूत्सहसा सा महाटवी ।
पुल्लिन्वले विविधप्राणिपाताय धावति ॥४४३॥
वृत्तान्वटीदित शूरया दिनमागत्वभूमिपु ।
आगाच्छद्वरमम्यं सत्रास्त पिशितभारवं ॥४४४॥
एवस्तु वृद्धगयरन्तद्रामामान्त्यामिप ।
अद्वाशीत् स त गाधं सुधिवस्तमुपागतम् ॥४४५॥
आगत्य च स तत्राणू शुक्तानन्यांश्च पक्षिणः ।
आरूढ्यारूह्य नीडेभ्यो हत्वा हत्या भुवि क्ष्यपात् ॥४४६॥
मपायान्तं च निकटं यमविस्फुरदन्निभम् ।
मं दृष्ट्वा भयाल्लीनो हन पक्षांन्तरं पितुः ॥४४७॥
तावत्नाम्मरतुमाय स प्राप्यारूह्यथ पातरौ ।
तान्तं म पीडितग्रीवं हत्या तन्मन्वधिक्षिपत् ॥४४८॥
अयं च तातेन समं पतित्वा तस्य कण्ठने ।
निगल्प शष्पन्तंग भयं प्राविन शनैः ॥४४९॥
अपार्याथ भित्नात्रावमो भग्नतमाश्रयन् ।
श्वानन्पाग्गमानाय पातं पत्तौ निशामगात् ॥४५०॥
तत्र तातमया दृष्ट्वाऽथ नीत्वा निशामयम् ।
शाभूदिन्यमुनि रन्त्येष्वति भागणः ॥४५१॥
अनन्तं फालगण्डूषप प्रवृन्तमन्तम् ।
तृप्तं पदगम्भीरंरमग्प्रदर्शना ॥४५२॥
दशम स्तबक ४२७
उस वृक्ष में एक सुग्गा सुग्गी के साथ घोंसला बनाकर रहता था। उसी सुग्गी के गर्भ से,
अपने दुष्कर्मों के कारण मैं उत्पन्न हुआ ॥३८॥
मेरे उत्पन्न होते ही वह माता सुग्गी मर गई। पिता वृद्ध थे वे अपने पक्षों के भीतर मुझे
रखकर मेरा पालन-पोषण करते थे ॥३९॥
आसपास सुग्गों के खाकर बचे (फेंके हुए) फलों को खाते हुए और मुझे देते हुए मेरे
पिता मेरा पालन करने लगे ॥४०॥
एक बार शिकार करने के लिए तूणी गोमुख आदि वाद्यों से भीषण शब्द करती हुई
भीलों की भयंकर सेना शिकार करने के लिए उस वन में आई ॥४१॥
उस सेना के भील जब जंगली प्राणियों के विनाश के लिए चारों ओर दौड़-धूप कर रहे थे
तब नाचते हुए कृष्णसार मृग-रूपी आँखोंवाली धूल से भरे हुए पत्तोंवाली भाग्य से घबराकर
इधर-उधर भागते हुए चमरी मृगों के पूँछ-रूपी केशोंवाली वह वनभूमि सहसा व्याकुल
हो उठी ॥४२-४३॥
सारे दिन उस शिकार की भूमि में विनाश-लीला करके मारे हुए पशुओं के मांस को
लादे हुए वह भील-सेना सायंकाल के समय उस वृक्ष के नीचे आ गई ॥४४॥
उसमें एक वृद्ध भील था जिसे मांस नहीं मिला था। उस भूखे भील ने सायंकाल के
समय उस वृक्ष पर दृष्टि डाली और वृक्ष के समीप आ गया ॥४५॥
आकर, तुरन्त ही वृक्ष पर चढ़कर उसने सुग्गा तथा अन्यान्य पक्षियों को घोंसलों से
निकाल-निकालकर और मार-मारकर वृक्ष के नीचे फेंकना प्रारम्भ किया ॥४६॥
उसे यम के किंकर की तरह निकट आया देख मैं भय से अपने पिता के पंखों के बीच
चुपके-से छुपक गया ॥४७॥
जब उस पापी ने क्रमशः मेरे घोंसले को देखकर मेरे पिता को घोंसले से बाहर खींचकर,
गला दबाकर मार डाला और फेंक दिया ॥४८॥
मैं भी अपने पिता के साथ भूमि पर गिरकर और उनके पंख से निकलकर घास और
पत्तों के भीतर धीरे-धीरे घुस गया ॥४९॥
तब वह भील नीचे उतरकर और मारे हुए पक्षियों को आग में भून-भूनकर खाने लगा।
शेष कुछ सुग्गों को लेकर वह पापी अपने गांव को चला गया ॥५०॥